Month: June 2020

पाताल भुवनेश्वर : पृथ्वी के आदि और अंत का चित्रण 

पाताल भुवनेश्वर : पृथ्वी के आदि और अंत का चित्रण 

धर्मस्थल
ऋचा जोशीधरती पर एक जगह ऐसी भी है जहां एक ही स्थान पर पूरी सृष्टि के दर्शन होते हैं. सृष्टि की रचना से लेकर कलयुग का अंत कब और कैसे होगा इसका पूरा वर्णन यहां पर है. आइए आज आपको ऐसी जगह ले चलती हूं. बात हो रही है भारत के उत्तरी राज्य उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर की.पाताल भुवनेश्वर दरअसल एक प्राचीन और रहस्यमयी गुफा है जो अपने आप में एक रहस्यमयी दुनिया को समेटे हुए है.  ये गुफा विशालकाय पहाड़ी के करीब 90 फिट अंदर है.पाताल भुवनेश्वर दरअसल एक प्राचीन और रहस्यमयी गुफा है जो अपने आप में एक रहस्यमयी दुनिया को समेटे हुए है.  ये गुफा विशालकाय पहाड़ी के करीब 90 फिट अंदर है. 90 फिट नीचे गुफा में उतरने के लिए चट्टानों के बीच संकरे टेढ़ी मेढ़े रास्ते से ढलान पर उतरना पड़ता है. देखने पर गुफा में उतरना नामुमकिन सा लगता है लेकिन गुफा में उतरने पर शरीर खुद ब खुद गुफा क...
जावेद साहब कंगना को घर बुलाकर हड़काना सहिष्णुता है क्या?

जावेद साहब कंगना को घर बुलाकर हड़काना सहिष्णुता है क्या?

सोशल-मीडिया
ललित फुलाराजावेद साहब पिछले छह साल से भड़क रहे हैं. कभी टीवी पर, तो कभी मंचों पर, लेकिन मुझे उनका यह भड़कना अभी तक इतना ख़राब नहीं लगता था, पर जब से कंगना पर भड़कने की ख़बर सुनी है, तब से जावेद साहब की बौद्धिकता और उदारता से रश्क होने लगा है. कथित गढ़ी गई असहिष्णुता पर भड़कते हुए पुरस्कार लौटाने वालों के पक्ष में गोलबंदी करने वाले जावेद साहब को देश के प्रधानमंत्री के हर भाव-भंगीमा, साक्षात्कार, ओबामा से दोस्ती और यहां तक की सोने के घंटों पर अजीब-सी शक्ल बनाते हुए भड़कते और उपहास उड़ाते हुए तो देखा था, लेकिन एक स्त्री को घर बुलाकर माफी मांगने के लिए उस पर भड़कते/ धमकाते हुए सुना, तो कलेजा गुस्से से भर उठा.इतना महान कवि और गीतकार एक स्त्री को अपने घर बुलाकर कैसे हड़का सकता है? माफी मांगने के लिए दबाव बनाने का प्रयास कर सकता है. यहां तक कहता है कि अगर कंगना ने राकेश रोशन और उनके परि...
जलविज्ञान के आविष्कर्ता ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ और उनके जलचिकित्सा मंत्र

जलविज्ञान के आविष्कर्ता ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ और उनके जलचिकित्सा मंत्र

साहित्‍य-संस्कृति
भारत की जल संस्कृति-5डॉ. मोहन चन्द तिवारीविश्व की प्राचीनतम सभ्यता वैदिक सभ्यता का उद्भव व विकास सिन्धु-सरस्वती और गंगा-यमुना की नदी-घाटियों में हुआ. इसी लिए इस संस्कृति को 'नदीमातृक संस्कृति' के रूप में जाना जाता है.ऋग्वेद के मंत्रों में यह प्रार्थना की गई है कि ये मातृतुल्य नदियां लोगों को मधु और घृत के समान पुष्टिवर्धक जल प्रदान करें- “सरस्वती सरयुः सिन्धुरुर्मिभिर्महो महीरवसाना यन्तु वक्षणीः. देवीरापो मातरः सूदमित्न्वो घृत्वत्पयो मधुमन्नो अर्चत..”             - ऋ.,10.64.9 वैदिक कालीन भारतजनों ने ही सरस्वती नदी के तटों पर यज्ञ करते हुए इस ब्रह्म देश को सर्वप्रथम 'भारत' नाम प्रदान किया था जैसा कि ऋग्वेद के इस मन्त्र से स्पष्ट है- "विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्."                           -ऋग्वेद,3.53.12 सरस्वती नदी के तटों पर रची बसी भारत जनों की इस सभ्यता...
पेंटिंग की वैश्विक प्रदर्शनी में उत्तराखंड के तीन कलाकारों ने किया प्रतिनिधित्व

