साहित्‍य-संस्कृति

अपने बच्‍चों को पढ़ाएं नैतिक शिक्षा का पाठ

अपने बच्‍चों को पढ़ाएं नैतिक शिक्षा का पाठ

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कैसे बनता है कोई समाज, कौन हैं ये लोग?डॉ. दीपा चौहान राणाबिना किसी व्यक्ति विशेष के किसी समाज का निर्माण नहीं हो सकता है. हम मानव ही सभी समाज की नींव हैं. लेकिन इसी समाज में हमें सामाजिक बुराई देखने को मिलती है, एक से एक घिनौनी कुरीतियां तब से becauseचली आ रही हैं जब से इंसान इस धरती पर पैदा हुआ. कुरीति उसी कुरीति में से एक है बलात्कार! क्या है बलात्कार? so जब किसी के साथ पूरे बल से उसकी मर्जी के बिना उसकी आत्मा, उसके शरीर तथा उसके अंगों को छुआ या नोचा जाए, वो होता है बलात्कार. कुरीति ऐसी भी क्या है कि कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ इतने बल का प्रयोग करता है? उसके साथ इतना दानव जैसा व्यवहार करता है. ये एक संवेदनशील विषय है, जिस पर सिर्फ तभी बातbecause होती है, जब कोई बेटी या महिला इस घटना की शिकार होती है तभी बस बात होती है, उससे पहले कोई बात नहीं?  इसके क्या कारण हो सकते हैं क...
बड़ी खूबसूरती से निरूपित किया है जैव विविधता के सन्तुलन को सनातनी परम्परा में

बड़ी खूबसूरती से निरूपित किया है जैव विविधता के सन्तुलन को सनातनी परम्परा में

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भुवन चन्द्र पन्तप्रारम्भिक स्तर की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में बेसिक हिन्दी रीडर में एक पाठ हुआ करता था, जिसका शीर्षक अक्षरक्षः तो स्मरण नहीं हो पा रहा है, कुछ यों था कि वनस्पति एवं जीव-जन्तु परस्पर एक दूसरे पर निर्भर हैं. तब जैव विविधता जैसे शब्द नहीं खोजे गये थे, लेकिन जिस खूबसूरती से बालमन को वनस्पति एवं जीवजन्तुओं की परस्पर उपयोगिता समझाई गयी थी, उसे जैव विविधता जैसे वजनदार शब्द से समझने से अधिक रोचक था. जैविक विविधता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वन्य जीव वैज्ञानिक रेमंड एफ डेशमैन द्वारा 1968 में ’ए डिफरेंट काइंड ऑफ कन्ट्री’ नामक पुस्तक में किया है. पहले बायोलॉजिकल डायवर्सिटी के नाम से because और फिर सन् 1986 के बाद संक्षिप्तिीकरण कर बायोडायवर्सिटी यानी जैव विविधत शब्द चलन में आया. बात जब पर्यावरण व पारिस्थितिकीय की आती है, तो आज हर एक की जुबान पर जैव विविधता शब्द अपनी जगह बना चुका है. ...
हर दुल्हन के श्रृंगार में चार चांद लगाती पारपंरिक नथ

