लोक पर्व-त्योहार

कुमाऊं,गढ़वाल में गणपति गणेश की मूर्तिकला का इतिहास

कुमाऊं,गढ़वाल में गणपति गणेश की मूर्तिकला का इतिहास

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गणेश चतुर्थी पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज गणेश चतुर्थी है. हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है. गणेशजी के जन्म के बारे में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. उस सन्दर्भ में कुमाऊं स्थित देवभूमि उत्तराखंड के पाताल भुवनेश्वर में भगवान गणेश के आदिकालीन इतिहास के सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक अवशेष आज भी संरक्षित हैं. यह स्थान श्रद्धालु because भक्तों के लिए बहुत ही पवित्र और गणेश के सांस्कृतिक महत्त्व को उजागर करने वाली देवभूमि है. यद्यपि शैव संस्कृति का मुख्य केंद्र होने के कारण उत्तराखंड में गणेश पूजा एक स्वतंत्र धार्मिक परम्परा के रूप में यहां विकसित नहीं हो सकी किन्तु यहां के शैव मंदिर हों या वैष्णव मंदिर अथवा शाक्त सम्प्रदाय के मंदिर सभी में देवपूजा के अंतर्गत गणपति की पूजा और अर्चना को प्रमुखता से स्थान मिला है. कुमाऊं प्रदेश में चाहे किसी प्रकार की धार्मिक पू...
हरताली’: सामवेदी तिवारी ब्राह्मणों का यज्ञोपवीत पर्व

हरताली’: सामवेदी तिवारी ब्राह्मणों का यज्ञोपवीत पर्व

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एक धर्मशास्त्रीय विवेचनडॉ. मोहन चंद तिवारी इस बार 9 सितंबर,2021 (भादो 24 पैट) because को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया  तिथि और हस्त नक्षत्र के पावन अवसर पर हरताली तीज और सामवेदी ब्राह्मणों का उपाकर्म का पर्व मनाया जा रहा है. इस दिन अखंड सौभाग्य व उत्तम वर की कामना से महिलाएं व युवतियां निर्जल निराहार रहकर शिव-पार्वती का पूजन करती हैं.कोलकाता धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार इस दिन हस्त नक्षत्र के अवसर पर कुमाऊं उत्तराखंड के सामवेदी तिवारी ब्राह्मणों द्वारा यज्ञोपवीत धारण तथा रक्षासूत्र बंधन का पर्व 'हरताली' मनाया जाता है. सदियों से चली आ रही इस 'हरताली' की परम्परागत मान्यता के अनुसार because कुमाऊं में तिवारी, तिवाड़ी, तेवारी, तेवाड़ी, त्रिपाठी, त्रिवेदी आदि उपनामों से प्रचलित सामवेदी ब्राह्मण ‘हस्त’ नक्षत्र में ही ‘हरताली’ तीज पर जनेऊ धारण करते हैं. हरताली के दिन प्रा...
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के हर्षोल्लास एवं धरती के प्रति कृतज्ञता का पर्व है आठाँईं पूजन

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के हर्षोल्लास एवं धरती के प्रति कृतज्ञता का पर्व है आठाँईं पूजन

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावतदेवभूमिउत्तराखण्ड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी का पश्चिमोत्तर रवाँई क्षेत्र अपनी सामाजिक—सांस्कृतिक विवि​धता एवं विशिष्टता के लिए सदैव से ही विख्यात रहा है. पर्व—त्योहार—उत्सव हों या कोई अन्य सामाजिक—सांस्कृतिक आयोजन, सभी की अपनी—अपनी विशिष्टताएं हैं. पर्व—त्योहारों की श्रृंखला में प्रमुखता से शामिल है 'भादों की आठाँई' या 'दुर्बाष्टमी को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव'.ज्योतिषलोक की अपनी रीति—नीति, मान्यता—परम्पराएं होती हैं उन्हीं के आलोक में लोकवासी श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं, जो पूरी तरह विरल व विविधतायुक्त होता है.कृष्ण के साथ because लोकपूजित समस्त देवी—देवताओं का आह्वान—स्मरण, पूजन—वंदन और धरती के प्रति कृतज्ञता अभिव्यक्त करते हुए आनन्द—उत्सव मनाते हैं.ज्योतिष भाद्रपद मास यानी एक तरफ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की धूमदूसरी तरफ गाँव—घरों के आस—पास मौसमी साग—सब्जी व फलों से भरे ...
इटलेश्वर महादेव : जालली क्षेत्र का सिद्ध स्वयम्भू ज्योतिर्लिंग

