
- नीरज उत्तराखंडी | रवांई घाटी/उत्तरकाशी
जनपद उत्तरकाशी की रवांई घाटी में यमुना नदी के तट पर स्थित तिलाड़ी मैदान आज भी उस दर्दनाक इतिहास का मौन साक्षी है, जिसने पूरे गढ़वाल को झकझोर दिया था। आज तिलाड़ी कांड की 96वीं बरसी है। 30 मई 1930 को टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ अपने हक-हकूकों की रक्षा के लिए एकत्रित निहत्थे ग्रामीणों पर की गई अंधाधुंध गोलीबारी में अनेक लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। इतिहास में यह घटना ‘गढ़वाल के जलियांवाला बाग’ के नाम से दर्ज है।
आज भी जब तिलाड़ी कांड का जिक्र होता है, तो रवांई घाटी के लोगों की आंखें नम हो जाती हैं और उस दिन की भयावह स्मृतियां लोगों को भीतर तक झकझोर देती हैं।
वन बंदोबस्त बना आंदोलन की वजह
टिहरी रियासत ने वर्ष 1927 में रवांई क्षेत्र में वन बंदोबस्त लागू किया था। इसके तहत ग्रामीणों के जंगलों पर पारंपरिक अधिकार सीमित कर दिए गए। खेत-खलिहानों तक मुनारबंदी कर दी गई तथा जंगलों से जलाऊ लकड़ी, चारा और अन्य वन संसाधन लेने पर कर लगा दिया गया।
इतना ही नहीं, ग्रामीणों द्वारा पाले जाने वाले मवेशियों की संख्या भी निर्धारित कर दी गई। इन कठोर नियमों से पूरे क्षेत्र में असंतोष फैल गया और लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।
दयाराम की बात पर भड़का जनाक्रोश
बताया जाता है कि बड़कोट में आयोजित एक बैठक में तत्कालीन डीएफओ पद्मदत्त ग्रामीणों को नए कानूनों की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा कि एक परिवार केवल एक गाय, दो बैल और सीमित संख्या में भेड़-बकरियां ही रख सकता है। इस पर कंसेरू गांव के दयाराम ने बताया कि उनके पास 200 से 300 मवेशी हैं। आरोप है कि इस पर डीएफओ ने उन्हें मवेशियों को खाई में फेंक देने की बात कह दी। इस टिप्पणी ने ग्रामीणों के आक्रोश को और भड़का दिया।
आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी और संघर्ष
वनाधिकार आंदोलन के प्रमुख नेताओं दयाराम, रुद्र सिंह, राम प्रसाद और जमन सिंह को 20 मई 1930 को रवांई परगने के तत्कालीन एसडीएम सुरेंद्र दत्त की अदालत ने दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई और टिहरी जेल भेजने का आदेश दिया। लेकिन डंडालगांव के पास ग्रामीणों ने उन्हें छुड़ा लिया।
इस दौरान हुई झड़प और गोलीबारी में तत्कालीन एसडीएम सहित कुछ ग्रामीणों की मृत्यु हो गई। इसके बाद रियासत और जनता के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया।
30 मई 1930: जब तिलाड़ी मैदान बना शहादत की धरती
अपने अधिकारों की रक्षा और आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के लिए 30 मई 1930 को हजारों ग्रामीण तिलाड़ी मैदान में एकत्रित हुए थे। इसी बीच टिहरी रियासत के दीवान चक्रधर जुयाल के आदेश पर बड़कोट के ऊपर की पहाड़ियों में सैनिक तैनात कर दिए गए।
प्रत्यक्षदर्शियों और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, जब ग्रामीण शांतिपूर्वक सभा कर रहे थे, तभी उन्हें तीन ओर से घेर लिया गया और अचानक गोलियां बरसाई गईं। जान बचाने के लिए कई लोग यमुना नदी में कूद पड़े, लेकिन तेज बहाव में बह गए। गोलीबारी और भगदड़ में बड़ी संख्या में लोग शहीद हुए, जबकि अनेक लोग घायल हुए।
राजशाही के खिलाफ तेज हुआ आंदोलन
तिलाड़ी कांड ने टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जनआक्रोश को और अधिक प्रबल कर दिया। इस घटना के बाद राजशाही विरोधी आंदोलन पूरे क्षेत्र में फैल गया। बाद के वर्षों में स्वतंत्रता सेनानी और जननायक श्रीदेव सुमन ने इस संघर्ष को नई दिशा दी। उनके त्याग, बलिदान और जनआंदोलनों के दबाव के परिणामस्वरूप वर्ष 1949 में टिहरी रियासत का भारतीय गणराज्य में विलय हुआ और जनता को राजशाही से मुक्ति मिली।
शहीदों की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम
तिलाड़ी कांड की 96वीं बरसी पर आज रवांई घाटी सहित पूरे उत्तराखंड में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठनों द्वारा तिलाड़ी मैदान में कार्यक्रम आयोजित कर उन अमर शहीदों को नमन किया जा रहा है, जिन्होंने जल, जंगल, जमीन और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
तिलाड़ी कांड केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जनचेतना, अधिकारों की लड़ाई और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का अमर प्रतीक है। 96 वर्ष बाद भी यह घटना हमें याद दिलाती है कि अधिकारों की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता और न ही इतिहास उसे भुला पाता है।
