Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
मेरे बगीचे के फूल

मेरे बगीचे के फूल

संस्मरण
सुनीता भट्ट पैन्यूलीमानसून के पदचापों की आमद हर because तरफ़ सुनाई दे रही है. पेड़ों के अपनी जड़ों से विलगित होने का शोर शायद ही मानवता को सुनाई दे किंतु इस वर्षाकाल में कोरोना का हाहाकार और मानवता के उखड़ने और उजड़कर गिरने का शोर हर रोज़ कर्णों को भेद रहा है.मानसून इस कोरोना के वर्षाकाल में so मानव को वेंटिलेटर की दरकार है कृत्रिम  प्राण वायु मनुष्य के लिए आज कितना अपरिहार्य है इस कोरोनाकाल में हमें महसूस हो रहा है किंतु प्राकृतिक प्राण वायु जो अदृश्य रुप में हमें मिल रही है उसका ज़िक्र कहीं हमारे मानस-पटल पर धुंधलाता जा रहा है. आज उत्तराखंड में हरेला दिवस मनाया जा रहा है उल्लास कम है कोरोना की वजह से किंतु पौधे रोपे ही जायेंगे कुछ प्राचीन पुरोधाओं की स्मृतियों में कुछ उपेक्षित नदियों के तटों पर, स्कूल, बगीचों अपने घरों में श्रलाघनीय है यह और सार्थक भी.मानसून किंतु पर्यावरण ...
“बृहत्संहिता में शिलाभेदन के रासायनिक फार्मूले”

“बृहत्संहिता में शिलाभेदन के रासायनिक फार्मूले”

जल-विज्ञान
असगोली की ग्राउंड रिपोर्ट सहित  "जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने से भी बड़ा काम है,because उनकी सड़क माफियों के अत्याचार से रक्षा करना." भारत की जल संस्कृति-21डॉ. मोहन चंद तिवारीहम जब प्राचीन काल की गुफाओं अजन्ता, so ऐलोरा,मंदिरों,कुओं और विशाल जलाशयों आदि को देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि आखिर कैसे इन विशाल गुफाओं की भूमिगत विशाल शिलाओं को खंड-खंड करके इतनी सुंदरता के साथ इनका निर्माण किया गया होगा? केवल छैनीं, कुदाल और हथौड़ों के उपकरणों से तो इनका निर्माण सम्भव नहीं लगता है. इसी सन्दर्भ में जब अपने प्राचीन ग्रन्थों में विवेचित भारत की रासायनिक विधियों का अन्वेषण करते हैं तो वराहमिहिर की बृहत्संहिता उनमें से रासायनिक शिलाविज्ञान का मुख्य ग्रन्थ सिद्ध होता है.जानकारी बृहत्संहिता में जल वैज्ञानिक आचार्य वराहमिहिर द्वारा अनेक ऐसे उपाय और विधियां बताई गई हैं,जिनसे जलाशय या कूप उत...
‘दो व्यक्तियों के बीच का गीतात्मक वाक्य व्यवहार है बाजूबन्द गीत’

‘दो व्यक्तियों के बीच का गीतात्मक वाक्य व्यवहार है बाजूबन्द गीत’

साहित्‍य-संस्कृति
ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’समाज में गायन की अनको विधाओं का because चित्रण देखने व सुनने को मिल जाता है. छौपती, छूड़े, पवाड़े, बाजूबन्द, लामण, तांदी गीत, आदि  मनोरंजन तो हैं ही साथ ही जीवन यथार्थ से जुड़ी सुख -दुःख,  प्रेम प्रसंगों व अनको घटनाओं पर भी आधारित हैं. इन्हीं विधाओं में गायन की एक विधा है बाजूबन्द.पहाड़ बाजूबन्द एक प्रकार के संवाद गीत हैं. so जो प्रायः स्त्री पुरुषों द्वारा वनों में घास- पत्ती, लकड़ी- चारा लाते हुए या भेड़- बकरी, गाय- भैंस चराते और खेतों में काम करते लम्बी सुरीली आवाज में गाये जाते हैं. ये प्रेम व मनोरंजन के लिए भी हो सकते हैं.पहाड़‘‘बाजूबन्द दो व्यक्तियों के but बीच का गीतात्मक वाक्य व्यवहार है जो नितान्त वैयक्तिक होता है वह सामुदायिक मनोरंजन का आधार न हो कर एक प्रकार का आत्म निवेदन है जो वनों के एकान्त में दूसरे के कानों में भले ही पड़ जाये पर वह किसी एक ...
गाँव का इकलौता ‘नौह’ वो भी सूख गया

