ट्रैवलॉग

आस्था के पथ पर मेरी गोमुख यात्रा…

यात्रावृत्तांत

  • डॉ कपिल पंवार

गंगा नदी, सांस्कृतिक वैभव, श्रद्धा एवं आस्था की प्रतीक मानी जाती हैं. सदियों से भारतीय समाज के हर वर्ग और समुदाय ने अपनी भावनात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानकर गंगा की स्तुति की. पौराणिक काल से ही गंगा, ममतामयी माँ के रूप में पूजनीय है. गंगा, श्रद्धा और विश्वास के रूप में  पतित पावनी है तो जलापूर्ति के रूप में  जीवनदायनी भी.

गंगा आदिकाल से ही भारत की आस्था, श्रद्धा का केंद्र होने के साथ ही दिव्य मंगलमयी कामना की पुण्यसलिला रही है. इसी आस्तिक अवधारणा का भाव लिए श्रद्धालु एक बार उस स्थान तक अवश्य पहुंचना चाहता है जहाँ से गंगा का उद्गम है. श्रद्धालु गंगोत्री धाम से 18 किमी की पैदल दूरी तय करके गोमुख तक पहुंचता है. गोमुख तक की यह यात्रा वही श्रद्धालु करता है, जो उच्च हिमालयी क्षेत्र के कारण आक्सीजन की कमी और पैदल यात्रा की चुनौती के लिए शारीरिक रूप से सक्षम हो लेकिन बहुत वर्षों बाद मैं अपने तीन साथियों  के साथ गोमुख यात्रा के लिए गया. इस बार  गोमुख यात्रा के लिए कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. बहुत सी यादें ताजा हुई कभी जिन रास्तों पर लड़कपन में बिना थके चलता था उन्हीं रास्तों ने इस बार बढ़ती उम्र का एहसास दिलाया. तैतीस की उम्र में ये थकावट आ जाना स्वयं के आंकलन के लिए भी ठीक था.

हम 19 जून 2022 को रात्रि विश्राम के लिए गोमुख मार्ग पर कनखू आश्रम आ चुके थे. यहाँ आश्रम के मुख्य महंतजी के साथ भोजन करने के बाद कुछ देर आध्यात्मिक और सांसारिक बातचीत के साथ अपनी यात्रा की रूपरेखा उन्हें बताई. आश्रम के एक ही कमरे में हम चारों लोग सोये और सुबह 5 बजे गोमुख के लिए प्रस्थान करने की योजना बनाई. हमें एक ही दिन में गोमुख से वापसी इसी आश्रम में करनी थी. सुबह जल्दी जाने की तैयारी थी लेकिन बारिश के कारण संभव नही हो पाया. जून के महीने में भी ठंड इतनी थी कि रजाई से उठने का मन नही था लेकिन दूसरी तरफ जाने की प्रबल इच्छा भी थी, आसमान थोड़ा खुला तो हम निकल पड़े गोमुख के लिए.

गंगोत्री धाम से 2 किमी गोमुख मार्ग पर ये स्थान कनखू गुफा के नाम से जाना जाता है. यहीं पर वन विभाग गोमुख जाने की अनुमति देता है और हर यात्री से गंगोत्री नेशनल पार्क में प्रवेश करने के लिए एक निश्चित शुल्क लेकर उसके जाने की जानकारी रजिस्टर में दर्ज की जाती है. हम चारों मित्रों ने यहां चैकी के दरोगा श्री राजवीर रावत को अपनी जानकारी देकर आगे जाने की अनुमति ली. राजवीर रावत जी मेरे पुराने परिचित है इसलिए उन्होंने हमें यात्रा की चुनौतियों से रूबरू करवाकर सुरक्षा बरतने की सलाह दी. हम आगे बढ़े और एक किमी आगे जाकर ही अपने-अपने मोबाइल-कैमरों से फोटों खींचने में जुट गये. सुबह-सुबह प्रकृति के खूबसूरत दृश्यों को कौन कैद नही करना चाहेगा, गंगोत्री नेशनल पार्क का पग-पग पर बदलता फ्लोरा, आसमान छूते चट्टाननुमा एकदम खड़े-खड़े पहाड़ बहुत लुभावने थे, हर किसी के लिए ये कुछ अलग अनुभव था.

