September 22, 2020
अध्यात्म

पितृपक्ष : पितरों की समाराधना का पर्व

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

इस वर्ष 1 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है, जिसका समापन 17 सितंबर, 2020 को होगा. उल्लेखनीय है कि भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों का पितृपक्ष पूरे देश में ‘महालय’ श्राद्ध पर्व के रूप में मनाया जाता है.आमतौर पर पितृपक्ष 16 दिनों का होता है, लेकिन इस संवत्सर वर्ष में तिथि के बढ़ने के कारण एक दिन अधिक होकर यह 17 दिनों का हो गया है.

वैदिक सनातन धर्म के अनुयायी इस पितृपक्ष में अपने स्वर्गीय पिता,पितामह, प्रपितामह, माता, मातामह आदि पितरों को श्रद्धा तथा भक्ति सहित पिंडदान देते हैं और उनकी तृप्ति हेतु तिलांजलि सहित श्राद्ध-तर्पण भी करते हैं. ‘श्राद्ध’ का अर्थ है जो वस्तु श्रद्धापूर्वक दी जाए- ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्.’ आश्विन मास के पितृपक्ष को ‘महालय’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह पक्ष पितरों का आलय (निवास) है. महालय श्राद्ध में मुख्य रूप से तीन कार्य होते हैं- पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन. अपराह्नकाल में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पिसा हुआ चावल‚ गाय का दूध,घी शक्कर‚ शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धाभाव से पितरों को अर्पित करना पिंडदान कहलाता है. जल में काले तिल‚ जौ‚ कुश और पुष्प को लेकर पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है.

असल में अपने पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज इस मनुष्य जीवन को भोग रहे हैं और इस जीवन का सुख और आनंद प्राप्त कर रहे हैं. इस सनातन वैदिक धर्म परम्परा में, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया है. इसी पितृपक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण और उनकी मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न करते हुए उन्हें अर्घ्य समर्पित करते हैं. यदि किसी कारण से उनकी आत्मा को मुक्ति प्रदान नहीं हुई हो, तो हम उनकी शांति के लिए विशिष्ट कर्म करते है जिसे ‘श्राद्ध’ कहा जाता है.

‘ब्रह्मपुराण’ ने श्राद्ध की परिभाषा देते हुए कहा है कि ‘जो कुछ उचित काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार उचित शास्त्रानुमोदित विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है.’-
“देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्. पितृनुद्दिश्य विप्रभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाह्रतम्..”   -ब्रह्मपुराण

मनु के अनुसार श्राद्ध पांच प्रकार का होता है- नित्य, नैमित्तिक, काम्य‚ वृद्धि और पार्वण. आश्विन मास का पितृपक्षीय श्राद्ध ‘पार्वण श्राद्ध’ कहलाता है. धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितरों को पिण्डदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु,पौत्रादि, यश, स्वर्ग, र्कीर्ति, बल, लक्ष्मी‚ धन-धान्यादि की प्राप्ति करता है.

श्राद्ध करने का सामान्य नियम यह है कि वर्ष के किसी भी मास या पक्ष की जिस तिथि में पितर जन की मृत्यु हुई हो आश्विन कृष्ण पक्ष की उसी तिथि को उस पितर का श्राद्ध करने का विधान है. अपवाद स्वरूप माता या कुल की अन्य सधवा रूप में मृत नारियों का श्राद्ध केवल पितृपक्ष की नवमी तिथि को ही किया जाता है भले ही वे किसी भी तिथि को मरी हों. संन्यासी व्यक्ति का श्राद्ध भी द्वादशी तिथि को निश्चित है. अकाल मृत्यु‚ विषपान तथा आत्महत्या के कारण मरे हुए व्यक्ति का श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्दशी तिथि को किए जाने का विधान है. जिनकी मृत्यु तिथि याद नहीं या किसी कारण वश उस पितर का श्राद्ध निश्चित तिथि पर न हो सका हो तो ऐसे सभी पितरों का श्राद्ध अमावस्या की तिथि को किया जा सकता है. ‘निर्णयसिन्धु’ के अनुसार आषाढी कृष्ण अमावस्या से पांच पक्षों के बाद आने वाले पितृपक्ष में जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है तब पितर जन क्लिष्ट होते हुए अपने वंशजों से प्रतिदिन अन्न जल पाने की इच्छा रखते हैं-
“आषाढीमवधिं कृत्वा पंचमं पक्षमाश्रिताः.
कांक्षन्ति पितरःक्लिष्टा अन्नमप्यन्वहं जलम्…”

