March 5, 2021
अध्यात्म

पितरों के प्रति आस्था का पर्व – श्राद्ध एवं हवीक

  • भुवन चन्द्र पन्त

पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किये जाने वाला कर्म ही श्राद्ध है. दरअसल पितर ही हमें इस धरती पर लाये, हमारा पालन पोषण किया और हमें अपने पांवों पर खड़े होने के लिए समर्थ किया. लेकिन उनसे ऊपर भी हमारे ऋषि थे, जो हमारे आदिपुरूष रहे और जिनके नाम पर हमारे गोत्र चले तथा उन ऋषियों के शीर्ष में देवता. देवऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए ही श्राद्ध की परम्परा शुरू हुई. हालांकि जितना उपकार इनका हमारे प्रति है उस ऋण से उऋण होना तो संभव नहीं और नहीं ऋण का मूल चुका पाना संभव है, श्राद्ध के निमित्त सूद ही चुका दें तो हम अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकते हैं. जिसने हमारे लिए इतना सब किया, उनके इस दुनियां से चले जाने के बाद उनके प्रति श्रद्धा एवं सम्मान देकर कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा नैतिक दायित्व बनता है. यों तो श्रद्धाभाव से  पितरों को स्वयं पिण्ड अर्पित कर तथा उन्हें तिलांजलि देकर भी श्रद्धा व्यक्त की जा सकती है, लेकिन सनातन धर्म में कर्मकाण्डी विधि से तर्पण एवं पिण्ड दान की विधिवत् व्यवस्था की गयी है. जिसमें देवताओं के स्वरूप विश्वेदेवाः (दस देवताओं के समूह) का तर्पण उसके बाद ऋषियों और अन्त में पितरों को तर्पण देकर उनका श्रद्धा से स्मरण किया जाता है, जिसमें पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, मातामह, प्रमातामह तथा ननिहाल प़क्ष के भी पिछले तीन पीढ़ियों का सगोत्र नामोच्चार कर तिलांजलि अर्पित की जाती है. ऐसी मान्यता है कि जन्मान्तर में वे जिस योनि में चले गये हों, उनके पास उसी रूप में वह उनके भोज्य पदार्थ के रूप में पहुंचती है. यह भी मान्यता है कि पितर कौवे के रूप में श्राद्ध में अर्पित भोजन को ग्रहण करते हैं.

यों तो श्राद्धों के कई प्रकार बताये गये हैं, लेकिन हमारे पर्वतीय क्षेत्र में मुख्यतः 5 प्रकार के श्राद्ध किये जाते हैं, जिनमें पिण्डदान एवं तर्पण से पितरों को तृप्त करने की बात कही गयी है. मृत्यु के ग्यारहवे दिन प्रेतात्मा को कुल के अन्य पितरों के साथ मिलाने के लिए सपिण्डन श्राद्ध, मृत्यु के एक वर्ष बाद  मृत्यु की तिथि पर वार्षिक श्राद्ध, मुृत्यु की चन्द्र तिथि को प्रतिवर्ष किये जाने वाला एकोदिष्ट श्राद्ध तथा महालय अथवा आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावास्या पर्यन्त निश्चित तिथि को पार्वण  श्राद्ध. जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि एकोदिष्ट श्राद्ध (एक को उद्देश्य मानकर) में किसी पितर विशेष के निमित्त श्राद्ध किया जाता जब कि पार्वण श्राद्ध में उन सभी के पितरों का श्राद्ध का पर्व है, जो पितृपक्ष में आशा के साथ अपने वंशजों द्वारा किये गये तर्पण एवं श्राद्ध भोज के लिए पितृ लोक से धरती पर तृप्त होने के लिए आते हैं. पितरों के पर्व (पितृपर्व) से ही पार्वण शब्द बना है.

सभी फोटो गूगल से साभार

ऐसी मान्यता है कि महालय अथवा पार्वण श्राद्ध के सोलह दिनों में पितर भूलोक में सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों के पास तृप्त होने के लिए विचरण करते हैं. इसलिए इस अवधि में कोई शुभ कार्य नये वस्त्रादि का का क्रय करना आदि वर्जित माना जाता है, ताकि पितरों की भूलोक में इन वस्तुओं व शुभकार्यों आदि के समारोहों पर आसक्ति न हो. पार्वण श्राद्ध (माता के श्राद्ध को छोड़कर) प्रायः उसी तिथि को किया जाता है जिस तिथि को पितर की मृत्यु हुई हो, लेकिन यदि किसी की मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो तो प्रतिपदा से अमावास्या पर्यन्त पूर्णिमा की तिथि तो होती नहीं, इसलिए ऐसे पितर के श्राद्ध के लिए आश्विन कृष्ण प़क्ष के पन्द्रह दिनों के साथ भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भी महालय अथवा पार्वण श्राद्ध में सम्मिलित कर इस तरह कुल श्राद्धों की संख्या सोलह मानी गयी है.

