लोक पर्व-त्योहार

दीपावली राष्ट्रलक्ष्मी की सुरक्षा का पर्व

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी 

दीपावली के दिन क्यों की जाती है लक्ष्मी के साथ सरस्वती और गणपति की पूजा ?

प्रकाश का पर्व दीपावली पूरे देश में because लगातार पांच दिनों तक मनाया जाने वाला एक राष्ट्रीय लोकपर्व है। कृष्णपक्ष अन्धकार का प्रतीक है और शुक्लपक्ष प्रकाश का। इन दो पक्षों की संक्रान्तियों में गतिशील दीपावली का महापर्व अन्धकार से प्रकाश की ओर,अकाल से सुकाल की ओर‚मृत्यु से जीवन की ओर तथा निर्धनता से भौतिक समृद्धि की ओर अग्रसर होने का भी एक वार्षिक अभियान है।

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इस साल शुभ मुहूर्त कब है?

इस साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि 24 because और 25 अक्टूबर दोनों दिन दीपावली का शुभ मुहूर्त पड़ रहा है। लेकिन 25 अक्टूबर को अमावस्या तिथि प्रदोष काल से पहले ही समाप्त हो रही है। इसलिए 24 अक्टूबर को प्रदोष काल में अमावस्या तिथि के अवसर पर दीपावली का पर्व पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाएगा।

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ज्योतिषाचार्य बता रहे हैं कि इस वर्ष दीपावली because के प्रकाश पर्व पर 178 साल बाद गुरु-शनि का दुर्लभ योग  25 तारीख को सूर्य ग्रहण होने से इस वर्ष दीपोत्सव 6 दिनों तक मनाया जाएगा,कार्तिक अमावस्या को पितरों की विदाई का पर्व भी मनाया जाता है।पंचदिवसीय प्रकाशपर्व का सामाजिक,

आर्थिक और राष्ट्रीय संदेश क्या है?

पांच दिनों के इस दीपावली महापर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है और भाई दूज पर इसका समापन होता है। देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था और वहीं से देश और राष्ट्र को खुशहाली देने वाले 14 रत्न भी निकले थे। दीपावली के पंचदिवसीय पर्व की एक मान्यता वैद्य धन्वंतरि जयंती से भी जुड़ी है।कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि जी का because समुद्र से अवतरण हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है।धनतेरस पर अमृत कलश के साथ वैद्य धन्वंतरि प्रकट हुए थे। धन्वंतरि भगवान विष्णु के अंशावतार और आयुर्वेद के जन्मदाता माने जाते हैं,इनकी पूजा अर्चना से बेहतर स्वास्थ्य और दीर्घ आयुष्य मिलता है। इसलिए धनतेरस के दिन धन की देवी लक्ष्मी के साथ भगवान धनवंतरी की भी पूजा की जाती है। ताकि धन लक्ष्मी के साथ साथ आरोग्य लक्ष्मी की भी समाराधना की जा सके। ‘जान है तो जहाँ है’,शरीर निरोग रहेगा तो धन धान्य का भी महत्त्व है। तभी खुशहाली के भी कुछ मायने हो सकते हैं। मान्यता है कि धनतेरस के दिन नया सामान बर्तन आदि खरीदने से धन लक्ष्मी के शुभागमन का मार्ग प्रशस्त होता है और घर में धन- सम्पत्ति की विशेष अभिवृद्धि होती है।

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कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी नरक because चतुर्दशी या छोटी दीपावली के रूप में मनाई जाती है। इस दिन श्रीकृष्ण की पूजा का विधान है क्योंकि उन्होंने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और उसके बन्दीगृह से सोलह हजार कन्याओं को मुक्त किया।