पेंटिंग की वैश्विक प्रदर्शनी में उत्तराखंड के तीन कलाकारों ने किया प्रतिनिधित्व

समसामयिक
हिमाँतर डेस्‍कउत्तराखंड के राजेश चंद्र की चित्रकला इनदिनों सुर्खियां बंटोर रही है. हाल ही में विश्व स्तर पर हुई एक प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग को खूब सराहा गया है. इस पेंटिंग में राजेश ने समुद्र बचाओ का संदेश दिया था. राजेश 24 साल के हैं और उनकी पेंटिंग्स को नमामि गंगे व जल शक्ति मंत्रालय भी सराह चुका है. राजेश की पेंटिंग की प्रदर्शनी यूनाइटेड नेशन वर्ल्ड ओसन डे ऑर्गनाइजेशन के वैश्विक स्तर पर हुए 'समुद्र बचाओ प्रदर्शनी'  में लगी थी. इस कार्यक्रम में उनके साथ ही विश्वभर के कई कलाकारों ने समुद्र बचाओ का संदेश दिया. राजेश के साथ ही इस प्रदर्शनी में उनके दो बाल कलाकारों शिवांश और मानव थापा की पेंटिंग भी प्रदर्शित की गई. इस वैश्विक प्रदर्शनी में भारत की तरफ से उत्तराखंड के तीन कलाकारों ने प्रतिनिधित्व किया.शिवांश ग्यारह और मानव महज सात साल के हैं जिनकी पेंटिंग इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित ...
टिहरी रियासत के विरुद्ध जन-संघर्षों का अग्रणी व्यक्तित्व

टिहरी रियासत के विरुद्ध जन-संघर्षों का अग्रणी व्यक्तित्व

उत्तराखंड हलचल
दादा दौलतराम खुगशाल (मार्च, 1891- 3 फरवरी, 1960)डॉ. अरुण कुकसाल‘‘आज तक राजा ने हमको पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं दिया जिससे हम बायां अंगूठा लगाने को मजबूऱ हैं, लेकिन अब अगर राजा के कर्मचारी ‘कर’ आदि वसूलने आयें तो हमें उन्हें अपना दायां अंगूठा दिखाना चाहिए और हम दिखायेंगे भी.’’                                                                                                                                    - दादा दौलतराम खुगशाल प्रजामंडल के टिहरी सम्मेलन (25-27 मई, 1947) में दादा दौलतराम ने अपने भाषण में उक्त वक्तव्य देकर राजशाही को खुली चुनौती दे थी. टिहरी रियासत के विरुद्ध हुये निर्णायक आंदोलनों में 3 नाम प्रमुख रूप में सामने आते हैं. अमर शहीद श्रीदेव सुमन, दादा दौलतराम खुगशाल और नागेन्द्र सकलानी. श्रीदेव सुमन टिहरी रियासत के आत्याचारों के खिलाफ स्थानीय जनता की आवाज को देश के राष...
पूर्वजों की आस्था का केन्द्र : कटारमल सूर्य मंदिर

पूर्वजों की आस्था का केन्द्र : कटारमल सूर्य मंदिर

धर्मस्थल
शशि मोहन रावत ‘रवांल्‍टा’जैसा कि हम सभी जानते हैं कि कोणार्क का सूर्य मंदिर अपनी बेजोड़ वास्तुकला के लिए भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है. भारत के ओड़िसा राज्य में स्थित यह पहला सूर्य मंदिर है जिसे भगवान सूर्य की आस्था का प्रतीक माना जाता है. ऐसा ही एक दूसरा सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के कुमांऊ मण्डल के अल्मोड़ा जिले के कटारमल गांव में है. यह मंदिर 800 वर्ष पुराना एवं अल्मोड़ा नगर से लगभग 17 किमी की दूरी पर पश्चिम की ओर स्थित उत्तराखण्ड शैली का है. अल्मोड़ा-कौसानी मोटर मार्ग पर कोसी से ऊपर की ओर कटारमल गांव में यह मंदिर स्थित है.महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस मन्दिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उनका मानना है कि यहाँ पर समस्त हिमालय के देवतागण एकत्र होकर पूजा-अर्चना करते रहे हैं. उन्होंने यहाँ की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों एवं कला की प्रशंसा की है. यह मंदिर...
सौण कम न भादौ

सौण कम न भादौ

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—24प्रकाश उप्रेतीआज बात- बरसात, रात, सूखा, 'गोल्देराणी' पूजना और पहाड़ की. पहाड़ में बरसात के दिन किसी आफ़त से और रातें आपदा से कम नहीं होती थीं. चौमास में 'झड़' (कई दिनों तक लगातार बारिश का होना) पड़ जाते थे तो वहीं बे-मौसम बारिश सबकुछ बहा ले जाती थी. ईजा कहती थीं कि- "सौण कम न भादौ". बारिश होना, न होना दोनों पहाड़ की नियति में है और दोनों के अपने उपाय भी... ईजा बारिश के दिनों में परेशान हो जाती थीं. एक तो 'गुठ्यार में कच्यार' (गाय-भैंस को बांधने वाली जगह में कीचड़) और दूसरा 'भ्योव' (जंगल) 'खसखस' (फिसलन भरे) हो जाते थे. दिनभर घर पर बैठना भी ईजा को ठीक नहीं लगता था. हम सब तो अंगीठी में 'मुन' (पेड़ों की जड़) लगाकर आग 'तापते' रहते थे. आग से फुर्सत मिलते ही रजाई ओढ़ के बैठ जाते और कुछ न कुछ खेलना या अम्मा से किस्से सुनते रहते थे. ईजा कभी भैंस, कभी पानी, कभी ...
वीरान होती छानियां

