हम लोग बचपन में जिस त्योहार का बेसब्री से इंतजार करते थे वह दिवाली या होली नहीं बल्कि ‘घुघुतिया’ था।

  • प्रकाश चंद्र

भारत की विविधता के कई आयाम हैं इसमें बोली से लेकर रीति-रिवाज़, त्योहार, खान-पान, पहनावा और इन सबसे मिलकर बनने वाली जीवन पद्धति। इस जीवन पद्धति में लोककथाओं व लोक आस्था का बड़ा महत्व है। हर प्रदेश की अपनी लोक कथाएं हैं जिनका अपना एक संदर्भ है। इन लोक कथाओं और उनसे संबंधित त्योहारों के कारण ही आज भी ग्रामीण समाज में सामूहिकता का बोध बचा हुआ है। उसके उलट महानगरों में लगभग सामूहिकता का लोप हो चुका है। इस कारण से ही महानगरों में पलने और पढ़ने वाली पीढ़ी के लिए त्योहारों का महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। त्योहार अब उत्सव से ज्यादा ‘इवेंट’ में तब्दील हो रहे हैं। ऐसे समय उन त्योहारों को फिर से याद करना समय के चक्र के साथ बचपन में लौटने जैसा है। हम लोग बचपन में जिस त्योहार का बेसब्री से इंतजार करते थे वह दिवाली या होली नहीं बल्कि ‘घुघुतिया’ था।

उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र में मकर संक्राति के दिन मनाये जाने वाले त्योहार ‘उत्तरैणी’ और ‘मकरैणी’ का खासा महत्त्व है। गढ़वाल में इस त्योहार को ‘मकरैणी’ के नाम से जाना जाता है वहीं कुमाऊँ में ‘उत्तरैणी’ या ‘घुघुतिया’ त्योहार के रूप में मनाया जाता है। यह पूरे उत्तराखंड के लोक का एक बड़ा त्योहार है। पहाड़ की लोक कथाओं और त्योहार में प्रकृति, पशु और पक्षियों का बड़ा महत्व होता है। इस त्योहार और इसके पीछे की कथा में भी मनुष्य और प्रकृति का एक रिश्ता नज़र आता है । इसे ‘उत्तरैणी’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन के बाद सूर्य उत्तरायण की ओर जाता है और दिन बड़े होने लगते हैं। लेकिन गाँव में इस त्योहार को घुघुतिया त्योहार के नाम से जाना जाता है। इस घुघुतिया त्योहार को मनाने के पीछे एक लोककथा है।

इस लोककथा के अनुसार जब कुमाऊँ में चन्द्र वंश के राजा राज करते थे तो उस समय राजा कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी, संतान न होने के कारण उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। उनका मंत्री सोचता था कि राजा के मरने के बाद राज्य उसे ही मिल जाएगा। एक बार राजा कल्याण चंद अपनी पत्नी के साथ बागनाथ मंदिर के दर्शन के लिए गए और संतान प्राप्ति के लिए मनोकामना व पूजा अर्चना की। इस यात्रा के कुछ समय बाद राजा कल्याण चंद को संतान का सुख प्राप्त हुआ। राजा के लिए यह जीवन में बड़ी खुशी का पल था क्योंकि काफी मिन्नतों के बाद पुत्र की प्राप्ति हुई थी। राजा ने अपने पुत्र का नाम ‘निर्भय चंद’ रखा। राजा की पत्नी पुत्र को प्यार से ‘घुघुती’ के नाम से पुकारा करती थी। रानी छोटे से निर्भय चंद के गले में ‘मोती की माला’ बांधकर रखती थी। धीर-धीरे बालक निर्भय चंद को मोती की माला से विशेष लगाव हो गया था, वह पूरे दिन माला से ही खेलता रहता। अगर कोई उस माला को छू भी ले तो निर्भय चंद रोने लग जाता था। इसलिए जब कभी भी निर्भय किसी वस्तु की हठ करता तो रानी उसे कहती थी कि “हठ न कर नहीं तो तेरी माला कौवों को दे दूंगी”। अक्सर पुत्र को डराने के लिए रानी “काले कौआ काले/घुघुती माला खाले” बोलती थी ताकि पुत्र किसी और चीज के लिए हठ न करे। रानी द्वारा ऐसा कहने पर अक्सर कौवे आ जाते थे और रानी कौवों को खाने के लिए कुछ दे दिया करती थी। धीरे-धीरे निर्भय और कौवों की दोस्ती हो गई। दूसरी तरफ राजा का मंत्रीघुघुती (निर्भय) को मारकर राज- पाठ हडपने की उम्मीद लगाए रहता था ताकि उसे राजगद्दी प्राप्त हो सके।