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कार्तिक अमावस्या के तीसरे दिन पूरे देश में because दीपावली बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। प्रदोष काल में लक्ष्मी व गणेश के साथ विद्या तथा बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की भी पूजा की जाती है। इस दिन व्यापारी वर्ग अपने बहीखाते बदलते हैं। शिक्षा एवं लेखन व्यवसाय एवं सरस्वती की समाराधना में लगे साहित्यकार और ज्ञानीजन ज्ञानवर्धन की कामना से कलम-दवात की पूजा-अर्चना करते हैं।तिजोरी,संदूक आदि को स्वस्तिक के चिन्हों से अलंकृत किया जाता है।

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चौथे दिन शुक्ल प्रतिपदा की तिथि को गोवर्धन because पूजा का पर्व आता है। द्वापर युग में इस दिन भगवान् कृष्ण ने इन्द्र के गर्व को पराजित करके लगातार बारिश और बाढ़ से लोगों और मवेशियों के जीवन की रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अँगुली पर उठा लिया था। इसलिए इस दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं और गोबर को पर्वत बनाकर उसकी पूजा करते हैं। क्योंकि इसी गोधन से उन्हें अपने बच्चों के पोषण के लिए दुग्ध, घृत, मक्खन आदि सामग्री मिलती है और खेती की उन्नत फसल हेतु गोबर की खाद भी प्राप्त होती है।

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पांचवे दिन का त्यौहार भाइयों और बहनों के because मंगल मिलन का पर्व ‘भैयादूज’ कहलाता है। इस दिन यम देवता अपनी बहन यमी से मिलने गए और वहाँ अपनी बहन द्वारा उनका आरती के साथ स्वागत हुआ और यम देवता ने अपनी बहन को उपहार दिया। इस तरह बहन अपने भाइयों की आरती उतारती है और फिर भाई अपनी बहन को उपहार भेंट करता है। इस तरह दीपावली का त्यौहार पांचों दिन बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
दीपावली पर क्यों की जाती है

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लक्ष्मी-गणेश की पूजा

दीपावली पर शुभ मुहूर्त में मुख्य रूप से because लक्ष्मी-गणेश की पूजा की जाती है। किन्तु इस पर्व के साथ भारतराष्ट्र के शौर्यतापूर्ण और आर्थिक खुशहाली के सरोकार एवं भारतीय संवत्सर के ऋतुवैज्ञानिक सिद्धांत भी घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं।

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वेदों में दीपोत्सव के संकेत

वेदों में दीपावली पर्व के संकेतों की खोज की जाए तो लगभग सात आठ हजार वर्ष पूर्व लिखे गए ऋग्वेद के श्रीसूक्त में लक्ष्मी पूजा का उल्लेख मिलता है। पुराणों में लक्ष्मी पूजा की कथा समुद्रमंथन से जुड़ी हुई है और इसके साथ वैद्य because धनवन्तरि द्वारा समुद्र से अमृत घट के अवतरण का भी वर्णन आता है। उपनिषदों, महाभारत,रामायण,पाणिनि की अष्टाध्यायी आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी लक्ष्मीपूजा की चर्चा मिलती है।

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धीरे-धीरे इनमें रामायण की रामकथा जैसे जैसे लोकप्रिय होती गई तो दशहरे पर रावण वध करने के बाद राम के अयोध्या आगमन पर प्रजाजनों द्वारा विशेष हर्षोल्लास सहित दीपावली का पर्व मनाया जाने लगा। राम ने दशहरे के दिन because रावण वध किया था, 20 दिन लंका से अयोध्या आने में लगे। यही वजह है कि हर वर्ष दशहरे के 20वें दिन दीपावली का त्योहार पड़ता है।भगवान् श्रीराम के शुभागमन पर घर घर दीये जलाए गए। दीपावली के बाद गन्ना ग्यारस यानी भारतीय लोक जीवन और गोप और कृषि संस्कृति का प्रतीक गोवर्धन पूजा के अनुष्ठान का पर्व भी मनाया जाता है।

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भारतीय परम्परा में लक्ष्मी की अवधारणा