आश्विन मास के पितृपक्ष में पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि देकर संतुष्ट करेंगे. इसी इच्छा को लेकर वे पितृलोक से पृथ्वीलोक में आते हैं. पितृपक्ष में यदि पितरों को पिण्डदान या तिलांजलि नहीं मिलती है तो वे पितर निराश होकर अपने पुत्र-पौत्रादि को कोसते हैं और उन्हें शाप भी दे देते हैं.

दरअसल‚ पूर्वज-पूजा के रूप में श्राद्ध की अवधारणा वैदिक चिन्तन का परिणाम है.ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में अग्नि से प्रार्थना की गई है कि वह शरीर दाह के उपरान्त मृतात्मा को सत्कर्मों वाले पितरों और देवताओं के लोक की ओर ले जाए (ऋ.10.15.14) बृहदारण्यकोपनिषद् में मनुष्यों‚ पितरों और देवों के तीन पृथक् पृथक् लोक बताए गए हैं. उपनिषदों के काल से ही यह मान्यता प्रसिद्ध हो चुकी थी कि विद्या अर्थात् ज्ञानमार्ग से देवलोक की प्राप्ति होती है और कर्ममार्ग से पितरलोक मिलता है-
‘विद्यया देवलोकः’ ‘कर्मणा पितृलोकः’   -बृहदा‚1-5-16

छान्दोग्योपनिषद् में मृत्यु के उपरान्त जीवात्माओं द्वारा देवयान (उत्तरायण)और पितृयान (दक्षिणायन) इन दो मार्गों से परलोक जाने का वर्णन आया है. पितृयान के मार्ग से विभिन्न योनियों में भ्रमण करने वाली जीवात्माएं पितर कहलाती हैं और इनका मार्ग अन्धकार युक्त होता है. यही कारण है कि महालय श्राद्ध का पक्ष कृष्ण पक्ष की  अंधेरी रातों में आता है. इस प्रकार वैदिक काल से ही आश्विन मास का पितृपक्ष अपने पूर्वज पितरों को श्रद्धांजलि देने तथा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक वार्षिक अनुष्ठान रहा है.

वैज्ञानिक दृष्टि से वैदिक धर्म में श्राद्ध की अवधारणा मात्र एक धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि श्राद्ध अथवा पितृपूजा सूर्य के संवत्सर चक्र‚ चन्द्रमा के नक्षत्र विज्ञान और कर्म सिद्धान्त की मान्यताओं पर आधारित एक ब्रह्माण्ड दर्शन से उभरा चिंतन है. पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे नवीन शरीर को धारण कर लेती है. किन्तु पिण्डदान देने की मान्यता यह बतलाती है कि पूर्वजों की मृतात्माएं पचास या सौ वर्षों के बाद भी वायु में सन्तरण करते हुए चावल के पिण्डों की सुगन्ध को अपने वायव्य शरीर द्वारा ग्रहण करने में समर्थ होती हैं.

