November 25, 2020
समाज/संस्कृति

वैदिक साहित्य में पितर अवधारणा और उसका उत्तरवर्त्ती विकास

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

पितृपक्ष चर्चा

पितृपक्ष के इस कालखंड में पितर जनों के स्वरूप और उसके ऐतिहासिक विकासक्रम की जानकारी भी बहुत जरूरी है. इस लेख में वैदिक काल से लेकर धर्मशात्रों और निबन्धग्रन्थों (मध्यकाल) तक की पितर परम्परा का विहंगमावलोकन किया गया है. भारतीय चिंतन परम्परा में वैदिक काल से ही समूचे ब्रह्मांड व्यवस्था के सन्दर्भ में मुख्य रूप से तीन लोकों की परिकल्पना की गई है. ये तीन लोक हैं- देव लोक, पितृ लोक और मनुष्य लोक. देव लोक में रहने वाली दिव्यात्माओं और पितृलोक रहने वाली पितर आत्माओं से ही मनुष्य आदि की उत्पत्ति होती है और ये आत्माएं बहुत शक्तिशाली मानी जाती हैं. पक्ष, मास,ऋतुओं के कारक भी देवता और पितृगण ही माने गए हैं. पितृपक्ष में यदि पितर गण श्राद्ध कर्म से प्रसन्न हो जाएं तो अपनी संतानों को दीर्घायु,संतति, धन, यश एवं सभी प्रकार के सुख का आशीर्वाद देते हैं.चौरासी लाख योनियों में से एक योनि पितृयोनि भी मानी जाती है, जिसे पूर्वज या पितर भी कहते हैं.

प्राचीन भारतीय ग्रन्थकार अपने विवेच्य विषय को भागों,उपविभागों के रूप में वर्गीकरण को बहुत महत्त्व देते आए हैं.सम्भवतः इसी प्रवृत्ति के कारण उन्होंने पितृवर्ग के पितृजनों का स्वरूप भी वर्गीकरण के माध्यम से स्पष्ट करने का विशेष प्रयास किया है.

वैदिक साहित्य में पितरों की तीन मुख्य श्रेणियां मानी गई हैं-

  1. पितर: ‘सोमवन्त:’,
  2. पितर: ‘बर्हिषद:’ एवं
  3.  पितर: ‘अग्निष्वात्ता:’.

इनमें से अन्तिम दो :बर्हिषद:’ और ‘अग्निष्वात्ता:’ इन दो पितरों का नामोल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है-
“बर्हि॑षदःपितर ऊ॒त्य१र्वागि॒मा
वो॑ ह॒व्या च॑कृमा जु॒षध्व॑म्.
त आ ग॒ताव॑सा॒ शंत॑मे॒नाथा॑
न॒: शं योर॑र॒पो द॑धात॥”
      -ऋग्वेद,10.15.4

“अग्नि॑ष्वात्ताः पितर॒ एह ग॑च्छत॒
सद॑:सदः सदत सुप्रणीतयः.
अ॒त्ता ह॒वींषि॒ प्रय॑तानि ब॒र्हिष्यथा॑
र॒यिं सर्व॑वीरं दधातन॥”
    -ऋग्वेद,10.15.11

ब्राह्मण ग्रन्थों में पितृजनों की इन तीनों श्रेणियों की विशेष परिभाषा करते हुए कहा गया है कि ‘सोमवन्त:’ पितर वे हैं,जिन्होंने एक सोमयज्ञ किया है.’बर्हिषद:’ पितर वे हैं, जिन्होंने पक्व अन्न (चरु एवं पुरोडास ) की आहुतियां दी हैं और एक लोक प्राप्त किया है. ‘अग्निष्वात्ता:’ पितर वे हैं, जिन्होंने उपर्युक्त दोनों अनुष्ठानों में से कोई भी कृत्य नहीं किया और जिन्हें जलाते समय अग्नि ने समाप्त कर दिया. सामान्य रूप से पितृपक्ष में जिन पितरों को श्राद्ध तर्पण या पिंडदान देने का विधान है वे ही वास्तविक पितर वैदिक काल में ‘अग्निष्वात्ता:’ पितर कहे गए हैं.(विशेष द्रष्टव्य- ‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’,1.6.9.5 एवं ‘काठकसंहिता’,9.6.17)

परन्तु उत्तरवर्त्ती पुराण और स्मृतिग्रन्थों के लेखकों ने उपर्युक्त वैदिक कालीन पितरों की मुख्य तीन श्रेणियों में तत्कालीन वर्णव्यवस्था और नई उभरी सामाजिक व्यवस्थाओं के आधार पर कुछ और नई श्रेणियों को जोड़ने और पूर्वनिर्धारित वैदिककालीन पितृश्रेणियों के अर्थों में भी परिवर्तन करने का प्रयास किया है.इस सम्बंध में एक नई व्यवस्था यह उभर कर आई कि म्लेच्छों एवं अस्पृश्यों की पितृश्रेणी को धर्मशास्त्रकारों द्वारा मान्यता दी

