धर्मस्थल

द्वाराहाट क्षेत्र का ‘बागेश्वर’ : सदियों से उपेक्षित पांडवकालीन तीर्थ

कुमाऊं क्षेत्र के उपेक्षित मन्दिर-1

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

उत्तराखंड देव संस्कृति का उद्गम स्थल है और वहां के मन्दिरों के स्थापत्य और अद्भुत मूर्तिकला ने भारत के ही नहीं विश्व के कला प्रेमियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है. किंतु पुरातत्त्वविदों और स्थापत्यकला के विशेषज्ञों द्वारा द्वाराहाट,जागेश्वर, because बैजनाथ के मन्दिरों के स्थापत्य और मूर्तिकला का सतही तौर से ही आधा अधूरा मूल्यांकन किया गया है. स्थानीय लोक संस्कृति के धरातल पर तो मूल्यांकन बिल्कुल ही नहीं हुआ है. इनके अलावा दूर दराज के गांवों और नौलों के मन्दिरों का स्थापत्य और मूर्तियों का कलात्मक मूल्यांकन आज भी उपेक्षित और अनलोचित ही पड़ा है.  उत्तराखंड की अधिकांश मूर्तियां धर्म द्वेषियों द्वारा खंडित कर दी गई हैं. किंतु इन खंडित मूर्तियों में भी उत्तराखंड का आदिकालीन इतिहास और देव संस्कृति की झलक आज भी इतनी शक्तिशाली है कि वह न केवल मूर्तिकला के इतिहास को वरन उत्तराखंड के आद्य इतिहास की टूटी हुई कड़ियों को भी जोड़ने का महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं. लेखक इस क्षेत्र में बहुत पहले से अनेक उपेक्षित ऐतिहासिक स्थलों मन्दिरों और वहां की देवप्रतिमाओं के कलात्मक महत्त्व को  सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया के माध्यम से उजागर करता आया है. उसी परम्परा में आज प्रस्तुत है द्वाराहाट क्षेत्र के अति उपेक्षित एक प्राचीन और ऐतिहासिक ‘बागेश्वर मन्दिर’ की शोधपूर्ण जानकारी.

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बागेश्वरतीर्थ की भौगोलिक स्थिति

उत्तराखंड, राज्य के जिला अल्मोड़ा में द्वाराहाट से 17 कि.मी. because और रानीखेत मासी मोटर मार्ग पर सूरे ग्वेल नामक स्थान से डेढ़ कि.मी की दूरी पर स्थित ‘बागेश्वर महादेव’ नामक तीर्थस्थान एक अल्पज्ञात किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण प्राचीन शैव तीर्थ है. प्रसिद्ध नैथना देवी शक्तिपीठ के नीचे बसे नौबड़ा गांव से कुछ ही दूरी पर स्थित यह शिवालय पांडवकालीन धार्मिक स्थल होने के बावजूद वर्त्तमान में विकास की प्रक्रिया के दौर में है.

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यहां  बागेश्वर में कग्यूरी कालीन मंदिर के प्राचीन अवशेष तो मिलते ही हैं इसके ऊपरी भाग कोट नामक स्थान में टूटे और ध्वस्त मकानों के प्राचीन अवशेष भी विद्यमान हैं, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां अतीत में आवासीय बस्ती बसी हुई थी और कत्युरी काल में यहां बागेश्वर महादेव का भव्य मंदिर रहा था किन्तु आज वह तीर्थ क्षेत्र पूरी तरह से नष्ट हो चुका है.

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स्थानीय लोगों का मानना है कि किसी प्राकृत because आपदा अथवा नदी के स्रोत सूख जाने के कारण यहां बसे लोग नौबड़ा आदि पार्श्ववर्ती स्थानों में स्थानांतरित हो गए तो   यह तीर्थ भी तब से उजाड़ बन कर रह गया. उत्तरवर्ती काल के मांडलिक राजाओं तथा चंद राजाओं द्वारा संरक्षण न मिलने के कारण भी इस धार्मिक स्थल की सदियों से घोर उपेक्षा हुई और इस क्षेत्र का समुचित विकास नहीं हो सका. वर्त्तमान में बंधारी गधेरे के संगम स्थान पर स्थापित होने के कारण यह धार्मिक स्थल निकटवर्ती गांवों के शवदाह का भी पवित्र स्थान माना जाता है.

