संस्मरण

इनसे खेत आबाद रहे, हमसे जो बर्बाद हुए

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ पहाड़ी पन व मन बरकरार है. यायावर प्रवृति के प्रकाश उप्रेती वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। कोरोना because महामारी के कारण हुए ‘लॉक डाउन’ ने सभी को ‘वर्क फ्राम होम’ के लिए विवश किया। इस दौरान कई पाँव अपने गांवों की तरफ चल दिए तो कुछ काम की वजह से महानगरों में ही रह गए. ऐसे ही प्रकाश उप्रेती जब गांव नहीं जा पाए तो स्मृतियों के सहारे पहाड़ के तजुर्बों को शब्द चित्र का रूप दे रहे हैं। इनकी स्मृतियों का पहाड़ #मेरे #हिस्से #और #किस्से #का #पहाड़ नाम से पूरी एक सीरीज में दर्ज़ है। श्रृंखला, पहाड़ और वहाँ के जीवन को अनुभव व अनुभूतियों के साथ प्रस्तुत करती है। पहाड़ी जीवन के रोचक किस्सों से भरपूर इस सीरीज की धुरी ‘ईजा’ हैं। ईजा की आँखों से पहाड़ का वो जीवन कई हिस्सों और किस्सों में अभिव्यक्ति पा रहा है। प्रस्तुत है उनके संस्मरणों की 47वीं किस्त…

ज्योतिष


मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—47

  • प्रकाश उप्रेती

आज बात पहाड़ में खेती के उन दो औजारों की जिनसे खेत आबाद रहे हैं. बात- “जोव”और “दन्याव” की. अगर पहाड़ के सीढ़ीदार खेत आबाद रहे तो आपको भूखा नहीं मरने देंगे. दोbecause पीढ़ी पहले तक सबकी निर्भरता उन्हीं खेतों पर थी जो आज बंजर हैं. हमारा 18 लोगों का परिवार उन खेतों से पलता था जिनमें “कुछ नहीं होता” का हवाला देकर हम शहरों में नौकर या ‘भन मजुआ’ (बर्तन धोने वाला) हो गए हैं. दिल्ली जाना तब कोई शान नहीं थी. दिल्ली से लौटने वालों को लेकर अम्मा (दादी)एक गाना सुनाती थीं- “दिल्ली बे आ गो भन मजुआ बन बे हिरोकट, देखो कस चप्पल पटको मों पट..पट पट..”.

ज्योतिष

खेतों का बंजर होना तब गाली थी. किसी को ये कह दो कि- “बांज है जी त्यर पटो” (बंजर हो जाएं तुम्हारे खेत) तो झगड़ा हो जाता था. ‘पटो’ (खेत) का बंजर होना जीवन नष्ट हो जाने जैसा था. because हल चलाते हुए अगर थोड़ा सा कोना भी छूट जाता था तो ईजा उसे ‘कुटो’ (कुदाल) से “खन” (खोद) देती थीं और कहतीं -” पटोम वैर भोल नि देख्यन” (खेत में छोटा सा बंजर हिस्सा भी अच्छा नहीं दिखता है). “ढिका- निसा” (खेत के ऊपर-नीचे) जहाँ भी हल न पहुँच पाने से छूट जाता था तो उसे ईजा कुदाल से बराबर कर देती थीं.

ज्योतिष

खेतों में जी तोड़ मेहनत होती थी. हल चलाने से पहले खेतों में ‘ढुङ्ग चाड़ने’ (पत्थर हटाने) और ‘बुज’ (झाड़ियाँ) काटने जाते थे. ईजा शाम को उन सभी खेतों में जाती जिनमें अगले दिन because हल आने वाला हो. हम ईजा के साथ होते थे . खेत पहुँच कर ईजा कहतीं- “च्यला भोव हैं ये पटोम हो ले आणु तू जरा ढुङ्ग चाडि दे, मैं यूँ बुज-बाजि काट दिनों” (बेटा कल इस खेत में हल ने आना है, तू खेत के पत्थर साफ कर दे और मैं झाड़ियाँ काट देती हूँ). हम खेत के छोटे-बड़े पत्थर ऊपर नीचे रखने लग जाते थे. ईजा वो सब झाड़ियाँ काट देती थीं जो हल चलाते हुए बैलों को लग सकती थीं.