हमारे पर्वतीय अंचल में यह परम्परा रही है कि पार्वण श्राद्धों में पिता का श्राद्ध तो मृत्यु वाली तिथि को ही निश्चित है, जब कि माता का श्राद्ध नवमी की तिथि को ही किये जाने की मान्यता है. दूसरी ओर यह भी मान्यता है कि माता का श्राद्ध पिता के श्राद्ध से पहले नहीं किया जा सकता. इस स्थिति में यदि किसी के पिता की मृत्यु की तिथि नवमी के बाद की तिथि हो तो मान्यतानुसार पिता का श्राद्ध अष्टमी को ही किया जाता है अन्यथा यदि पिता की मृत्यु तिथि नवमी से पूर्व हो तो उसी निश्चित तिथि को श्राद्ध किया जाना ज्यादा उपयुक्त बताया गया है.

हमारे हर कार्य में पितरों का आशीर्वाद बना रहे, इसलिए हर शुभकार्य- जैसे विवाह, नामकरण आदि में भी पितरों को नान्दी श्राद्ध(आबदेव) करने की परम्परा है. नान्दी मतलब आशीर्वाद प्राप्त करना. निर्विघ्न कार्य सम्पन्न होने की कामना के साथ जैसे प्रथम गणेशपूजा होती है उसी प्रकार पितरों से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नान्दी श्राद्ध का विधान है लेकिन इसमें पिण्डदान नहीं किया जाता. नान्दी श्राद्ध को वृद्धि श्राद्ध भी कहा जाता है, जिसमें पितरों से कुल वृद्धि की कामना की जाती है.

फोटो गूगल से साभार

हमारे पर्वतीय अंचल में यह परम्परा रही है कि पार्वण श्राद्धों में पिता का श्राद्ध तो मृत्यु वाली तिथि को ही निश्चित है, जब कि माता का श्राद्ध नवमी की तिथि को ही किये जाने की मान्यता है. दूसरी ओर यह भी मान्यता है कि माता का श्राद्ध पिता के श्राद्ध से पहले नहीं किया जा सकता. इस स्थिति में यदि किसी के पिता की मृत्यु की तिथि नवमी के बाद की तिथि हो तो मान्यतानुसार पिता का श्राद्ध अष्टमी को ही किया जाता है अन्यथा यदि पिता की मृत्यु तिथि नवमी से पूर्व हो तो उसी निश्चित तिथि को श्राद्ध किया जाना ज्यादा उपयुक्त बताया गया है. लेकिन वर्तमान में अधिकांश लोग अपनी सुविधा देखते हुए, जिनके माता-पिता दोनों नहीं हैं, अष्टमी व नवमी को क्रमशः माता व पिता का श्राद्ध कर लिया करते  हैं. जिस पितर की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, उस का श्राद्ध पितृविर्सजन अमावास्या को किया जाता है तथा ऐसे पितर जिनकी  मृत्यु शस्त्रों से हुई हो अथवा अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाना बताया गया है.

सर्वपितृ अमावास्या पितरों की विदाई का दिन होता है, इस दिन भी पितरों का तर्पण किया जाता है. जब कि श्रद्धावान लोग तो पूरे सोलह श्राद्धों में प्रतिदिन  पितरों का तर्पण किया करते हैं. इस वर्ष श्राद्ध पूर्णिमा तिथि 2 सितम्बर से प्रारम्भ हो रहे हैं जो 17 सितम्बर को सर्व पितृ अमावास्या को सम्पन्न होंगे.

श्राद्ध से एक दिन पूर्व हवीक होता है. दरअसल हमारे पहाड़ में हवीक को हबीक उच्चरित किया जाता है और हम इसी गलत उच्चारण से शब्द के मूल अर्थ से भटक जाते हैं. पुरोहिती पेशे से जुड़े व्यक्ति भी हवीक के बारे में आपको सारे नियम बता देंगे लेकिन हवीक का शाब्दिक अर्थ नहीं बता पाते.

बताया गया है कि गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध तथा ब्रह्मकपाली पिण्डदान के बाद पितरों को श्राद्ध में पिण्डदान देने की आवश्यकता नहीं होती लेकिन श्रद्धास्वरूप निश्चित तिथि को तर्पण के माध्यम से तब भी उन्हें तृप्त किया जाता है. कुशा वेष्टित अंगुली से तिल, तण्डुल (चावल) के साथ जल अर्पित पितर सन्तुष्ट हो जाते हैं. पितर के लिए परोसे जाने वाले भोज को पातई या पातली कहा जाता है. शुद्धता की दृष्टि से हरे पत्ते पर परोसने के कारण इसे पातई उच्चरित किया गया हो. इसके साथ ही गाय, कौवे एवं कहीं कही कुत्ते व चींटी के लिए भी अलग से भोजन रखने की परम्परा है.

