Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
आज भी प्रासंगिक हैं ‘गांधी-गीता’ के प्रजातांत्रिक मूल्य

आज भी प्रासंगिक हैं ‘गांधी-गीता’ के प्रजातांत्रिक मूल्य

साहित्‍य-संस्कृति
डॉ. मोहन चंद तिवारीप्रोफेसर इन्द्र की 'गांधी-गीता' दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के स्नातक स्तर के 'भारतीय राष्ट्रवाद' के पाठ्यक्रम में निर्धारित एक महत्त्वपूर्ण रचना है. यह पुस्तक सन् 1950 में प्रकाशित हुई थी जो अब दुर्लभप्राय है.मैं अपने फेसबुक पर गांधी जयंती, गणतंत्र दिवस स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय महोत्सवों के अवसर पर because लिखे लेखों में प्रोफेसर इन्द्र द्वारा रचित इस 'गांधी-गीता' के बारे में प्रायः चर्चा करता रहता हूं. राजनैतिक जगत में भारतीय राष्ट्रवाद और प्रजातांत्रिक मूल्यों का देश में आज जिस प्रकार से क्षरण हो रहा है,उसे देखते हुए भी देश में प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए गांधीवादी चिंतन आज भी जनोपयोगी और प्रासंगिक भी है.गांधी चिंतन के इसी सन्दर्भ में यह लेख भी लिखा गया है. प्रवासी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के पिछले सौ वर्षों के इतिहास की ओर नजर दौड़ाएं ...
उत्तराखंड राज्य के लिए भुलाया नहीं जा सकता दिल्लीवासियों का संघर्ष

उत्तराखंड राज्य के लिए भुलाया नहीं जा सकता दिल्लीवासियों का संघर्ष

देहरादून
उत्तराखंड राज्य के स्थापना दिवस (9 नवम्बर) पर विशेष याद आ रहे हैं डॉ. नारायण दत्त पालीवालडॉ. मोहन चंद तिवारीआज 9 नवम्बर को उत्तराखंड because राज्य का 21वां स्थापना दिवस है। हम सभी उत्तराखंडवासियों के लिए चाहे वह उत्तराखंड राज्य में रह रहे नागरिक हों, जो एक स्वतंत्र राज्य के अहसास से जीवन यापन कर रहे हैं, या फिर राज्य की बदहाली के कारण दूर दराज के मैदानी इलाकों में मजबूरी से गुजर बसर कर रहे प्रवासी जन हों,सबके लिए अत्यन्त ही हर्ष और गर्व का मौका है कि आज के दिन लंबे संघर्ष और अनेक लोगों के बलिदान के बाद नए राज्य का हमें हमारा संविधान सम्मत अधिकार मिला। प्रवासी यह गर्व करने का दिन इसलिए भी है क्योंकि so आज हमें एक स्वतंत्र राज्य के अलावा अपनी एक नई पहचान भी मिली थी। वरना तो उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्य के किसी कोने में हम भी अपनी पहचान और लोक संस्कृति के लिए संघर्ष कर रहे होते ...
आमरऽ उत्तराखंड क हाल

आमरऽ उत्तराखंड क हाल

कविताएं
उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस 2020 (रवांल्टी कविता )अनुरूपा “अनुश्री”उत्तराखण्ड बणी के कति साल हइगे, बेरोजगार यो पहाड़ी मुलुकई रइगो.कति पायो कति खोयो यूं सालु पोडो, त पु किचा न पड्यो आमार पला ओडो.इक्कीस साल बिचिगे यां आस मा, कि किचा रोजगार आलो कतरांई त आमर हातु मा.जियूं नेताऊं क बाना यो राज्य बणि्यो, तियं भाई-भतीजावाद की राजनीति आणी.जति पु नेता आये  ततियें राजनीति करी, ओर घर  सबुओं आपड़ई भरे.चंद लोगु को भलऽ कतरांई हई पु रल, त का बड़ो काम दयो यें करी.आपु वोटु को सोउदा करिके, गरीब शरीफ दये बदनाम करी.सोचो देई  मेर भाई - बइणियों, कोइच छुटिगे तियूंक स बड़-बड़ वादा.जागी जाओ अब त आमर पहाड़ क नवजवानो, आपड़ उत्तराखंड क विकास करनऽ क बाना..नानई, मोरी, उत्तरकाशी (उत्तराखंड)...
प्यारा उत्तराखंड

