November 30, 2020
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संस्मरण

एक दौर ऐसा भी था- गुजरे जमाने की चिट्ठी-पत्री का

भुवन चन्द्र पन्त गुजरे जमाने के साथ ही कई रवायतें अतीत के गर्भ में दफन हो गयी,  इन्हीं में एक है- चिट्ठी-पत्री. एक समय ऐसा भी था कि गांव में पोस्टमैंन आते ही लोगों की निगाहें उस पर टिक जाती कि परदेश में रह रहे बच्चों अथवा रिश्तेदारों की कुशल क्षेम वाला पत्र पोस्टमैन ला […]
संस्मरण

च्यला देवी थान हैं ले द्वी बल्हड़ निकाल दिए

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—32 प्रकाश उप्रेती आज बात-“उमि” की. कच्चे गेहूँ की बालियों को आग में पकाने की प्रक्रिया को ही ‘उमि’ कहा जाता था. गेहूँ कटे और उमि न पके ऐसा हो ही नहीं सकता था. उमि पकाने के पीछे का एक भाव ‘तेरा तुझको अर्पण’ वाला था. साथ ही गेहूँ […]
समाज/संस्कृति

पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला

अशोक जोशी देवभूमि, तपोभूमि, हिमवंत, जैसे कई  पौराणिक नामों से विख्यात हमारा उत्तराखंड जहां अपनी खूबसूरती, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं धार्मिक तीर्थ स्थलों के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध है,  तो वहीं यहां के लोक पर्व भी पीछे नहीं, जो इसे ऐतिहासिक दर्जा प्रदान करने में अपनी एक अहम भूमिका रखते हैं. हिमालयी, धार्मिक व […]
संस्मरण

अम्मा का वो रेडियो

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—31 प्रकाश उप्रेती आज बात- “आम्क- रेडू” (दादी का रेडियो) की. तब शहरों से गाँव की तरफ रेडियो कदम रख ही रहा था. अभी कुछ गाँव और घरों तक पहुँचा ही था. परन्तु इसकी गूँज और गुण पहाड़ की फ़िज़ाओं में फैल चुके थे. इसकी रुमानियत ‘रूडी महिनेक पौन […]
स्मृति शेष

पहाड़ की माटी की सुगंध से उपजा कलाकार : वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’   

पुण्यतिथि (8 जुलाई) पर विशेष डॉ. मोहन चन्द तिवारी आज उत्तराखंड की लोक संस्कृति के पुरोधा वंशीधर पाठक जिज्ञासु जी की पुण्यतिथि है. जिज्ञासु जी ने कुमाऊं और गढ़वाल के लोक गायकों, लोक कवियों और साहित्यकारों को आकाशवाणी के मंच से जोड़ कर उन्हें प्रोत्साहित करने का जो महत्त्वपूर्ण कार्य किया और आकाशवाणी से प्रसारित […]
संस्मरण

दो देशों की साझा प्रतिनिधि थीं कबूतरी देवी

पुण्यतिथि पर (7 जुलाई) विशेष हेम पन्त नेपाल-भारत की सीमा के पास लगभग 1945 में पैदा हुई कबूतरी दी को संगीत की शिक्षा पुश्तैनी रूप में हस्तांतरित हुई. परम्परागत लोकसंगीत को उनके पुरखे अगली पीढ़ियों को सौंपते हुए आगे बढ़ाते गए. शादी के बाद कबूतरी देवी अपने ससुराल पिथौरागढ़ जिले के दूरस्थ गांव क्वीतड़ (ब्लॉक […]
साहित्यिक हलचल

‘दुदबोलि’ के रचना शिल्पी, साहित्यकार और समलोचक मथुरादत्त मठपाल

80वें जन्मदिन पर विशेष डा. मोहन चंद तिवारी 29 जून को जाने माने कुमाऊंनी साहित्यकार श्रद्धेय मथुरादत्त मठपाल जी का जन्मदिन है. उत्तराखंड के इस महान शब्दशिल्पी,रचनाकार और कुमाउनी दुदबोलि को भाषापरक साहित्य के रूप में पहचान दिलाने वाले ऋषिकल्प भाषाविद श्री मथुरादत्त मठपाल जी का व्यक्तित्व और कृतित्व उत्तराखंड के साहित्य सृजन के क्षेत्र […]
संस्मरण

घुल्यास की दुनिया

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—28 प्रकाश उप्रेती आज बात- ‘घुल्यास’ की. घुल्यास मतलब एक ऐसी लकड़ी जो पहाड़ की जिंदगी में किसी बड़े औजार से कम नहीं थी. लम्बी और आगे से मुड़ी हुई यह लकड़ी खेत से जंगल तक हर काम में आगे रहती थी. बगीचे से आम, माल्टा, और अमरूद की […]
समाज/संस्कृति

उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू होता है वैदिक जल प्रबंधन व कृषि प्रबन्धन का स्वर्णिम इतिहास

भारत की जल संस्कृति-6 डॉ. मोहन चन्द तिवारी मैंने अपने पिछले लेख में वैदिक जलविज्ञान के प्राचीन इतिहास के बारे में बताया है कि वेदों के मंत्रद्रष्टा ऋषियों में ‘सिन्धुद्वीप’ सबसे पहले जलविज्ञान के आविष्कारक ऋषि हुए हैं, जिन्होंने जल के प्रकृति वैज्ञानिक‚ औषधि वैज्ञानिक, मानसून वैज्ञानिक और कृषिवैज्ञानिक महत्त्व को वैदिक संहिताओं के काल […]
किस्से/कहानियां

दिल्ली जन्नूहू, हेर्या जन

लच्छू की रईसी के किस्से कमलेश चंद्र जोशी बात तब की है जब दूर दराज गॉंव के लोगों के लिए दिल्ली सिर्फ एक सपनों का शहर हुआ करता था. उत्तराखंड के लगभग हर पहाड़ी परिवार का एक बच्चा फौज में होता ही था बाकी जो भर्ती में रिजेक्ट हो जाते वो या तो आवारा घूमते […]