ज्योतिष

अक्सर बरसात में खेतों की दीवार गिर जाती थीं. जिस खेत की दीवार गिरती वह तो खराब होता ही था साथ में जिसमें गिरती उस खेत का भी कुछ हिस्सा पत्थरों से भर because जाता था. हल चलाने से पहले इसे साफ करना होता था. खेत की दीवार को ‘भिड़’ कहते थे. भिड़ चिड़ना (दीवार रखना) सबको आता नहीं था. यह एक कला थी.

ज्योतिष

अक्सर बरसात में खेतों की दीवार गिर जाती थीं. जिस खेत की दीवार गिरती वह तो खराब होता ही था साथ में जिसमें गिरती उस खेत का भी कुछ हिस्सा पत्थरों से भर जाता था. हल चलाने से पहले इसे साफ करना होता था. खेत की दीवार को ‘भिड़’ कहते थे. भिड़ चिड़ना (दीवार रखना) सबको आता नहीं था. यह एक कला थी. इसमें पत्थरों को ऐसे सेट करना होता था कि वो गिरे भी न और उनके अंदर because पानी भी न जाए. because इस काम में बुबू माहिर थे. वह जब भी घर पर रहते तो सुबह-शाम किसी न किसी खेत का भिड़ चिड़ने पर लगे रहते थे. वो जब भिड़ चिड़ते तो हमारा काम उनको पत्थर पकड़ाने का होता था.

ज्योतिष

हल चलाने से पहले खेत का साफ होना जरूरी होता था. इसके लिए घर का हर सदस्य किसी न किसी रूप में योगदान देता था. ईजा पर इन दिनों काम का बोझ ज्यादा ही होता था. because वैसे तो उनके लिए साल का हर दिन काम के बोझ के साथ शुरू होता और कमर तोड़ थकान के साथ खत्म होता था. ईजा का सुबह-सुबह ‘हो’ (हल) के साथ जाना और खेत में कुछ न कुछ काम करना लगा रहता था.

ज्योतिष

हमारी तब “हसिया-खैर” (बैलों के नाम) because की जोड़ी इलाके भर में जानी जाती थी. एक झक सफेद और दूसरा हल्का भूरा था. नुकीले सींग, चमकीली आँखे, तकरीबन 4 से साढ़े 4 फुट की ऊंचाई और उनके गले में बंधी ‘घानियों'(घंटियों) की आवाज कई मील दूर तक सुनाई देती थी. because लोग उनकी घानियों की आवाज से ही रास्ता छोड़ देते थे. ईजा ‘ज्योड़’ (रस्सी) से बांधकर उनको ले जाती थीं. हम बस दूर-दूर से उन्हें ‘चटाक’ मारते थे. पास जाने की कभी हिम्मत नहीं होती थी. ईजा भी कहती थीं- “बलदुक धोंणपन झन जाये हां, कचुनि दिल” (जहाँ बैल बंधे हैं, वहाँ मत जाना, कुचल देंगे). हम बस कभी-कभी दीवार में चढ़कर उनकी गले की घानियाँ बजाते थे. उनको खोलने-बांधने की हिम्मत तो कभी आई ही नहीं.

ज्योतिष

खेतों में हल चलाने के साथ- साथ ‘जोव’ (मिट्टी समतल because करने वाला) और ‘दन्याव’ (खेत की गुड़ाई करने वाला) because भी लगाया जाता था. हमारे लिए ‘जोव’ सबसे आकर्षक होता था. ‘जोव’

ज्योतिष

लगाते हुए बुबू हमें उसमें बिठा देते थे. because उनका एक पाँव जोव में रहता और हम पूरा ‘उकुडु’ होकर आगे का डंडा पकडकर उसमें बैठेbecause रहते थे. बैठे-बैठे ही मुँह से हा.. हा.. ब..ब.. बैलों को बोलते रहते थे.

ज्योतिष

6 नुकीली लकड़ियों से बना ये because औजार अनाज उग आने के बाद खरपतवार निकालने के लिए प्रयोग होता था. because दन्याव लगाने में बहुत सावधानी बरतनी होती थी. इससे अनाज के साथ उग आई घास को निकाला जाता था. एक तरह से बैलों के जरिए खेत की गुड़ाई ही इसका काम था. दन्याव कहाँ उठाना है, कब हल्का छोड़ना, कब दबा कर रखना है, कहाँ सिर्फ तीन ही डंडों को जमीन में गाड़ना है, सब एक कला होती थी. तब हम इस कला में परिपक्व नहीं थे.