मंत्री निर्भय के पैदा होने के दिन से ही उसे मारने की योजना बना रहा था। एक दिन मंत्री ने अपने साथियों के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा। जब घुघुती (निर्भय) खेल रहा था तो मंत्री उसे चुप चाप उठा कर ले गया। इसी दौरान घुघुती (निर्भय) को जंगल की ओर ले जाते हुये एक कौवे ने देख लिया। उसके बाद कौआ जोर-जोर से कॉव-कॉव करने लगा। कौवों का शोर सुनकर घुघुती रोने लगा और अपनी मोती की माला को निकालकर लहराने लगा। उस कौवे ने वह माला घुघुती (निर्भय) से छीन ली और धीरे-धीरे उस कौवे की आवाज़ सुनकर उसके साथी कौवे भी वहाँ इकट्ठा हो गए। उन कौवों ने मिलकर अपनी नुकीली चोंच से मंत्री और उसके साथियों पर प्रहार कर दिया। कौवों के प्रहार से घायल होकर मंत्री और उसके साथी घुघुती को वहीं छोडकर जंगल से भाग खड़े हुए।

उधर, राजमहल में घुघुती (निर्भय) को न पाकर सब लोग बेहद परेशान थे। तभी एक कौवे ने घुघुती (निर्भय) की मोती की माला रानी के सामने गिरा दी। यह देखकर सभी को संदेह हुआ कि शायद कौवे को घुघुती (निर्भय) के बारे में कोई जानकारी हो। राजमहल से सभी कौवे के पीछे –पीछे चलने लगे और एक घने जंगल में जा पहुंचे। उस घने जंगल में एक पेड़ के नीचे रानी को अचेत अवस्था में पड़ा घुघुती (निर्भय) दिखाई दिया। उसके बाद रानी ने अपने पुत्र को गले लगाया और राजमहल ले आई। जब राजा को यह पता चला कि उसके पुत्र को मारने के लिए मंत्री ने षड्यंत्र रचा था तो राजा ने मंत्री और उसके साथियों को मृत्यु दंड दे दिया। घुघुती के मिल जाने पर रानी ने बहुत सारे पकवान बनाए और घुघुती से कहा कि अपने दोस्त कौवों को बुलाकर उन्हें भी पकवान खिला दो। धीरे-धीरे यह कथा उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में फैल गई और हर घर में ही घुघुती त्योहार मनाया जाने लगा। इस त्योहार पर कौवों का विशेष महत्व होता है। दुनिया का शायद यह पहला ऐसा त्योहार हो जिसमें कौवों को बकायदा निमंत्रित किया जाता है और जो भी पकवान घर में बनते हैं उन्हें कौवों को भी खिलाया जाता है।