गाँव का इकलौता ‘नौह’ वो भी सूख गया

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—53प्रकाश उप्रेतीपहाड़ में पानी और 'नौह' की because बात मैंने पहले भी की है लेकिन आज उस नोह की बात जिसे मैंने डब-ड़बा कर छलकते हुए  देखा है. उसके बाद गिलास से पानी भरते हुए और कई सालों से बूँद-बूँद के लिए तरसते हुए भी देखा है.पहाड़ ये हमारे छोटे से गाँव का इकलौता नौह था.but इसके बारे में तब कहा जाता था कि "सब जग पाणी बिसिक ले जालो, खोपड़ी नौह हन तो मिलोले" (अगर सब जगह पानी सूख भी जाएगा तो खोपड़ा वालों के नौह में तो मिलेगा ही). अब इसे दुर्भाग्य कहिए या सौभाग्य कि उस इलाके में सबसे पहले इसी नौह का पानी सूखा. एक बार सूखा तो फिर कभी लौटा भी नहीं.पानी तब पानी लाने के लिए शाम में ही जाना होता था.so ईजा घास लेने जाते हुए कहा करती थीं- "आज दी गगर भरि दिये हां पाणिल" (आज पानी से दो गगरी भर देना). हम तुरंत हाँ..हाँ..कह देते थे. शाम को एक "हलाम" (कु...
पहाड़ में स्‍वरोजगार का बेहतर जरिया हो सकती है लहसुन की जैविक  

पहाड़ में स्‍वरोजगार का बेहतर जरिया हो सकती है लहसुन की जैविक  

खेती-बाड़ी
डॉ. राजेंद्र कुकसाललहसुन  पहाड़ी क्षेत्रों  की एक प्रमुख नगदी/व्यवसायिक फसल है. पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली लहसुन जैविक होने के साथ ही अधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट व औषधीय गुणों से because भरपूर भी होती है जिस कारण बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है. उद्यान विभाग के बर्ष 2015 - 16 में दर्शाये गये आंकड़ों के अनुसार राज्य में 1530.45 हैक्टर क्षेत्र फल में लहसुन की खेती की जाती है जिससे 9768.25 मैट्रिक टन उत्पादन होता है.पहाड़ीपहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिकbut रूप से उगाई जाने वाली लहसुन जैविक होने के साथ ही अधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट व औषधीय गुणों से भरपूर होती है, जिस कारण बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है.पहाड़ी जलवायु ऐसी जगह जहां न तो बहुत गर्मी हो so और न ही बहुत ठण्डा लहसुन की खेती के लिए उपयुक्त है. लहसुन की खेती 1000 से 1500 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र जहां तापमान 25 - 35...
वर्तमान परिदृश्य पर गांधी जी की आर्थिक दृष्टि

वर्तमान परिदृश्य पर गांधी जी की आर्थिक दृष्टि

समसामयिक
151वीं गांधी जयंती पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्रआज पूरे संसार में एक विकटbecause वैश्विक आपदा के चलते उदयोग और व्यवसाय की दुनिया के सारे कारोबार और समीकरण अस्त-व्यस्त होते जा रहे हैं. विकसित हों या अविकसित सभी तरह के देशों अर्थ व्यवस्था चरमरा रही है और उनकी रफ़्तार ढीली पड़ती जा रही है. ऐसे में यह प्रश्न सहज में उठता है कि आधुनिकता की परियोजना के तहत विश्वास जतलाते हुए प्रगति और विकास की जो राह चुनी गई थी वह किस सीमा तक सही थी या कि उसकी राह पर आगे भी चले चलना कितना ठीक होगा. बड़े पैमाने पर थोक भाव से उत्पादन और स्वचालित यंत्रों की सहायता से मानव श्रम के मूल्य का पुनर्निर्धारण हुआ और सामाजिक ताने बाने की तस्बीर ही बदलती गई .आज वैश्विक आर्थिक संस्थाओं के तंत्र butजाल ने विकास का एक ढांचा, एक मान दंड तय किया और उसी के इर्द-गिर्द और कमोबेश उसी के अनुरूप आगे बढ़ते रहने के लक्ष्य तय ...
गांधी चिंतन ने ‘भारतराष्ट्र’ को सांस्कृतिक पहचान दी

गांधी चिंतन ने ‘भारतराष्ट्र’ को सांस्कृतिक पहचान दी

समसामयिक
151वीं गांधी जयंती पर विशेष  डॉ. मोहन चंद तिवारी आज 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की 151वीं जयंती becauseपूरे देश में राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान की भावना से मनाई जा रही है. मोहनदास कर्मचंद गांधी 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर, गुजरात में पैदा हुए थे. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गांधी जी अमूल्य योगदान और अहिंसा के प्रति उनकी गहन आस्था के कारण उन्हें कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के अलग-अलग प्रान्तों में अत्यंत श्रद्धा और देशभक्ति की भावना से याद किया जाता है.  विश्व को सत्य और अहिंसा का सबसे ताकतवर हथियार देने वाले महात्मा गांधी का चिंतन और जीवन दर्शन न केवल भारत के लिए अपितु पूरी दुनिया के लिए आज भी प्रासंगिक हैं. गहनबीसवीं शताब्दी की दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं मानी जाती हैं. उनमें से एक घटना है परमाणु बम के प्रयोग द्वारा मानव सभ्यता के विनाश का प्रयास और दूसरी घटना है गांधी ज...
मोहनदास करमचंद गाँधी को बापू और महात्मा गाँधी बनाने वाली ‘बा’ कहाँ