उदाहरण के लिए नान्दीपुराण (हेमाद्रि) में ब्राह्मणों के पितर ‘अग्निष्वात्त’, क्षत्रियों के पितर ‘बर्हिषद्’,वैश्यों के पितर ‘काव्य’, शूद्रों के पितर ‘सुकालिन:’और अस्पृश्यों के पितर ‘व्याम’ कहे जाने लगे. (मनुस्मृति,3.197)

इस सम्बंध में मनु ने चार वर्णों के अनुसार पितरों की श्रेणियों का विभाजन करते हुए क्रम से ब्राह्मणों के पितरों को ‘सोमपा:’, क्षत्रियों के पितरों को ‘हविर्भुज:’,वैश्यों के पितरों को ‘आज्यपा:’ एवं शूद्रों के पितरों को ‘सुकालिन:’ की संज्ञा प्रदान की है-
“सोमपा नाम विप्राणां
क्षत्रियाणां हविर्भुजः.
वैश्यानां आज्यपा नाम
शूद्राणां तु सुकालिनः..”
  -मनुस्मृति,3.197

मनुस्मृति (3.199) में यह भी उल्लेख आया है कि ब्राह्मणों के पितर ‘अनग्निदग्ध’, ‘अग्निदग्ध’, ‘काव्य’, ‘बर्हिषद्’, ‘अग्निष्वात्त’ एवं ‘सौम्य’ नामों से सम्बोधित किए जाते हैं-
“अग्निदग्धानग्निदग्धान्
काव्यान्बर्हिषदस्तथा .
अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्च
विप्राणां एव निर्दिशेत् ..”
  -मनुस्मृति,3.199

धर्मशास्त्र के काल में इन नई पितृ श्रेणियों के उदय होने से यह पता चलता है कि मनु ने परंपरागत रूप से चली आ रही वर्णव्यवस्था के अलावा कुछ वेदेतर सामाजिक व्यवस्थाओं से जुड़े लोगों के पितरों को भी सनातन धर्मशास्त्रीय व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया है.

पितृश्रेणियों के इन विभिन्न नामों की परिभाषा सहित विस्तृत चर्चा मत्स्यपुराण (141.4, 141.15-18 में भी आई है-
“सौम्याबर्हिषदः काव्या
अग्निष्वात्ता इति त्रिधा.
गृहस्था ये तु यज्वानो
हविर्यज्ञार्त्तवाश्च ये..
स्मृता बर्हिषदस्ते वै
पुराणे निश्चयं गताः..
गृहमेधिनश्च यज्वानो
अग्निष्वात्तार्त्तवाः स्मृताः.
अष्टका पतयः काव्याः
पञ्चाब्दांस्तु निबोधत..
तेषु सम्वत्सरो ह्यग्निः
सूर्य्यस्तु परिवत्सरः.
सोमस्त्विड्‌ वत्सरश्चैव
वायुश्चैवानुवत्सरः..
रुद्रस्तु वत्सरस्तेषां
पञ्चाब्दाये युगाल्पकाः.
कालेनाधिष्ठितस्तेषु
चन्द्रमाः स्रवते सुधाम्..
-मत्स्यपुराण ,141.15-18

शातातपस्मृति (625.6) में पितरों की बारह श्रेणियों को चार विभागों में इस प्रकार विभाजित किया गया है- पिण्डभाज: (3), लेपभाज: (3), नान्दीमुख (3) एवं अश्रुमुख (3).

वायुपुराण (72.1 एवं 7.6), ब्रह्माण्डपुराण (उपोदघात् 9.53, पद्मपुराण (5.9.2-3), विष्णुधर्मोत्तरपुराण (1.138.2-3), एवं अन्य पुराणों में पितरों की सात प्रकार की श्रेणियों की प्रायः चर्चा आई है,जिनमें तीन अमूर्तिमान् हैं और चार मूर्तिमान्; वहां पर पितरों का और उनकी संतति का भी विशद वर्णन आया है.

स्कन्द पुराण (6.216.9-10),में पितरों की नौ कोटियों का उल्लेख आया है,जो इस प्रकार हैं –
1. अग्निष्वात्ता:, 2. बर्हिषद:, 3. आज्यपात्, 4. सोमपा:, 5. रश्मिपा:, 6.उपहूता:, 7.आयन्तुन:, 8.श्राद्धभुज: एवं 9.नान्दीमुखा:. इस सूची में नई एवं पुरानी दोनों पितृश्रेणियों के नामों को सम्मिलित किया गया है.

