October 30, 2020
अभिनव पहल इतिहास उत्तराखंड

उत्तराखंड औद्योगिक भांग की खेती आधारित स्वरोजगार का इतिहास 210 वर्ष पुराना

औद्योगिक भांग की खेती को लेकर विभागों एवं एजेंसियों में तालमेल का अभाव

  • जे.पी. मैठाणी

उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य है जहां औद्योगिक भांग के व्यावसायिक खेती का लाइसेंस इसके कॉस्मेटिक एवं औषधिय उपयोग के लिए दिया जाने लगा है, लेकिन दूसरी तरफ औद्योगिक भांग के लो टीचीएसी (टेट्रा हाइड्रा कैनाबिनोल) वाले बीज कहां से मिलेंगे इसके बारे में कोई जानकारी स्पष्ट नहीं है।

पर्वतीय क्षेत्रों में 1910 से पूर्व अंग्रेजों के जमाने से अल्मोड़ा और गढ़वाल जिलों (वर्तमान का पौड़ी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़) में रेशे और मसाले के लिए भांग की व्यावसायिक खेती की अनुमति का प्रावधान कानून में है।

हालांकि राज्य में विभिन्न एजेंसियां भांग की व्यावसायिक खेती शुरू करने की बात पिछले दो वर्ष कर रही हैं, लेकिन उत्तराखंड में लो टीचीएससी का बीज किसी एजेंसी के पास आम पहाड़ी किसानों के लिए जब उपलब्ध ही नहीं है तो इससे स्पष्ट होता है कि सरकार ने अपने कृषि विश्वविद्यालय, शोध संस्थानों जैसे एनबीपीजीआर, राज्य जैव विविधता बोर्ड, आबकारी विभाग, भरस्सार कृषि विश्वविद्यालय, जीबी पंत कृषि एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय को स्थानीय लो टीएचसी के बीच विकसित करने के लिए धरातर पर कोई कार्य नहीं किया है।

उर्गम घाटी में भांग उत्पादन का अध्ययन करते हुए लेखक

राज्य में पौड़ी जनपद में और जीबी पंत इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन एनवायरनमेंट डेवेलपमेंट कोसी कटारमल्ल में दो एजेंसियां अभी प्रारंभिक अवस्था में प्रयोग कर रही हैं। इनको सिर्फ वैज्ञानिक खेती हेतु लाइसेंस मिला है। उत्तराखंड राज्य में उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद, उद्योग विभाग, उत्तराखंड हैंडी क्राफ्ट एवं हैंडलूम डेवेलपमेंट काउंसिल भी रेशा प्राकृतिक आधारित स्वरोजगार विकसित करने के लिए राज्य के कुछ सामाजिक संगठनों और स्टॉर्टअप प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन योजना/नीतिगत समन्वय का अभाव है।

पुरातन समय में जब जूते, चप्पलों का प्रचलन नहीं था, तब भेड़-बकरी पालक और तिब्बत के साथ व्यापार करने वाले लोग भेड़-बकरी की खाल से बने जूतों के बाहर भांग की रस्सी से बुने गये छपेल का प्रयोग करते थे। ऐसे जूते पांव को गर्म तो रखते ही थे साथ ही बर्फ में फिसलने से रोकते थे।

विगत वर्ष सूबे में प्राकृतिक रेशे की खेती के प्रोत्साहन और कृषिकरण में सरकार सहयोग करेगी। यहीं नहीं जनपद स्तर पर प्रकृतिक रेशो जैसे- डांस कंडाली, भीमल, सन, भाबड़ घास और भांग के रेशों की खरीद के लिए पहाड़ी जनपदों में क्लस्टर स्तर पर कलेक्शन सेंटर बनेंगे। उत्तराखंड के समस्त प्रकार के रेशों की खरीद के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करेगी, इसके लिए राज्य स्तर पर एक समिति का गठन किया जायेगा यह बात सूबे के मुख्यमंत्री ने बीजापुर अतिथि गृह में आयोजित बैठक में कही।

उर्गम घाटी में भांग की खेती का अध्ययन करते अजीम प्रेम जी यूनि​वर्सिटी बंगलौर के छात्र

