
संकट में सीमांत
सुमन जोशीबरसात का मौसम है. खिड़कियों के शीशों पर पड़ी बूंदों को देखते हुए अदरक-इलायची वाली चाय की चुस्कियों के बीच अपनी पसंदीदा किताब पढ़ने के दिन.
और उसी के साथ म्यूजिक स्टोर से,
"रिम-झिम गिरे सावन,
सुलग-सुलग जाए मन,
भीगे आज इस मौसम में,
लगी कैसी ये अगन".
गीत सुनते-सुनते कहीं पहाड़ों व बचपन की यादों में खो जाने के दिन.
तेल की कढ़ाई में प्याज़ और आलू का बेसन में लिपटकर गोते खाने के दिन.हम इस बरसात में जहाँ जाने का मन बनाते हैं. जिस जगह की छवि हम मन में उकेरते हैं असल में वहां के लोग पल-पल डरों के अंधेरों में जीते हैं. जो लोग इस मंजर का आँखों देखा हाल देख रहे है और त्रादसी से जूझ रहे हैं उनके लिए बरसात एक डरावने सपने की तरह हैं.और इसी बीच शहर में बैठे अपने 12×14 फ़ीट के कमरे में बैठे फेसबुक,इंस्टाग्राम पर बरसात की चुनिंदा तस्वीरों पर लाइक करते हुए हम सोचते हैं कि काश हम वहा...









