• डॉ. मोहन चंद तिवारी

जब भी मुझे अपने पैतृक निवास ग्राम जोयूं में जाने का अवसर मिलता है तो अपने गांव से 4 कि.मी. की दूरी पर जालली स्थित इटलेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन अवश्य करता हूं. संयोग से तीन वर्ष पूर्व जब सितंबर के महीने में अपने गांव गया था तो उस मौके पर जालली क्षेत्र में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भी बहुत धूमधाम से because मनाया जा रहा है. स्थानीय क्षेत्रवासियों के द्वारा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर राधाकृष्ण को डोली में बिठाकर शोभायात्रा निकाली जा रही थी. इसी समय जब मेरा इटलेश्वर महादेव के मंदिर में दर्शनार्थ जाना हुआ तो संयोग से उसी समय राधाकृष्ण जी की डोली का भी मंदिर प्रांगण में प्रवेश हो रहा था और प्रभुकृपा से मुझे इटलेश्वर मंदिर में ही भगवान शिव के साथ साथ राधा कृष्ण जी के दर्शनों का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ.

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यह हमारे देश की उदात्त परम्परा रही है कि जन्माष्टमी हो या शिवरात्रि या अन्य कोई त्योहार श्रद्धालुजन अपने because स्थानीय मंदिरों में अत्यंत भक्तिभाव से पूजा अर्चना करते हैं.इसी समय इटलेश्वर महादेव में भी आज अच्छी खासी भीड़ थी. मंदिर में जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुजनों की इस अति प्राचीन ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक करने की मनोकामना से दर्शनार्थियों की भीड़ लगी हुई थी. इस प्राचीन महादेव के मंदिर प्रांगण में राधाकृष्ण,हनुमान जी की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं.

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गौरतलब है कि जालली घाटी के प्रधान शिव मंदिरों में सिलोर महादेव,बिल्वेश्वर महादेव के साथ साथ इटलेश्वर महादेव की भी विशेष ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यता रही है. होली, दीपावली, because मकर संक्रांति आदि त्योहारों में यहां पूजापाठ करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है. सन 2015 में जब सुरेग्वेल के निकट तथा जालली घाटी से ऊपर 4 कि.मी.की दूरी पर स्थित ‘दाणुथान’ में आर्यों के इतिहास के संदर्भ में, मैं शोधात्मक पर्यवेक्षण कर रहा था तो लगभग उसी दौरान मुझे इटलेश्वर महादेव के पुरातात्त्विक महत्त्व के सम्बंध में भी विशेष जानकारी प्राप्त हुई थी.

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यहां बंधरा ग्राम के निवासी पान सिंह बिष्ट जी ने मुझे तब इटलेश्वर मन्दिर से निकली लाल मिट्टी से बनी पक्की ईंट को भी दिखाया था,जो इस तथ्य का प्रमाण है कि जहां आज जालली का because बस स्टैंड है वहां कभी पक्की ईंटें और पक्के मिट्टी के बर्तनों को बनाने वाले कुंभकारों की आवासीय बस्ती रही थी. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि प्राचीन काल में इस मंदिर का निर्माण ईंटों से होने के कारण इसे ‘इटलेश्वर’ महादेव कहा जाने लगा.

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इटलेश्वर महादेव के बारे में ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर प्राकृतिक रूप से उत्पन्न ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड क्षेत्र में because सबसे ऊंचा, आकार में बड़ा और स्वयम्भू ज्योतिर्लिंग है.प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इसकी ऊंचाई निरन्तर रूप से आज भी बढ़ रही है.

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गौरतलब है कि शैवधर्म का यह धार्मिक तीर्थ स्थान इटलेश्वर महादेव का मंदिर जहां स्थित है उसके निकट ही सुरेग्वेल की ओर जाने वाला पर्वतीय ढलान ‘माईधार’ यानी मातृदेवी का स्थान because कहलाता है,जहां आज भी ग्यारह ओखलियों और बाईस ओखलियों के मोनोलिथ अवशेष विद्यमान हैं. ये पुरातात्त्विक अवशेष इस तथ्य का भी प्रमाण हैं कि यहां पुराकाल में मातृदेवी के उपासक तथा धान उत्पादक आर्य किसानों की बस्तियां रही होंगीं.