वीरान होती छानियां

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालडांडा छानी (गौशाला)- पहाड़ों में हर मौसम के अनुसार और खेती-बाड़ी के अनुसार लोगों ने छानियां बनाई हुई रहती थी जिससे उन्हें अपनी खेती—बाड़ी के काम और चारा—पत्ती लाने में किसी भी तरह की परेशानियों का सामना न करना पड़े, इससे उनका समय भी बचता था और समय पर उनका काम भी निपटता था. उनकी समय सीमा भी निर्धारित रहती थी कि किस समय और किस मौसम में वो कौन—सी जगह की छानी में उनको रहने जाना है, उस हिसाब से फसल बोना और अपनी जरूरत का सामान जुटाकर जाना होता था. मार्च माह के मध्य में मैं और मेरे साथ मेरे गांव के दो चार लोग हम बुरांश लेने अपने गांव की डांडा छानी गए बल्कि जाना तो उससे भी ऊपर था और गए भी. सच कहूं तो बुरांश लेने जाना तो एक बहाना था मुझे तो उन छानियों को देखना था, जो कभी पशुओं और इंसानों से गुलजार हुआ करती थी, आज वो बिल्कुल निर्जन जंगल भी कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. छानियां बिल्क...
जबही महाराजा देस में आए …

जबही महाराजा देस में आए …

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—12रेखा उप्रेती“बारात आ गयी !!” यह वाक्य हमारे भीतर वैसा ही उत्साह जगाता जैसे ओलंपिक्स में स्वर्ण-पदक जीतने की सूचना … उत्साह का बीज तो किसी बुआ या दीदी का ‘ब्याह ठहरते’ ही अँखुआ जाता. घर की लिपाई-पुताई, ऐपण, रंग्वाली पिछौड़, सुआल-पथाई, धुलिअर्घ की चौकी जैसे कई काज घर और गाँव की महिलाओं की हका-हाक लगाए रखते और हम बच्चों के लिए ‘कौतिक’ जैसा माहौल बनाते… हमारे हिस्से कुछ काम आते, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण था- ओलंपिक की मशाल लेकर भागने जैसा गौरव-पूर्ण दायित्व-गाँव-भर में सबको न्यूतना…किस घर को कैसे न्यौतना है यह अच्छी तरह समझना होता. लड़की वाले की हैसियत के हिसाब से न्यौते का स्वरूप अलग-अलग होता. बड़ा गाँव था हमारा… ऐसा कम ही होता कि लड़की की शादी में पूरे गाँव को “च्युल-न्यूत” मिले.यूँ तो लड़की चाहे किसी घर की हो, उसके विदा होने तक सारा गाँव एक परिवार...
माँ तुम झूठी हो!

माँ तुम झूठी हो!

आधी आबादी
डॉक्टर दीपशिखा जोशीमाँ तुम ने विदाई के समय गले लगा बोला था, जा बिटिया वहाँ तुझे मिलेगी दूसरी माँ. मुझ में और उन में कभी अंतर ना करना. जा बिट्टो तुझे कभी ना खलेगी मेरी कमी, ना आएगी याद! कुछ समय लगेगा ज़रूर, मगर तू निभा लेगी मुझे पता है. मैं भी एक दिन ऐसे ही आयी थी तेरी नानी के घर से. यही रिवाज है बिटिया! हमेशा ख़ुश रहना कह तूने अपने आंसू पोंछे थे. मुझे तो रोना आया ही नहीं माँ उस दिन. मुझे लगा तू सच बोलती होगी! मैं तो ख़ुशी-ख़ुशी तेरे दिखाए सपने देख हवा में उड़ी जा रही थी. जैसे तू मुझे हमेशा परियों की कहानियां सुनाती, जैसे दिखाती थी मंगल ग्रह पर कैसे होता होगा जीवन, बताती थी बहुत काल्पनिक किस्से मुझे प्रेरणा देने को. माँ मैंने सब सच माना. तेरी हर सीख मेरे जीवन के उसूल बन गयी. तू मेरी माँ, बहन, सहेली सबकुछ थी! जब तक थी मैं तेरे आँचल के नीचे मुझे कभी ज़िम्मेदारियों, समस्याओं, डर और वास्तव...