धर्मस्थल

सुखादेवी: शुकवती का उद्गम व सरस्वती का संगम स्थल

कुमाऊं क्षेत्र के उपेक्षित मन्दिर – 4 

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

द्वाराहाट में गर्ग आश्रम से निकलने वाली गार्गी नदी गगास के पौराणिक इतिहास के बारे में तो सब जानते हैं किंतु ‘सुखादेवी’ (Sukhadevi) आश्रम से निकलने वाली इस नदी की बड़ी बहिन गुमनाम ‘शुकवती’ के बारे में कोई नहीं जानता. आजकल महावतार बाबा की गुफा दिखाने वाली टूरिस्ट संस्थाओं द्वारा भी विदेशी टूरिस्टों को आकर्षित करने के लिए पुराण प्रसिद्ध ‘शुकवती’ because नदी के उद्भव स्थान ‘सुखादेवी’ को ‘स्वेता देवी’ का एक नया नाम देकर  द्रोणगिरि क्षेत्र और इस देवी स्थल को शुकदेव मुनि की तपःस्थली बताकर द्रोणगिरि और गगास घाटी की समूची नदी परम्परा और उसके निकट बसे ऐतिहासिक शैव मंदिरों के इतिहास की भी विकृत व्याख्या की जा रही है.जिस सरस्वती नदी की वेदों में श्रेष्ठतम माता, श्रेष्ठतम नदी और श्रेष्ठतम देवी के रूप में स्तुतिगान हुआ है,उसे ‘स्वेता देवी’ का एक नया नाम देकर द्रोणगिरि क्षेत्र के वैदिक कालीन इतिहास पर भी प्रश्न चिह्न लगाने का प्रयास युक्तिसंगत नहीं है.उसी सन्दर्भ में यह शोधलेख द्रोणगिरि के उपेक्षित ‘सुखावती’ मन्दिर और वहां गुप्त सरस्वती और ‘शुकवती’ नदी की पुनर्विवेचना का प्रयास है.

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द्वाराहाट-कुकुछीना मोटर मार्ग में द्वाराहाट से 16 कि.मी.और मंगलीखान से 2 कि.मी. दूर एवं 500 मीटर की ऊंचाई पर सुखादेवी या शुकवती देवी का प्राचीन मन्दिर है. द्रोणगिरि और द्वाराहाट क्षेत्र का अति प्राचीन because तीर्थस्थान होने के बावजूद भी विकास कार्यों की दृष्टि से यह स्थान आज भी उपेक्षित है. सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि वैदिक काल,त्रेता और द्वापर युग के विभिन्न कालखंडों की सभ्यता और नदीमातृक संस्कृति की इतिहास चेतना को समेटता हुआ यह स्थान आज भी सांस्कृतिक मूल्यांकन की दृष्टि से भी सर्वथा उपेक्षित है. यहां आज भी मन्दिर तक पहुंचने के लिए उबड़- खाबड़ मार्ग बना हुआ है. मन्दिर परिसर की अति प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए जो उपाय उत्तराखंड because राज्य के संस्कृति और पुरातत्त्व विभाग को किए जाने चाहिए उस दृष्टि से भी यह दो दो नदियों की उद्गम स्थली उपेक्षित ही है. पर सन्त चन्द्रगिरि महाराज इस सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा और उसके पुनर्निर्माण द्वारा देश की इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा में लगे हैं.

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मंगली खान से दो कि.मी. ऊपर आधा कि.मी.की चढ़ाई चढ़ने के बाद इस सुखावती मंदिर परिसर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है. मेरे आग्रह पर हाल ही में दुनागिरी क्षेत्र के उत्साही युवा गौरव तिवारी,कमल भट्ट और राकेश शाह ने नदी धाराओं के संरक्षण अभियान के तहत पिछले सप्ताह इस क्षेत्र के जलस्रोतों विशेषकर ‘सुखादेवी’ और गर्गाश्रम क्षेत्र के जो चित्र और वीडियो क्लिपें भेजीं हैं, उनमें खंडित मंदिरों because और मन्याओं के निरीक्षण से साफ पता चलता है कि अतीत में यह स्थान भव्य शक्ति पीठ का मंदिर परिसर रहा होगा. वर्त्तमान में यहां दो मन्दिर हैं, एक निर्माणधीन नया मन्दिर है और दूसरा प्राचीन मां सरस्वती देवी का मंदिर,जिसमें एक वृक्ष के नीचे बहुत प्राचीन शिवलिंग है और उसके सामने की ओर वीणा वादिनी देवी सरस्वती की मूर्ति विराजमान है,जो संगमरमर की होने के कारण आधुनिक प्रतीत होती है.