बैठक में जानकारी देते हुये प्रदेश के समाजसेवी संगठनों ने यह मंशा जाहिर की कि सरकार को दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक रेशा आधारित स्वरोजगार देने के लिए समूहिक प्रयास करने होंगे। सरकारी और गैरसरकारी संगठनों को जो पूर्व से ही प्राकृतिक रेशा आधारित कार्य कर रहे हैं और उनसे बने उत्पादों का विपणन कर रहे है उनको उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद तथा उत्तराखंड हैंडलूम एंव हस्तशिल्प विकास परिषद पूर्ण सहयोग करेगी। गौरतलब है कि पर्वतीय क्षेत्रों में 1910 से पूर्व अंग्रेजों के जमाने से अल्मोड़ा और गढ़वाल जिलों (वर्तमान का पौड़ी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़) में रेशे और मसाले के लिए भांग की व्यावसायिक खेती की अनुमति का प्रावधान कानून में है। पुरातन समय में जब जूते, चप्पलों का प्रचलन नहीं था, तब भेड़-बकरी पालक और तिब्बत के साथ व्यापार करने वाले लोग भेड़-बकरी की खाल से बने जूतों के बाहर भांग की रस्सी से बुने गये छपेल का प्रयोग करते थे। ऐसे जूते पांव को गर्म तो रखते ही थे साथ ही बर्फ में फिसलने से रोकते थे। भेड़-बकरियों की पीठ पर माल ढोने के लिए भांग के रेशों से बनाये गये थैले भी पुराने समय में प्रचलन में थे।

गढ़वाल में बड़े पैमाने पर भांग की खेती पूर्व में 4000 से 7000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्र- बधाण, लोहबा, चांदकोट, चांदपुर, धनपुर, और देवलगढ़ परगने में किए जाने का जिक्र है।

उत्तराखंड के स्थानीय संसाधनों का वर्णन करते हुए पुरातन ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी यहां के प्राकृतिक संसाधनों जैसे परम्परागत फसलें, प्राकृतिक रेशे डांस कंडाली, भांग और अन्य रेशों के बारे में उद्घृत करते हैं। इन्हीं में से एक गढ़वाल हिमालय के गजेटियर में वर्णन किया गया है-

औद्योगिक भांग के रेशे को उबाल कर बहते पानी से धोना

1910 में छपे ब्रिटिश गढ़वाल गजेटियर में लेखक एच.जीच. वाल्टन लिखते हैं- चंदपुर में निचले वर्ग के खसिया-पबिला अब भांग उगाते हैं। वे भांग गांव से लगे उपजाऊ खेतों में उगाते हैं। पहले वे जंगलों को काटकर उसमें भांग बोते हैं। लेकिन इससे चूंकि जंगल को नुकसान होता था इसलिए इस परम्परा को हतोत्साहित किया गया। भांग के हरे तने काटकर उन्हें धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद उनके बंडल बनाकर पंद्रह-सोलह दिन के लिए पानी में डुबो दिया जाता है। तदोपरांत उन्हें लकड़ी के मुदगर से पीट कर फिर धूप में सुखाया जाता है। इसके पश्चात् इसके रेशे (लम्फा) निकाले जाते हैं। ये रेशे इसके मोटे वाले कोने से उधेड़ने शुरू किए जाते हैं और फिर कूटकर इसकी गर्द निकालकर इसके पुलिंदे बनाए जाते हैं। ताकि इसे बेचा जा सके या इससे वस्तुएं बनाई जा सकें। इससे कपड़ा बनाया जाता है जिसे भंगेला कहते हैं। इसे चांदपुर के लोग आमतौर पर पहनते हैं या थैले बनाते हैं। इसका कोटद्वार और रामनगर के रास्ते थोड़ा बहुत निर्यात होता है। यही नहीं गढ़वाल हिमालय के गजेटियर में यह भी जिक्र किया गया है कि भोटिया लोग ऊन के साथ-साथ भांग के बने कपड़े भी पहनते हैं। आंतरिक व्यापार में स्थानीय तौर पर कम्बल और भांग के रेशे का व्यापार किए जाने का जिक्र भी है। घी के व्यापार के साथ-साथ प्राकृतिक रेशे का व्यापार परम्परागत रूप से उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों में 150 वर्ष से भी पूर्व का बताया गया है।