गोमुख जाते हुए हर पहाड़ देवता नजर आता है कभी इन्हें ध्यान से देखता हूं तो लगता है कोई ऋषि शांत-धीर-गंभीर बैठे तप करते हुए हमें देख रहा हो और हम मनुष्य उसे अपनी तलहटी पर चींटी की तरह रेंगते दिख रहें हों, वह हम पर मंद-मंद मुस्करा रहा हो. हम मनुष्य अपने को कितना बलशाली समझते हैं लेकिन हिमालय में प्रकृति के सामने अपनी तुच्छता महसूस की जा सकती है. यहां प्रकृति का एक छोटा सा अदृश्य कारनामा आधुनिक विज्ञान से लदे मानव को अपनी ताकत का अंदाजा करा सकता है.

किसी भी यात्रा में हमारे सहयात्री ही यात्रा के अनुभवों की प्रकृति तय करते हैं. सबसे अच्छा यह था कि मेरी इस यात्रा के सहयात्री न तो कोई बचपन के मित्र थे न ही कोई ऐसा था जिसने मेरे गंगोत्री में बिताये बचपन के संघर्ष को देखा हो. तीनों में से कोई ऐसा भी नही था जो समान कार्यक्षेत्र का हो, ये न तो कभी मेरे साथ पत्रकारिता के पेशे में रहे, न ही उनका मेरी तरह शिक्षण क्षेत्र से कोई तालुकात है. यात्रा के दौरान यही सबसे अच्छा होता है कि आप पूर्व के दैनिक कार्यों, समस्याओं, सफलताओं-असफलताओं के बारे में बात ही न करें यही मेरे लिए इस यात्रा में सबसे अच्छा अनुभव था. गोमुख आमतौर से दो तरह के लोग जाते हैं एक श्रद्धा के भाव लिए श्रद्धालु बनकर और दूसरे एडवेंचर के लिए पर्वतरोही बनकर लेकिन इन रास्तों में  देखता हूं सब अपने में खोये हुए हैं. इन पगडंडियों में न कोई भागमभाग, न स्पर्धा, न जदोजह्द, न कोई जलन न कोई शत्रुता सब एकाग्र भाव से चल रहे हैं मानों गंगा के आँचल में  सब देव-सभ्यता से जुड़ गये हों.

दो-तीन किमी चलने के बाद थकान महसूस होने लगी थी. चीड़वासा तक पहुंचना पहला लक्ष्य था. जब दो किमी पहले  चीड़वासा दिखना शुरू हो जाता है तो एक पल राहत महसूस होती है लेकिन देखते-देखते आंखे थक जाती है और लगता है मानों ये दूरी कम होने की जगह बढ़ती जा रही हो. चीड़वासा से थोड़ी पहले हम नदी के बिल्कुल ऊपर चट्टानों को काटकर बनाये गये रास्ते से गुजरते हैं. एक छोटी सी गलती यहाँ भारी पड़ सकती है क्योंकि नीचे भागीरथी का तेज प्रवाह दिखाई देता है. गोमुख मार्ग के किनारे अद्भुत है माँ गंगा का रूप. माना जाता है कि गंगा, स्वर्ग से सीधे यहीं भागीरथी के कमंडल में  उतरती है.

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पैदल दूरी से यात्रा करते समय यही सबसे ज्यादा ध्यान रखना होता है कि आपके बैग में कुछ भी अतिरिक्त सामान नही होना चाहिए क्योंकि ऑक्सीजन की कमी के कारण यहाँ पैदल चलना सामान्य से ज्यादा थका देने वाला होता है और ऐसी स्थिति में बैग में एक सुई का भार भी बहुत ज्यादा महसूस होता है.

गंगोत्री से ही हम इसके दाँई ओर गोमुख के लिए चलते हैं और देखते हैं इसके उस बालरूप का अल्लहड़पन जिसमें वह कहीं भारी चट्टानों से कूद-फांदती हुई आड़े-तिरछे पत्थरों के बीच से निकल रही है. भागीरथी की चाल यहाँ उस किशोरी की तरह लगती है जो मदमस्त होकर हँसती-खेलती-किलकारियों के साथ घर से क्रीड़ा के लिए निकलती है.  वह कहीं विशालकाय पत्थरों से टकराकर खंडों में बंटती है तो कहीं मतवाली होकर इन्हीं पत्थरों पर अपनी कलाकारी उस शिशु की तरह दिखाती है जो हाथ में कलम मिलते ही साफ-सुथरी दिवारों पर टेढ़े-मेढ़े आकृतियां उकेर देती है. सचमुच भागीरथी का यह बालरूप अद्भुत है.