हर दुल्हन के श्रृंगार में चार चांद लगाती पारपंरिक नथ

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दुनियाभर में मशहूर है टिहरी की सोने से बनी नथआशिता डोभालसंस्कृति सिर्फ खान-पान because और रहन-सहन में ही नहीं होती, बल्कि हमारे आभूषणों में भी रची-बसी  होती है. उत्तराखंड तो संस्कृति सम्पन्न प्रदेश है और हमारी सम्पन्नता हमारे परिधानों और गहनों में सदियों पुरानी है. उत्तराखंड देश दुनिया में अपने परम्पराओं के लिए विशेष रूप से जाना जाता है, जिस वजह से विदेशी भी हमारी संस्कृति के मुरीद हुए जा रहे हैं.संस्कृतिअपनी परंपरागत वेशभूषा के लिए देश so और दुनिया भर में मशहूर है उत्तराखंड. आभूषण हर महिला के श्रृंगार का एक अभिन्न हिस्सा होता है, आभूषणों की चमक-दमक से उसके चेहरे में और निखार आता है और उसकी सुंदरता में चार चांद लग जाते हैं. सजने-संवरने और निखरने के लिए आभूषणों का होना अनिवार्य है.नथ आज मैं आपका उत्तराखंड के एक ऐसे आभूषण से परिचय करवाती हूं जिसे पहनने से सुंदरता में ...
‘दो व्यक्तियों के बीच का गीतात्मक वाक्य व्यवहार है बाजूबन्द गीत’

‘दो व्यक्तियों के बीच का गीतात्मक वाक्य व्यवहार है बाजूबन्द गीत’

साहित्‍य-संस्कृति
ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’समाज में गायन की अनको विधाओं का because चित्रण देखने व सुनने को मिल जाता है. छौपती, छूड़े, पवाड़े, बाजूबन्द, लामण, तांदी गीत, आदि  मनोरंजन तो हैं ही साथ ही जीवन यथार्थ से जुड़ी सुख -दुःख,  प्रेम प्रसंगों व अनको घटनाओं पर भी आधारित हैं. इन्हीं विधाओं में गायन की एक विधा है बाजूबन्द.पहाड़ बाजूबन्द एक प्रकार के संवाद गीत हैं. so जो प्रायः स्त्री पुरुषों द्वारा वनों में घास- पत्ती, लकड़ी- चारा लाते हुए या भेड़- बकरी, गाय- भैंस चराते और खेतों में काम करते लम्बी सुरीली आवाज में गाये जाते हैं. ये प्रेम व मनोरंजन के लिए भी हो सकते हैं.पहाड़‘‘बाजूबन्द दो व्यक्तियों के but बीच का गीतात्मक वाक्य व्यवहार है जो नितान्त वैयक्तिक होता है वह सामुदायिक मनोरंजन का आधार न हो कर एक प्रकार का आत्म निवेदन है जो वनों के एकान्त में दूसरे के कानों में भले ही पड़ जाये पर वह किसी एक ...
विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

साहित्‍य-संस्कृति
आशिता डोभालअरसे/अरसा पहाड़ में समूण या कलेउ becauseके रूप मे दिया जाने वाला एक पकवान है, जो उत्तराखण्ड में सिर्फ गढ़वाल मण्डल में प्रमुखता से बनता है बल्कि हमसे लगे कुमाऊं, जौनसार—बावर, बंगाण, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, तिब्बत कहीं भी अरसा नही बनता है. इसके इतिहास की बात करें तो बहुत ही रूचिपूर्ण इतिहास रहा है अरसे का. बताते हैं कि यह दक्षिण भारत से आया हुआ पकवान है. इतिहासकारो के अनुसार आदिगुरू शंकराचार्य ने जब बद्रीनाथ और केदारनाथ में कर्नाटक के पुजारियों को नियुक्त किया था, तो नवीं सदी में वहां से आए हुए ये ब्राहमण अपने साथ अरसा so यहां लेकर आए और साथ ही बनाने की परम्परा भी शुरू कर गये. कालांतर में ये परम्परा गढ़वाल के आमजन में भी शुरू हो गई. अरसा तमिलनाड, केरल, आंध्र प्रदेश, उडीसा, बिहार और बंगाल में भी बनाया जाता है, वहां इसको अलग-अलग जगह अलग-अलग नामों से जाना जाता है.अटल आंध्र प्रदे...
ब्राह्मण ग्रन्थों में ब्रह्मांड चेतना से अनुप्रेरित पितर अवधारणा 