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पांडवों द्वारा स्थापित तीर्थ

इस बागेश्वर मंदिर की पिछले 18 वर्षों से सेवा और देखभाल कर रहे महंत श्री अमावस गिरि ने बताया है कि प्राचीन काल में महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद जब पाण्डव हिमालय की ओर प्रस्थान कर रहे थे तब उन्होंने जिस ऊँचे पर्वत शिखर पर because शिवलिंग की स्थापना की थी,वही तीर्थ स्थान पाली पछाऊँ क्षेत्र में आज बागेश्वर तीर्थ के रूप में विख्यात है.

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इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास के सम्बन्ध में यह जनश्रुति भी प्रचलित है कि पांडव लोगों ने अपने हिमालय प्रवास के दौरान यहां मां नैथना देवी के चरणों में बसे नौबड़ा नामक स्थान पर निवास करते हुए सम्पूर्ण पाली पछाऊँ क्षेत्र के समुचित विकास की एक योजना भी बनाई थी और मन्दिरों की नगरी द्वाराहाट को सुन्दर द्वारिका का रूप भी इसी बागेश्वर नामक स्थान पर दिया गया था. उसी समय से यहां ‘नौवाड़ा’ (नववाट) नाम से because एक गाँव बसा हुआ है. यहां स्थित शिवालय को ‘बागेश्वर’ नाम से जाना जाता है. आदि पूर्वजों के मुख से सुना जाता है कि रामगंगा व कोशी नदी ने आपसी विचार विमर्श के बाद यहां नौबड़ा के निकट उस स्थान पर मिलने का स्थान निश्चित किया था जहां आज बागेश्वर नामक तीर्थस्थल है. किन्तु उन दो नदियों के संगम स्थान की पहचान कर पाना आज असम्भव है,क्योंकि वर्त्तमान में इस स्थान के नदी तन्त्र की भौगोलिक स्थिति बदल गई है. पर इतना तो सत्य है कि इस क्षेत्र के दाणुथान नामक स्थान में कभी इतना भारी जल स्रोत बहता था कि उसमें बारह बीसी (240 लोगों) की बारात नववधु की डोली सहित डूब गई थी. इस सम्बन्ध में एक लोकगीत भी प्रसिद्ध है-
बार बीसी बर्यात डुबी, ब्योली डुबी डोलि समेत

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त्रेतायुग यानी वैदिक काल में इस द्वाराहाट, मासी,जालली क्षेत्र में नदियों और गाड़,गधेरों की इतनी भरमार थी कि रामगंगा घाटी और  जालली घाटी में भारी मात्रा में धान की खेती होती थी. यही कारण है कि रानीखेत मासी मोटर मार्ग में एक नहीं अनेक शिव महादेव के मन्दिर विराजमान हैं और उन्हें चावलों की खिचड़ी का भोग लगाया जाता था.इन शैव मन्दिरों के नाम हैं- सिलोर महादेव, बिल्वेश्वर महादेव, इटलेश्वर महादेव,उडलेश्वर because महादेव, सूरेग्वेल महादेव ,बागेश्वर महादेव इत्यादि. ये सब महादेव के मन्दिर कत्युरी काल के बने मन्दिर हैं और परस्पर तीन-चार कि मी.की दूरी पर पंक्तिबद्ध योजना से निर्मित हैं. हालांकि आज हम जिस बागेश्वर मन्दिर की चर्चा कर रहे हैं वह कुछ अलग और निर्जन स्थान में जंगल के बीच बना है.

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इस बागेश्वर मन्दिर के आसपास के गांवों के नामों पर because जरा ध्यान दें तो उनके नाम हैं – निरकोट यानी  ‘नरकोट’, सुरे और सुरेखेत यानी ‘सुरक्षेत्र’, दाणुथान यानी ‘दानव स्थान’. इन के मूल संस्कृत शब्दों से अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘बागेश्वर’ प्राचीन काल में नर संस्कृति ,देव संस्कृति और दानव संस्कृति इन तीनों संस्कृतियों का केंद्रीय स्थल था.

