Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
पहाड़ों में ब्याह-बारात की सामूहिकता

पहाड़ों में ब्याह-बारात की सामूहिकता

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—21प्रकाश उप्रेतीआज बात उस पहाड़ की जो आपको अकेले होने के एहसास से बाहर रखता है. वो पहाड़ जो आपको हर कदम पर सामूहिकता का बोध कराता है. हमारे लिए 'गौं में ब्याह' (गाँव में शादी) किसी उत्सव से कम नहीं होता था. खासकर लड़की की शादी में तो गाँव में 'कौतिक'(मेला) लगा रहता था. शहरों और दूर-दराज से रिश्तेदार गाँव पहुंच जाते थे. उस दौरान गाँव की रौनक ही अलग हो जाती थी. शादी जिसके घर में हो रही होती थी उससे ज्यादा उत्साहित गाँव भर के लोग रहते थे.हर उम्र के लोगों के लिए शादी में कुछ न कुछ होता था. शादी से दो दिन पहले हमारी ड्यूटी आस-पास के गाँव में 'न्यौत' (निमंत्रण) देने की लग जाती थी. ईजा कहती थीं- "अरे पारक बुबू कमछि कि म्यर दघें न्यौत कहें हिट दिए कबे" (गाँव के दादा जी कह रहे थे,मेरे साथ निमंत्रण देने चल देना). बड़े- बुजुर्गों के साथ निमंत्रण देने जाना भी ...
ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालपहाड़ों में बहुत—सी चीजें हमारे बुजुर्गों ने हमें विरासत के रूप में सौंपी हैं पर आज आधुनिकता की चमक—दमक और भागदौड़ भरी जीवनशैली में हम इन चीजों से कोसों दूर जा चुके हैं. हम अपनी पुराने खान—पान की चीजों को सहेजना और समेटना लगभग भूल ही गए हैं. अपने खान—पान में हमने पुराने अनाजों, पकवानों को कहीं न कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया है. आज लोग उस खान—पान को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जिसमें पौष्टिकता बहुत कम मात्रा में होती है और शरीर को नुकसान अलग से होता है, जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ रही है. हमारा शरीर रोगों से लड़ने के लिए कमजोर होता जा रहा है. जिस खाने में नाममात्र की भी पौष्टिकता नहीं होती है बल्कि शरीर को मजबूत बनाना तो दूर, कमजोर ज्यादा बना रहा है, ऐसे खान—पान को हमने अपने आज खाने में शामिल किया हुआ है.रवांई घाटी एक ऐसी घाटी है जहां पर लोगों ने आज भी अपनी परम्पराओ...
पहाड़ की लोकसंस्कृति को पहचान दी लोक गायक हीरासिंह राणा ने

पहाड़ की लोकसंस्कृति को पहचान दी लोक गायक हीरासिंह राणा ने

समसामयिक
डॉ. मोहन चन्द तिवारीबहुत ही दुःख की बात है कि कोरोना काल के इस कठिन दौर में "लस्का कमर बांध, हिम्मत का साथ फिर भोल उज्याई होलि, कां ले रोलि रात"- जैसे अपने ऊर्जा भरे बोलों से जन जन को कमर कस के हिम्मत जुटाने का साहस बटोरने और रात के अंधेरे को भगाकर उजाले की ओर जाने की प्रेरणा देने वाले उत्तराखंड लोक गायिकी के पितामह, लोक-संगीत के पुरोधा तथा गढ़वाली कुमाऊंनी और जौनसारी अकादमी,दिल्ली सरकार के उपाध्यक्ष श्री हीरा सिंह राणा जी अब हमारे बीच नहीं रहे.'हिरदा कुमाऊनी' के नाम से पुकारे जाने वाले हीरा सिंह राणा जी का जन्म 16 सितंबर 1942 को उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल के ग्राम-मानिला डंढ़ोली, जिला अल्मोड़ा में हुआ.उनकी माताजी का नाम नारंगी देवी और पिताजी का नाम मोहन सिंह राणा था.लोकगायकी की पहचान बने राणा जी का अचानक चला जाना उत्तराखण्डी समाज के लिए बहुत दुःखद है और पर्वतीय लोक संगीत के ल...
सबको स्तब्ध कर गया दिनेश कंडवाल का यों अचानक जाना