भगवती लक्ष्मी का उद्भव समुद्र मंथन से हुआ है। समुद्र मंथन का अर्थ उद्योग और परिश्रम से है।लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में दीपक रखने की जगह और मिट्टी की मूर्ति के साथ दीपदान और साथ because ही वहां कृषि जन्य वनस्पति देवी की पूजा के साक्ष्य भी मिले हैं। इतिहासकार इसे दीपोत्सव की परम्परा से जोड़ते हैं। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व कौटिल्य ने लिखा था कि लोग कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और नदियों के घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाकर दीपदान महोत्सव मनाते थे। इस मौके पर मशालें लेकर नृत्य भी किया करते थे। कंबोडिया में 12वीं सदी के अंकोरवाट मंदिर में समुद्र मंथन के चित्र उकेरे गए हैं। इन्हें दीपोत्सव से जोड़ा जाता है।

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लक्ष्मी पूजा के बारे में भर्तृहरि ने because कहा है कि बिना परिश्रम के लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती है-
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी
दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।”

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अर्थात् उद्योगी पुरुषसिंह ही लक्ष्मी का because उपार्जन करता है,परंतु कायर यानी आलसी और निकम्मा मनुष्य भाग्य के भरोसे ही बैठा रहता है तुलसीदास जी ने भी लिखा है –
“चित्र कल्पतरु कामधेनु
गृह लिखे न विपति नसावै।”

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अर्थात् लक्ष्मी पर फूल चढ़ाने मात्र से लक्ष्मी because प्रसन्न नहीं होती। वास्तविक लक्ष्मी परिश्रम से ही प्राप्त होती है।

दीपावली प्रकाश का पर्व

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प्राचीन काल से ही हमारे देश के ऋषि-मुनि यह मानते आए हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु यदि कोई है तो वह है- अज्ञानरूपी अन्धकार। कार्तिक मास की अमावस्या के दिन जब चारों ओर घनघोर अन्धकार का भय और आतंक because छाया रहता है तो दीपावली का पर्व मनाते हुए हम दीपमालाओं की पंक्ति जलाकर प्रकाशोत्सव का पर्व मनाते हैं। प्रकाश हमें केवल भय तथा आतंक से ही मुक्ति नहीं दिलाता बल्कि श्रम तथा उद्योग के कुशल प्रबन्धन की भी प्रेरणा देता है। दीपावली के अवसर पर ब्रह्मांड में व्याप्त दीपज्योति में स्थित लक्ष्मी को नमस्कार सहित जागृत करने का मंत्र बोला जाता है-
“सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपज्योतिःस्थिते नमः।”

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लोकपाल लक्ष्मी-पूजा का पर्व

दीपावली मुख्य रूप से धन की देवी लक्ष्मी की समाराधना का पर्व है।लक्ष्मी आर्थिक प्रगति की प्रतीक है। आर्थिक प्रगति के द्वारा ही धन्य- धान्य सम्पन्न सुराज्य और राष्ट्र की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है। because भारत के प्राचीन राष्ट्रचिन्तकों के द्वारा की गई ‘राष्ट्र’ की परिभाषा के अनुसार पशु,धन, धान्य‚ स्वर्ण आदि आर्थिक वैभव से सम्पन्न देश ‘राष्ट्र’ राज्य के रूप में सुशोभित होता है- “पशुधनधान्यहिरण्यसम्पदा राजते शोभते इति राष्ट्रम्।” (नीतिवाक्यामृत )

राष्ट्र सम्बन्धी इस परिभाषा के अनुसार because आर्थिक प्रगति से ही राष्ट्र खुशहाल हो सकता है और भारत जैसे कृषिप्रधान देश में उसका मुख्य आधार है, पशुधन और कृषि सम्पदा की समृद्धि।