हम तीन घटें में लगभग 7 किमी चलने के बाद चीड़वासा तो पहुंच गये थे लेकिन थकान इतनी महसूस हुई कि चीड़वासा पहुंचते मैं बुरी तरह थक गया. मैंने आगे चलने में असमर्थता जताई लेकिन एक साथी-शक्ति डोभाल हर हाल में गोमुख जाना चाहता था और इस पूरी यात्रा में मैं ही उनके लिए मार्गदर्शक की भूमिका में था. चीड़वासा में चारों की सहमति बनी कि यहां नाश्ता किया जाए. इस पूरे यात्रा मार्ग पर दुकान खोलना प्रतिबधिंत है, वन विभाग द्वारा केवल चीड़वासा और भोजवासा में एक-एक दुकान खोलने का प्रावधान है जो टेण्डर प्रक्रिया से आंवटित की जाती है. हम करीब बीस मिनट आराम फरमा चुके थे और पराठों का इंतजार कर रहे थे लेकिन जब दुकानदार को दुबारा पूछा तो पता चला कि उसने हमारा ऑर्डर सुना ही नही हमने दुबारा इंतजार करना उचित नही समझा.

हमने बैग में उत्तरकाशी बाजार से ही कुछ खाने का सामान रखा था जिसमें 1 किलो सेब, और 4-5 बिस्किट-नमकीन के छोटे-छोटे पैकेट थे. उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पैदल दूरी से यात्रा करते समय यही सबसे ज्यादा ध्यान रखना होता है कि आपके बैग में कुछ भी अतिरिक्त सामान नही होना चाहिए क्योंकि ऑक्सीजन की कमी के कारण यहाँ पैदल चलना सामान्य से ज्यादा थका देने वाला होता है और ऐसी स्थिति में बैग में एक सुई का भार भी बहुत ज्यादा महसूस होता है. चलते हुए मुझे भी यही महसूस हुआ, यूँ तो मैंने कनखू राम मन्दिर आश्रम में भी आधा से ज्यादा सामान छोड़ दिया था लेकिन यहाँ जब 5-6 किलो का बैग ज्यादा महसूस हुआ तो मैंने बैग में रखे चप्पल चीड़वासा के पास पत्थर के नीचे छुपा दिए जिन्हें वापसी के समय दुबारा में बैग में रख सकता था.

हम भोजवासा तक तो नीले आसमान के नीचे ही विचरण कर रहे थे लेकिन जैसे ही अचानक मौसम बदला तो यहां से गोमुख तक की यात्रा के लिए चुनौतियां पैदा हो गई. अब हम बादलों के तेजी से उड़ते फाहों के बीच, घिरते अंधेरे और शरीर के अंगों को काटने वाली बारिश की बूँदों के बीच तिलस्मी हिमालय के भीतर प्रवेश कर रहे थे. यहाँ अनुमान लगाना मुश्किल था कि  जहाँ श्रीनगर गढ़वाल से हम दो दिन पहले चले थे वहाँ आज भी सूर्य 40 डिग्री की तपिश दे रहा होगा. यहाँ तो पैदल चलने से ही गर्मी पैदा की जा सकती थी, समझ नही आ रहा था कि इस मौसम की खूबसूरती को, हिमालय के मनमोहक दृश्यों को कैसे जी-भर के जिऊँ, इनको कैसे सहेज के रखूँ.  इन्हें कैमरे से तस्वीरों के रूप में रख भी लूगां तो तस्वीरों में  ताजगी महसूस तो नहीं की जा सकती खैर…..स्मृतियों की भी तो अपनी रवानगी होती ही है. करीब दो घटें में चार-पांच किमी आगे भोजवासा पहुंचे तो सब कुछ बदला-बदला सा दिखाई दिया.

भोजवासा में रह रहे व्यापारियों ने बताया कि इस साल दो दर्जन से अधिक श्रद्धालु भोजवासा में लगी ट्रॉली से अपनी अँगुलियों को गंवाकर हताश होकर लौट चुके हैं. सरकारी महकमें से मन बहुत आहत हुआ लगा कि इससे अच्छा तो प्रशासन को इस यात्रा पर रोक ही लगानी चाहिए. कोई बहुत उम्मीदों और हंसी-खुशी से यात्रा के लिए आता है लेकिन एक ऐसी निशानी लेकर घर लौटना जो ताउम्र इस यात्रा के कटु अनुभवों को सहेज के रखें, वह बहुत दुखद है.