इटलेश्वर महादेव : जालली क्षेत्र का सिद्ध स्वयम्भू ज्योतिर्लिंग

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीजब भी मुझे अपने पैतृक निवास ग्राम जोयूं में जाने का अवसर मिलता है तो अपने गांव से 4 कि.मी. की दूरी पर जालली स्थित इटलेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन अवश्य करता हूं. संयोग से तीन वर्ष पूर्व जब सितंबर के महीने में अपने गांव गया था तो उस मौके पर जालली क्षेत्र में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भी बहुत धूमधाम से because मनाया जा रहा है. स्थानीय क्षेत्रवासियों के द्वारा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर राधाकृष्ण को डोली में बिठाकर शोभायात्रा निकाली जा रही थी. इसी समय जब मेरा इटलेश्वर महादेव के मंदिर में दर्शनार्थ जाना हुआ तो संयोग से उसी समय राधाकृष्ण जी की डोली का भी मंदिर प्रांगण में प्रवेश हो रहा था और प्रभुकृपा से मुझे इटलेश्वर मंदिर में ही भगवान शिव के साथ साथ राधा कृष्ण जी के दर्शनों का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ. ज्योतिष यह हमारे देश की उदात्त परम्परा रही है कि जन्माष्टमी ...
इतिहास के पन्नों से आज भी गायब हैं उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के कुछ मेले

इतिहास के पन्नों से आज भी गायब हैं उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के कुछ मेले

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हरियाली पर्व के उपलक्ष्य में लगने वाला नगदूण कीजातर/ जातोर (मेला) (जखोल गांव नगदूण का मेला)चैन सिंह रावत उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के सुदूरवर्ती विकास खंड मोरी के जखोल गांव में सावन महीने की संक्रांति 15-16 अगस्त के मध्य मनाए जाने वाला एक प्राचीन औषधीय मेला नगदूण मेले के नाम से जाना जाता है, इस मेले का आयोजन पंजगायींपट्टी के आठ गांव जखोल, धारा,सावनी, सटुडी, सुनकुण्डी सिरगा पाँवतल्ला पाँवमल्ला एवं बाहर से आए हुए आगंतुक जो कि सावन महीने में अपनी बहनों की ढोकरी/कंडी (मायके पक्ष से बेटी के ससुराल में लिया जाना वाला यादगार खाद्य सामग्री) लेकर आते हैं इस मेले के एक दिन पहले ही आ जाते हैं तथा मेले में सम्मिलित होते हैं.नगदूण मेले का आयोजन 1 दिन पहले 8 गांव के लोगों एवं बाहर से आए आगंतुक गण नगदूण के लिए जंगल की छनियों मे (जहां पशुचारक अल्पकाल के लिए निवास करते हैं) अपने साथ प्राथम...
आज महाभारत में शकुनि हैं दुर्योधन हैं पर न कृष्ण हैं, न अर्जुन

आज महाभारत में शकुनि हैं दुर्योधन हैं पर न कृष्ण हैं, न अर्जुन

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कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व समूचे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है.आज के ही दिन भगवान् कृष्ण ने द्वापर युग में दुराचारी कंस के अत्याचार और आतंक से मुक्ति दिलाने तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए जन्म लिया था. गीता में भगवान् कृष्ण स्वयं कहते हैं कि "जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तो मैं धर्म की स्थापना के लिए हर युग में अवतार लेता हूं- “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत. अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् . धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥" -गीता‚ 4.7-8 ज्योतिष गीता में धर्म की अवधारणा सज्जन के संरक्षण और दुर्जन के विनाश से जुड़ी है तो वहीं आधुनिक संदर्भ में ‘धर्म’ से तात्पर्य है समाज व्यवस्था को युगानुसारी मानवीय मूल्यों की दृष्टि से पुन...
कृष्ण को पाने के लिए हमें कृष्ण ही होना होगा!

कृष्ण को पाने के लिए हमें कृष्ण ही होना होगा!

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कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेषसुनीता भट्ट पैन्यूली ऐसा क्यों है कि बहुत सारे लोग मुझे जान नहीं पाते हैं? भगवदगीता में श्री कृष्ण ने कहा है. ऐसा इसलिए है शायद हम अपनी भौतिकता में इतने रत हैं कि स्वयं से परिचित होने के लिए कभी समय ही नहीं निकाला है हमने स्वयं के लिए. जीवन में आत्म तत्व का दर्शन बहुत साधारण सी परिभाषा है कृष्ण होने की. ज्योतिष जैसे मक्खन परिष्कृत उपादान है दूध का उसी तरह आत्मा का विशुद्ध रूप ही कृष्ण होना है अथार्त जिस तरह दूध से दही व दही को बिलोकर, मथकर मक्खन  ऊपरी सतह पर पहुंच जाता है गडमड,संघर्ष करते हुए उसी तरह जीवन प्रक्रिया में धक्के खाकर तूफानी व पथरीले संघर्ष से गुज़र कर  आत्मा के परिष्कृत स्वरुप में पहुंचने कि प्रकिया ही कृष्ण होना है. ज्योतिष कृष्ण बनने के लिए गूढ़ होना अपरिहार्य नहीं है कृष्ण यानी  भौतिकता और अध्यात्म के मध्य वह समतल ज़मीन का संतुलन जहां व्यक्...
 सबके और सबसे परे: अतिक्रामी श्रीकृष्ण

