लोक पर्व-त्योहार

अस्तित्व की व्याप्ति का उत्सव है होली

अस्तित्व की व्याप्ति का उत्सव है होली

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होली पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  प्रकृति के सौंदर्य और शक्ति के साथ अपने हृदय की अनुभूति को बाँटना बसंत ऋतु का तक़ाज़ा है. मनुष्य भी चूँकि उसी प्रकृति की एक विशिष्ट कृति है इस कारण वह इस उल्लास से अछूता नहीं रह पाता. माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंत की आहट मिलती है. परम्परा में वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है इसलिए उसके जन्म के साथ इच्छाओं और कामनाओं का संसार खिल उठता है. फागुन और चैत्त के महीने मिल कर वसंत ऋतु बनाते हैं. वसंत का वैभव पीली सरसों, नीले तीसी के फूल, आम में मंजरी के साथ, कोयल की कूक प्रकृति सुंदर चित्र की तरह सज उठती है. फागुन की बयार के साथ मन मचलने लगता है और उसका उत्कर्ष होली के उत्सव में प्रतिफलित होता है. होली का पर्व वस्तुतः जल, वायु, और वनस्पति से सजी संवरी नैसर्गिक प्रकृति के स्वभाव में उल्लास का आयोजन है.रंग, गुलाल और अबीर से एक दूसरे को...
‘प्रकृति को पूजने और पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देता है उत्तरायणी पर्व’

‘प्रकृति को पूजने और पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देता है उत्तरायणी पर्व’

लोक पर्व-त्योहार
पर्वतीय लोकविकास समिति द्वारा 19 वें उत्तरायणी महोत्सव का आयोजनहिमांतर ब्यूरोदक्षिण दिल्ली के पालम क्षेत्र के डीडीए ग्राउंड साध नगर में पर्वतीय लोकविकास समिति द्वारा राष्ट्रीय उतरायणी अभियान के अंतर्गत 19 वें उत्तरायणी महोत्सव का आयोजन किया गया.आचार्य महावीर नैनवाल और पं. ओम नारायण शुक्ला द्वारा सर्वप्रथम प्रकृति के सम्मान,पर्यावरण चेतना और विश्व शांति के लिए सृष्टि रक्षा महायज्ञ किया गया. समारोह का उद्घाटन करते हुए दक्षिण दिल्ली के सांसद श्री रमेश विधूड़ी ने कहा कि उत्तरायणी पर्व हमें प्रकृति को पूजने और पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व को भारत के इस संदेश और प्रतिबद्धता को धरातल पर उतारते हुए 2030 तक कार्बन उत्सर्जन से मुक्त करने का लक्ष्य रखा है.इस अवसर पर आयोजित गोष्ठी के मुख्य वक्ता चार्टर्ड अकाउंटेंट राजेश्वर पैन्यूली ने कहा कि उत्तरा...
बसंत पंचमी: कला का सदुपयोग व आत्मनवीनीकरण…

बसंत पंचमी: कला का सदुपयोग व आत्मनवीनीकरण…

लोक पर्व-त्योहार
सुनीता भट्ट पैन्यूली एक साहित्यिक उक्ति के अनुसार,“प्राण तत्व ‘रस' से परिपूर्ण रचना ही कला है" इसी कला की प्रासंगिकता के परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि सृष्टि की रचना, अनादिशक्ति ब्रहमा का अद्भुत चमत्कार है और उसमें अप्रतिम रंग,ध्वनि,वेग,स्पंदन व चेतना का स्फूरण मां सरस्वती की कलाकृति. यही कला का स्पर्श हमें उस चिरंतन ज्योतिर्मय यानि कि मां सरस्वती से एकाकार होने का अनुभूति प्रदान करता है. क्योंकि यही देवी सरस्वती ही ज्ञान, कला, विज्ञान, शब्द-सृजन, व संगीत की अधिष्ठात्री हैं.  सरस्वती मां को मूर्तरुप में ढूंढना उनकी व्यापकता को बहुत संकुचित करता है. दरअसल जहां-जहां कला अहैतुकि,नि:स्वार्थ एवं जगत कल्याण के लिए सजग व सक्रिय है सरस्वती का वहीं वास है. जहां सात्त्विक जीवन,कला के विभिन्न रूपों का अधिष्ठान, अध्यात्म, गहन चिंतन, विसंगति के वातावरण में रहकर भी आंतरिक विकास और ऊंचाई पर पहुंच...
‘पूष क त्यार’: एक नहीं अनेक आयाम