भाग के धूले हुए रेशे को प्रसंस्करण करते करते हुए

यही नहीं महान इतिहासकार, हिमालय प्रेमी आयरलैंड में जन्मे शोधकर्ता एडविन थाॅमस एटकिन्सन ने 1881 में ‘द हिमालयन गजेटियर’ के भाग एक में उत्तराखंड में भांग की खेती आधारित स्वरोजगार जो उत्तराखंड में पहले से ही प्रचलन में थी के बारे में लिखा है कि ‘भांग की प्रजाति कैनाबिस इंडिका में नर और मादा पौधे अलग-अलग होते हैं। नर पौधे को फूल भांग और मादा पौधे को गुर भांग कहते हैं।’

वे लिखते हैं, ‘एक वर्ष में 3 से 14 फीट लंबाई तक बढ़ जाने वाले भांग के लंबे—लंबे गोल डंठलों की ऊपरी त्वचा से ही भांग के रेशे का उत्पादन होता है। ये बारिक रेशे क्यूटिकल नामक त्वचा से ढ़के रहते हैं। भांग का रेशा अधिकतर नर पौधे से प्राप्त होता है यानी मादा पौधे से रेशा कम निकलता है। जबकि बीज और नशीला पदार्थ मादा पौधे से निकलता है। बीज का उपयोग तेल निकालने और मसाले के रूप में किया जाता है। नर पौधे से निकलने वाले रेशे को भंगेला कहते हैं। भांग के रेशे का उपयोग कोथला, बोरा, गाजी और पुलों के लिए रस्सी बनाने में उपयोग किया जाता है। कहीं-कहीं इन्हें गनरा-भांग, बण भांग, जंगली भांग भी कहते हैं। यह हिमालय के उत्तर-पूर्व जनपदों में उगायी जाती है।’

गढ़वाल में भांग की खेती करने वालों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था और- ‘तेरे घर-खेत में भांग जम जाए’ ऐसा कहना अपशब्द माना जाता था। लेकिन दूसरी तरफ खसिया जाति के लोग बिना जाति मोह की चिंता किए सतत् रूप से भांग उगाकर उनके रेशों से घरेलू उपयोग के लिए रस्सियां बनाते हैं।

एटकिन्सन लिखते हैं कि इस प्रोविन्स में भांग की खेती की संभावनाओं के बारे में 1800 से पूर्व डाॅ. राॅक्सबर्ग ने लिखा है कि इस क्षेत्र में भांग की खेती को बढ़ावा देने के लिए यूरोप से भांग की खेती के विशेषज्ञ मुरादाबाद और गोरखपुर जिलों में लाए गए थे। और कई वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी अपने वार्षिक निवेश का बड़ा हिस्सा कुमाऊं की पहाड़ियों में उगाए गए भांग के एवज में प्राप्त करती थी। लेकिन कालांतर में ईस्ट इंडिया कंपनी के उन्मूलन और बहिष्कार के साथ भांग के रेशा आधारित कपड़ों की मांग सिर्फ स्थानीय स्तर पर ही रह गई थी।

भांग का कच्चा रेशा

यही नहीं हिमालयी क्षेत्र में भांग की खेती के संदर्भ में हडल स्टोन और बेटन्स ने भी महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं। गढ़वाल में बड़े पैमाने पर भांग की खेती पूर्व में 4000 से 7000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्र- बधाण, लोहबा, चांदकोट, चांदपुर, धनपुर, और देवलगढ़ परगने में किए जाने का जिक्र है। ये क्षेत्र अपनी विस्तृत वन सीमाओं, घने जंगल और समान तापमान की वजह से भांग की खेती के लिए उस दौर में अनुकूल थे जबकि उत्तरी दिशा के परगने जो हिमालय की बर्फीली चोटियों से मिलते थे वहां भांग की खेती बहुत कम थी। अतः यह कहा जा सकता है कि गढ़वाल में भांग के उत्पादन का सर्वथा अनुकूल क्षेत्र उत्तर में पिंडर, दक्षिण में नयार, पूर्व में पश्चिमी रामगंगा और पश्चिम में गंगा नदी के बीच स्थित था।

उस दौर में प्रति बिस्सी/ बिसवा जमीन (1 बिस्सी बराबर 45 वर्ग गज) में 20 से 25 पाथा या 52 से 66 पाउंड भांग के बीज बोये जाने का जिक्र किया गया है। उस दौर में भी भांग की खेती के लिए जमीन को साफ करके मई-जून में बीज बोये जाने का जिक्र है। हिमालयन गजेटियर में भांग की खेती किए जाने का दस्तावेज़ीकरण 210 साल से भी पुराना है। दस्तावेज़ों में भांग की खेती करने के तरीके, कटाई, रेशा निकालना और मोटा कपड़ा बनाने की प्रक्रिया को विस्तारपूर्वक बताया गया है। यह कहा गया है कि गरीब लोग गर्मियों में भी भांग के भंगेला वस्त्र पहनते थे।

