शारीरिक असमर्थता भी नहीं रोक पाई अभिलाषा जोशी की अभिलाषा

Abhilasha Joshi

 

नवदुर्गा विशेष | श्रृंखला  – 5

Ashita Dobhal Navdurga

विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं छोड़ा हौसला, उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला को दी नई पहचान

उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में रची-बसी ऐपण कला केवल एक कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि यहां की परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है। कुमाऊं के घरों की देहरी, पूजा की चौकियों और मांगलिक अवसरों पर बनाई जाने वाली यह लोककला आज घरों की चौखट से निकलकर देश-विदेश में अपनी पहचान बना रही है।

इस पारंपरिक कला को आधुनिक स्वरूप देकर नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाली कलाकारों में एक नाम है हल्द्वानी की अभिलाषा जोशी का। अभिलाषा की कहानी केवल एक सफल उद्यमी और कलाकार की नहीं, बल्कि अदम्य साहस, आत्मविश्वास और संघर्ष की भी है। जीवन में आई एक गंभीर दुर्घटना ने उनकी शारीरिक क्षमताओं को बुरी तरह प्रभावित किया, लेकिन कला के प्रति उनका समर्पण और कुछ नया करने की अभिलाषा कम नहीं हुई।

Abhilasha Joshi

कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत है ऐपण

ऐपण उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की एक प्राचीन लोककला है, जिसका स्वरूप बंगाल की अल्पना, महाराष्ट्र की वारली और बिहार की मधुबनी जैसी पारंपरिक कलाओं से कुछ हद तक मिलता-जुलता है।

इस कला में बिंदुओं, ज्यामितीय आकृतियों, चौकोर चौकियों, महीन रेखाओं और धार्मिक प्रतीकों का विशेष महत्व होता है। स्वस्तिक, लक्ष्मी चरण, बेल-बूटे और अन्य मांगलिक चिह्न इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। परंपरागत रूप से ऐपण बनाने के लिए गेरू यानी लाल मिट्टी से पृष्ठभूमि तैयार की जाती है और उस पर बिस्वार अर्थात पिसे हुए चावल के सफेद घोल से सुंदर आकृतियां उकेरी जाती हैं।

कभी केवल घरों की देहरी और पूजा स्थलों तक सीमित रहने वाली यह लोककला आज साड़ियों, हैंडबैग, नेम प्लेट, दीपकों, लकड़ी के सजावटी उत्पादों और अनेक आधुनिक वस्तुओं पर अपनी छाप छोड़ रही है। इससे न केवल उत्तराखंड की संस्कृति का प्रचार-प्रसार हो रहा है, बल्कि स्थानीय कलाकारों के लिए स्वरोजगार के अवसर भी विकसित हो रहे हैं।

नानी और मां से मिली कला की विरासत

अभिलाषा जोशी का जन्म उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिले के रुद्रपुर में हुआ। उनके पिता का नाम जीवन चंद्र जोशी और माता का नाम सावित्री देवी है। अपने माता-पिता की इकलौती संतान अभिलाषा को बचपन से ही कला और रचनात्मक गतिविधियों में विशेष रुचि थी। घर में होने वाले प्रत्येक शुभ अवसर पर वह अपनी नानी और मां को ऐपण बनाते हुए देखा करती थीं। गेरू की लाल पृष्ठभूमि पर चावल के सफेद घोल से उभरती सुंदर आकृतियां उन्हें आकर्षित करती थीं। धीरे-धीरे यह आकर्षण उनके व्यक्तित्व और जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया।

अभिलाषा का मानना है कि ऐपण केवल किसी संस्थान में सिखाई जाने वाली कला नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली सांस्कृतिक विरासत है। इसे कभी दादी-नानी से, कभी मां-मौसी से तो कभी घर की बड़ी बहनों से सीखा जाता है। उनके अनुसार, पहाड़ के घरों में पली-बढ़ी बेटियों के लिए यह कला किसी औपचारिक शिक्षा से अधिक पारिवारिक संस्कारों का हिस्सा होती है।

Apain Art by Abhilasha Joshi

नौकरी छोड़कर शुरू किया अपना उद्यम

अभिलाषा की प्रारंभिक शिक्षा रुद्रपुर में हुई। इसके बाद उन्होंने हल्द्वानी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और देहरादून से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह बेहतर करियर की तलाश में दिल्ली पहुंचीं और एक एक्सपोर्ट हाउस में नौकरी करने लगीं। हालांकि, नौकरी के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि उनकी रचनात्मक क्षमताओं को वह विस्तार नहीं मिल पा रहा है, जिसकी उन्हें तलाश थी।

आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़कर अपनी कला और संस्कृति को ही उद्यम का आधार बनाने का निर्णय लिया। इसी सोच के साथ उन्होंने ‘पर्वतजन आर्ट’ नाम से अपना उद्यम शुरू किया। शुरुआत में हैंडबैग, नेम प्लेट, दीयों और वुडन क्राफ्ट जैसे उत्पादों पर ऐपण कला के प्रयोग किए। धीरे-धीरे उनके बनाए उत्पाद लोगों को पसंद आने लगे और उनके काम को नई पहचान मिलने लगी।

सिल्क की साड़ियों पर ऐपण ने दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान

अभिलाषा के रचनात्मक प्रयोगों में सबसे अधिक चर्चा सिल्क की साड़ियों पर उकेरी गई ऐपण कला की हुई। पारंपरिक लोक आकृतियों से सजी इन खूबसूरत साड़ियों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इन साड़ियों को देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों में रहने वाले भारतीयों और कला प्रेमियों ने भी सराहा। अभिलाषा के अनुसार, ऑनलाइन माध्यम से उनके उत्पाद कनाडा, फ्रांस और दुबई तक पहुंचे। यह उनके लिए केवल व्यावसायिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण भी था कि उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला आधुनिक फैशन और जीवनशैली का हिस्सा बन सकती है।

अभिलाषा ने ऐपण के माध्यम से परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु बनाने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य विशेष रूप से युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना था, ताकि वे लोककला को केवल अतीत की विरासत न समझें, बल्कि उसे अपने वर्तमान जीवन का भी हिस्सा बनाएं।

तोरण को दिया नया स्वरूप

अभिलाषा के एक अन्य अनूठे प्रयोग ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। यह प्रयोग था पारंपरिक तोरण को नए स्वरूप में प्रस्तुत करना। तोरण भारतीय संस्कृति में शुभता और स्वागत का प्रतीक माना जाता है। घरों, मंदिरों और अन्य भवनों के प्रवेश द्वारों को सजाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

अभिलाषा ने तोरण में ॐ नमः शिवाय, स्वस्तिक, हनुमान जी, भगवान श्रीराम और नीम करौली बाबा से जुड़े धार्मिक प्रतीकों और आकृतियों का समावेश किया। उनके इन प्रयोगों को लोगों ने खूब पसंद किया। इस विचार के पीछे भी एक दिलचस्प अनुभव था। अभिलाषा ने कई वाहनों में लद्दाख और तिब्बत की संस्कृति से जुड़े सजावटी तोरण लटकते देखे थे। तभी उनके मन में विचार आया कि उत्तराखंड की लोककला और भारतीय धार्मिक प्रतीकों को भी इसी प्रकार के उत्पादों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।

सोशल मीडिया के माध्यम से शुरू हुई ‘पर्वतजन आर्ट’ की यात्रा ने धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक उद्यम का रूप ले लिया। अभिलाषा कहती हैं, “मैं पहाड़ी हूं, ऐपण मेरी पहचान है और मेरी संस्कृति ही मेरी पहचान है।”

25 नवंबर 2022 : जब जीवन ने ली कठिन परीक्षा

कला और उद्यम के क्षेत्र में अभिलाषा निरंतर आगे बढ़ रही थीं, लेकिन 25 नवंबर 2022 की सुबह उनके जीवन में एक ऐसी दुर्घटना हुई, जिसने सब कुछ बदलकर रख दिया। इस दुर्घटना के बाद उनके दोनों पैर और बायां हाथ गंभीर रूप से प्रभावित हुए। शरीर के इन हिस्सों में लकवे जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। उनकी शारीरिक क्षमताएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और मानसिक रूप से भी यह समय उनके लिए अत्यंत कठिन था।

चिकित्सकों के अनुसार, उनके पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावनाएं बहुत कम थीं। हालांकि, उन्हें लगातार अभ्यास और फिजियोथेरेपी जारी रखने की सलाह दी गई। एक ऐसी कलाकार, जिसकी पहचान ही हाथों से सुंदर आकृतियां उकेरना थी, उसके लिए हाथ और पैरों की कार्यक्षमता प्रभावित होना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन अभिलाषा ने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी।

अस्पताल के बिस्तर से फिर खड़े होने तक का संघर्ष

कई महीनों तक अस्पताल में उपचार और पुनर्वास की प्रक्रिया से गुजरने के बाद अभिलाषा ने बड़ी कठिनाई से बैसाखियों के सहारे अपने कदम बढ़ाए। वह उस क्षण को अपने जीवन का दूसरा जन्म मानती हैं।