‘पूष क त्यार’: एक नहीं अनेक आयाम

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावत देवभूमि उत्तराखण्ड के सीमांत उत्तरकाशी का पश्चिमोत्तर रवाँई अपनी सामाजिक—सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए सदैव ही विख्यात रहा है. इस लोकांचल में होने वाले पर्व—त्योहारों की श्रृंखला जितनी विस्तृत है, सामाजिक—सांस्कृतिक दृष्टि से उतनी ही समृद्ध है. पर्व—त्योहारों के आयोजन में प्रकृति व संस्कृति, ऋतु व फसल चक्र की गहरी छाप दिखती है. फिर चाहे वह आयोजन के तौर—तरीके हों या इन अवसरों पर बनने वाले विशेष भोजन, सभी मौसमानुकूल ही बनते हैं. इस दौरान जो रंग दिखते हैं वह बहुत ही न्यारे और प्यारे हैं. 'पूष क त्यार' यानी 'पौष के त्योहार' इस लोकांचल में होने वाले पर्व—त्योहारों में प्रमुखता से शामिल हैं. माघ माह तक इनकी रंगत बनी रहने पर इन्हें 'माघी मघोज' या 'मरोज' भी कहते हैं. पौष माह में इस अंचल की अधिकांश पर्वत श्रृंखला बर्फ की चादर ओढ़ लेती हैं. कई बार बर्फ की वहीं श्वेद चादर घाटी या तलहटी में...
कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का अनोखा त्यौहार

कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का अनोखा त्यौहार

लोक पर्व-त्योहार
नीलम पांडेय नील, देहरादून आ कौवा आ, घुघुती कौ बड़ खै जा मैकेणी म्येर इजैकी की खबर दी जा. आ कौवा आ, घुघुती कौ बड़ ली जा मैकेणी म्येर घर गौं की खबर दी जा. आ कौवा,अपण दगड़ी और लै पंछी ल्या, सबुकैं घुघुती त्यारै की खबर दी आ. इस बार घुघुती के प्रचलित गीत को एक नए सुर में गाना चाहती हूं, मेरी उम्र के असंख्य बच्चे जो आज खाने कमाने की दौड़ में बड़े - बड़े महानगरों में व्यस्त हो गए हैं, और व्यस्क होकर जीवन की ढलान में बढ़ रहे हैं, वे इन त्योहारों की आहट पर अपने देश, गांव लौट जाना चाहते हैं. जैसे पक्षी लौट आते हैं दूरदराज से वापस अपने देश. घुघुती के त्योहार के दिन हम महानगरों में किसी चिड़िया को खोजने लगते हैं.  कौवे को बुलाने की कोशिश करते हैं....पर वे नही दिख रहे हैं. जब हम छोटे थे ....आज के दिन असंख्य कौवे घर के आसपास घूमने लगते थे और घर की मुंडेर, आंगन में घुघुती बड़े रखते ही फुर्र से उठ...
मकर संक्रांति : सूर्यवंशी वैदिक आर्यों का राष्ट्रीय पर्व 

मकर संक्रांति : सूर्यवंशी वैदिक आर्यों का राष्ट्रीय पर्व 

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीइस वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी, 2023 को मनाया जा रहा है. पंचांग गणना के अनुसार इस बार 14 जनवरी दोपहर 1.55 से सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे.ब्रह्म योग का विशेष शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार हर साल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है. इस बार सूर्य धनु राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए 14 जनवरी की रात को 08 बजकर 20 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे. साल 2023 में मकर संक्रांति का पुण्य काल का शुभ मुहूर्त 15 जनवरी को सुबह 06 बजकर 48 मिनट से शुरू होगा और समापन शाम 05 बजकर 41 मिनट पर होगा. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी. ज्योतिशाचार्यों के अनुसार, इस साल 2023 में मकर संक्रांति पर रोहिणी नक्षत्र का खास संयोग बनेगा. इस दिन रोहिणी नक्षत्र शाम 8:18 मिनट तक रहेगा. रो...
गीता जयंती: सनातन धर्म का नवनीत है गीता

गीता जयंती: सनातन धर्म का नवनीत है गीता

लोक पर्व-त्योहार
गीता जयंती (3 दिसम्बर) पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीमहाभारत की कथा के अनुसार गीता की उत्पत्ति कलियुग से 30 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र की धर्मभूमि में भगवान् कृष्ण के श्रीमुख से हुई थी. कौरव और पांडवों के युद्ध के समय अपने स्वधर्म और कर्त्तव्य पथ से विमुख अर्जुन को कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान् कृष्ण ने जो ज्ञान दिया था उसे ही गीता का ज्ञान कहा जाता है. इसलिए गीता जंयती के अवसर पर गीता का कालजयी चिंतन सनातन हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले समस्त देशवासियों के लिए आज भी प्रासंगिक है. गीता को हिंदू धर्म के अनुसार सबसे पवित्र ग्रंथ माना जाता है,जिसके 18 अध्यायों में से पहले 6 अध्यायों में कर्मयोग, मध्य के 6 अध्‍यायों में ज्ञानयोग और अंतिम 6 अध्‍यायों में भक्तियोग का उपदेश दिया गया है. सनातन धर्म के नवनीत स्वरूप इस गीताग्रंथ के अठारह अध्यायों में जो संचित ज्ञान है,वह मनुष्यमात्र के लिए आ...
इगास पर्व: भैलो रे भैलो काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू

इगास पर्व: भैलो रे भैलो काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू

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सुनीता भट्ट पैन्यूली इगास पर्व पर उपरोक्त गढ़वाली लोकगीत गाते हुए, भैलों खेलते, गोल-घेरे में घूमते हुए स्त्री और  पुरुष संभवतः अपने कठिन जीवन की पीड़ा सहकर भी इस प्रकार से आशान्वित हैं कि, अंधेरा वहीं काबिज़ रहेगा जहां उसे रहना है,ये प्रकाश ही है जिसे स्वयं अंधेरों के कोने-कोने तक पहुंचकर उसके काले रंध्रों में भी उजाला करना होगा अर्थात स्वयं को उर्ज्जवसित करने के लिये, स्वयं का अनथक प्रयास.. और यही जिंदगी जीने का मूलमंत्र भी तो है. यही जीवन का उदेश्य भी होना चाहिए कि चाहे बाहर जितना भी अंधेरा हो हमें मन के कोनों-कोनों को प्रकाशित करना है.संपूर्ण भारत में मनायी जाने वाली दीपावली के ग्यारहवें दिन बाद हरिबोधनी एकादशी अर्थात कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को उत्तराखंड में बग्वाल, इगास या बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है. उत्तराखंड में दीपावली को पारंपरिक रुप से बग्वाल और एकादशी को इगास कहा ज...
छठ: आस्था, प्रकृति और सूर्य पूजा का महापर्व

छठ: आस्था, प्रकृति और सूर्य पूजा का महापर्व

लोक पर्व-त्योहार
सुनीता भट्ट पैन्यूली जल-लहरियों में आस्था और विश्वास के रंगों में सजी, श्रंगार-विन्यास में दिव्य, व्रतधारी स्त्रियां,  दूर पहाड़ों पर नीम-कुहासे को पछाड़ कर आसमान की पहली सीढ़ी चढ़ आये सूरज की ओर मुंह किये हुए  छठ के पारंपरिक गीत गाती हुई स्त्रियों को पिछले साल मैने भी देखा.  यही अनुभूति हुई मुझे कि जो भी आस्था के गीत व भजन ये स्त्रियां गा रही हैं, संभवतः सूर्य भगवान के आचार-व्यवहार से इन्होंने यही सीखा होगा कि अंधकार अस्थाई है. निश्चित ही अंधकार के बाद प्रकाश का अवतरण होगा. सूर्य डूबेगा ज़रूर लेकिन पुनः दैदीप्यमान होगा नयी उम्मीद और नयी आशा की किरण लेकर. एक विहंगम दृश्य, भोर की पौ फटती है और  पीत स्वर्ण हो जाती है संपूर्ण प्रकृति अर्थात नदी, पोखर,सरोवर, तालाब के तटों पर बदलते मौसम की शीत बयार से विरत असंख्य श्रद्धालु सूर्य भगवान के दर्शन हेतु आतुर हैं. जहां महिलायें सर्द-सुबह की परवाह ...
छठ : भारतराष्ट्र के सूर्य उपासकों का लोकपर्व 

छठ : भारतराष्ट्र के सूर्य उपासकों का लोकपर्व 

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीचार दिवसीय छठ पूजा महापर्व की शुरुआत आज 28 अक्टूबर को नहाय खाय से हो रही है. भगवान् सूर्य और छठी माता को समर्पित महापर्व छठ हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. इस लोक पर्व में स्वास्थ्य, सफलता, सौभाग्य संतान प्राप्ति और दीर्घायु के लिए पूरे 36 घंटे का निर्जला उपवास किया जाता है.राजधानी दिल्ली में पूर्वांचल के महापर्व छठपूजा की तैयारियां पिछले एक सप्ताह से जोर शोर से चल रही थीं. दिल्ली सरकार द्वारा नदी घाटों और जल संस्थानों को सुधारने संवारने का काम तेजी से किया जा रहा था. इस वर्ष यह पर्व 28 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक मनाया जायेगा. आज 28 अक्टूबर से चार दिनों तक चलने वाला छठ पर्व 'नहाय खाय' के साथ शुरु हो चुका है. 29 अक्टूबर को 'खरना', 30 अक्टूबर को 'सांझ का अर्ध्य' और 31 अक्टूबर को सूर्य को 'सुबह का अर्ध्य' के साथ ये त्योहार संपन्न ह...