Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
मुनिया चौरा की कपमार्क ओखली उत्तराखंड के आद्य इतिहास का साक्ष्य

मुनिया चौरा की कपमार्क ओखली उत्तराखंड के आद्य इतिहास का साक्ष्य

इतिहास
डॉ. मोहन चंद तिवारीएक वर्ष पूर्व दिनांक 11अक्टूबर, 2019 को जालली-मासी मोटरमार्ग पर स्थित सुरेग्वेल से एक कि.मी.दूर मुनियाचौरा गांव में मेरे द्वारा खोजी गई कपमार्क ओखली मेरी because नवरात्र शोधयात्रा की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है. महापाषाण काल की यह  कपमार्क मेगलिथिक ओखली उत्तराखंड के पाली पछाऊं क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास को उजागर करने वाली एक महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक अवशेष भी है. बुदापैश्त इस ओखली के मिलने का घटनाक्रम भी बहुत रोचक है. राष्ट्रीय इतिहास लेखन की चिंताओं को लेकर नवरात्र यात्रा because के दौरान मैंने जब दिनांक 11 अक्टूबर, 2019 को कपमार्क ओखलियों का सर्वेक्षण करने के लिए 'मुनिया की धार' जाने का मन बनाया और वहां सुरेग्वेल जाकर मैंने अनेक स्थानीय लोगों से ओखलियों के रास्ते के बारे में पूछा तो उन्हें कोई ओखली की जानकारी नहीं थी. मैं फिर भी अपनी पुरानी स्मृतियों के सहारे अ...
ग़म-ए-ज़िदगी तेरी राह में

ग़म-ए-ज़िदगी तेरी राह में

संस्मरण
बुदापैश्त डायरी-14डॉ. विजया सतीग़म-ए-ज़िदगी तेरी राह में, शब-ए-आरज़ू तेरी चाह में .............................जो बिछड़ गया वो मिला नहीं !बुदापैश्त शान्दोर कोरोशी चोमा के लिए हम यही कह सकते हैं! so बुदापैश्त जाकर इन्हें जानना संभव हुआ क्योंकि हंगेरियन इंडोलोजी के इतिहास में कोरोशी चोमा का काम मील का पत्थर माना जाता है.बुदापैश्त ट्रांससिल्वानिया, (अब रोमानिया में) के कोरोश because गाँव में जन्मे चोमा ने अध्ययन के दौरान बहुत सी भाषाओं पर अच्छा अधिकार पाया, इनमें मुख्य थीं- ग्रीक और लैटिन, हिब्रू, फ्रेंच, जर्मन और रोमानियन भी. चोमा ने तुर्की और अरबी भाषा भी सीखी. अपने भारत प्रवास में चोमा ने संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं पर भी अधिकार प्राप्त करने के लिए प्रयास किया.बुदापैश्त एक समय उनकी दिलचस्पी हंगेरियन लोगों के मूल स्थान की खोज में हुई. भाषिक संबंधों के आधार पर इ...
वराहमिहिर का जलान्वेषण विज्ञान आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर

वराहमिहिर का जलान्वेषण विज्ञान आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-24डॉ. मोहन चंद तिवारीभारतीय जलविज्ञान की पिछली पोस्टों में बताया जा चुका है कि वराहमिहिर के भूमिगत जलान्वेषण विज्ञान द्वारा वृक्ष- वनस्पतियों,भूमि के उदर में रहने वाले जीव-जन्तुओं की निशानदेही और भूमिगत शिलाओं या चट्ठानों के लक्षणों और संकेतों के आधार पर भूमिगत जल को कैसे खोजा जा सकता है? आज इस पोस्ट के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया because जा रहा है कि वर्त्तमान विज्ञान और टैक्नौलौजी के इस युग में भी वराहमिहिर के जलवैज्ञानिक सिद्धांत कितने प्रासंगिक और उपयोगी हैं? जिनकी सहायता से आज भी पूरे देश की जलसंकट की समस्या का हल निकाला जा सकता है तथा अकालपीड़ित और सूखाग्रस्त इलाकों में भी हरित क्रांति लाई जा सकती है.जलविज्ञान अब देश विदेश के आधुनिक भूवैज्ञानिकों ने भी वराहमिहिर के इन फार्मूलों की वैज्ञानिक धरातल पर जांच पड़ताल और अनुसंधान का कार्य प्रारम्भ कर द...
‘चलो गांव की ओर’ मुहिम के तहत डॉ. जोशी ने  उत्तरकाशी में लगाया फ्री मेडिकल हैल्थ कैम्प

‘चलो गांव की ओर’ मुहिम के तहत डॉ. जोशी ने  उत्तरकाशी में लगाया फ्री मेडिकल हैल्थ कैम्प