घुघुती त्योहार के दिन पूरे कुमाऊँ अंचल में अलग-अलग तरह के पकवान बनाए जाते हैं लेकिन एक पकवान ऐसा होता जिसे हर कोई बनाता है। उस पकवान का नाम है ‘घुघुत’। घुघुत एक खास तरह का व्यंजन है। इसे सूजी, आटे और गुड़ से बनाया जाता है। त्योहार की पहली रात कई तरह के पकवान बनते हैं और त्योहार के दिन सभी बच्चे सुबह- सुबह नहाकर अपने से बड़ों के पाँव छूकर आशीर्वाद लेते हैं फिर पूरे गाँव में घूमते हैं। जब बच्चे अपने से बड़ों के पाँव छूते हैं तो उन्हें उसके बदले में गुड़ दिया जाता है। इसी गुड़ से बनते हैं घुघुत! घुघुत को बनाने के लिए पहले गुड़ को उबाला जाता है और गुड़ के पानी से आटा गूँथा जाता है। कुछ लोग आटे में सूजी भी मिलाते हैं जबकि कुछ लोग नहीं मिलाते हैं। जब अच्छे से आटा गूँथ लिया जाता है तो फिर उसे एक खास आकार दिया जाता है जिसे घुघुत कहा जाता है। उसके बाद इन्हें धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब घुघुत अच्छे से सूख जाते हैं तो फिर उन्हें घी या तेल में तला जाता है। इस तलने की प्रक्रिया का भी बड़ा महत्व है। इसे कुमाऊँनी भाषा में ‘घुघुत उलावना’ कहते हैं। पहले इस समय महिलाएँ सामूहिक तौर पर विशेष गीत गाती थीं लेकिन अब यह परंपरा लगभग लुप्त हो चुकी है। इस तरह जो कुछ भी बनता है सबसे पहले उसे कौवों के लिए निकाल दिया जाता है। उसके बाद कौवों के लिए घुघुती निकाली जाती है और कुछ घुघुती की बच्चों के लिए माला बनाई जाती है। बच्चे माला पहनकर कौवों को बुलाते हैं- काले कौवा काले/घुघुती माला खाले। हर एक बच्चे की इच्छा होती है कि कौवा उसकी घुघुती खा ले लेकिन जिस बच्चे की घुघुती कौवे नहीं खाते हैं वह बड़ा दुखी होता है। तब उसके माँ-बाप उसे समझाते हैं कि तुमने सालभर कौवों को पत्थर मारा होगा इसलिए नाराज़ होकर कौवों ने तुम्हारी घुघुती नहीं खाई। यह बच्चों को दी जाने वाली बडी सीख थी ताकि बच्चे अपने आस-पास की प्रकृति, पशु-पक्षियों सभी से प्रेम करें।

एक तरह से यह त्योहार पूर्णत: बच्चों और कौवों का त्योहार है। इस त्योहार की अपनी एक सामाजिकता भी है। पूरे समाज में जिस कौवे को दुत्कारा जाता है और अशुभ माना जाता है उसी कौवे की मिन्नतें और प्रतिष्ठा इस त्योहार के दिन होती है। कई मायनों में यह त्योहार रूढ़ियों को तोड़ता है और एक सामूहिकता के बोध को मजबूत करता है। पूरे उत्तराखंड में यह त्योहार किसी बड़े उत्सव से कम नहीं है। जाति से लेकर आर्थिक गैर बराबरी के भेद को भी तोड़ने वाला यह त्योहार है लेकिन समय के साथ यह त्योहार तो बड़ा हो रहा है परंतु इसके पीछे लोक की धरोहर खत्म होती जा रही है।

उत्तराखंड लगातार पलायन की मार झेल रहा है। वहां से लोग निकल कर बड़े- बड़े महानगरों में बस गए हैं। गाँव में वीरान घर और घुघुती की बाट जोहते कौवे हैं। इन बड़े-बड़े शहरों ने हमसे हमारी घुघुती ही नहीं बल्कि एक धरोहर छीन ली है। आजकल घुघुती के दिन बड़े आयोजन तो होते हैं लेकिन उनमें वो रंगत नहीं जो गांवों की घुघुती ‘सज्ञान’ में थी। दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में बचपन की स्मृतियों का यह त्योहार आयोजनों की भीड़ में कहीं गुम हो गया है। त्योहार अब मिठाई और रेस्टोरेन्ट की शान तक सिमट गए हैं। अब न बच्चे घुघुती की माला पहनते हैं और न वो घुघुती का त्योहार ही बचा रहा न आसमान में कौवे।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

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