 सबके और सबसे परे: अतिक्रामी श्रीकृष्ण

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जन्माष्टमी (30 अगस्त) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  भारतीय जीवन में आस्था के सजीव आधार because भगवान श्रीकृष्ण के जितने नाम और रूप हैं वे मनुष्य की कल्पना की परीक्षा लेते से लगते हैं. देवकीसुत, यदुनंदन, माधव, मुकुंद, केशव, श्याम, गोपाल, गोपिका-वल्लभ, गोविन्द, अच्युत, दामोदर, मोहन, यशोदानंदन, वासुदेव, राधावर, मधुसूदन, गोवर्धनधारी, कन्हैया, नन्द-नंदन, मुरारी, लीला-पुरुषोत्तम, बांके-बिहारी, मुरलीधर, लालबिहारी, वनमाली, वृन्दावन-विहारी आदि सभी नाम ख़ास-ख़ास देश-काल से जुड़े हुए हैं और उनके साथ-साथ जुडीं हुई हैं अनेक रोचक और मर्मस्पर्शी कथाएँ जो श्रीकृष्ण की अनेकानेक छवियों की सुधियों में सराबोर करती चलती हैं.संसाधनों पूरे भारत में साहित्य, लोक-कला, संगीत, नृत्य, चित्र-कला, तथा स्थापत्य सभी क्षेत्रों में श्रीकृष्ण की अमिट छाप देखी जा सकती है. चित्रों में माखन चोर बाल श्रीकृष्ण, मोर पंख, क...
उत्‍तराखंड : एक मंदिर ऐसा भी जहां 68 वर्षों से चल रहा है पुराण सप्ताह

उत्‍तराखंड : एक मंदिर ऐसा भी जहां 68 वर्षों से चल रहा है पुराण सप्ताह

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीसमूचे उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल के अंतर्गत द्वाराहाट स्थित श्री नागार्जुन देव का प्राचीन विष्णु मन्दिर एक ऐसा मन्दिर है,जहां विगत 68 वर्षों से नागार्जुन ग्रामवासी मिलकर प्रतिवर्ष नियमित रूप से भाद्रपद मास में 2 गते से पुराण ‘सप्ताह’ का आयोजन करते आए हैं,जिसमें अठारह पुराणों में से किसी एक पुराण की कथा का प्रवचन प्रतिवर्ष किया because जाता है. इस वर्ष इस पुराण सप्ताह के अंतर्गत श्री विष्णु महापुराण कथा यज्ञ का आयोजन 18 अगस्त, 2021 से 25 अगस्त तक होगा. ‘श्री विष्णु मन्दिर निर्माण एवं भागवत कथा समिति', ग्राम नागार्जुन द्वारा आयोजित इस कथा-सप्ताह के व्यासाचार्य चनोली ग्राम के प्रसिद्ध कथावाचक श्री गणेशदत्त शास्त्री, साहित्याचार्य विशारद हैं,जो पिछले अनेक वर्षों से नागार्जुन’ के कथा सप्ताहों में व्यासाचार्य का दायित्व निर्वहन करते आए हैं. इसी पुराण सप्ताह के दौरान शास्त्र...
भगवान शिव को क्यों प्रिय है सावन का महीना?

भगवान शिव को क्यों प्रिय है सावन का महीना?

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारी 16 जुलाई को हरेला पर्व के साथ ही उत्तराखंड so में श्रावण का पवित्र महीना भी शुरु हो गया है.इस सावन के महीने में शिवाराधना बहुत ही पुण्यदायी और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है.भगवान को सावन का महीना बहुत प्रिय है क्योंकि वे इसी महीने अपनी शक्ति के साथ सायुज्य प्राप्त करते हुए समस्त सृष्टि का सर्जन करते हैं.'शिव'- सर्वहारा वर्ग के संरक्षक देव शिव भारतीय परम्परा में शिव परब्रह्म,परमात्मा, रुद्र, महादेव आदि विभिन्न नामों से जाने जाते हैं. 'शिव’ शब्द की एक व्याख्या के अनुसार अनन्त तापों से संतप्त होकर प्राणी जहां विश्राम हेतु शयन करते हैं अथवा प्रलय की अवस्था में जगत् जिसमें शयन करता है उसे 'शिव’ कहते हैं -'शेरते प्राणिनो यत्र स शिवः’ अथवा 'शेते जगदस्मिन्निति शिवः.’ so भगवान् राम तथा कृष्ण का आविर्भाव क्रमशः त्रेता तथा द्वापर युग में होता है किन्तु शिव सृष्टि के...