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यहां प्राचीन सरस्वती मंदिर का स्थापत्य द्वाराहाट के कत्यूरी कालीन अर्द्धमंडप शैली से बहुत कुछ मिलता है.मन्दिर के निचले गर्भभाग की दीवारों और छत का नवीनीकरण हो जाने के कारण इसका मूल स्वरूप अब पूरी तरह बदल because गया है किंतु मन्दिर के ऊपर बने नागरी शैली के शिखर और आमलक यह बताते हैं कि कत्यूरी राजाओं ने आदिशक्ति मां दुनागिरी शक्तिपीठ के चरणों में विराजमान होने के कारण द्वाराहाट के मंदिरों के निर्माण से भी पहले इस सुखावती मन्दिर परिसर का निर्माण किया होगा. हालांकि इस मन्दिर की स्थापत्य शैली के अवशेष द्वाराहाट के मंदिर स्थापत्य से कुछ अलग प्रतीत होते हैं,और गिवाड़ घाटी स्थित रामपादुका के निकट बने शैव मन्दिर समूह के शिखर आमलकों से भी इनका बहुत कुछ मिलान किया जा सकता है.

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 यहां सर्वाधिक आकर्षण है – इस प्राचीन मंदिर को छत्रछाया देता हुआ बांज का अति प्राचीन वृक्ष,जो दूर से देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भगवान् शिव नटराज की मुद्रा में नृत्यरत हों या स्थानक मुद्रा में तपस्या कर रहे हों because और पल्लव रूपी केशों और शाखारूपी भुजाओं से उन्होंने मन्दिर की अधिष्ठात्री शक्ति को आलिंगनबद्ध कर रखा हो. इस दिव्य वृक्ष में अनेक देवी देवताओं जैसे,उमा महेश, गणपति, हनुमान, सिंहवाहना दुर्गा देवी और साधनारत योगी संन्यासी आदि विविध प्रकार की आकृतियां झलकती हैं. यहां दूसरे निर्माणाधीन नए मन्दिर को भी इस शक्तिपीठ क़े संरक्षक महंत चन्द्रगिरि जी भव्य रूप देने में लगे हैं.

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यहां एक और नया मन्दिर कक्ष है,जिसमें किसी गुजरात की संस्था ‘श्री सच्चिदानंद सेवा ट्रस्ट,पालसर’ ने भेंट स्वरूप शुकदेव मुनि और शिवलिंग की स्थापना की हुई है,और नेमप्लेट लगाकर इस ‘सुखादेवी’ मंदिर का नाम ही बदल कर उसे “श्री स्वेता मां तथा शुकदेवी जी तपःस्थली, गन्धर्वलोक, श्री शुकदेवी मन्दिर”- का नया नाम दे दिया है, जो सर्वथा असंगत, त्रुटिपूर्ण और इस क्षेत्र की हजारों साल पौराणिक because परम्परा के भी विरुद्ध है. उत्तराखंड में प्रायः यह देखा जाता है कि कुछ छोटे-मोटे निर्माणकार्य करके पर्यटन का व्यापारिक हित साधने के लिए टूरिस्ट संस्थाएं उस सांस्कृतिक धरोहर पर अपना अधिकार जताने के लिए प्रयत्नशील रहती हैं. आज से 25 वर्ष पूर्व जब मैंने द्रोणगिरि पर पुस्तक लेखन के लिए इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया था तो स्थानीय लोग इसे ‘सुखादेवी’ के नाम से ही जानते थे जो शुकादेवी या शुकवती नदी का पौराणिक नाम है,किंतु इसे अब ‘स्वेता देवी’ या शुकदेव मुनि की तपःस्थली घोषित करना इतिहास और पुराण के साथ की गई छेड़छाड़ ही है.