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ये आर्य किसान सामूहिक रूप से धान की खेती करते थे तथा दूध दही जमाने के लिए पक्की मिट्टी के बरतनों का इस्तेमाल करते थे. जालली क्षेत्र के धान उत्पादक सेरों की खास because विशेषता रही है कि इस क्षेत्र की मिट्टी बहुत चिकनी है जो बर्तन बनाने के लिए उपयोगी होती है. इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जालली घाटी का यह क्षेत्र पक्की ईंटों और मिट्टी के बर्तनों को बनाने वाले शिल्पियों की भी आवासीय बस्ती रही होगी.

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प्रायः देखा जाता है कि पुराकाल में जहां नदी का स्रोत होता था, वहां धान की खेती भी होती थी और ऐसे ही धन-धान्य सम्पन्न खुशहाल क्षेत्र में विशाल शिव मंदिरों की अवस्थिति रही थी. because इस रानीखेत मासी मोटर मार्ग के किनारे सुरेग्वेल से लेकर सिलोर महादेव तक एक पूरी श्रृंखला शैव मंदिरों से जुड़ी है. इटलेश्वर और बिल्वेश्वर के कत्यूरी कालीन मंदिर भी इसी जालली घाटी के प्राचीन राजनैतिक,धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व को बताते हैं.

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वस्तुतः जालली घाटी का क्षेत्र धान उत्पादक प्राचीन आर्य किसानों का वैदिक कालीन आवासीय क्षेत्र है. इस क्षेत्र में छोटी छोटी नदियां जहां जहां मुख्य नदी के साथ संगम करती हैं,वहां वहां प्राचीन काल में कत्यूरी शैली के भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ था. किन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि रोहिलों या अन्य धर्म विध्वंशक आक्रमणकारियों द्वारा because यहां स्थित विशाल और भव्य शैव मंदिरों को बेरहमी से ध्वस्त कर दिया गया. इस धार्मिक विध्वंश का प्रमाण इन मंदिरों के प्रांगण में विद्यमान वे ध्वंशावशेष हैं, जिनकी स्थापत्यकला द्वाराहाट के मंदिरों की वास्तुकला से हूबहू मेल खाती है. इटलेश्वर महादेव के प्रांगण में विद्यमान शिवमंदिर का चक्राकार शिखर, खंडित अवस्था में नान्दी की मूर्ति और लोकपाल आदि देवमूर्तियों के खंडित मस्तक आज भी इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि पुराकाल में यह मंदिर कभी कत्यूरी कालीन जालली घाटी का प्रमुख शिव मंदिर रहा होगा.

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पर विडम्बना यह है कि उत्तराखंड का पुरातत्त्व विभाग जालली घाटी के इन प्राचीन और पुरातात्त्विक धरोहरों के प्रति सदा उदासीन ही रहा है. कुमाऊँ या गढ़वाल विश्वविद्यालयों के इतिहास और पुरातत्त्व विभाग ने भी कभी इन उपेक्षित क्षेत्रों के इतिहास को जानने की कोई कोशिश नहीं की.जैसा पुरातात्त्विक अध्ययन द्वाराहाट, जागेश्वर, चंपावत के because मन्दिरों का हुआ, वैसा अध्ययन इन मंदिरों का कभी नहीं हुआ. यही कारण है कि रानीखेत-मासी मोटर मार्ग पर विद्यमान ये प्राचीन मंदिर और यहां विद्यमान पुरातात्विक अवशेष आज भी सुनसान पड़े हैं और अपनी गुमनामी की मूक गाथा कह रहे हैं. हमें इस क्षेत्र की जनता का विशेष आभारी होना चाहिए कि इन नष्ट-विनष्ट प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार किया गया है, वहां नित्यप्रति पूजा अर्चना होती है और इस प्राचीन धरोहर का संरक्षण करते हुए यहां जन्माष्टमी, शिवरात्रि, होली, दीपावली के पर्वों पर धार्मिक कार्यक्रमों का अनुष्ठान भी किया जाता है.

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जन्माष्टमी के पावन अवसर पर इटलेश्वर because महादेव के सिद्ध ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके और उनका जलाभिषेक करके सुखद अनुभूति हुई है. ऐसा लगा कृष्ण और देवाधिदेव इटलेश्वर महादेव दोनों के एक साथ साक्षात दर्शन हो गए. भगवान कृष्ण और देवाधिदेव इटलेश्वर महादेव हम सब का कल्याण करें.

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 मेंसंस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 मेंविद्या रत्न सम्मानऔर 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वाराआचार्यरत्न देशभूषण सम्मानसे अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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