Tag: लोकसंस्कृति

भगवान तुंगनाथ की लोकपरंपरा की ध्वजवाहक पुष्पा देवी

भगवान तुंगनाथ की लोकपरंपरा की ध्वजवाहक पुष्पा देवी

अभिनव पहल
  नवदुर्गा विशेष | श्रृंखला  - 2 लोकसंस्कृति की ध्वजवाहक पुष्पा देवी तीन दशकों से लोकगायन, आस्था और प्रकृति से जुड़ी परंपराओं को सहेज रही हैं लोकगायिका पुष्पा देवीउत्तराखंड की लोकसंस्कृति केवल गीतों और संगीत तक सीमित नहीं है। यह यहां के लोगों के जीवन, आस्था, प्रकृति, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों की जीवंत अभिव्यक्ति है। यहां के लोकगीतों में पहाड़ों की पीड़ा भी सुनाई देती है और देवभूमि की आध्यात्मिक चेतना भी। इन्हीं परंपराओं को अपनी आवाज के माध्यम से जीवंत बनाए रखने वाली लोकगायिका हैं पुष्पा देवी, जो रुद्रप्रयाग जनपद के ऊखीमठ विकासखंड की जगपुड़ा ग्रामसभा की निवासी हैं। पुष्पा देवी और उनके साथी पिछले लगभग तीन दशकों से देवताओं के जागर गायन और प्रस्थान गीतों की परंपरा से जुड़े हुए हैं। उनका गायन केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि लोकविश्वास, आध्यात्मिक अनुभूति और हिमालयी जनजीवन का ऐ...
माँ नंदा देवी राजजात: उत्तराखंड की बेटी की कैलाश यात्रा और सदियों पुरानी परंपरा

माँ नंदा देवी राजजात: उत्तराखंड की बेटी की कैलाश यात्रा और सदियों पुरानी परंपरा

लोक पर्व-त्योहार
 डॉ. प्रवेश कुमार जा मेरी लाड़ली नंदा ते ऊँचा कैलाश। ना-ना बाबा, मैं नी जानदू ते ऊँचा कैलाश।। इस गीत की पंक्तियों के साथ माँ नंदा देवी की यात्रा शुरू हो जाती है। हमारी भारत भूमि अपनी विविधता और उसमें विद्यमान एकता के लिए विश्व में पहचानी जाती है। इस विविधता को हम एक उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसी प्रकार हमारे पहाड़ों में हर चोटी पर एक देवता और उसे पूजने वाले भक्त हमें मिल जाते हैं। इस लेख में मैंने उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में रची-बसी माँ नंदा देवी लोकजात और राजजात पर चर्चा की है। अभी पिछले दिनों यह यात्रा (लोकजात) प्रत्येक वर्ष की भाँति प्रारंभ हुई, हालाँकि लोकजात तो प्रत्येक वर्ष होती है। लेकिन पहले तो यह सुनने में आया कि इस बार लोकजात के साथ राजजात भी होगी। फिलहाल इस पर स्थानीय लोगों में कुछ संशय बना, लेकिन फिर भी चौसिंघा खाड़ू के साथ 5 सितंबर को यह यात्रा प्रारंभ हो गई।...
‘रवांई के लोकगीत’ का लोकार्पण: रवांई क्षेत्र की लोकसंस्कृति और लोकधरोहर का महत्वपूर्ण दस्तावेज़

‘रवांई के लोकगीत’ का लोकार्पण: रवांई क्षेत्र की लोकसंस्कृति और लोकधरोहर का महत्वपूर्ण दस्तावेज़