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यहां सुखादेवी के संरक्षक महन्त श्री चन्द्रगिरि because जी की मन्दिर के बारे में मान्यता है कि देवी के रौद्र और शान्त इन दो रूपों में से यहां देवी सरस्वती के शान्त स्वरूप की उपासना की जाती है. उनके अनुसार शुकदेव मुनि ने यहां हिमालय भ्रमण के दौरान सरस्वती देवी की तपस्या की थी.इस प्रकार वर्त्तमान में सुखावती देवी के साथ सरस्वती देवी और मुनि शुकदेव की तपःस्थली होने की जनश्रुतियां लोक प्रचलन में हैं.

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‘इस तीर्थ के प्राचीन इतिहास ‘मानसखंड’ का अवलोकन करें तो यह तीर्थस्थल द्रोणगिरि शक्तिपीठ के बाद इस क्षेत्र का दूसरा बड़ा शक्तिपीठ प्रतीत होता है जिसका विस्तृत वर्णन दो अध्यायों में आया है.

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‘शुकवती’ नदी का उद्गम स्थल ‘सुखादेवी’ में कहां रहा होगा यह आज भी गहन शोध का विषय है, किन्तु इस स्थान के आधे कि.मी.नीचे ‘श्री बजरंगबली धाम’ से एक कि.मी.की दूरी पर ‘सुखादेवी’ का झरना है, जिसे स्थानीय because लोग सुखदेव मुनि का झरना भी कहते हैं. दरअसल, यही वह ‘शुकवती’ नदी का मूलस्रोत है जो ‘शुकवती’ नदी के अस्तित्व को आज भी बचाए हुए है. इसी जलसोत के कारण ‘शुकवती’ नदी की पौराणिक पहचान भी संरक्षित है. त्रेतायुग में हनुमान जी जब द्रोणगिरि से संजीवनी बूटी की खोज में आए थे तो सम्भवतः उन्होंने इसी शुकवती नदी के स्रोत पर स्नान किया होगा, इसलिए स्थानीय लोगों के बीच इस स्थान की पहचान ‘श्री बजरंगबली धाम’ के नाम से आज भी बनी हुई है.

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भारत में वैदिक काल से ही नदियों के स्रोत स्थल because वंदनीय माने गए हैं. बाद में उस नदी को देवी मानकर पूजा जाने लगा और उसके नाम से मन्दिर और आश्रम बनाए जाने लगे. वैदिक काल में सरस्वती नदी के रूप में और देवी के रूप में पूजी जाती थी. ऋग्वेद में इसका स्पष्ट उल्लेख भी आया है –

“अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति.”
                -ऋग्वेद 2.41.16

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‘मानसखंड’ के अनुसार इस तीर्थ का माहात्म्य ‘शुकवती’ नदी के उद्गम स्थल से जुड़ा है जहां गुप्त सरस्वती भी मिलती है. इसलिए यहां ‘सुखादेवी’ में ‘शुकवती’ और ‘सरस्वती’ दोनों नदियों की देवी रूप में पूजा करने की पुरानी because परंपरा रही है.यहीं से ‘शुकवती’ और सरस्वती आपस में संगम करते हुए एक ओर जहां ‘शुकवती’ गगास नदी से संगम करती है तो दूसरी ओर सरस्वती का गुप्त प्रवाह रिस्कन (ऋषिकन्या) घाटी के विभांडेश्वर, सिलोर महादेव आदि तीर्थस्थलों का निर्माण करता हुआ भिकियासैंण के पास रामगंगा में मिल जाता है.

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“मानसखंड’ के अनुसार पहले कृतयुग (सत्ययुग) में इस सुखावती के स्थान पर शुक्र पक्षियों (तोतों) ने मुक्ति की कामना से यमराज की आराधना की थी और प्रसन्न होने के बाद उन्हें तत्त्वज्ञान देते हुए शुकवती और शतधारा के because संगम पर जाकर भगवान् शिव की तपस्या करने का उपदेश दिया था,जिसके कारण इसे ‘शुकवती’ या स्थानीय भाषा में ‘सुखावती’ कहा जाता है. कालांतर में संस्कृत ‘शुक’ का  हिन्दीकरण हो जाने के कारण तथा जनश्रुतियों के माध्यम से ‘शुक’ पक्षी और ‘शुकदेव’ मुनि के नामसाम्य होने से पौराणिक ‘शुकवती’ कुकुछीना स्थित ‘सुखावती’ हो गई और बग्वाली पोखर के ‘शुकेश्वर’ महादेव ‘सुखेश्वर’ कहे जाने लगे.

