समाज

श्राद्ध की आस्था में पर्यावरण व जीवन

सुनीता भट्ट पैन्यूली

पितृपक्ष या श्राद्ध हमारे अपने जो अब जीवित नहीं हैं या हमारे पास नहीं हैं. because उनको याद करने का अवसर हैं. हमारी हिंदू परंपरा में इन दिनों दिवंगत  पूर्वजों का श्राद्ध व पिंडदान किया जाता है.ऐसा माना जाता है कि पितरों की पूजा अर्चना करने से उनकी हम पर विशिष्ट कृपा बनी रहती है.

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हमारा यह भी विश्वास है कि अपने पितरों को श्राद्ध देकर हम उनके निमित्त जो भी because ब्राह्मण को दे रहे हैं वह उन तक ज़रूर पहुंच जायेगा. यह तो हम नहीं जानते है कि पहुंचता है या नहीं किंतु यह निश्चित है कि  सच्चे हृदय से पितरों को याद करके जब उनको तर्पण दिया जाता है तो हमारी श्रद्धाऐं उन तक तो ज़रूर पहुंचती ही होंगी.

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पितृ ऋण को चुकाने because और कृतज्ञता प्रकट करने का कर्म भी है श्राद्ध

श्राद्ध में गाय, कुत्ता, कौऐ को खिलाने का विधान भी है यह प्रशंसनीय है कि  because इसमें जीव-कल्याण का प्रयोजन भी सिद्ध होता है.हमें ना केवल गाय,कुत्ता और कौए बल्कि समस्त मूक जीव जिनके खाने-पीने के कोई नियमित श्रोत नहीं हैं उनको श्राद्ध में भरपेट भोजन कराना चाहिए.श्राद्ध में ही क्यों? हमेशा अपनी आदत में इसे जीवन के महत्त्वपूर्ण उदेश्यों में शामिल कर लेना चाहिए.

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पढ़ें- पितरों के प्रति आस्था का पर्व – श्राद्ध एवं हवीक

यहां प्रकृति और कौए का because ज़िक्र करना भी निहायत ज़रूरी है.

प्रकृति का दोहन करके हम स्वयं के लिए चाहते हैं आधुनिक व्यवस्थाओं से becauseलैस जीवन किंतु उसकी यंत्रणा झेल रहे पक्षियों का क्या?

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श्राद्ध में कौओं की भूमिका को भी  हम नकार नहीं सकते हैं because ना ही पुराणों में, ना पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के संतुलन में,सवाल है कि कुछ बचे-खुचे कौओं because की प्रजाति को बचाया कैसे जाये?

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श्राद्ध में अगर हमारी आस्था है तो उन अ पौराणिक परंपराओं का ही वास्ता?

श्राद्ध में हमारे  पुरखों तक भोजन पहुंचाने because वाले कौए ही नहीं होंगे तो श्राद्ध की मुक़्कमल मान्यताएं भी कैसे पूर्ण होंगी?

दुनिया में पक्षियों की आबादी  लगभग एक तिहाई because ख़त्म हो चुकी है कैसे इनका संरक्षण किया जाये? यह सोचना नितांत ज़रूरी है.

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क्या मानवीय हिमाक़त यानि हम सभी ज़िम्मेदार नहींbecause अपनी-अपनी मुंडेरों पर कांव-कांव की  आवाज़ सुनने से वंचित होने के लिए?

पढ़ें – वैदिक पितृपूजा का ऐतिहासिक और धार्मिक विकास क्रम

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वह दिन ज़्यादा दूर नहीं जब श्राद्ध ही क्यों हमें हमेशा के लिए पक्षियों की आवाज़ों  (जो घर आंगन में सकारात्मकता फैलाती सुख समृद्धि का भी द्योतक हैं) और उनके अस्तित्व से  भी महरूम होना पड़ जायेगा.

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खेती-बाड़ी में कीटनाशकों के because इस्तेमाल पर परहेज़
पक्षियों के प्राकृतिक because आवास को बढ़ावा
पेड़ों पर आरी चलाने because से रोकने का प्रयास
सामाजिक और सरकारी because स्तर पर जागरूकता

अपने-अपने घरों में पक्षियों के लिए उनकी रिहायश के लिए उनके अनुसार  उनके भोजन- पानी की व्यवस्था.

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एक सजग व संजीदा  पहल के तहत इन थोड़े बहुत because प्रयासों द्वारा हम प्रकृति व पक्षियों को उनका प्राचीन स्वरूप  शायद लौटा सकें.

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अपनी जीविका का एक अंश हमें पितृ प्रयोजनों के because निमित्त लोक-कल्याण में लगाना चाहिए.

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सभी फोटो गूगल से साभार

पितृपक्ष में हमारी आस्था यदि अन्न दान या भोजन because कराने की ही है तो ज़रूरतमंद व गरीबों को अन्न- दान देकर या भोजन कराकर उनकी आर्थिक रूप से मदद की जानी चाहिए.

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पढ़ें- पितृपक्ष : पितरों की समाराधना का पर्व

श्राद्ध हमारी अपने पितरों को श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम है, इस माध्यम because के द्वारा क्यों ना हम ऐसा मार्ग प्रशस्त करें जिसमें सामाजिक कार्य के लिए समवेत भावना मुखर हो. कुछ ऐसा, जिसमें हमारी नई पीढ़ियों में गरीब, असहाय व बेसहारा,जीव,जानवरों की सहायता करने की भावना जागृत हो.

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हमारे प्रयासों और दृढसंकल्पता से यदि किसी के माथे से चिंता की लकीरें मिट because जायें किसी निर्धन के खाली पड़े हुए अनाज के डिब्बे भर जायें तो सच्चे अर्थों में यह हमारे पितरों के निमित्त सार्थक व कल्याणकारी श्राद्ध होगा.

(लेखिका साहित्यकार हैं एवं विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में अनेक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं.)

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