गोमुख यात्रा अब पहले जैसी नही रही, वर्ष 2018 में मेरू ग्लेशियर के ऊपर झील फटने से गोमुख जाने वाला प्राचीन मार्ग बह चुका था. जिससे भागीरथी के बायें तरफ की बजाय भोजवासा से यात्री ट्रॉली के सहारे दांई तरफ पहुंच रहे थे.  पता चला कि यही ट्रॉली श्रद्धालुओं के लिए जोखिमभरी साबित हो रही है. दरअसल वन विभाग के द्वारा भोजवासा में तपोवन तक पहुंचने के लिए हस्तचलित ट्रॉली तो लगाई गई थी लेकिन ट्रॉली का संचालन यात्रियों के भरोसे था.  यात्रियों को इस हस्तचलित ट्रॉली को संचालित करने का कोई अनुभव नहीं था ऐसे में लोगों ने बताया कि यहाँ हर रोज किसी न किसी यात्री की अंगुली ट्रॉली की तार के बीच फँस रही है और यात्रियों को अपनी अँगुलियां गवांनी पड़ रही है.

भोजवासा में रह रहे व्यापारियों ने बताया कि इस साल दो दर्जन से अधिक श्रद्धालु भोजवासा में लगी ट्रॉली से अपनी अँगुलियों को गंवाकर हताश होकर लौट चुके हैं. सरकारी महकमें से मन बहुत आहत हुआ लगा कि इससे अच्छा तो प्रशासन को इस यात्रा पर रोक ही लगानी चाहिए. कोई बहुत उम्मीदों और हंसी-खुशी से यात्रा के लिए आता है लेकिन एक ऐसी निशानी लेकर घर लौटना जो ताउम्र इस यात्रा के कटु अनुभवों को सहेज के रखें, वह बहुत दुखद है. हमारा एक साथी शैशव राणा भोजवासा में ही रूक गया और हमने किसी तरह ट्रॉली पार करके गोमुख के लिए प्रस्थान किया. भोजवासा से आगे दूसरी तरफ जिस रास्ते से हम गोमुख जा रहे थे वहां जमीन में रास्ता कहीं नजर नही आ रहा था. जमीन के पथरीले होने से एक-एक कदम आगे बढ़ाना मुश्किल था उस पर बरसात और कोहरे के कारण अब हिमालय का विराट रूप आखों से औझल हो गया और हिमालय में  चलने का द्वन्द्ध ज्यादा हो गया हालांकि मिट्टी की फिसलन और पानी के भराव  की समस्या यहां बिल्कुल नही थी.

गोमुख जाते हुए देवत्व की सुगंध महसूस होती है. चारों तरफ हिमालय का उन्मुक्त हास, उसके कई रंग-आकार, उसकी तलहटी में  कई किस्म के फूल-वनस्पतियों से भरी यह धरती, न जाने कितनी संजीविनी मौजूद है यहाँ. जब-जब यहाँ आता हूं मन लालायित हो जाता है यहीं रहने को. गोमुख मार्ग पर चलते ही पल-पल फ्लोरा तेजी से बदल जाता है. पहाड़ में चलते-चलते इसतरह पहाड़ों का बदल जाना हमेशा ही मुझे आकर्षित करता है. हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, शीतल हवाएं तेज महसूस हो रही थी. योजना ठीक से बनाई होती तो हम गोमुख से दो-तीन किमी ऊपर तपोवन तक जा सकते थे. तपोवन में हम शिवलिंग, भागीरथी पर्वत श्रृखंलाओं के और करीब होते हैं. यहां से बहने वाली आकाशगंगा का मन्द-मन्द प्रवाह देखकर लगता है कि हम किसी आकाश में बैठे हुए गंगा की ठंडी हवाओं का स्पन्दन महसूस कर रहे हों. करीब दस साल पहले मैं तपोवन-नन्दनवन तक गया था वे सारी स्मृतियां गोमुख जाते हुए बार-बार स्मृतिपटल पर लौट रही थी. अब दो बजने को था और गोमुख से यात्री लौट रहे थे, पूरे रास्ते में गोमुख की तरफ जाने वाले केवल हम तीन लोग ही थे. मुश्किलें बढ़ती जा रही थी और मेरे मन में एक डर भी था क्योंकि इसतरह का मौसम कभी भी मौत का कारण बन सकता था. एक बात महसूस हुई  हिमालय की यात्रा उन लोगों के साथ ही करनी चाहिए जो इस तरह के मौसम में यात्रा के  दुष्परिणाम जानते हो.

यात्रा का आनन्द अनिश्चितता और एक रहस्य में ही होता है वरना यात्रा, यात्रा नही रह जाती है. यह पूरी यात्रा भी अनिश्चितताओं के साथ पूरी हुई और जीवन भर महसूस की जा सकने वाली स्मृति बन गई, अब माँ गंगा अपने आँचल में कब बुलाएगी पता नही, मैं नहीं चाहता हूं कि मैं उस बच्चे की तरह बन जाऊँ जो बड़ा होकर माँ के आँचल को भूल जाता है इसलिए फिर जरूर जाना चाहूंगा लेकिन 38-40 किमी की एक दिवसीय गंगोत्री-गोमुख पैदल यात्रा हमेशा मेरी स्मृतियों में रहेगी.