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वर्त्तमान में इस बागेश्वर शिवालय के पूर्व में पटास, पश्चिम में नौवाड़ा, उत्तर में डंगर खोला तथा दक्षिण में निरकोट, रूपानौली आदि गांव बसे हुए हैं,जो अपनी वास्तु योजना और गृह स्थापत्य कला के लिए आज भी प्रसिद्ध हैं.निरकोट यानी दुर्गनगर because और नैथना गढ़ी के निकटवर्ती स्थान बताते हैं कि चिर अतीत में नैथना देवी और उसके निकट बागेश्वर शिवालय का विशेष राजनैतिक और सांस्कृतिक महत्त्व रहा होगा. यहां कत्युरी राजाओं द्वारा कोट (दुर्ग) शक्तिपीठ और शैवपीठ से संपन्न नगर बसाया गया होगा और द्वाराहाट के भट्ट लोगों की भांति इन दुर्गों में रहने वाले योद्धा ही कालांतर में भट्ट कहलाये और पुजारी वर्ग पाठक कहलाया.

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परन्तु विडम्बना यह रही है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी पांडवों के because काल से ही प्रसिद्ध इस अल्प विकसित और उपेक्षित तीर्थ क्षेत्र को विकसित करने में राज्य प्रशासन ने कोई रुचि प्रकट नहीं की. वर्त्तमान में स्थानीय श्रद्धालुजनों के दान स्वरूप दिए गए आर्थिक सहयोग से ही इस तीर्थक्षेत्र का विकास सम्भव हो पाया है.

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अलौकिक शक्ति-सम्पन्न तीर्थ

लंबे अरसे से इस बागेश्वर मन्दिर क्षेत्र के विकास से जुड़े महाराज अमावस गिरि ने बताया है कि नौवाड़ा नामक गांव के निकट स्थित यह बागेश्वर शिवालय पांडवकालीन प्राचीन सिद्धतीर्थ होने के कारण अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न हैं. यहां पर एक because विषैले फन वाला नाग रहता है. इस नाग देवता की भी अद्भुत शक्ति है कि सच्चे दिल से शिवजी की भाराधना करने वाला व्यक्ति ही इस नाग देवता के दर्शन कर पाता है.मार्कण्डेय ऋषि की तपोभूमि
इस बागेश्वर शिवालय का एक ख़ास पौराणिक महत्त्व यह बताया जाता है कि मार्कण्डेय ऋषि ने यहां पुराकाल में तप किया और व्याघ्र रूप से शिवजी ने उन्हें दर्शन दि

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ए थे. तभी से इस तपोभूमि को ‘व्याघ्रेश्वर’ अर्थात् ‘बागेश्वर’ के because नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई.अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए यहां दर्शनार्थी दूर दूर से आते हैं. मान्यता है कि यहां शिवाराधना करने से निसंतान की भी संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होती हैं.

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महाराज अमावस गिरि जी ने बताया है कि बहुत समय पहले नौबाड़ा because और उसके आसपास के गांवों में लोगों को भयंकर हैजा जैसी महामारी का सामना करना पड़ा था. बच्चों की जन्म होते ही मृत्यु  हो जाती थी, कुष्ठ रोग आदि उपसर्ग क्षेत्रवासियों के लिए बहुत बड़ी परेशानी बन गए थे. तब उन सब के निराकरण हेतु बागेश्वर शिवालय में पूजा अर्चना की गई तो वे तमाम महामारियां और उपसर्ग शांत हो गए. तब से इस स्थान की प्रसिद्धि सिद्ध क्षेत्र के रूप में होने लगी.

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अमावस गिरि जी द्वारा तीर्थ का विकास

वर्त्तमान में इस शैवपीठ के सन्त अमावस गिरि जी सिद्ध शक्तियों से सम्पन्न एक साधक भक्त के रूप में वर्ष 2004 से इस बागेश्वर नामक शिवालय में अपनी साधनाएं कर रहे हैं और समय समय पर यहां धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन कर उन्होंने इस  because उपेक्षित तीर्थ को बहुत ऊंचाइयों में पहुंचाया है. गत वर्षों में अमावस गिरि जी ने इस शिवालय के विकास और यहां मंदिर निर्माण साधु संतों के निवास हेतु धर्मशाला, यज्ञ शाला, राधेश्याम मन्दिर आदि निर्माण कार्यों द्वारा इस धार्मिक क्षेत्र के विकास में अपना विशेष योगदान किया है.