प्यारा उत्तराखंड

कविताएं
उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस 2020आदेश सिंह राणा केदारखण्ड और मानसखण्ड, देवभुमि है मेरी उत्तराखंड. पहाड़ों और फूलों की घाटी, वीर धरा है मेरी राज्य की माटी.प्रदेश में मेरे मिलता है ऐसा सुकून, लगता है माँ का आँचल. देवभूमि के नाम से विख्यात है, यह है अपना प्यारा उत्तरांचल.गढ़वाल और कुमाऊँ दो खंड है, तेरह जिले है पहचान इसके. हिम शिखरों से सुसज्जित है, निवास यहाँ है सब देवों की.ऋषियाँ की है तप स्थली, मुनियाँ की यह जप स्थली है. पंच बदरी पंच केदार, पंच मठ है यहाँ पंच प्रयाग.वीरों की यह भूमि है, सैन्य धाम है उत्तराखंड. बलदानियों ने यहाँ जन्म लिया है, पूरी दुनिया हमने नाम किया है.चारों दिशाओं में चार धाम हैं, माँ गंगा जी उदगम है यहाँ. यमुना जी भी निकल है यहाँ से, स्वर्ग जाने का मिलता है पथ यहाँ.सैकड़ों नदियाँ बहती है यहाँ से, जो देतें है पूरे भा...
क्या यही राज्य हमने मांगा था

क्या यही राज्य हमने मांगा था

कविताएं
उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस 2020धीरेन्द्र सिंह चौहानखटीमा मसुरी रामपुर तिराह में हुआ आंदोलनकारियों का  हत्या कांड उन शहीदों के बदौलत है आज उत्तराखंड, जिन्होंने हिलाया था ब्रह्मांडराज्य बनाने की खातिर आंदोलनकारी रहे सलाखों में खाई लाठी और गोलियां सलामत रहेगी कब तक देवभूमि में भ्रष्टाचार अधिकारी, शराब माफियों की टोलियांमंत्री, संतरी नेता और विधायक, सांसद अधिकारी सारे पड़े हैं, कमिशन की मौज में देख रहे हैं आंदोलनकारी, बोल रही है जनता क्या यही राज्य हमने माँगा, पड़ी है सोच मेंअधिकारियों में पनपा भ्रष्टाचार नेताओं में पनपा है पाखंड गढ़वाल कुमाऊँ की जनता ने इस खातिर नहीं माँगा था उत्तराखंडनौरी पुरोला, उत्तराखंड...
चक्रपाणि मिश्र के भूमिगत जलान्वेषण के वैज्ञानिक सिद्धांत

चक्रपाणि मिश्र के भूमिगत जलान्वेषण के वैज्ञानिक सिद्धांत

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-26डॉ. मोहन चंद तिवारीआचार्य वराहमिहिर की तरह चक्रपाणि मिश्र का भी भूमिगत जलान्वेषण के क्षेत्र में  महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है,जो वर्त्तमान सन्दर्भ में भी अत्यन्त प्रासंगिक है. चक्रपाणि मिश्र ने भारतवर्ष के विविध क्षेत्रों because और प्रदेशों की पर्यावरण और भूवैज्ञानिक पारिस्थिकी के सन्दर्भ में देश की भौगोलिक पारिस्थिकी को जलवैज्ञानिक धरातल पर पांच वर्गों में विभक्त किया है और प्रत्येक क्षेत्र की वानस्पतिक तथा भूगर्भीय विशेषताओं को अलग अलग लक्षणों से परिभाषित भी किया है. प्राचीन भारत के परंपरागत जल संसाधनों के सैद्धांतिक  स्वरूप को जानने के लिए भी चक्रपाणि मिश्र का 'विश्ववल्लभवृक्षायुर्वेद’ नामक ग्रन्थ बहुत महत्त्वपूर्ण है.'विश्ववल्लभवृक्षायुर्वेद’ में जलवैज्ञानिक सिद्धांत सोलहवीं शताब्दी में महाराणा प्रताप (1572-1597 ई.) के समकालीन रहे ज्योतिर्विद पं.चक्र...
हाशिये पर पड़े सत्य को रोशनी में लाने के लिए कभी-कभी मरना पड़ता है