मैं हर हाल मैं वापस जाना चाहता था क्योंकि मुझे पता था कि मैं हिमालय और गोमुख जैसी अति संवेदनशील जगह पर प्रकृति को चुनौती दे रहा हूं. लेकिन माँ गंगा की जो कृपा मुझ पर बचपन से रही वह एक बार फिर जागृत हुई और हम गोमुख पहुंच गये. जब मैं गोमुख से 100 मीटर नजदीक था तब लगा कि मैं एक नई दुनिया में हूं, बारिश अब बहुत कम हो चुकी थी, गोमुख पहुंचकर एक पल मैं सब कुछ भूल गया. आखों में आँसू आ गये लगा, माँ ने मुझे अपने आँचल में ही बड़ा किया है करीब 12-13  साल पहले मैं माँ के इस आँचल गंगोत्री-गौमुख-तपोवन में  किन हालतों में रहता था और आज उसी की कृपा से मैं जीवन के एक नए रास्ते पर हूं. कठिन रास्तों और हालतों के बाद भी यहां कुछ पल रूकना अद्भुत था, हमने कुछ तस्वीरें ली. गोमुख में दो-दो लीटर की कैन भरना तेज शीतल धारा में आसान नही था, जल इतना ठण्डा था कि उसमें 5 सेकेण्ड हाथ रखना भी संभंव नही था किसी तरह हमनें गंगाजल भरा और वापसी के लिए तेज कदम नापने शुरू किए.

अब हम जल्दी से जल्दी वापस लौटना थे क्योंकि हमें 18-20 किमी वापस राम मन्दिर कनखू आश्रम पहुंचना था. हम भोजवासा या चीड़वासा भी रूक सकते थे लेकिन राम मन्दिर में महाराज जी को हमारी चिंता हो सकती हैं इसलिए मैं तो ठान चुका था कि वापस जाना है. जब वापस भोजवासा पहुंचे तो हमारे साथी शैशव राणा ने बताया कि उनके सामने एक दिल्ली निवासी यात्री की तीन अंगुलियां  कटी जिसे भोजवासा में कोई प्राथमिक उपचार तक नही मिला और आनन-फानन में खच्चर बुक करवाकर वह गंगोत्री लौट गया, यहीं भोजवासा में वापसी के दौरान मैं और हमारा तीसरा साथी संदीप ट्रॉली से गिरते-गिरते बचे. वापस लौटकर मैंने  वन विभाग को भी इस समस्या के बारे में बताया तो पता चला कि भोजवासा में लगी ट्रॉली केवल तपोवन जाने वाले ट्रैकिंग दल के लिए है जिन्हें सुरक्षित ले जाना गाइड की जिम्मेदारी होती है. लेकिन राम मन्दिर के महंत हमारे गुरूजी स्वामी रामकृष्ण दासजी इस तरह की घटनाओं को देखकर शासन-प्रशासन से खासे नाराज थे और उनका नाराज होना भी लाजमी है क्योंकि इस पवित्र स्थल से किसी को बुरी यादें मिलना जीवनभर का दुख है. हम चीड़वासा से कनखू आश्रम तक मोबाइल के प्रकाश में आये. ये रात का पूरा सफर बहुत खतरनाक था एक छोटी गलती हमारे लिए बहुत भारी साबित हो सकती थी लेकिन बहरहाल हम सही सलामत पहुंच गये.

यात्रा का आनन्द अनिश्चितता और एक रहस्य में ही होता है वरना यात्रा, यात्रा नही रह जाती है. यह पूरी यात्रा भी अनिश्चितताओं के साथ पूरी हुई और जीवन भर महसूस की जा सकने वाली स्मृति बन गई, अब माँ गंगा अपने आँचल में कब बुलाएगी पता नही, मैं नहीं चाहता हूं कि मैं उस बच्चे की तरह बन जाऊँ जो बड़ा होकर माँ के आँचल को भूल जाता है इसलिए फिर जरूर जाना चाहूंगा लेकिन 38-40 किमी की एक दिवसीय गंगोत्री-गोमुख पैदल यात्रा हमेशा मेरी स्मृतियों में रहेगी. फिर आऊँगा…..ऐसी प्रतिश्रुति करके मैं एक बार फिर से इस मायवी दुनिया का सहयात्री बन गया.

(लेखक हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर है.)

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