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मूर्तिकला कत्यूरी काल की धरोहर

मूर्तिकला की दृष्टि से भी यह शैव तीर्थ कत्यूरी कालीन स्थापत्यकला और उत्कृष्ट मूर्तिकला से सम्पन्न है. हालांकि कत्यूरकाल में बना शिव मंदिर पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है किंतु नागर शैली के मंदिर शिखर का खंडित आमलक, बाघ की प्रतिमा तथा because उमा-महेश की काले पाषाण में निर्मित मूर्ति आज भी इस तथ्य का पुरातात्त्विक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि यह स्थान कभी कत्यूरी राजाओं के काल में भव्य मन्दिरों से सम्पन्न शैव तीर्थ रहा होगा.मैने अपने सुरेग्वेल और जालली से सम्बंधित एक शोधलेख में बताया है कि इस क्षेत्र के मन्दिर आदि भवनों के निर्माण में चौदहवीं शताब्दी में हुए कत्युरी राजा मानदेव का विशेष योगदान था. इसलिए सम्भावना की जा सकती है कि इस बागेश्वर मन्दिर का निर्माण भी उसी चौदहवीं सदी के दौरान हुआ होगा.उसका मुख्य पुरातात्त्विक प्रमाण इस मन्दिर का खंडित आमलक का हिस्सा और बाघ की मूर्ति है. साथ ही उमा-महेश की मूर्ति भी लगभग उसी काल की प्रतीत होती है.

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इस मंदिर में बाघ की मूर्ति की अवस्थिति यह दर्शाती है कि बाघ सरयू because और गोमती के संगम पर स्थित बागनाथ मन्दिर और दुनागिरी मन्दिर का भी महत्त्वपूर्ण प्रतीक चित्र रहा है, जिसके कारण से यह मंदिर बागेश्वर महादेव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ.

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मन्दिर का पुरातन इतिहास

जहां तक इस मंदिर के पुरातन इतिहास का सम्बन्ध है,महंत श्री अमावस गिरि जी ने बताया कि बहुत पहले यहां एक महात्मा अजयनाथ जी अपनी शिष्य मंडली के साथ माँ नैथना देवी के दर्शन करने मन्दिर में पधारे थे. रात का समय था और महाराज अजयनाथ जी अपने अंतर्ध्यान में लीन थे तो उन्होंने देखा कि माँ ‘वैष्णव देवी’ ने उन्हें इस बागेश्वर शिवालय की दिशा विशेष की ओर जाने का निर्देश देते हुए कहा कि- “आपका स्थान because वहां है.’ माँ नैथना के आदेश के अनुसार बाबा जी शिवालय की ओर प्रस्थान कर गए. वहां जा कर उन्होंने देवी द्वारा निर्दिष्ट बागेश्वर मंदिर क्षेत्र की साफ-सफाई इत्यादि की और मंदिर स्थल पर वाल्मीकि रामायण की कथा कर के इस जीर्ण-शीर्ण पुरातन मंदिर को पुनः प्रतिष्ठित किया. उसके कुछ समय बाद यहां गनोली ग्रामवासी महात्मा श्री सीताराम जी का पदार्पण हुआ. उन्होंने मंदिर के ऊपर कोट की पहाड़ी पर श्री राम, सीता तथा श्री हनुमान की मूति सहित अनेक मन्दिरों का निर्माण किया. उन मन्दिरों के निर्माण से यह बागेश्वर नामक स्थान धार्मिक पर्यटन का भी सुरम्य स्थान बन गया.

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अनेक प्रकार के कथा-सूत्रों ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्थानीय जनश्रुतियों because के आलोक में ग्रथित मेरी यह छोटी सी जानकारी द्वाराहाट, जालली, सुरेग्वेल, के सदियों से उपेक्षित पुरातात्त्विक स्थलों और प्राचीन ऐतिहासिक मन्दिरों के  स्थापत्य और मूर्तिकला को प्रकाश में लाने के प्रयोजन से सम्बन्धित है,आशा है उत्तराखंड के इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले विद्वानों को यह पसंद आएगी.

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आभार प्रदर्शन

अंत में, मैं महाराज श्रीअमावस गिरि जी द्वारा भेजे गए इस बागेश्वर because मंदिर से सम्बंधित चित्रों और उनके द्वारा दी गई महत्त्वपूर्ण जानकारी हेतु महाराज श्री का विशेष आभार प्रकट करता हूँ.

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के  रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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