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स्कन्दपुराण की एक कथा के अनुसार राजा पृथु के काल में अंधविकासवादियों ने पृथ्वी के उदर को चीर-फाड़ कर धरती का निर्ममता से ऐसा दोहन किया जिससे संत्रस्त होकर पृथ्वी आत्मरक्षा हेतु गाय का रूप धारण करके भगवान् विष्णु के पास पहुँची। इसी आख्यान विशेष के सन्दर्भ में भारतीय चिन्तकों ने प्रजा के नागरिक अधिकारों और धरती के प्राकृतिक संसाधनों का राजनैतिक सत्ताबल के द्वारा दुरुपयोग को रोकने के लिए गोरूपधरा ‘लोकपाल लक्ष्मी’ का चिन्तन दिया,ताकि कृषि सभ्यता का मूल गोवंश तथा आर्थिक संसाधनों की मूलाधार धरती माता की अन्धविकासवादी अत्याचारियों से because रक्षा हो सके। यही कारण है कि इस प्रकाश पर्व दीपावली के साथ गोवर्धनपूजा और ‘यम द्वितीया’ यानी भैयादूज के दिन यमुना नदी में स्नान का विशेष माहात्म्य भी जुड़ा हुआ है। यमुना नदी के स्नान का प्रतीकात्मक अर्थ नदियों के संरक्षण और उसे प्रदूषण मुक्त करने से है।

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वर्त्तमान में गंगा-यमुना आदि नदियां जिस प्रदूषण से दूषित कर दी गई हैं, चारों ओर गंदे नालों और कूड़े कचरे से इन नदियों को इतना गन्दा और प्रदूषित कर दिया गया है कि उनका जल न तो स्नान योग्य रहा और न ही वह because जल पीने योग्य है। सच तो यह है कि समूचे देश को अन्न, धन और प्राकृतिक सम्पदाएं देने वाली नदियां और जलस्रोत राज्य सरकारों की प्रकृति विरोधी अंधविकास की नीतियों के परिणामस्वरूप सूखती जा रही हैं।किंतु इसकी चिंता किसी को नहीं।

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आज दीपावली के अवसर पर नदीमातृक संस्कृति के उपासक सनातन धर्म के अनुयायियों को इस पर भी गम्भीरता से सोचने की जरूरत है कि हमारे देश में अन्न-धन की समृद्धि करने वाली नदियां सूखने के साथ प्रदूषित भी क्यों होती जा because रही हैं? गोधन की कितनी दुर्दशा हो रही है,उसकी चिंता भी किसी को नहीं। देश का किसान आज खेती की रासायनिक खाद की मार झेल रहा है। किन्तु गोबर जनित खाद की अभिवृध्दि का जो सन्देश भगवान् कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठा कर हमारे देशवासियों को दिया था उसे नेताओं और जनता दोनों ने भुला दिया है।

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दीपावली रामराज्य का पर्व

ऐतिहासिक दृष्टि से दीपावली मूलतः अयोध्या के सूर्यवंशी क्षत्रियों का मुख्य पर्व था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम रावण का वध करके चौदह वर्षों का वनवास पूर्ण कर इसी दिन अपने नगर अयोध्या लौटे तो अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में दीपक जलाकर प्रकाशोत्सव मनाया था। तभी से देश में रामराज्य की अर्थव्यवस्था की भी शुरुआत हुई  और कृषक समाज द्वारा प्रतिवर्ष दीपावली पर्व मनाने की परंपरा भी शुरू हुई। because दीपावली के साथ कालांतर में अनेक पर्व और आख्यान जुड़ते गए किन्तु सब का सम्बन्ध खुशहाल राष्ट्र की ग्रामीण कृषि मूलक अर्थव्यवस्था से था। राजा पृथु ने भी इस दिन प्रजा को अन्न-धन प्रदान किया था। समुद्र मंथन के समय इसी दिन क्षीरसागर से देवी लक्ष्मी प्रकट हुई और उसे सृष्टि के पालनहार भगवान् विष्णु की अर्द्धांगिनी होने का सौभाग्य मिला। इसलिए यह दिन लक्ष्मी के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है।