मोहनदास करमचंद गाँधी को बापू और महात्मा गाँधी बनाने वाली ‘बा’ कहाँ

समसामयिक
151वीं गांधी जयंती पर विशेषप्रकाश उप्रेतीनैतिक शिक्षा की किताब के पीछे दुबली-पतली, आधी झुकी हुई काया, बदन पर धोती लपेटे,  हाथ में लाठी वाली तस्वीर से जब पहली बार सामना हुआ तो हैड मास्टर साहब ने becauseबताया की ये महात्मा गाँधी अर्थात बापू हैं. यह तस्वीर और स्मृति ही बड़े-होने के साथ बड़ी होती गई.परंतु इनमें कहीं भी ‘बा’ (कस्तूरबा) नहीं थीं. बापू को लेकर बचपन से ही जो समझ बनी उसमें कहीं बा नहीं थीं. जबकि मोहनदास करमचंद गाँधी को बापू और महात्मा गाँधी बनाने में ‘बा’ की बड़ी भूमिका थी. इस बात को स्वयं बापू ने भी बहुत बार स्वीकार किया.संध्या भराड़े अपनी किताब  ‘बा’ में लिखती हैं कि जॉन एस॰ हाइलैंड से बापू ने एक बार कहा, ‘मैंने बा से अहिंसा का पहला सबक सीखा.नैतिक एक ओर तो वह मेरे विवेकहीन आदर्शों का दृढ़ता से विरोध करतीं, दूसरी so ओर मेरे अविचार से जो तकलीफ उन्हें होती उसे चुपचाप सह ल...
भारत में भौमजल की दशा और दिशा : एक भूवैज्ञानिक विश्लेषण

भारत में भौमजल की दशा और दिशा : एक भूवैज्ञानिक विश्लेषण

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-20डॉ. मोहन चंद तिवारीभारत एक विकासशील देश है.प्रत्येक क्षेत्र में because उसकी प्रगति हो रही है और उसकी जनसंख्या में भी वृद्धि हो रही है.अतः वर्ष 2025 तक 1093 बिलियन क्यूबिक मीटर्स जल की आवश्यकता होगी. इसके लिए वर्षाजल को बहकर समुद्र में जाने से रोकने के लिए वर्षाजल संग्रहण (रेन हार्वेस्टिंग) ही शहरों के लिये बड़ा कारगर उपाय है. इसके लिए छतों का पानी एकत्रित कर इससे जलभृतों (एक्वीफर्स) का पुनर्भरण किया जाना बहुत जरूरी है ताकि भौमजल का संवर्धन हो सके. देश की महत्त्वपूर्ण सम्पदाओं में जल संसाधन एक प्रमुख घटक है. देश का धरातलीय जल एवं भौमजल संसाधन कृषि, पेयजल, औद्योगिक गतिविधियाँ,जल विद्युत उत्पादन, पशुधन उत्पादन, वनरोपण, मत्स्य पालन, नौकायन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों आदि में मुख्य भूमिका निभाता है.वराहमिहिर जल संसाधन का प्राथमिक स्रोत वर्षण (प्रेसिपिटेशन...
नहीं रहे हिमालय पर्यावरणविद् भूवैज्ञानिक प्रो. वल्दिया

नहीं रहे हिमालय पर्यावरणविद् भूवैज्ञानिक प्रो. वल्दिया

स्मृति-शेष
डॉ. मोहन चंद तिवारीअत्यंत दुःखद समाचार है कि हिमालय पर्यावरणविद् अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भूवैज्ञानिक पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित प्रोफेसर खड्ग सिंह वल्दिया का 83 साल की उम्र में कल 29 सितंबर को निधन हो गया.वे इन दिनों बेंगलुरु में थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे.प्रो.वल्दिया उत्तराखंड के पिथौरागढ़ सीमांत जिले आठगांव शिलिंग के देवदार (खैनालगांव) के मूल निवासी थे. वह कुमाऊं विवि के कुलपति भी रहे थे.पिथौरागढ़ सन्त 2015 में भूगर्भ वैज्ञानिक because प्रो.के.एस. वल्दिया को भूगर्भ क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने पर पद्म भूषण सम्मान मिला था.इससे पहले 2007 में उन्हें भूविज्ञान और पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए पद्मश्री सम्मान मिला था. प्रो.वल्दिया भू वैज्ञानिक होने के साथ साथ कवि और लेखक भी थे. प्रो.वल्दिया ने कुल चौदह पुस्तकें लिखी, जिनमें मुख्य पुस्तकें हैं ...