पुस्तक-समीक्षा
  पुस्तक समीक्षाजबर सिंह रावत 'सरनोली' माँ रेणुका मेले के शुभ अवसर पर 5 जून 2026 को ग्राम सरनौल में लोकसंस्कृति और लोकसाहित्य के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण आयोजन सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर लोकसंस्कृति शोधकर्ता एवं लेखक ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ की नवीन पुस्तक ‘रवांई के लोकगीत’ का भव्य लोकार्पण किया गया। यह आयोजन केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रवांई क्षेत्र की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत, लोकगीतों, लोक कलाकारों और परंपराओं के सामूहिक सम्मान का उत्सव बन गया। इस कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि पुस्तक का लोकार्पण उसी विद्यालय में सम्पन्न हुआ जहाँ लेखक ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी। लेखक के लिए यह अवसर भावनात्मक और स्मरणीय था, क्योंकि जिस स्थान पर कभी उन्होंने अपने सहपाठियों के साथ बैठकर भविष्य के सपने देखे थे, उसी भूमि पर उनकी वर्षों की साधना का परिण...
बिखोत पर्व पर भिलंगना घाटी में नवोदित प्रतिभाओं ने बिखेरे लोकसंस्कृति के रंग

बिखोत पर्व पर भिलंगना घाटी में नवोदित प्रतिभाओं ने बिखेरे लोकसंस्कृति के रंग

टिहरी गढ़वाल
हिमांतर ब्यूरो, भिलंगना (टिहरी गढ़वाल)भगवान श्री रघुनाथ जी के प्रांगण और भृगु गंगा के सुरम्य तट पर स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी जी की कर्मभूमि इस बार बिखोत पर्व पर लोकसंस्कृति और नवोदित प्रतिभाओं की अभिव्यक्ति की साक्षी बनी. राजेन्द्र सिंह चौहान के निर्देशन में गढ़भूमि सांस्कृतिक एवं नाट्य कला मंच के शुभारंभ की यह बेला उपस्थित अतिथियों, भिलंगना घाटी के स्थानीय अभिभावकों और आयोजकों के लिए मानों एक अकल्पनीय उपलब्धि थी. राइजिंग सन पब्लिक स्कूल घुत्तू के नन्हे मुन्ने कलाकार यूं तो पहले ही दिल्ली में उत्तरायणी के राष्ट्रीय मंच पर राजेन्द्र सिंह चौहान के निर्देशन में माधो सिंह भंडारी की शानदार प्रस्तुति दे चुके थे, उसके बाद भिलंगना क्षेत्र विकास समिति के स्थापना दिवस पर जीतू बगडवाल नाटिका प्रस्तुत की थी, जिसकी बहुत चर्चा और तारीफ हुईं. इन उदीयमान कलाकारों अद्वितीय अभिनय से जीतू बगडवाल नाटिका को ...
पहाड़ की लोकसंस्कृति को पहचान दी लोक गायक हीरासिंह राणा ने

पहाड़ की लोकसंस्कृति को पहचान दी लोक गायक हीरासिंह राणा ने

समसामयिक
डॉ. मोहन चन्द तिवारीबहुत ही दुःख की बात है कि कोरोना काल के इस कठिन दौर में "लस्का कमर बांध, हिम्मत का साथ फिर भोल उज्याई होलि, कां ले रोलि रात"- जैसे अपने ऊर्जा भरे बोलों से जन जन को कमर कस के हिम्मत जुटाने का साहस बटोरने और रात के अंधेरे को भगाकर उजाले की ओर जाने की प्रेरणा देने वाले उत्तराखंड लोक गायिकी के पितामह, लोक-संगीत के पुरोधा तथा गढ़वाली कुमाऊंनी और जौनसारी अकादमी,दिल्ली सरकार के उपाध्यक्ष श्री हीरा सिंह राणा जी अब हमारे बीच नहीं रहे.'हिरदा कुमाऊनी' के नाम से पुकारे जाने वाले हीरा सिंह राणा जी का जन्म 16 सितंबर 1942 को उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल के ग्राम-मानिला डंढ़ोली, जिला अल्मोड़ा में हुआ.उनकी माताजी का नाम नारंगी देवी और पिताजी का नाम मोहन सिंह राणा था.लोकगायकी की पहचान बने राणा जी का अचानक चला जाना उत्तराखण्डी समाज के लिए बहुत दुःखद है और पर्वतीय लोक संगीत के ल...