ब्राह्मण ग्रन्थों में ब्रह्मांड चेतना से अनुप्रेरित पितर अवधारणा 

साहित्‍य-संस्कृति
एक दार्शनिक चिंतनडॉ.  मोहन चंद तिवारी 'ऐतरेय ब्राह्मण' में सोमयाग सम्बन्धी एक सन्दर्भ वैदिक कालीन पितरों की ब्रह्मांड से सम्बंधित आध्यात्मिक अवधारणा को समझने की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है ब्राह्मण "अन्यतरोऽनड्वान्युक्तः स्यादन्यतरो विमुक्तोऽथ राजानमुपावहरेयुः. यदुभयोर्विमुक्तयोरुपावहरेयुः पितृदेवत्यंbecause राजानं कुर्युः. यद्युक्तयोरयोगक्षेमःbut प्रजा विन्देत्ताः प्रजाःso परिप्लवेरन्. योऽनड्वान् विमुक्तस्तच्छालासदां प्रजानां रूपं यो becauseयुक्तस्तच्च क्रियाणां, ते ये युक्तेऽन्ये butविमुक्तेऽन्य उपावहरन्त्युभावेव ते क्षेमयोगौ soकल्पयन्ति." -ऐ.ब्रा.1.14 ब्राह्मण उपर्युक्त सोमयाग प्रकरण में सोमलता because को यज्ञ वेदी तक दो बैलों (अनड्वाहौ) से जुते शकट (गाडी) में ढोकर लाया गया है. तभी यह धर्मशास्त्रीय प्रश्न उठाया गया है कि सोम को शकट से उतारने से पहले एक बैल (बलीव...
वैदिक पितृपूजा का ऐतिहासिक और धार्मिक विकास क्रम

वैदिक पितृपूजा का ऐतिहासिक और धार्मिक विकास क्रम

साहित्‍य-संस्कृति
धार्मिक मान्यता के अनुसार सत्य और श्रद्धा से किया गया कर्म 'श्राद्ध' कहलाताडा. मोहन चंद तिवारी सामान्य तौर पर पितृपक्ष में किया जाने वाला श्राद्ध-तर्पण आदि कृत्य पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है. धार्मिक मान्यता के अनुसार सत्य और श्रद्धा से किया गया कर्म 'श्राद्ध' कहलाता है और जिस कर्म से माता-पिता और आचार्य तृप्त हों, वह 'तर्पण' है. जहां तक वैदिक परंपरा की बात है, संहिता ग्रन्थों में कहीं because‘श्राद्ध’ शब्द का उल्लेख नहीं है किन्तु इसके लिए  ‘पितृयज्ञ’ का उल्लेख मिलता है, जिसे प्रकारान्तर से पितरों की समाराधना से जुड़ी यज्ञविधि ही माना जा सकता है. वैदिक काल में आहिताग्नि द्वारा प्रत्येक मास की अमावस्या को सम्पादित किया जाने वाला यज्ञ 'पिण्ड-पितृयज्ञ' कहलाता था. महा-पितृयज्ञ चातुर्मास्य में सम्पादित होता था एवं 'अष्टका' यज्ञ का भी आरम्भिक वैदिक साहित्य मे...
वैदिक साहित्य में पितर अवधारणा और उसका उत्तरवर्त्ती विकास