कुमाऊं में चैगरखा विशेषकर लखनपुर, दारूण, रांगौर और सालम पट्टी में भांग की खेती की जाती रही है। गंगोलीहाट के बरौं अस्सी चालिसी, ऊच्यूर, गुमदेश, ध्यानीराव और मल्ला चैंकोट में भांग की वृहद् खेती किए जाने वर्णन है। एटकिन्सन लिखते हैं कि गढ़वाल में भांग की खेती करने वालों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था और- ‘तेरे घर-खेत में भांग जम जाए’ ऐसा कहना अपशब्द माना जाता था। लेकिन दूसरी तरफ खसिया जाति के लोग बिना जाति मोह की चिंता किए सतत् रूप से भांग उगाकर उनके रेशों से घरेलू उपयोग के लिए रस्सियां बनाते हैं। यही नहीं वे भांग के रेशे से बने थैलों का उपयोग करते थे। जो कि उस दौर के अनुसूचित जाति के कोली, बोरा और आगरी लोग ही बुना करते थे। जबकि दूसरी तरफ सभी जनजाति समाज के लोग बिना सामाजिक चिंता किए हुए भांग का सभी तरह से व्यापार कर रहे थे।

जिन पौधों को फूल और बीज बन जाने के बाद अक्टूबर में काटा जाता है। उनके डंठलों को 8 से 10 दिनों तक तेज धूप में सुखाया जाता है फिर उन गट्ठरों को तीन दिन तक बहते पानी में डुबोकर रखा जाता है और चौथे दिन उनकी छाल निकालकर, धोकर अच्छे ढंग से सुखाया जाता है इस तरह से अब प्रत्येक छाल बारीक-बारीक छिलकर उसके रेशे हाथ के नाखूनों से अलग करते हुए तकली (टिकुली) से घुमाते हुए धागा तैयार कर लिया जाता है।

एटकिन्सन लिखते हैं कि डाॅ रदरफोर्ड ने भांग के रेशे के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी से करार किया था और इस वक्त ही उत्तराखंड में भांग रेशा आधारित उद्यमिता की शुरुआत हुई जो कि गांव के मुखिया के माध्यम से की जाती थी। 1814 में 4 रूपये में एक मौंड (320 पौंड) रेशे की कीमत किसान के घर पर 4 रूपये और कोटद्वार या चिल्किया में 5 रूपये प्रति मौंड बताई गई। यानी  लगभग 128 किग्रा0 रेशे की कीमत सन् 1814 के आसपास मंडियों में 5 रूपये और किसान के घर पर 4 रूपये थी। सन् 1840 में कुमाऊं क्षेत्र से हजार रूपये से थोड़ा अधिक धनराशि का भांग रेशा और भांग से बने उत्पादों का व्यापार हुआ था। कैप्टन हडल्सटन ने अनुमान लगाया था कि गढ़वाल क्षेत्र में उसी दौरान 250 एकड़ से 40 टन रेशा पैदा हुआ होगा। इस दौर में भांग के बीजों को सौर एवं सीरा परगना में खाने के लिए प्रयोग किया जाता था। सन् 1840 में भांग का बीज 3 रुपया प्रति मौन्ड (320 पौण्ड) था जो बाद में 4 रुपया हो गया था इस दौर में भी लोग बिना बुने हुए भांग के रेशे अपने उपयोग के अनुसार खरीदते थे।

सॉफ्टनर में धोने के बाद रेशे का उपचार

भंगेला या भांग का कपड़ा सीट के रुप में और या तो कोटला (मोटा कपड़ा) और थैले के लिए उपयोग होता था जबकि बारिक काते गए भांग के धागे से आटा और चूना लाने लेजाने के लिए थैलियां बनाई जाती थी सन् 1840 में भांग के कपड़े का बैग 6 आना और सन् 1881 में 12 आने में बेचा जाता था छोटे साइज के बैग सन् 1840 में 2 रुपये दर्जन होते थे।