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‘विचार एक नई सोच’ संस्था ने बांटे मास्क और सैनिटाइजर, कोरोना को लेकर किया लोगों को जागरूकहिमांतर ब्‍यूरो, देहरादूनडॉक्‍टर को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है. कुछ लोग इसको साकार करते हुए दिखाई दे रहे हैं. इन्हीं में से एक हैं डॉक्‍टर एसडी जोशी. उत्तराखंड के लोकप्रिय फिजीशियन डॉ. एसडी जोशी किसी पहचान के मोहताज नहीं है. अपने व्यवहार और समर्पण से मरीजों में खासा लोकप्रिय डॉ. जोशी की लोकप्रियता का अंदाजा आप but इस बात से लगा सकते हैं कि जिन-जिन जनपदों में इन्होंने अपने रिटायरमेंट से पहले सेवाएं दे वहां से आज भी मरीज इनकी सलाह लेने या इनको दिखाने के लिये देहरादून स्थित इनके शंकर क्लीनिक में आते हैं. डॉ. जोशी भी किसी को निराश नहीं करते हैं. चिकित्सा सेवा के तमाम संगठनों से जुड़े डॉ. एसडी जोशी प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ के 2 बाद निर्विरोध अध्यक्ष भी रह चुके हैं.उत्तरकाशी में लगाया फ्री...
पर्वतीय जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं उरख्यालि और गंज्यालि

पर्वतीय जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं उरख्यालि और गंज्यालि

साहित्‍य-संस्कृति
विजय कुमार डोभालहमारे पहाड़ी दैनिक-जीवन में भरण-पोषण की पूर्त्ति के लिये हथचक्की (जंदिरि) और ओखली मूस (उरख्यलि-गंज्यालि) से कूटने-पीसने की प्रक्रिया सनातनकाल से चली आ रही है. because यह भी कहा जा सकता है कि ये हमारे पर्वतीय जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं, जिनके बिना जीवन कठिन है.ओखल-मूसल और हथचक्की प्राचीन प्रोद्यौगिकी के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं.पत्थर पहले जब गांव के निकट कोई चक्की नहीं होती थी, तब से ही इनका उपयोग अनाज कूटने-पीसने, तिलहनों से तेल निकालने because तथा छाल-छिलकों से चूर्ण बनाने के लिए किया जाता रहा है. पहाड़ी क्षेत्र में प्रायः सड़क-निर्माण करते समय चट्टानों पर ओखली खुदी हुई मिलती हैं, जो पुरातात्विक सामग्री होने के साथ-साथ सभ्यता के विकास और प्रसार का द्योतक भी हैं. इनसे ऐसा प्रतीत होता है कि कभी यहाँ मानव बस्तियां रही होंगी.पत्थर ओखली (उरख्यालि) का निर्माण butएक म...
बिना पड़ाव (बिसोंण) के नहीं चढ़ा जाए पहाड़

बिना पड़ाव (बिसोंण) के नहीं चढ़ा जाए पहाड़

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—55प्रकाश उप्रेतीपहाड़ में पड़ाव का बड़ा महत्व है. इस बात को हमसे ज्यादा वो समझते थे जिनकी समझ को हम नासमझ मानते हैं. हर रास्ते पर बैठने के लिए कुछ पड़ाव होते थे ताकि पथिक वहाँ  बैठकर सुस्ता सके. दुकान से आने वाले रास्ते से लेकर पानी, घास लाने वाले सभी रास्तों में कुछ जगहें ऐसी बना दी जाती थीं जहां पर थका हुआ इंसान because थोड़ा आराम कर सके. बुबू बताते थे कि जब वो रामनगर से पैदल सामान लेकर आते थे तो 5 दिन लगते और बीच में 12 पड़ाव पड़ते थे. वो इन पड़ावों के अलावा कहीं और नहीं बैठते थे. पत्थर अब हमारा बाजार केदार हो गया है. यह गाँव से चार एक किलोमीटर तो होगा ही. पहले इस बाजार में बड़ी रौनक रहती थी. मिठाई से लेकर किताब, कंचे, राशन, चक्की सभी की दुकानें थीं. सबसे ज्यादा तो चाय और सब्जी की दुकानें होती थीं. शाम के समय तो आस-पास के गांव वालों से पूरा बाजार पट...
अपनी खूबसरती और रहस्यमय के लिए प्रसिद्ध है रूपकुंड

अपनी खूबसरती और रहस्यमय के लिए प्रसिद्ध है रूपकुंड

इतिहास
मुर्दा और कंकाल का कुंड है रूपकुंड झीलऋचा जोशीआइए आज चलते है उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ों में स्थित रहस्यमय झील रूपकुंड तक. हिमालय के ग्लेशियरों के गर्मियों में पिघलने से उत्तराखंड के पहाड़ों में बनने वाली छोटी-सी झील हैं. so यह झील 5029 मीटर (16499 फीट) की ऊचाई पर स्थित हैं, जिसके चारो ओर ऊंचे ऊंचे बर्फ के ग्लेशियर हैं. यहां तक पहुचने का रास्ता बेहद दुर्गम हैं इसलिए यह एडवेंचर ट्रैकिंग करने वालों की पसंदीदा जगह हैं. उत्तराखंडरूपकुंड झील को मुर्दा because और कंकाल का कुंड भी कहा जाता हैं. यह कुंड ना केवल अपनी सुन्दरता बल्कि मुर्दों के कुंड जैसे रहस्यमय इतिहास के लिए भी मशहूर हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार इस कुंड की स्थापना या निर्माण संसार के रचयिता भगवान शिव ने अपनी पत्नी पार्वती (नंदा) के लिए करवाया था.उत्तराखंड यह झील यहां पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित ह...
अपने बच्‍चों को पढ़ाएं नैतिक शिक्षा का पाठ