वैज्ञानिक दृष्टि से वैदिक धर्म में श्राद्ध की अवधारणा मात्र एक धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि श्राद्ध अथवा पितृपूजा सूर्य के संवत्सर चक्र‚ चन्द्रमा के नक्षत्र विज्ञान और कर्म सिद्धान्त की मान्यताओं पर आधारित एक ब्रह्माण्ड दर्शन से उभरा चिंतन है. पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे नवीन शरीर को धारण कर लेती है. किन्तु पिण्डदान देने की मान्यता यह बतलाती है कि पूर्वजों की मृतात्माएं पचास या सौ वर्षों के बाद भी वायु में सन्तरण करते हुए चावल के पिण्डों की सुगन्ध को अपने वायव्य शरीर द्वारा ग्रहण करने में समर्थ होती हैं. इस सन्दर्भ में मत्स्यपुराण में ऐसी ही श्राद्ध विषयक जिज्ञासा का उत्तर देते हुए कहा गया है कि वह भोजन जिसे श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मण खाता है अथवा जो अग्नि में डाला जाता है वह पितरों के पास पहुंच जाता है. क्योंकि नाम और गोत्र के साथ उच्चारित मन्त्र श्रद्धा भाव से दी गई आहुतियों या वस्तुओं को संकल्पित पितरों के पास पहुंचा देते हैं. यदि किसी के पितर अपने अच्छे कर्मों के कारण देवता हो गए हैं तो उनके लिए श्राद्ध भोजन अमृत हो जाता है. यदि वे अपने बुरे कर्मों के कारण दैत्य या असुर हो गए हैं तो उन्हें श्राद्ध के अवसर पर दिया गया भोजन आनन्द प्राप्त कराता है. यदि वे पशु हो गए हैं तो वही भोजन घास के रूप में उन्हें तृप्त करता है और यदि वे अपने क्रूर कर्मों के कारण सर्प बन गए हैं तो श्राद्ध भोजन वायु बन कर उनकी सेवा करता है.

सभी फोटो गूगल से साभार

पितृपक्ष के इतिहास की दृष्टि से सनातन हिन्दू धर्म में पितरों का श्राद्ध करने की परम्परा उतनी ही प्राचीन है जितना प्राचीन वैदिक धर्म है. ऋग्वेद में श्राद्ध के देवता ‘श्रद्धा’ की स्तुति की गई है. श्राद्ध के अवसर पर बोला जाने वाला मंत्र ‘मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः’ भी ऋग्वेद (1.90.6) का ही एक मंत्र है जिसका पिंडदान करते हुए उच्चारण करने पर पितर जन तृप्ति को प्राप्त करते हैं. तैत्तिरीय संहिता में भी देवऋण, ऋषिऋण के साथ साथ पितृऋण चुकाने का भी उल्लेख आया है. छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार देवताओं के समान ही पितृगण भी इस ब्रह्माण्ड व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं इसलिए उन्हें ‘स्वधा’ अर्थात् जल तर्पण देने का विशेष विधान किया गया है- ‘स्वधा पितृभ्यः.’ (छान्दो- 2.22.2)

ऐतिहासिक दृष्टि से विचार किया जाए तो इस श्राद्ध की परम्परा को सर्व प्रथम सूर्यवंश के संस्थापक मनु के वंशजों ने अपने पितरों को श्रद्धांजलि देने के प्रयोजन से शुरू किया था. ‘श्राद्धविधि’ की मूल कल्पना ब्रह्मदेव के पुत्र अत्रि ऋषि की है. अत्रि ऋषि ने निमी नामक अपने एक पुरुष वंशज को ब्रह्मदेव द्वारा बताई गई श्राद्धविधि सुनाई.मनु ने सर्व प्रथम श्राद्ध क्रिया का अनुष्ठान किया, इसलिए मनु को ‘श्राद्धदेव’ कहा जाता है.  श्रीराम के वनवास-प्रस्थान के उपरांत,भरत वनवास में उनसे जाकर मिलते हैं एवं उन्हें पिता के निधन का समाचार देते हैं. तदुपरांत मनुवंश के वंशज होने के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम यथाकाल पिता का श्राद्ध करते हैं,ऐसा उल्लेख श्रीरामचरितमानस में आया है.अपनी इस कुल परम्परा का पालन करते हुए श्रीराम ने सरयू प्रवेश से पहले भी अपने पूर्वज पितरों की पवित्र भूमि उत्तराखण्ड हिमालय स्थित ‘काषाय’ पर्वत पर देव‚ऋषियों और पितरों का श्राद्ध-तर्पण किया था. अल्मोड़ा में ‘कलमटिया’ नामक स्थान पर वह स्थान आज भी ‘रामशिला’ के रूप में पूज्य है-
“दृश्यते भूतलेऽद्यापि पुण्ये काषायपर्वते .
तत्र ये वैष्णवा धन्या रामपादाकिंतां शिलाम् .
पूजयन्ति महाभागास्ते धन्या नात्र संशयः .
सधन्यः पर्वतो ज्ञेयो यत्र रामशिला शुभा..”
        -मानसखण्ड‚ 52.36–37