वैदिक साहित्य में पितर अवधारणा और उसका उत्तरवर्त्ती विकास

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डॉ. मोहन चंद तिवारीपितृपक्ष चर्चा पितृपक्ष के इस कालखंड में पितर जनों के स्वरूप और उसके ऐतिहासिक विकासक्रम की जानकारी भी बहुत जरूरी है. इस लेख में वैदिक काल से लेकर धर्मशात्रों और निबन्धग्रन्थों (मध्यकाल) तक की पितर परम्परा का विहंगमावलोकन किया गया है. भारतीय चिंतन परम्परा में वैदिक काल से ही समूचे ब्रह्मांड व्यवस्था के सन्दर्भ में मुख्य रूप से तीन लोकों की परिकल्पना की गई है. ये तीन लोक हैं- देव लोक, पितृ लोक और मनुष्य लोक. देव लोक में रहने वाली दिव्यात्माओं और पितृलोक रहने वाली पितर आत्माओं से ही मनुष्य आदि की उत्पत्ति होती है और ये आत्माएं बहुत शक्तिशाली मानी जाती हैं. पक्ष, मास,ऋतुओं के कारक भी देवता और पितृगण ही माने गए हैं. पितृपक्ष में यदि पितर गण श्राद्ध कर्म से प्रसन्न हो जाएं तो अपनी संतानों को दीर्घायु,संतति, धन, यश एवं सभी प्रकार के सुख का आशीर्वाद देते हैं.चौरासी लाख योनि...
पुत्र अपने कुल को ही तारता है, पुत्रियां दो-दो कुलों को तारतीं हैं

पुत्र अपने कुल को ही तारता है, पुत्रियां दो-दो कुलों को तारतीं हैं

साहित्‍य-संस्कृति
डॉ. मोहन चंद तिवारी  पितृपक्ष के अवसर पर प्राय: यह जिज्ञासा प्रकट की जाती है कि श्राद्ध का अधिकार किस किस को है? क्या पुत्र के अतिरिक्त पुत्री या पत्नी को भी श्राद्ध करने का अधिकार है या नहीं? कुछ पितृसत्तात्मक परंपरागत समाजों में स्थानीय मान्यताओं के कारण केवल पुत्र को या पुरुष को ही श्राद्ध का अधिकारी माना जाता है, पुत्री या स्त्री को नहीं. परन्तु इस सम्बंध में धर्मशास्त्रकार हेमाद्रि के अनुसार मुख्य नियम यह है कि पिता का श्राद्ध पुत्र को करना चाहिए. पुत्र न हो तो पत्नी श्राद्ध करे. पत्नी के अभाव में सहोदर भाई और उसके अभाव में सपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए- “पितु: पुत्रेण कर्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया. पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्न्याभावे तु सोदर:॥”‘श्राद्धकल्पलता’ में मार्कंडेयपुराण के द्वारा दी गई व्यवस्था के अनुसार भी पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, पुत्रिका का पुत्र (दौहित्र), पत्नी...
धार, खाळ, खेत से सैंण तक

धार, खाळ, खेत से सैंण तक

साहित्‍य-संस्कृति
विजय कुमार डोभालपहाड़ी क्षेत्र में जन्मे, पले-बढ़े, शिक्षित-दीक्षित होने के बाद यहीं रोजगार (अध्यापन- कार्य) मिलने के कारण कभी भी यहां से दूर जाने का मन ही नहीं हुआ. वैसे भी हम पहाड़ी-लोगों की अपनी कर्मठता, आध्यात्मिकता तथा संघर्षशीलता अपनी अलग ही पहचान रखती है. हमारा अपना संसार पहाड़ के विभिन्न स्वरूपों धार खाळ, खेत, सैंण से शुरू होकर तराई-भाबर तक ही सीमित हैं. हमारी पढ़ाई-लिखाई, खरीददारी, व्यापार, रिश्ते-नातेदारी आदि भी यहीं तक सीमित होती है.हमारा पहाड़ पावन गंगा-यमुना के उद्गम, पवित्र चार धाम, अन्य तीर्थस्थानों, विश्व प्रसिद्ध पर्यटक-स्थलों, सांस्कृतिक धरोहरों, ब्रह्मकमल, मोनाल, कस्तूरी मृग, बुरांश आदि के कारण देशवासियों ही नहीं वरन् विदेशियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है.हमारा पहाड़ पावन गंगा-यमुना के उद्गम, पवित्र चार धाम, अन्य तीर्थस्थानों, विश्व प्रसिद्ध पर्यटक-स्थलों, सांस्...