हाशिये पर पड़े सत्य को रोशनी में लाने के लिए कभी-कभी मरना पड़ता है

संस्मरण
जवाबदेही की अविस्मरणीय यात्रा - भाग-4सुनीता भट्ट पैन्यूलीहाशिये पर पड़े सत्य को रोशनी में becauseलाने के लिए कभी-कभी लेखक को मरना भी होता है ताकि पाठकों द्वारा विसंगतियों का वह सिरा पकड़ा जा सके जिसकी स्वीकारोक्ति सामाजिक पायदान पर हरगिज़ नहीं होनी चाहिए.सत्य ऐसी घटनाओं और अनुभव लिखने के because लिए कलम की रोशनाई यदि कम पड़ेगी  तो उन स्मृतियों की स्याह छाप प्रगाढ होकर पाठकों को झकझोरेगी कैसे? मेरे अपने बीते हुए अनुभवों पर प्रकाश डालने से शायद कुछ छुपा हुआ, ढका हुआ बाहर निकल कर आ जाये कालेजों की मौज़ूदा हालत के रूप में.सत्यऐसा ही उपरोक्त अनुभव जो कि कुछ because अप्रत्याशित, अशोभनीय और हिकारत भरा था मेरे लिए,मज़बूर हो गयी थी मैं सोचने के लिए कि कोई इतना असभ्य कैसे हो सकता है? पढ़ें — वो बचपन वाली ‘साइकिल गाड़ी’ चलाई सत्य हां..! आनन्द प्रकाश सर के कहे because अनुसार उ...
अपना गाँव

अपना गाँव

कविताएं
अंकिता पंतगाँवों में फिर से हँसी ठिठोली है बुजुर्गों ने, फिर किस्सों की गठरी खोली है.रिश्तों में बरस रहा फिर से प्यार मन रहा संग, खुशी से हर त्यौहार.गाँवों में फिर से खुशियाँ छाई हैं परदेसियों को बरसों बाद, घर की याद आई है.महामारी एक बहाना बन कर आ गई खाली पड़े मकानों को, बरसों बाद घर बना गई.पहाड़ अब और अधिक चमकने लगे हैं अपनों से जुड़कर, ये रिश्ते और अधिक महकने लगे हैं.रिश्तों की चाहत, अपनी मिट्टी से फिर जुड़ने लगी है अब मेरे पहाड़ों को, सुकूँ भरी राहत मिलने लगी है.विजयपुर  (खन्तोली) जनपद – बागेश्वर, उत्तराखंड ...
सरुली और चाय की केतली….

सरुली और चाय की केतली….

किस्से-कहानियां
लघु कथाअमृता पांडेसरुली चाय की केतली से because निकलती भाप को एकटक देख रही थी. पत्थरों का ऊंचा नीचा आंगन, एक कोने पर मिट्टी का बना कच्चा जिसमें सूखी लकड़ियां जलकर धुआं बनकर गायब हो जातीं. चाय उबलकर काढ़ा हो गई थी पर सरुली ना जाने किन विचारों में निमग्न थी. because न जाने कितने वर्षों पुरानी यात्रा तय कर ली थी उसने कुछ ही मिनटों में. बचपन में स्कूल नहीं जा पाई थी. मां खेत में काम पर जाती और जानवरों के लिए चारा लाती. सरुली घर में छोटे भाई बहनों की फौज को संभालती और सयानों की तरह उनका ध्यान रखती थी. प्यारे छोटी-सी उम्र में ही घर के सारे because काम से लिए थे उसने. सोलह वर्ष की कच्ची उम्र में तो इतनी काबिल हो गई थी कि विवाह तय हो गया था उसका. झट मंगनी, पट विवाह हो गया. सरुली का बचपन वैवाहिक ज़िम्मेदारियों की भेंट चढ़ गया. एक पत्नी, गृहणी और बहू से जो अपेक्षाएं होती हैं उन सभी को वह...
लोकतंत्र

लोकतंत्र

कविताएं
भारती आनंदतानाशाही का अंत हुआ, फिर भारत में लोकतंत्र आया. जनता के द्वारा शासन यह, जनता का शासन कहलाया. जनता के हित की ही खातिर, नव नियमों का विधान किया. जन अधिकारों को आगे रखा, संविधान इसे नाम दिया.जन-जन की बात सुनेगा जो, जन-जन के लिए जियेगा जो. उसको ही चुनेंगे अपना शासक, जनता के साथ चलेगा जो. वो अपना ही तो भाई होगा, अपनी हर बात सुनायेगे. जो होगा भारत के हित में, हम काम वही करवायेंगे.मौलिक अधिकार मिले जनता को, जख्म पुराने भर जायेंगे. लोकतंत्र से चलता है भारत, दुनिया को दिखलायेंगे. लिखी जायेगी नई इबारत नया दौर फिर से आयेगा. बनकर कोई भी तानाशाही, अत्याचार न कर पायेगा.सत्तर वर्षो में देखो कैसे बदल गयी है परिभाषा. लोकतंत्र भी बदल गया है, बदल गयी सब अभिलाषा. काम के सारे रंग ढंग बदले,जनप्रतिनिधी हो गये नेताजी. कुछ दलों में हुए विभाजित, कुछ अपने में ही राजी.क्षेत्र...