अभिलाषा बताती हैं कि अस्पताल में रहते हुए ही उन्हें महसूस होने लगा था कि जीवन ने उन्हें दोबारा अवसर दिया है। चिकित्सकों और नर्सों के सहयोग के साथ उनकी मां और पति अमित ने इस कठिन दौर में उनका हौसला बनाए रखा। जब उन्होंने महीनों बाद पहली बार घर से बाहर की दुनिया देखी, तो वह अनुभव उनके लिए बेहद भावुक था।

माता-पिता और पति के सहारे उन्होंने धीरे-धीरे चलने का अभ्यास शुरू किया। हर छोटा कदम उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि था। समय के साथ वह अपने दैनिक कार्य भी स्वयं करने का प्रयास करने लगीं। अभिलाषा इस अनुभव की तुलना एक नए जन्म से करती हैं। उनका कहना है कि जब बच्चा जन्म लेता है, तो उसे अपने आसपास की दुनिया का बोध नहीं होता, लेकिन उनका यह दूसरा जन्म ऐसा था, जिसमें वह पूरी तरह सचेत थीं और उन्हें हर काम दोबारा सीखना पड़ रहा था।

जब दोबारा हाथ में थामी पेंसिल

दुर्घटना के बाद अभिलाषा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी अपनी कला की दुनिया में लौटना। लंबे अंतराल के बाद जब उन्होंने पहली बार हाथ में पेंसिल पकड़ी, तो वह अनुभव किसी बच्चे के पहली बार चित्र बनाना सीखने जैसा था। उनकी फिजियोथेरेपिस्ट ने उन्हें लगातार पेंसिल चलाने और हाथों की गतिविधियों का अभ्यास करने की सलाह दी थी।

अभिलाषा ने इस अभ्यास को अपनी रचनात्मकता से जोड़ दिया। शुरुआत में उन्होंने डिजिटल माध्यम पर काम करना शुरू किया और धीरे-धीरे दोबारा चित्रकारी की ओर कदम बढ़ाए। पेंसिल से रेखाएं खींचने का अभ्यास धीरे-धीरे रंगों और आकृतियों में बदलने लगा। उनके भीतर की कलाकार फिर से सक्रिय होने लगी।

आज अभिलाषा ऐपण कला के साथ-साथ पोर्ट्रेट बनाने में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। जिस हाथ से कभी पेंसिल पकड़ना भी कठिन हो गया था, उसी हाथ से दोबारा कला का सृजन करना उनके धैर्य, निरंतर अभ्यास और आत्मविश्वास की बड़ी उपलब्धि है।

परिवार बना सबसे बड़ी ताकत

अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए अभिलाषा अपने माता-पिता के साथ पति अमित को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं। उनका कहना है कि शारीरिक रूप से कमजोर होने पर समाज अक्सर व्यक्ति को उसकी अक्षमता के आधार पर देखने लगता है। कई बार लोग उसकी प्रतिभा, इच्छाशक्ति और संभावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं।

अभिलाषा इस सोच को बदलना चाहती हैं। उनके अनुसार, शारीरिक सीमाएं किसी व्यक्ति की रचनात्मकता, प्रतिभा और सपनों का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकतीं। आवश्यकता है आत्मविश्वास, परिवार के सहयोग और लगातार प्रयास की। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों में भावनात्मक सहयोग और दृढ़ संकल्प व्यक्ति को दोबारा आगे बढ़ने की शक्ति दे सकते हैं।

संघर्ष, स्वावलंबन और संस्कृति की प्रेरक मिसाल

अभिलाषा जोशी की यात्रा कई मायनों में प्रेरणादायक है। उन्होंने पहले अपनी सांस्कृतिक विरासत को स्वरोजगार का माध्यम बनाया, फिर उसे आधुनिक उत्पादों के जरिए देश-विदेश तक पहुंचाया और जब जीवन की सबसे कठिन परीक्षा सामने आई, तब भी अपनी रचनात्मक पहचान को समाप्त नहीं होने दिया।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में लोककला, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक पर्यटन स्वरोजगार की अपार संभावनाएं रखते हैं। यदि पारंपरिक कलाओं को आधुनिक बाजार, तकनीक और डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जाए, तो वे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम बन सकती हैं।

नवदुर्गा सीरीज की पांचवीं कड़ी में अभिलाषा जोशी ऐसी नारीशक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सपनों को जीवित रखा। उनके जीवन का संदेश स्पष्ट है कि शारीरिक चुनौतियां रास्ते को कठिन अवश्य बना सकती हैं, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर अभ्यास और अपनों के सहयोग से जीवन को नई दिशा दी जा सकती है।

अभिलाषा जोशी ने साबित किया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सृजन की अभिलाषा को समाप्त नहीं किया जा सकता।

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