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भारत के प्राचीन राष्ट्रवादी चिन्तकों का यह मानना था कि राष्ट्रीय धरातल पर दीपावली के दिन धन की देवी लक्ष्मी के साथ ज्ञान और विवेक की देवी सरस्वती की समाराधना से ही भारतीय राष्ट्रवाद की मूल चेतना के अन्तर्गत भारत की कृषि और गोधन की समृद्धि को भी मजबूत किया जा सकता है। इसलिए दीपावली महापर्व के अवसर पर धन की देवी लक्ष्मी के साथ ज्ञान और विवेक की देवी सरस्वती का माहात्म्य भी because जोड़ दिया गया था। पर दीपावली के सन्दर्भ में लोग आज अपनी कृषिमूलक ग्राम सभ्यता,गोधन संवर्धक राष्ट्रलक्ष्मी और गणेश से संरक्षित लोकपाल लक्ष्मी के चिंतन को पूरी तरह भुला चुके हैं। पश्चिमी सभ्यता की मानसिकता ने दीपावली के इस पंचदिवसीय लोकपर्व को महज एक बाजारवादी धार्मिक त्योहार बनाकर रख दिया है,जिसके कारण देश की ग्रामीण और कृषिमूलक अर्थव्यवस्था का निरंतर ह्रास हो रहा है।

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कृषि से उत्पन्न होने वाले खाद्यपदार्थों पर भी राज्य सरकारों द्वारा जीएसटी लगाने की जरूरत क्यों पड़ी इसका कारण स्पष्ट है कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था घोर संकट के दौर से गुजर रही है। ग्रामों के घर घर में संचित धन लक्ष्मी महानगरों के उद्योगपतियों की ओर पलायन कर रही है।जबकि सचाई यह है कि भारत की कृषिमूलक ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने कोरोना जैसे संकटपूर्ण काल में भी खाद्यान्न की प्राप्ति से because करोड़ों लोगों के जीवन को सुरक्षित किया और भारतीय अर्थव्यवस्था को नीचे गिरने से बचाए रखा। पर वास्तविकता यह भी है कि ग्रामों की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था चौपट होने के कारण खेतिहर किसान आज अपने श्रम का मेहनताना मांगने के लिए पिछले कई वर्षों से आंदोलनरत है,उन्हें लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा। फसल उगाने के लिए जो खाद, बिजली और पानी की जरूरत है,उसकी महंगाई और मौसम की बेसमय मार से भी किसान बदहाली के दौर से जूझ रहा है।

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‘राष्ट्रलक्ष्मी’ की सुरक्षा का पर्व

प्रत्येक युग में धनलिप्सा तथा राजसत्ता के गठजोड़ से जब जब बाहुबलियों और धनबलियों द्वारा प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों के संदोहन से राष्ट्रलक्ष्मी का शोषण और अपहरण करने की घिनौनी चेष्टाएं होती है,तब तब लोक मंगलकारी because विघ्नहर्ता गणपति जनलोकपाल के रूप में राष्ट्रलक्ष्मी के रक्षक बन कर उन बाहुबलियों को दण्डित करते रहे हैं। इसलिए दीपावली के अवसर पर ‘राष्ट्रलक्ष्मी’ की रक्षा-सुरक्षा के लिए गणेश सहित लक्ष्मीपूजा का विधान किया गया है। पर आज इस पर भी गम्भीरता से सोचने की  जरूरत है कि क्या राष्ट्रलक्ष्मी की खुशहाली का फल उन धरतीपुत्रों को मिल पा रहा है,जो दिन-रात धरती माता की सेवा में लगे हैं।और निरंतर मेहनत करने के बाद भी भूखे ही सो जाते हैं !

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सही मायने में तो हम दीपावली को राष्ट्रलक्ष्मी की because खुशहाली से तभी जोड़ सकते हैं,जब भारत के उन लाखों करोड़ों अन्न उगाने वाले खेतों और खलिहानों में,कृषि के मूलाधार उन सुनसान गोशालाओं में,खेती-बाड़ी से जुड़े उन मायूस किसानों के घरों में और कृषि की पैदावार उपजाने वाली उन सूखती नदियों और लुप्त होते उन जल संस्थानों में भी खुशहाली के दीपक जगमगाएं !

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सभी मित्रों को पंच दिवसीय प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

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