सबको स्तब्ध कर गया दिनेश कंडवाल का यों अचानक जाना

संस्मरण
भूवैज्ञानिक, लेखक, पत्रकार, प्रसिद्ध फोटोग्राफर, घुमक्कड़, विचारक एवं देहरादून डिस्कवर पत्रिका के संस्थापक संपादक दिनेश कण्डवाल का अचानक हमारे बीच से परलोक जाना सबको स्तब्ध कर गया. सोशल मीडिया में उनके देहावसान की खबर आते ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से लेकर हर पत्रकार एवं आम लोगों द्वारा उन्हें अपने—अपने स्तर और ढंग से श्रद्धांजलि दी गई. हिमांतर.कॉम दिनेश कंडवाल को श्रद्धासुमन अर्पित करता है. कंडवाल जी का जाना हम सभी के लिए बेहद पीड़ादाय है. उनको विनम्र अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि…मनोज इष्टवालपहली मुलाक़ात 1995....... स्थान चकराता जौनसार भावर की ठाणा डांडा थात. गले में कैमरा व एक खूबसूरत पहाड़ी महिला के साथ “बिस्सू मेले” में फोटो खींचता दिखाई दिया यह व्यक्ति. गले में लटका कैमरा Nikon F-5 . मैं अचम्भित था कि चकराता में यह जापानी, चीनी या फिर कोरियन व्यक्ति कैसे आया व इनके सम्पर्...
लोक के चितेरे जनकवि हीरा सिंह राणा

लोक के चितेरे जनकवि हीरा सिंह राणा

समसामयिक
डॉ. अरुण कुकसाललस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा, फिर भोला उज्याला होली, कां रोली राता 12 नवम्बर, 2019 की रात वैकुंठ चतुर्दशी मेला, श्रीनगर (गढ़वाल) में गढ़-कुमाऊंनी कवि सम्मेलन के मंच पर नरेन्द्र सिंह नेगीजी एवं अन्य कवियों के मध्य जनकवि हीरा सिंह राणाजी भी शोभायमान थे. प्रिय मित्र चारू तिवारीजी एवं विभोर बहुगुणाजी के साथ कवियों की कविताओं का आंनद लेते हुए नज़र हीरा सिंह राणाजी पर जाती रही. और अस्सी के दशक में सड़कों पर तमाम जलूसों और जन-यात्राओं में गाया उनका गीत ‘लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा, फिर भोला उज्याला होली, कां रोली राता.’ याद आता रहा. असली के दशक में नैनीताल और अल्मोड़ा की सड़कों पर जलूस में हीरा सिंह राणा जी के साथ ये गीत गाते हुए लगता था कि कमर बांधने का यही सही वक्त है. जीवन के प्रति सकारात्मक जज्बां ये गीत आज भी भर देता है. हीरा सिंह राणाजी का अस्वस्थ शरीर, चलने में दि...
कुछ लोग दुनिया में खुशबू की तरह हैं

कुछ लोग दुनिया में खुशबू की तरह हैं

संस्मरण
देश—परदेश भाग—4डॉ. विजया सतीबुदापैश्त में हिन्दी की तमाम गतिविधियों की बागडोर मारिया जी लम्बे समय से संभाले हुए हैं. डॉ मारिया नैज्येशी! बुदापैश्त में प्रतिष्ठित ऐलते विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग की अनवरत अध्यक्षा! मारिया जी विश्वविद्यालय स्तर पर प्राचीन यूनानी, लैटिन और संस्कृत भाषाएँ पढ़ रही थी जब अपने गुरु प्रोफ़ेसर तोत्तोशि चबा की प्रेरणा से वे भारत केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में हिन्दी पढ़ने आई. बाद में भारत के प्रेमचंद और हंगरी से मोरित्स जिग्मोंद – इनके साहित्य पर शोध किया और पीएचडी की डिग्री भारत से हासिल की. मारिया जी कहती हैं कि जब हंगरी में उन्होंने हिन्दी पढ़ना शुरू किया – तब न हिन्दी की किताबें थी, न हिन्दी जानने वाले अधिक लोग. फिर जब वे हिन्दी पढ़ने भारत आईं तो यहाँ का जीवन उनके लिए बिलकुल नया और अलग अनुभव लेकर आया. फिर भी भारत ने उन्हें प्रेरित किया. भारत से लौ...
जल मात्र प्राकृतिक संसाधन नहीं, हिमालय प्रकृति का दिव्य वरदान है

जल मात्र प्राकृतिक संसाधन नहीं, हिमालय प्रकृति का दिव्य वरदान है

साहित्‍य-संस्कृति
भारत की जल संस्कृति-3डॉ० मोहन चन्द तिवारी"शं ते आपो हेमवतीः शत्रु ते सन्तुतव्याः. शंते सनिष्यदा आपः शत्रु ते सन्तुवर्ष्या..                - अथर्ववेद 19.2.1 अर्थात् हिमालय से उत्पन्न होकर तीव्र गति से बहने वाली जलधाराएं और वर्षा द्वारा नदियों में प्रवाहित होने वाले जल प्रवाह,ये सभी जलस्रोत शुभकारक एवं कल्याणकारी हों. अथर्वर्वेद के ऋषि की जल विषयक यह प्रार्थना बताती है कि अनादि काल से ही उत्तराखंड सहित समूचे भारत का व्यवस्थित जलप्रबंधन हिमालय पर्वत से संचालित होता आया है,जिसमें ऊंची पर्वत श्रेणियों से उत्पन्न होने वाली नदियों,हिमनदों,गहरी घाटियों और भूमिगत विशाल जलचट्टानों की अहम भूमिका रहती है. जलस्रोतों का जन्मदाता होने के कारण भी वैदिक जल चिंतकों की हिमालय के प्रति अगाध श्रद्धा रही है.इसीलिए उन्होंने  आधुनिक जलवैज्ञानिकों की तरह जल को महज एक प्राकृतिक संसाधन नहीं माना, बल्...
हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत

हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत

संस्मरण
सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री और हिमालय के चिंतक प्रो. डीडी पंत की पुण्यतिथि (11 जून, 2008) पर विशेषचारु तिवारीमैं तब बहुत छोटा था. नौंवी कक्षा में पढ़ता था. यह 1979-80 की बात है. बाबू (पिताजी) ने बताया कि दुनिया के एक बहुत बड़े वैज्ञानिक आज बग्वालीपोखर में आ रहे हैं. बग्वालीपोखर में उन दिनों सड़क तो नहीं आई थी. हां, बिजली के पोल गढ़ गये थे, या कहीं बिजली आ भी गई थी. हमारे लिये वैसे भी अपने क्षेत्र के बाहर के आदमी को देखना ही कौतुहलपूर्ण था. वैज्ञानिकों और उनकी खोजों के बारे में किताबों में ही पढ़ते थे. हमें लगता था कि वैज्ञानिक आम आदमी से कुछ अलग होते होंगे. प्रतिभा और विद्वता में तो होते ही हैं, लेकिन हमें लगता था कि देखने में भी अलग होते होंगे.प्रो. डीडी पंत जी को पहली बार दूर से देखने का सुख मात्र एक वैज्ञानिक को देखने की बालसुलभ जिज्ञासा थी. उस समय पृथक उत्तराखंड राज्य के ल...
चीड़ को इस नज़र से भी देखना होगा

चीड़ को इस नज़र से भी देखना होगा

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—20प्रकाश उप्रेतीपहाड़ की हर चीज आपको कुछ न कुछ देती है. पहाड़ के लोगों का हर पेड़, ढुङ्ग (पत्थर), भ्योव (पहाड़), गढ्यर, और झाड़ियों से एक रिश्ता होता है. आज बात करते हैं- 'सोह डाव' (चीड़ के पेड़) और उसकी धरोहर- 'ठिट'(चीड़ का फल) और 'छिलुक' (आग पकड़ने वाली लकड़ी) की. जाड़े के दिनों में हमारा एक काम 'भ्योव बे ठिट'(जंगल से चीड़ का फल) लाने का भी होता था. ईजा घास काटने जाती थीं तो हम उनके साथ ठिट चाहने जाते थे. जाड़े की सुबह-सुबह जब 'हॉल' (कोहरा) के कारण दिखाई भी मुश्किल से देता था तो ईजा कहती थीं- "भ्योव हिट च्यला वोति घाम ले तापी हाले और आग तापे हैं 'मुन' (पेड़ की जड़) और ठिट ले चाहा ल्याले". ( बेटा मेरे साथ पहाड़ चल वहाँ से अंगीठी में जलाने के लिए चीड़ के फल, लकड़ी की जड़े भी ले आएगा और धूप भी सेक लेगा)  यह कहते हुए ईजा हमको एक बोरी देती थीं. हम ईजा के साथ भ्यो चल...
अपनेपन की मिठास कंडारी बंधुओं का ‘कंडारी टी स्टाल’

अपनेपन की मिठास कंडारी बंधुओं का ‘कंडारी टी स्टाल’

संस्मरण
डॉ. अरुण कुकसालचर्चित पत्रकार रवीश कुमार ने अपनी किताब 'इ़श्क में शह़र होना’ में दिल से सटीक बात कही कि ‘'मानुषों को इश्क आपस में ही नहीं वरन किसी जगह से भी हो जाता है. और उस जगह के किन्हीं विशेष कोनों से तो बे-इंतहा इश्क होता है. क्योंकि बीते इश्क की कही-अनकही बातें और सफल-असफल किस्से उन्हीं कोनों में दुबके रहते हैं. ये अलग बात है कि नये वक्त की नई चमचमाहट और आपाधापी में उन किस्सों और बातों के निशां दिखाई नहीं देते हैं. पर दिल का सबसे नाजुक कोना उन्हें ताउम्र बखूबी महसूस करता है.’'श्रीनगर गढ़वाल के 'सेमवाल पान भंडार' और उससे सटा 'कंडारी की स्टाल' क्रमशः प्रोफेसरों और छात्रों का बिड़ला कालेज से इतर का मिलन केन्द्र हुआ करता था. अक्सर किसी सेमीनार या कार्यक्रम हाल में बैठे प्रतिभागियों से ज्यादा गम्भीर चर्चा उससे ऊब कर हाल से बाहर आये प्रतिभागियों में होती है.श्रीनगर में रहते ...