श्राद्ध से एक दिन पूर्व हवीक होता है. दरअसल हमारे पहाड़ में हवीक को हबीक उच्चरित किया जाता है और हम इसी गलत उच्चारण से शब्द के मूल अर्थ से भटक जाते हैं. पुरोहिती पेशे से जुड़े व्यक्ति भी हवीक के बारे में आपको सारे नियम बता देंगे लेकिन हवीक का शाब्दिक अर्थ नहीं बता पाते. यह तो सभी जानते हैं कि श्राद्ध के पहले दिन मुण्डन आदि कर तर्पण किया जाता है, तथा सूर्यास्त से पूर्व एक ही समय भोजन करने का नियम बताया गया है. हवीक का अर्थ भी इसी में छिपा है. शास्त्रों में अग्नियों के भी प्रयोग के अनुसार विविध नाम दिये गये हैं. यथा –

“अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते.
पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभनः..
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि.
नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्निः प्राशने च शुचिस्तथा..
सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भवः.
गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते..
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजकः स्मृतः.
चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे..
प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहसः.
लक्षहोमे तु वह्निःस्यात कोटिहोमे हुताश्नः..
पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा.
पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके..
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषकः.
कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे..’’

इस प्रकार यज्ञ की अग्नि, चिता की अग्नि, पाक अग्नि को अलग अलग नामों से उच्चरित किया गया है, इन्हीं में एक है- भौतिक शरीर में पाये जाने वाली जठराग्नि. यही अग्नि हमारी क्षुधा को प्रज्ज्वलित करती है तथा किये गये भोजन को पचाती है. जिस प्रकार यज्ञकुण्ड में प्रज्ज्वलित अग्नि को भोजन रूप में दी जाने वाली हवि है, ठीक उसी प्रकार हमारे शरीर की जठराग्नि को भी भोजन रूप में हम हवि देते हैं. सामान्यतः हम भोजन दो बार किया करते हैं, लेकिन हवीक के दिन एक बार ही भोजन किया जाता है, यानि हवि एक बार दी जाती है. इस प्रकार यह शब्द हविऽ इक (एक) शब्दों को जोड़कर बना है. रही बात सूर्यास्त से पूर्व भोजन करने की. हवीक के दिन स्वयं भोजन करने से पूर्व गायों को गौग्रास तथा कौवों को खिलाने की परम्परा है. गांवों में गायों की गौशालाऐं घरों से दूर हुआ करती थी इसलिए रात्रि में गौशाला जाकर उन्हें गौग्रास दे पाना संभव नहीं होता तथा रात्रि में कौओं की अनुपलब्धता को देखते हुए संभवतः दिन ढलने से पूर्व हवीक के दिन भोजन करने की परम्परा रही हो.

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गौर करने वाली बात ये है कि श्राद्ध कर्म में पितरों को दिया जाने वाला तर्पण व भोजन पितरों को पहुंचता है या नहीं, इसका हमारे पास कोई प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, यह आस्था का विषय है और आस्था को प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं. लेकिन इसका इतर पक्ष देखें तो सनातनी संस्कृति में श्राद्ध के नाम पर अपने पितरों को याद करने का यह उपक्रम कितना व्यावहारिक है? यदि श्राद्ध जैसे पितृपर्वों की व्यवस्था न होती तो शायद आज की व्यस्त जिन्दगी में हम उनको कुछ ही काल के अन्तराल में भूल चुके होते और बहुत संभव है कि कई लोगों को तो अपने पितामह, प्रपितामह, मातामह और प्रमातामह का नाम तक पता न होता. श्राद्ध के बहाने में कम से कम वर्ष में दो बार एकोदिष्ट एवं पार्वण श्राद्ध तथा किसी भी शुभ कार्य में नान्दी श्राद्ध के मौके पर उनको याद तो कर लेते हैं, उनसे प्रेरणा लेने एवं अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर तो मिलता है. धन्य है, सनातनी संस्कृति की परम्पराऐं जो धार्मिक आस्थाओं के साथ व्यावहारिक जगत के लिए भी उतनी ही उपयोगी हैं.

(लेखक भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल से सेवानिवृत्त हैं तथा  प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों, लोकसंस्कृति, लोकपरम्परा, लोकभाषा तथा अन्य सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा कविता लेखन में भी रूचि. 24 वर्ष की उम्र में 1978 से आकाशवाणी नजीबाबाद, लखनऊ, रामपुर तथा अल्मोड़ा केन्द्रों से वार्ताओं तथा कविताओं का प्रसारण.)

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