मनुस्मृति में पितरों और मानवों की उत्पत्ति होने की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई है,उसके अनुसार ऋषियों से पितरों की उत्पत्ति हुई, पितरों से देवों एवं मानवों की तथा देवों से स्थावर एवं जंगम के सम्पूर्ण लोक की उत्पत्ति हुई-
“ऋषिभ्यः पितरो जाताः
पितृभ्यो देवमानवाः.
देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः..”
       -मनुस्मृति,3.201

गौरतलब है कि यहां मनु ने पितरों से देवगण की उत्पत्ति होने की जो बात कही गई है,उसे पितरों की प्रशंसा में कही गई प्रशस्ति ही मानी जा सकती है.

पितरों की श्रेणियां कौन-कौन सी है?
वेद,उपनिषद,पुराण,धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में पूर्वज पितरों की विभिन्न श्रेणियों का वर्णन आया है.सामान्यत: पितरों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है – एक दिव्य पितर, और दूसरा पूर्वज पितर. पितृपक्ष में दिवगंत पितर उनकी श्रेणी के अनुसार,श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं.

देव पितर
देव पितर वे हैं जिनसे देवता मनुष्य आदि उत्पन्न हुए. इन पितरों की उत्पत्ति ब्रह्मा के पुत्र मनु के विभिन्न ऋषि पुत्रों से हुई है. दिव्य पितरों के सात गण माने गए हैं-

  1. अग्निष्वात्त- इनकी उत्पत्ति मनु के पुत्र महर्षि मरीचि से हुई है अग्निष्वात देवताओं के पितर हैं. ये “सोम” नामक लोकों में निवास करते हैं. इन पितरों का देवता भी सम्मान करते हैं.
  2. बर्हिर्षद- इनकी उत्पत्ति महर्षि अत्रि से हुई है यह देव, दानव, यक्ष,गंधर्व, सर्प,राक्षस, सुपर्ण एवं किन्नरों के पितर हैं. यह स्वर्ग में स्थित “विभ्राज लोक “में रहते हैं. जो इस लोक में निवास करने वाले पितरों के लिए श्राद्ध करते हैं,उन्हें भी इस लोक की प्राप्ति होती है.
  3. सोमसद- सोमसद महर्षि विराट् के पुत्र हैं यह साध्यों के पितर हैं.
  4. सोमपा- सोमपा महर्षि भृगु के पुत्र हैं ये ब्राह्मणों के पितर हैं. ये ‘सुमानस लोक’में रहते हैं. यह लोक ‘ब्रह्मलोक’ के ऊपर स्थित है.
  5. हविर्भुज या हविष्यमान- महर्षि अंगिरा के पुत्र हविर्भुज हैं.ये क्षत्रियों के पितर माने गए हैं. ये मार्तण्ड मण्डल लोक में रहते हैं. यह स्वर्ग और मोक्ष फल प्रदान करने वाले पितर हैं. तीर्थों में श्राद्ध करने वाले श्रेष्ठ क्षत्रिय इन्हीं के लोक में जाते हैं.
  6. आज्यपा- आज्यपा वेश्यों के पितर हैं, इनके पिता महर्षि पुलस्त्य हैं.ये ‘कामदुध लोक’ में रहते हैं. इन पितरों का श्राद्ध करने वाले व्यक्ति इस लोक में पहुंचते हैं.
  7. सुकालि- सुकालि महर्षि वशिष्ठ के पुत्र हैं ये शूद्रों के पितर माने गए हैं.

उपर्युक्त पितरों की सात श्रेणियों में से प्रथम तीन मूर्तिरहित और शेष चार मूर्तिमान पितर कहे गए हैं. उक्त सात प्रमुख पितृ गण के अलावा और भी दिव्य पितर हैं.उदाहरण के लिए अनग्निदग्ध, काव्य, सौम्य, आदि.

पूर्वज पितर
पूर्वज पितर उन्हें कहते हैं,जो किसी कुल या व्यक्ति के पूर्वज होते हैँ. इनका ही एकोदिष्ट आदि श्राद्ध होता है.इन्हें दो वर्गों में विभक्त किया जाता है.

  1. सपिण्ड पितर- मृत पिता, पितामह एवं प्रपितामह के तीन पीढ़ी के पूर्वज सपिण्ड पितर कहलाते हैं.ये पितर पिण्डभागी होते हैं.एकोदिष्ट आदि श्राद्ध के अवसर पर इन्हें ही पिंडदान किया जाता है.
  2. लेपभागभोजी पितर- सपिण्ड पितरों से ऊपर तीन पीढ़ी तक के पितर लेपभागभोजी पितर कहलाते हैं. ये पितर चंद्रलोक के ऊपर स्थित ‘पितृलोक’ में रहते हैं.

पितृपक्ष पर आगे भी चर्चा जारी

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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