November 1, 2020
समसामयिक

कौन कह रहा है फैज़ साहब नास्तिक हैं? 

  • ललित फुलारा

फैज़ साहब की मरहूम आत्मा अगर ये सब देख रही होगी तो जरूर सोच रही होगी कि मैं जब नास्तिक था और मार्क्सवादी था तो ‘अल्लाह’ काहे लिख दिया। अल्लाह लिखने से ही तो सारा खेल बिगड़ा है। मुझसे कोई कह रहा था कि इस शायरी/गाने को गुनगुनाने वाले लोग बस ‘नाम रहेगा अल्लाह का’ इसी वाक्य पर जोर देते हैं, खूब ताली पिटते हैं, आगे के ग्यारह शब्द बोलते ही नहीं है। बोलते भी हैं तो बेहद धीमी आवाज में ताकि उनका असल अर्थ समझ में न आए।

शायर, लेखक, साहित्यकार और दार्शनिक तो होते ही बुद्धि से चालाक हैं, उनके लिए रचनात्मकता ही सबकुछ है, रचे गए शब्द। अर्थ आप अपने हिसाब से निकालिए, बुत को शासक का बुत बताइए या फिर… मंदिर की मूर्ति।

अब बताइए जब बस नाम रहेगा अल्लाह का तो हमारा ईश्वर कहां जाएंगा? उनकी बात भी सही है। क्योंकि वो भी ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ से खफा है, उसी तरह जैसे एक कट्टर मुस्लिम मित्र खुश हैं कि ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’। जब बस अल्लाह का नाम रहेगा तो यह बात तो उसी तरह हिंदू विरोधी है जैसे सिर्फ नाम रहेगा ईश्वर का कहने से मुस्लिम विरोधी।

अब ये जो खफा हैं, और जो खुश हैं, वो बुद्धिजीवी कहां हैं!

जो नास्तिक हैं, बुद्धिजीवी हैं, उनके लिए तो न अल्लाह है और न ही ईश्वर है। जो आस्तिक हैं उनके लिए अल्लाह और ईश्वर दोनों अलग है। और शायर, लेखक, साहित्यकार और दार्शनिक तो होते ही बुद्धि से चालाक हैं, उनके लिए रचनात्मकता ही सबकुछ है, रचे गए शब्द। अर्थ आप अपने हिसाब से निकालिए, बुत को शासक का बुत बताइए या फिर… मंदिर की मूर्ति।

खैर फै़ज साहब अगर पाकिस्तान नहीं गए होते तो….

अब आगे की पूरी बात दार्शनिक है, उस असीम शक्ति का नाम रहेगा जो आस्तिकों के लिए हाजिर है और नास्तिकों के लिए गायब है। जो भीतर भी है और जो बाहर भी है। फै़ज साहब अद्वैत के गहरे अध्येता रहे होंगे तभी तो यह दार्शनिक भाव उनके भीतर आया। मुझे लगता है वो बाहरी तौर पर नास्तिक रहे होंगे, भीतरी तौर पर वो अल्लाह के प्रति उतने ही आस्तिक होंगे, जितने आस्तिक भारत के बुद्धिजीवी भगवान के प्रति है।

भगवान और अल्लाह का तात्पर्य यहां शब्द से है। सनातन में तो शब्द ही ईश्वर है। शब्द: स ईश्वर। ओह्मकार है।

दृश्य और दृष्टा दोनों ही ईश्वर है। जो जीव के भीतर है।

अद्वैत की इतनी खूबसूरत व्याख्या। कौन कह रहा है फै़ज साहब नास्तिक हैं। वो सत्ताओं के प्रति नास्तिक रहे होंगे अल्लाह के प्रति वो आस्तिक थे। दृष्ट और दृष्टा की व्याख्या सनातनी है, जीवन और ब्रब्म की व्याख्या भी सनातनी है। इसलिए बस नाम रहेगा ईश्वर का जो बुद्धिजीवियों और वामपंथियों के जुंबा से गायब है, दिल के भीतर बसा हुआ है।

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र (दृश्य) भी है नाज़िर (दृष्टा) भी
उठेगा अन-अल-हक़ (मैं ही सत्य हूं) का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा (आम जनता)
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

मेरे प्रभु राम…

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