अपने बच्‍चों को पढ़ाएं नैतिक शिक्षा का पाठ

साहित्‍य-संस्कृति
कैसे बनता है कोई समाज, कौन हैं ये लोग?डॉ. दीपा चौहान राणाबिना किसी व्यक्ति विशेष के किसी समाज का निर्माण नहीं हो सकता है. हम मानव ही सभी समाज की नींव हैं. लेकिन इसी समाज में हमें सामाजिक बुराई देखने को मिलती है, एक से एक घिनौनी कुरीतियां तब से becauseचली आ रही हैं जब से इंसान इस धरती पर पैदा हुआ. कुरीति उसी कुरीति में से एक है बलात्कार! क्या है बलात्कार? so जब किसी के साथ पूरे बल से उसकी मर्जी के बिना उसकी आत्मा, उसके शरीर तथा उसके अंगों को छुआ या नोचा जाए, वो होता है बलात्कार. कुरीति ऐसी भी क्या है कि कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ इतने बल का प्रयोग करता है? उसके साथ इतना दानव जैसा व्यवहार करता है. ये एक संवेदनशील विषय है, जिस पर सिर्फ तभी बातbecause होती है, जब कोई बेटी या महिला इस घटना की शिकार होती है तभी बस बात होती है, उससे पहले कोई बात नहीं?  इसके क्या कारण हो सकते हैं क...
जलाशय निर्माण में वास्तु संरचना और ग्रह-नक्षत्रों की भूमिका

जलाशय निर्माण में वास्तु संरचना और ग्रह-नक्षत्रों की भूमिका

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-23डॉ. मोहन चंद तिवारीहमारे देश के प्राचीन जल वैज्ञानिकों ने because वास्तुशास्त्र की दृष्टि से भी जलाशय निर्माण के सम्बन्ध में विशेष मान्यताएं स्थापित की हैं. हालांकि इस सम्बंध में प्राचीन आचार्यों और वास्तु शास्त्र के विद्वानों के अलग अलग मत और सिद्धांत हैं. मूल अवधारणा यह है कि जिस स्थान पर जल के देवता या जल के सहयोगी देवों का पद या स्थान होता है उसी स्थान पर नौला, कूप, वापी, तालाब आदि जलाशयों का निर्माण शुभ माना गया है.जलविज्ञान जल के सहयोगी देव हैं-पर्जन्य,आपः, so आपवत्स, वरुण, दिति,अदिति, इंद्र, सोम, भल्लाट इत्यादि देवगण. टोडरमल के 'वास्तु सौख्यम्' नामक ग्रंथ  के अनुसार अग्निकोण में यदि जल की स्थापना की जाए तो वह अग्नि भय को देने वाला होगा. दक्षिण में यदि जलाशय हो तो becauseशत्रुभय होता है. नैर्ऋत्य में स्त्री विवाद को उत्पन्न करता है. पश्चिम में स्त...
चकाचौंध से भरी दुनिया में उसके भीतर का अंधेरा

चकाचौंध से भरी दुनिया में उसके भीतर का अंधेरा

पुस्तक-समीक्षा
"पति आमतौर पर सबसे अच्छे प्रेमी तब होते हैं, जब वे अपनी पत्नियों को धोखा दे रहे होते हैं"- मर्लिन मनरोप्रकाश उप्रेतीमर्लिन के इस कथन को पूर्णतः सत्य because नहीं माना जा सकता लेकिन झुठलाया भी नहीं जा सकता है. पितृसत्ता का अभ्यास और स्त्री को भोग की वस्तु समझे जाने वाली मानसिकता की बारीक नस को यह वाक्य पकड़ता है.मर्लिन इस किताब को बहुत पहले 'गोरख पाण्डेय' हॉस्टल के कमरा नम्बर 45 में, पढ़ा था. तब किताब किसी फिल्म की भांति चल रही थी. हर अध्याय क्लाइमेक्स की उत्सुकता को बढ़ा देता था. इधर इसे दोबारा पढ़ा तो पाठ ही बदल गया. किसी भी रचना को समय, काल but और परिस्थितियों से काट कर नहीं देखा जा सकता है. तकरीबन एक दशक बाद जब इस किताब को दोबारा पढ़ा तो स्वाभाविक ही पाठ बदला था. अर्थ की कई छवियाँ और निर्मित हो गई थीं.  "सिर्फ 36 वर्ष की उम्र... और कितना लंबा जीवन! इतना लंबा कि वह उससे थक चली ...