ज्योतिष

खेत बोने की प्रक्रिया में हमारे लिए यही रोमांचकारी चीज होती थी. हल बुबू कम ही छूने देते थे. उनको खेत में सीधा और परफेक्ट हल चला हुआ चाहिए होता था. हम खेत बिगाड़ देंगे के डर से वो हल चलाने नहीं देते थे. फिर जोअ ही ऐसी चीज थी जो हमें न चाहते हुए भी खेतों में खींच लाती थी.

ज्योतिष

दन्याव सबसे जटिल होता था. 6 नुकीली लकड़ियों से बना ये औजार अनाज उग आने के बाद खरपतवार निकालने के लिए प्रयोग होता था. दन्याव लगाने में बहुत सावधानी बरतनी होती थी. because इससे अनाज के साथ उग आई घास को निकाला जाता था. एक तरह से बैलों के जरिए खेत की गुड़ाई ही इसका काम था. दन्याव कहाँ उठाना है, कब हल्का छोड़ना, कब दबा कर रखना है, कहाँ सिर्फ तीन ही डंडों को जमीन में गाड़ना है, सब एक कला होती थी. तब हम इस कला में परिपक्व नहीं थे.

ज्योतिष

दन्याव बरसात में ही लगता था इसलिए ध्यान देना होता था कि घास के साथ अनाज भी न निकल जाए. मंडुवे में दन्याव लगता था. ईजा दन्याव के पीछे-पीछे घास की मिट्टी हटाती चलती थीं. अगर कोई मंडुवे का पौंधा निकल जाता तो तुरंत उसे इधर-उधर रोप देती थीं. दन्याव लगने वाले खेत में एक बार ईजा पहुँच जाती थीं तो फिर उनकी कमर because सीधी नहीं होती. वह बस झुके-झुके ही लगे रहती थीं. हम कभी ‘ढिकोक भिड़म’ (नीचे की दीवार में) तो कभी ‘निसायिक भिड़म’ (ऊपर की दीवार में) बैठे रहते थे. बस जो घट रहा होता था उसे देखते रहते थे. ईजा कई बार कहती भी थीं- “पटोपन काम कहें आ रछे कि भिड़म बैठे हैं” (खेत में काम करने के लिए आया है कि दीवार में बैठने के लिए). ईजा की बातों को सुना-अनसुना कर हम अपनी ही दुनिया में खोए रहते थे.

ज्योतिष

अब पहाड़ के खेतों के लिए “पटोपन के नि होन” ब्रह्म वाक्य बन गया है. धीरे-धीरे खेत बंजर हो गए हैं. पहले जो गाली थी उसका आज जश्न मन रहा है. ईजा जब हमारे कुछ बंजर because खेत देखती हैं तो कहती हैं- “यूँ बंज पटोउकें देख्य बे म्यर हिको चिरी आँछ’. ईजा की पीड़ा और दुःख को शब्द नहीं भाव बयान करते हैं और हम भावों को शायद समझते ही नहीं हैं…

ज्योतिष

इस पूरी प्रक्रिया और मेहनत का नतीजा वो होता था जिससे बड़े-बड़े परिवारों का पालन-पोषण हो जाता था. अब पहाड़ के खेतों के लिए “पटोपन के नि होन” (खेतों में कुछ नहीं होता) ब्रह्म वाक्य बन गया है. धीरे-धीरे खेत बंजर हो गए हैं. पहले जो गाली थी उसका आज जश्न मन रहा है. ईजा जब हमारे कुछ बंजर खेत देखती हैं तो because कहती हैं- “यूँ बंज पटोउकें देख्य बे म्यर हिको चिरी आँछ’ (इन बंजर खेतों को देखकर मेरा दिल फट जाता है). ईजा की पीड़ा और दुःख को शब्द नहीं भाव बयान करते हैं और हम भावों को शायद समझते ही नहीं हैं…

ज्योतिष

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में because असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

Share this:

Himantar Uttarakhand

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *