

डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र
सहायक प्रोफेसर
दिल्ली विश्वविद्यालय
किसी राष्ट्र का विकास केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, प्राकृतिक संसाधनों या सैन्य शक्ति से निर्धारित नहीं होता, बल्कि यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वह अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करता है, संघर्षों का समाधान कैसे खोजता है और ज्ञान-विज्ञान को सामाजिक कल्याण से किस सीमा तक जोड़ पाता है। आधुनिक विश्व में संसाधनों की असमान उपलब्धता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आर्थिक विषमता, सामाजिक विभाजन और राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियाँ विकास की दिशा को प्रभावित करती हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत के पूर्व राष्ट्रपति, प्रख्यात वैज्ञानिक और शिक्षाविद् डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन संघर्ष, संसाधन-प्रबंधन, वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता, नैतिक नेतृत्व और सामाजिक समरसता का उदाहरण है।
डॉ. कलाम का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि सीमित आर्थिक संसाधन किसी व्यक्ति की बौद्धिक और सामाजिक प्रगति की अंतिम सीमा नहीं होते। शिक्षा, अनुशासन, वैज्ञानिक जिज्ञासा, संस्थागत सहयोग और दूरदर्शी नेतृत्व के माध्यम से सीमाओं को अवसरों में बदला जा सकता है। उनका जीवन भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम, मिसाइल विकास, रक्षा प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य-संबंधी नवाचार तथा युवा सशक्तीकरण जैसे क्षेत्रों से जुड़ा रहा। वह वर्ष 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति रहे और सार्वजनिक जीवन में अपनी सादगी तथा विद्यार्थियों के साथ संवाद के लिए विशेष रूप से लोकप्रिय हुए। डॉ. कलाम के वैज्ञानिक जीवन और सार्वजनिक सेवा को इसी दृष्टि से समझा जा सकता है। हालांकि उनका जीवन केवल व्यक्तिगत परिश्रम की कहानी नहीं है; यह शिक्षा संस्थानों, वैज्ञानिक समुदायों, सरकारी निवेश, राष्ट्रीय नीतियों, मूल्यों और सामूहिक प्रयासों की भूमिका को भी स्पष्ट करता है।
इसी संदर्भ में उनका 22 नवंबर 2006 को श्री सत्य साईं इंस्टीट्यूट ऑफ हायर लर्निंग के दीक्षांत समारोह में डॉ. कलाम ने भगवद्गीता के माध्यम से विद्यार्थियों को मूल्यों और जीवन के उद्देश्य का संदेश दिया। समाचार रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने पुष्प के उदाहरण से समझाया कि मनुष्य को अपने गुणों का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करना चाहिए और अपने योगदान के बावजूद विनम्र बने रहना चाहिए।
यही संदेश उन्हें भगवद्गीता के इस श्लोक से जोड़ देता है जो उनके जीवन में दिखता भी है :-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ – श्रीमद्भगवद्गीता, 2.47
डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक साधारण मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति समय के साथ कमजोर हो गई थी। बचपन में उन्होंने परिवार की आय में सहायता करने के लिए समाचार-पत्र वितरित किए। इसके बावजूद उनकी शिक्षा के प्रति रुचि बनी रही। उन्होंने भौतिकी का अध्ययन किया और आगे चलकर मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की।

उनका जीवन सामाजिक-आर्थिक संघर्ष और शैक्षिक अवसरों के संबंध को समझने में सहायता करता है। आर्थिक कठिनाइयाँ व्यक्ति की शिक्षा तक पहुँच, अध्ययन के लिए उपलब्ध समय और व्यावसायिक विकल्पों को प्रभावित कर सकती हैं। इसके बावजूद प्रतिभा के विकास के लिए केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं होती; गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, छात्रवृत्ति, प्रशिक्षित शिक्षक, प्रयोगशालाएँ और संस्थागत अवसर भी आवश्यक हैं।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के विद्यार्थी जीवन का एक उल्लेखनीय प्रसंग मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT), चेन्नई में उनके एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के अध्ययन से जुड़ा है। यह घटना उनके अनुशासन, कठिन परिस्थितियों में काम करने की क्षमता, समय-प्रबंधन को दर्शाता है।
कलाम को अपने कुछ सहपाठियों के साथ एक कम ऊँचाई पर आक्रमण करने वाले विमान की डिजाइन तैयार करने की परियोजना सौंपी गई थी। इस परियोजना में विमान की समग्र संरचना और विन्यास तैयार करने की जिम्मेदारी कलाम के पास थी। परियोजना की प्रगति से संस्थान के निदेशक प्रोफेसर के. श्रीनिवासन संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कलाम को चेतावनी दी कि यदि वे अगले तीन दिनों में अपेक्षित डिजाइन प्रस्तुत नहीं कर पाए, तो उनकी छात्रवृत्ति समाप्त की जा सकती है। कलाम के लिए यह चुनौती अत्यंत गंभीर थी, क्योंकि छात्रवृत्ति उनकी पढ़ाई जारी रखने के लिए महत्त्वपूर्ण थी। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर लगातार परिश्रम किया, समय का सदुपयोग किया और निर्धारित समय-सीमा के भीतर डिजाइन तैयार कर दी। जब प्रोफेसर श्रीनिवासन ने उनका काम देखा, तो वे उससे प्रभावित हुए। इस अनुभव ने कलाम को कठिन समय-सीमा के भीतर कार्य पूरा करने, टीम के साथ सहयोग करने और अपनी क्षमता पर विश्वास रखने की सीख दी। इस प्रसंग का वर्णन कलाम के जीवन पर आधारित जीवनी- में मिलता है।
कलाम के विद्यार्थी जीवन का यह प्रसंग बताता है कि प्रतिभा को वास्तविक उपलब्धि में बदलने के लिए परिश्रम, समय-प्रबंधन, मार्गदर्शन और आत्मविश्वास का समन्वय आवश्यक है। यही गुण आगे चलकर उनके वैज्ञानिक जीवन और राष्ट्रीय सेवा में भी उपयोगी सिद्ध हुए।
आज भारतीय संदर्भ में इस अनुभव का महत्त्व इसलिए भी है कि देश में प्रतिभा का वितरण व्यापक है, लेकिन अवसरों का वितरण हमेशा समान नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे नगरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा तथा वैज्ञानिक अनुसंधान तक पहुँचने में अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए कलाम की जीवन-कथा को केवल प्रेरक प्रसंग के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा के लोकतंत्रीकरण और समान अवसरों की आवश्यकता के संदर्भ में भी पढ़ा जाना चाहिए। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है: व्यक्तिगत संघर्ष प्रेरणा देता है, जबकि संस्थागत संसाधन उस प्रेरणा को वास्तविक उपलब्धि में बदलने की क्षमता प्रदान करते हैं इसलिए किसी राष्ट्र की दीर्घकालीन प्रगति के लिए दोनों का संतुलन अनिवार्य है।

संसाधन का अर्थ केवल धन, भूमि, खनिज या प्राकृतिक संपदा नहीं है। आधुनिक विकास-अध्ययन में मानव संसाधन, ज्ञान, तकनीकी क्षमता, अनुसंधान संस्थान, वित्तीय निवेश, सूचना, सामाजिक विश्वास और संगठनात्मक दक्षता को भी संसाधन माना जाता है। डॉ. कलाम के जीवन में इन सभी प्रकार के संसाधनों की भूमिका दिखाई देती है।
उन्होंने अपने वैज्ञानिक जीवन की शुरुआत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) से की और बाद में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से जुड़े। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने वैज्ञानिकों और अभियंताओं के साथ मिलकर भारत के उपग्रह प्रक्षेपण कार्यक्रम में योगदान दिया। जुलाई 1980 में भारत के SLV-3 प्रक्षेपण यान ने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया। यह उपलब्धि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की तकनीकी क्षमता के विकास में महत्त्वपूर्ण थी।
इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक उपलब्धियाँ किसी एक व्यक्ति की प्रतिभा का परिणाम नहीं होतीं। इनके पीछे प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की टीमें, परीक्षण सुविधाएँ, वित्तीय निवेश, तकनीकी ज्ञान, प्रबंधन और दीर्घकालीन संस्थागत प्रतिबद्धता कार्य करती है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए संसाधन-प्रबंधन का प्रश्न विशेष महत्त्व रखता है। सीमित बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, रक्षा और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों के बीच प्राथमिकताएँ तय करनी पड़ती हैं। ऐसे में वैज्ञानिक अनुसंधान पर निवेश को तत्काल लाभ और दीर्घकालीन राष्ट्रीय क्षमता, दोनों के संदर्भ में देखना चाहिए।
डॉ. कलाम ने कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, शिक्षा एवं स्वास्थ्य, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, आधारभूत संरचना तथा महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता को भारत के विकास के लिए परस्पर संबद्ध क्षेत्र माना था। उनका दृष्टिकोण यह था कि इन क्षेत्रों में समन्वित प्रगति से खाद्य, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।
यह विचार समकालीन विकास सिद्धांतों से भी मेल खाता है, जिनमें मानव पूँजी, तकनीकी नवाचार और संस्थागत क्षमता को आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधारों में गिना जाता है। हालांकि संसाधनों की उपलब्धता अपने आप में विकास की गारंटी नहीं है। यदि उनका वितरण असमान हो, प्रबंधन कमजोर हो या तकनीक समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से अलग हो जाए, तो अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होते।
डॉ. कलाम को भारत में मिसाइल प्रौद्योगिकी के विकास के लिए विशेष पहचान मिली। उन्होंने एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (Integrated Guided Missile Development Programme – IGMDP) का नेतृत्व किया। इस कार्यक्रम के अंतर्गत अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइल प्रणालियों के विकास में महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ। वर्ष 1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों में भी उनकी संगठनात्मक, तकनीकी और वैज्ञानिक भूमिका रही।
इसको समझने के लिए उस अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण पर ध्यान देना आवश्यक है जिसमें भारत ने अपनी रक्षा-प्रौद्योगिकी क्षमता विकसित की। शीत युद्ध, महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ और उन्नत प्रौद्योगिकियों पर नियंत्रण की नीतियों ने अनेक देशों को अपनी वैज्ञानिक क्षमता मजबूत करने के लिए प्रेरित किया।
भारत के सामने चुनौती यह थी कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को भी पूरा करे। रक्षा अनुसंधान के लिए पूँजी, प्रशिक्षित मानव संसाधन, परीक्षण केंद्र और दीर्घकालीन सरकारी समर्थन की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, गरीबी उन्मूलन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय लक्ष्य हैं। इस प्रकार रक्षा-प्रौद्योगिकी का विकास संसाधनों के उपयोग से जुड़ा एक जटिल नीतिगत प्रश्न प्रस्तुत करता है। एक ओर, स्वदेशी रक्षा क्षमता बाहरी निर्भरता को कम कर सकती है और तकनीकी कौशल को बढ़ावा दे सकती है। दूसरी ओर, रक्षा व्यय की अवसर-लागत का मूल्यांकन भी आवश्यक है – अर्थात किसी क्षेत्र में खर्च किए गए संसाधनों से दूसरे क्षेत्र में कौन-से अवसर सीमित हो सकते हैं।
इस दृष्टि को किसी एक पक्ष को पूर्णतः सही या गलत घोषित करने के बजाय कई प्रश्नों की जाँच करता है: क्या अनुसंधान का नागरिक उपयोग भी विकसित हो रहा है? क्या रक्षा उत्पादन से घरेलू औद्योगिक क्षमता मजबूत हो रही है? क्या निवेश की लागत और परिणामों का मूल्यांकन किया जा रहा है? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ सामाजिक विकास की प्राथमिकताओं में संतुलन है?

डॉ. कलाम का जीवन वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की आकांक्षा को दर्शाता है, लेकिन उससे प्राप्त व्यापक शिक्षा यह है कि तकनीकी क्षमता का मूल्यांकन उसके सामाजिक, आर्थिक और रणनीतिक परिणामों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक विकास का इतिहास प्रतिस्पर्धा से निर्मित हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा ने रॉकेट विज्ञान, उपग्रह प्रौद्योगिकी, संचार और पृथ्वी-अवलोकन में तेजी से प्रगति को प्रोत्साहित किया। बाद के दशकों में अंतरिक्ष अनुसंधान के अनेक कार्यक्रमों ने वैज्ञानिक सहयोग के नए अवसर भी पैदा किए।
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को इसी व्यापक संदर्भ में समझा जा सकता है। डॉ. कलाम ने 1963 -64 के दौरान अमेरिका के नासा से जुड़े विभिन्न अनुसंधान केंद्रों का दौरा किया था। उनके अनुभवों के साथ भारत की अपनी वैज्ञानिक संस्थाओं, अभियंताओं और नीतिगत प्रयासों ने स्वदेशी प्रक्षेपण क्षमता के विकास में योगदान दिया।
अंतरराष्ट्रीय तुलना से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सभी देशों की परिस्थितियाँ समान हैं। अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और भारत के पास वित्तीय क्षमता, औद्योगिक आधार, राजनीतिक प्राथमिकताओं और अनुसंधान संरचनाओं के अलग-अलग स्तर रहे हैं। इसलिए तकनीकी उपलब्धियों की तुलना करते समय प्रति व्यक्ति आय, अनुसंधान पर सार्वजनिक व्यय, औद्योगिक विकास, शिक्षा व्यवस्था और भू-राजनीतिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
आज जलवायु परिवर्तन, महामारी, खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष मलबे जैसी समस्याएँ राष्ट्रीय सीमाओं से कई बार आगे आ जाती हैं। इनके समाधान के लिए ज्ञान-साझाकरण, वैज्ञानिक संवाद और साझा मानकों की आवश्यकता होती है। वहीं, संवेदनशील प्रौद्योगिकियों, सैन्य उपयोग और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सीमाएँ भी मौजूद हैं। इसलिए वैश्विक वैज्ञानिक व्यवस्था का मूल संघर्ष केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि संसाधनों, ज्ञान और तकनीकी लाभों के वितरण का प्रश्न भी है। विकसित देशों के पास अधिक अनुसंधान निवेश होने से वे कई क्षेत्रों में अग्रणी स्थिति प्राप्त कर सकते हैं; विकासशील देशों के सामने तकनीकी हस्तांतरण, स्थानीय अनुसंधान क्षमता और किफायती नवाचार विकसित करने की चुनौती रहती है।
डॉ. कलाम के अनुभव इस संदर्भ में एक उपयोगी भारतीय उदाहरण हैं:- अंतरराष्ट्रीय ज्ञान से सीखना और साथ ही घरेलू वैज्ञानिक क्षमता विकसित करना एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं हैं। प्रभावी नीति दोनों के बीच रचनात्मक संबंध स्थापित करती है।
डॉ. कलाम के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि तकनीक को केवल औद्योगिक या सैन्य उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने हृदय रोग विशेषज्ञ बी. सोमराजू के साथ मिलकर कम लागत वाले कोरोनरी स्टेंट के विकास में योगदान दिया, जिसे ‘कलाम-राजू स्टेंट’ कहा गया। बाद में दोनों ने ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मियों के उपयोग के लिए ‘कलाम-राजू टैबलेट’ भी विकसित किया। यह उदाहरण तकनीकी नवाचार और सामाजिक आवश्यकता के बीच संबंध को स्पष्ट करते हैं। किसी तकनीक की सफलता केवल उसकी जटिलता या नवीनता से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह किन समस्याओं को हल करती है, कितनी सुलभ है और समाज के कितने वर्गों तक पहुँच सकती है।
किसी राष्ट्र के संसाधनों का उपयोग केवल आर्थिक या तकनीकी परिस्थितियों से निर्धारित नहीं होता; सामाजिक विश्वास, सांस्कृतिक विविधता और राजनीतिक स्थिरता भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामाजिक संघर्षों के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और विकास संबंधी गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं। इसके विपरीत, संवाद और सहयोग की संस्कृति संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता कर सकती है।
डॉ. कलाम का जीवन भारतीय समाज की बहुलतावादी परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनका पालन-पोषण रामेश्वरम में हुआ, जहाँ उनके पिता एक मस्जिद के इमाम थे। कलाम के संस्मरणों के अनुसार, उनके पिता, स्थानीय हिंदू मंदिर के प्रमुख पुजारी और एक चर्च के पादरी आपस में बैठकर सामाजिक विषयों पर चर्चा करते थे। इस अनुभव ने उनके विचारों में अंतरधार्मिक संवाद और पारस्परिक सम्मान के महत्त्व को प्रभावित किया। यह प्रसंग भारतीय समाज में सामाजिक पूँजी की अवधारणा को समझने में सहायक है। सामाजिक पूँजी से आशय उन संबंधों, विश्वासों और सहयोगात्मक नेटवर्क से है, जो व्यक्तियों और संस्थाओं को सामूहिक उद्देश्य प्राप्त करने में मदद करते हैं। जब विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बना रहता है, तब शिक्षा, स्थानीय प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोग की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं।
हालाँकि सामाजिक संघर्षों के कारण केवल धार्मिक या सांस्कृतिक मतभेद नहीं होते। आर्थिक असमानता, संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भूमि संबंधी विवाद और ऐतिहासिक अन्याय भी संघर्षों को जन्म दे सकते हैं। इसलिए संघर्ष-समाधान के लिए सद्भावना के साथ-साथ न्यायपूर्ण संस्थाएँ, पारदर्शी नीतियाँ और संसाधनों तक समान अवसर भी आवश्यक हैं।
इसलिए कलाम की विरासत यह संदेश देती है कि विविधता को संघर्ष का अनिवार्य कारण मानने के बजाय सहयोग की संभावना के रूप में भी देखा जाना चाहिए। इसके लिए सामाजिक न्याय और समान नागरिक अवसरों को संवाद की प्रक्रिया के साथ जोड़ना आवश्यक है।
डॉ. कलाम 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक भारत के राष्ट्रपति रहे। उन्हें व्यापक रूप से ‘जनता के राष्ट्रपति’ के रूप में जाना गया। राष्ट्रपति पद के बाद भी उन्होंने शिक्षण, लेखन और विद्यार्थियों के साथ संवाद के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में योगदान जारी रखा।
उनकी सार्वजनिक छवि सादगी, ज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता और युवाओं के साथ संवाद पर आधारित थी। फिर भी नेतृत्व का अकादमिक मूल्यांकन केवल व्यक्तित्व की लोकप्रियता के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसमें निर्णय-प्रक्रिया, संस्थागत सीमाएँ, सार्वजनिक जवाबदेही, नीतियों के परिणाम और उपलब्ध संसाधनों के उपयोग का परीक्षण भी शामिल होना चाहिए।
सार्वजनिक संस्थाओं में संसाधन सीमित होते हैं। इसलिए नेतृत्व का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व यह निर्धारित करना है कि किन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए, निर्णय किस प्रमाण पर आधारित हों और उनके परिणामों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाए। पारदर्शिता तथा जवाबदेही के अभाव में संसाधनों का दुरुपयोग हो सकता है । इस संदर्भ में डॉ. कलाम की जीवन-दृष्टि से प्रेरणा लेते हुए यह कहा जा सकता है कि नेतृत्व का उद्देश्य केवल उपलब्धियाँ अर्जित करना नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता विकसित करना और भविष्य की पीढ़ियों के लिए अवसरों का विस्तार करना भी है।