वाल्मीकि रामायण से ज्ञात होता है कि भगवान राम ने पक्षिराज जटायु की मृत्यु हो जाने पर उसका भी अंतिम संस्कार और श्राद्ध-तर्पण किया था. वह स्थान आज नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में स्थित ‘सर्वतीर्थ’ नाम से एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान बन गया है.

दरअसल,श्राद्ध भारतीय संस्कृति का अपने पुर्वजों के प्रति किया जाने वाला एक कृतज्ञतापूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है,जो आत्मा की यात्रा में कहीं भी भटके अटके हुए हमारे पूर्वजों की पारलौकिक आवश्यकताओं को तर्पण पिंडदान आदि के द्वारा पूरा करता है. मनुष्य का अंतिम संस्कार हो जाने के बाद भले ही उसके स्थूल शरीर का अंत हो गया हो मगर उसके सूक्ष्म शरीर की अवस्थिति पितृलोक में बनी ही रहती है और अपने परिवार जनों से उसका पितर के रूप में सम्बन्ध भी अटूट होता है. इस वजह से पितृपक्ष में उसके परिवारजनों द्वारा श्राद्ध तर्पण करने का औचित्य भी सदा बना ही रहता है. हालांकि यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि जो लोग जीवितावस्था में अपने माता पिता का सम्मान नहीं करते वे अपने मृत माता-पिता का श्राद्ध क्या करेंगे? किन्तु वास्तविकता यह है कि यदि हम अपने शास्त्रों, वेद, पुराणों में आस्था रखते हैं तो हमें चाहिए कि जिस प्रकार यज्ञ में देवलोक स्थित इंद्र,वरुण,सूर्य आदि देवताओं को हवि प्रदान की जाती है उसी तरह प्रत्येक परिवार को पितृपक्ष या अन्य अवसरों पर पितृलोक में स्थित अपने पितृजनों को पिंडदान,तर्पण आदि द्वारा तृप्त करना सनातन हिन्दू धर्म  का अनुयायी होने की भी एक शास्त्रीय मर्यादा है.

भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन की अमावस्या तक हमारे ब्रह्मांड में तारा मंडल की स्थिति कुछ इस प्रकार रहती है, जिससे पितर लोकों के प्रवेश द्वार खुल जाते हैं और इन आत्माओं को अपने प्रियजनों से मिलने की अनुमति मिल जाती है. इस पितृपक्ष में अपने पितृजनों के नाम से किए गए दान,यज्ञ व श्राद्ध तर्पण द्वारा यदि उन्हें उन अवांछित योनियों व लोकों के बंधनों से मुक्ति मिलती है तो हम शास्त्रसम्मत पितृऋण से भी मुक्त होते हैं.

भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन की अमावस्या तक हमारे ब्रह्मांड में तारा मंडल की स्थिति कुछ इस प्रकार रहती है, जिससे पितर लोकों के प्रवेश द्वार खुल जाते हैं और इन आत्माओं को अपने प्रियजनों से मिलने की अनुमति मिल जाती है. इस पितृपक्ष में अपने पितृजनों के नाम से किए गए दान,यज्ञ व श्राद्ध तर्पण द्वारा यदि उन्हें उन अवांछित योनियों व लोकों के बंधनों से मुक्ति मिलती है तो हम शास्त्रसम्मत पितृऋण से भी मुक्त होते हैं.

अंत में, मैं इस पितृपक्ष में पृथ्वीलोक में आए हुए पितरदेवों से प्रार्थना करता हूं कि वे राष्ट्र के प्रदूषित वातावरण को शान्त करें तथा उनसे संचालित हमारे देश का ब्रह्मांडीय ऋतु चक्र राष्ट्र को निरोगता और खुशहाली प्रदान करे. सभी देशवासियों को पितृपक्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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