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प्राचीन आस्था से जुड़े मन्दिरों का आधुनिकीकरण किस तरह से होता है because और उसकी देवशास्त्रीय मान्यता को किस तरह से बदल दिया जाता है, द्वाराहाट क्षेत्र के दो तीर्थस्थल ‘सुखावती’ और ‘सुखेश्वर’ महादेव इसके प्रत्यक्ष उदाहरण कहे जा सकते हैं.

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परन्तु इसका एक कारण यह भी रहा है कि  ‘शुकवती’ जैसी महानदी का गगास  नदी में विलय हो जाने के कारण और अपने मूल उद्गम स्थल पर लुप्त या गुप्त हो जाने से लोक परम्परा ने ‘ब्रह्मपर्वत’ से निकलने वाली छोटी बहिन गार्गी नदी (गगास) को तो मिथकों के माध्यम से सदैव याद रखा क्योंकि वह गर्ग ऋषि की तपस्याओं के कारण उनके आश्रम में स्वयं प्रकट हुई थी, किन्तु द्रोणगिरि पर्वत से निकलने वाली because उसकी बड़ी बहिन ‘शुकवती’ महानदी के पुरातन इतिहास को लोक परम्परा ने शायद भुला दिया क्योंकि उसके साथ किसी ऋषि का पौराणिक आख्यान नहीं बल्कि मुक्तिकामी सामान्य तोते पक्षियों का माहात्म्य जुड़ा था. पर जनश्रुतियों के माध्यम से आज ‘शुकवती’ नदी के संगम पर स्थापित ‘शुकेश्वर’ महादेव के मूल पौराणिक माहात्म्य को बदलकर उसे महाभारत के रचयिता वेदव्यास के पुत्र मुनि शुकदेव के साथ जोड़ दिया गया है. इसका परिणाम यह हुआ कि द्वाराहाट क्षेत्र के दो धार्मिक तीर्थस्थलों – कुकूछिना स्थित ‘सुखावती’ और बग्वाली पोखर स्थित ‘सुखेश्वर’ महादेव अपने अपने शाक्त एवं शैव मन्दिरों के प्राचीन इतिहास को तो भूल गए और महाभारतकालीन मुनि शुकदेव की तपःस्थली का इतिहास ही याद रहा.

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पर कुमाऊं क्षेत्र के प्रामाणिक भूगोल ग्रन्थ ‘मानसखंड’ का अवलोकन करें तो वहां कहीं भी दुनागिरि क्षेत्र में या गगास घाटी के शैव तीर्थों में मुनि शुकदेव द्वारा तपस्या करने का कोई प्रसंग नहीं मिलता है. कुमाऊं के जाने माने because इतिहासकार अटकिंसन और बद्रीदत्त पांडे ने भी यहां महाभारत के काल में दुःशासन कौरव द्वारा दुनागिरि क्षेत्र के पर्वतीय राजा को जीतकर गगास घाटी में ‘शुकवती’ और ‘शतधारा’ के संगम पर ‘शुकेश्वर’ महादेव की स्थापना का तो उल्लेख किया है,किन्तु दुनागिरि क्षेत्र और गगास घाटी के इन शैव तीर्थों के सन्दर्भ में मुनि शुकदेव की तपःस्थली होने का कहीं कोई जिक्र नहीं किया है.

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अंत में, मैं इस लेख के तथ्यों की विवेचना हेतु दुनागिरी और गगास नदी की जल क्षेत्रों के संरक्षण और खोजबीन से जुड़े उत्साही नवयुवकों गौरव तिवारी,कमल भट्ट और राकेश शाह का विशेष आभारी हूँ,जिन्होंने मेरी नदी-पहाड़ों because से जुड़े प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की इस सांस्कृतिक मुहिम को सफल बनाने में अपना सहयोग दिया और इन स्थानों के वीडियो तथा चित्र भेजकर मेरी विशेष सहायता की है. मैं मां दुनागिरी से उनके यशस्वी होने की कामना करता हूं.

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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