डॉ. कलाम ने विद्यार्थियों और युवाओं को भारत के भविष्य की केंद्रीय शक्ति माना। राष्ट्रपति पद से पहले और बाद में उन्होंने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में व्याख्यान दिए तथा युवाओं को विज्ञान, नवाचार और राष्ट्र-निर्माण से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारत को ज्ञान-आधारित विकसित राष्ट्र बनाने की परिकल्पना पर भी बल दिया। युवा जनसंख्या किसी देश के लिए महत्त्वपूर्ण मानव संसाधन हो सकती है, लेकिन जनसांख्यिकीय लाभांश अपने आप प्राप्त नहीं होता। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल-विकास, स्वास्थ्य, रोजगार और अनुसंधान के अवसर आवश्यक हैं। यदि युवाओं को उपयुक्त प्रशिक्षण और रोजगार नहीं मिलता, तो बड़ी युवा आबादी सामाजिक तथा आर्थिक चुनौतियों का कारण भी बन सकती है।
भारत में डिजिटल शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। इन क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए केवल तकनीकी उपकरण पर्याप्त नहीं हैं। विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक पद्धति, समस्या-समाधान, नैतिक विवेक और संचार कौशल विकसित करना भी आवश्यक है।
डॉ. कलाम का विज्ञान और तकनीक के माध्यम से जीवन की गुणवत्ता सुधारने का दृष्टिकोण सतत विकास की बहस से जुड़ता है। उनकी वैज्ञानिक दृष्टि से प्रेरणा लेते हुए यह आवश्यक है कि तकनीकी प्रगति को पर्यावरणीय संरक्षण, सामाजिक न्याय और दीर्घकालीन मानवीय कल्याण के साथ समन्वित किया जाए।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन भारतीय समाज में संघर्ष, शिक्षा, वैज्ञानिक नवाचार और सार्वजनिक सेवा के संबंधों को समझने का एक उपयोगी आधार प्रदान करता है। साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से निकलकर वैज्ञानिक संस्थानों में नेतृत्व तक पहुँचना उनकी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता और परिश्रम को दर्शाता है। वहीं, अंतरिक्ष कार्यक्रम, मिसाइल विकास तथा चिकित्सा-संबंधी नवाचारों में उनकी भूमिका यह भी स्पष्ट करती है कि वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए संस्थागत सहयोग, सार्वजनिक निवेश, तकनीकी प्रशिक्षण और सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
उनके जीवन से तीन प्रमुख निष्कर्ष प्राप्त होते हैं:- पहला, शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान को राष्ट्रीय विकास की केंद्रीय प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। दूसरा, संसाधनों का उपयोग केवल तकनीकी उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए भी किया जाना चाहिए। तीसरा, विविधतापूर्ण समाज में संवाद, सामाजिक विश्वास और न्यायपूर्ण अवसर विकास की स्थिरता के लिए आवश्यक हैं।
अंततः, संघर्ष को विकास की अनिवार्य नियति मानने के बजाय उसके कारणों को समझना और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना अधिक महत्त्वपूर्ण है। डॉ. कलाम का व्यापक संदेश यही है कि ज्ञान को क्षमता में, क्षमता को नवाचार में और नवाचार को लोककल्याण में बदलने के लिए व्यक्तिगत परिश्रम के साथ संस्थागत उत्तरदायित्व भी आवश्यक है।
जो भारतीय दर्शन में भी इस प्रकार देखा जा सकता है :-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