भांग के कपडे़ से बने थैलों की मांग व्यापारियों द्वारा लगातार बढ़ती जा रही थी मांग का फायदा उठाते हुए भांग के कपड़े बने थैले  महंगे होते जा रहे थे। क्योंकि कोटद्वार और रामनगर के तराई में आलू बेचने के लिए इन थैलों का प्रयोग किया जा रहा था। मिस्टर जे.एच. बैटन ने अपनी रिपोर्ट- ‘कुमाऊं में भांग की खेती की संभावनायें’ शीर्षक में लिखा है कि कुमाऊं के चैगरखा परगना में और सम्पूर्ण कुमांऊ में जो भी परिवार भांग की खेती कर रहे हैं उन्हीं से भांग का रेशा खरीदा जाए बजाय कि यूरोपीय राजधानी के नुमांइदें यहां आकर जमीन खरीदें और फिर भांग की खेती को उद्यमिता विकास के लिए प्रोत्साहित करें। यहां यह समझना बहुत आवश्यक होगा कि- ‘मैं समझता हूं जब भांग के रेशा आधारित उद्योग से कोई भी परिवार रोजगार पा रहा हो और उसका जीवनस्तर बेहतर दिखाई देने लगे तो उत्तराखंड के समाज में अन्य लोग स्वयं इसका अनुसरण करेंगे। जिससे सम्पूर्ण कुमाऊं और गढ़वाल की वो सारी जमीन धीरे-धीरे भांग की खेती के लिए उपयोग की जा सकेगी। जो अभी तक बेनाप और बेकार पड़ी हुई है।

नेपाल में भांग की खेती- इसी दौर में नेपाल के उत्तरी परगना में भी भांग की खेती की जाती थी। मिस्टर बी.एच. हाॅगसन ने लिखा है कि नेपाल में मार्च अप्रैल में भांग के बीज बोये जाते हैं। खेत को समतल कर पर्याप्त मात्रा में गोबर डाला जाता है। बाद में भांग के बीजों को छिड़ककर बोया जाता है जो कि बोने के 7-8 दिन बाद जमने लगते हैं। वो लिखते हैं कि भांग के पौधों पर सावन यानी जुलाई और भादो यानी अगस्त की शुरुआत में फूल और बीज बनने लगते हैं। इसी दौरान जिन पौधों पर बीज ना बने हों उन्हें काटकर उनकी छाल से कोमल रेशा निकलता है। और इस रेशे से कोमल कपड़े या भंगीला (भांग से बने कपड़े) बनाये जाते हैं। जबकि जिन पौधों को फूल और बीज बन जाने के बाद अक्टूबर में काटा जाता है। उनके डंठलों को 8 से 10 दिनों तक तेज धूप में सुखाया जाता है फिर उन गट्ठरों को तीन दिन तक बहते पानी में डुबोकर रखा जाता है और चौथे दिन उनकी छाल निकालकर, धोकर अच्छे ढंग से सुखाया जाता है इस तरह से अब प्रत्येक छाल बारीक-बारीक छिलकर उसके रेशे हाथ के नाखूनों से अलग करते हुए तकली (टिकुली) से घुमाते हुए धागा तैयार कर लिया जाता है। इस तैयार किए गए धागे को लकड़ी की राख और पानी के घोल में 4 घंटे तक उबाला जाता है। तदोपरान्त पुनः अधिक सफेदी लिए धागा तैयार होता है। नेपाल में उस दौर में भांग के कपड़े और थैले बनाने का यह तरीका मौजूद था। वे आगे लिखते हैं कि एक माणा यानी कच्चा सेर का आधा बीज एक रोपणी (भूमि माप का पैमाना जो कि 605 वर्ग गज के बराबर होता है) भूमि से 10 या 12 लोड भांग पैदा होता है। वे लिखते हैं कि यूरोप के बाजारों के लिए उस दौर में तैयार किये जाने वाले भांग रेशे के वे समस्त गुण जैसे मज़बूती, महीन, कोमल और जोड़ों पर ना दिखने वाला प्राकृतिक रेशा उत्तराखंड और नेपाल के भांग रेशों में पीट्सवर्ग में उगाये जाने वाले भांग के उन्नत गुणों के समान मौजूद था।

नंदाकिनी स्वायत सहकारिता की बनुकर लूम पर भांग रेशा का कपड़ा बुनते हुए

ऊपर वर्णित ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को उद्घृत करना इसलिए भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि 15 साल पूर्व बने हिमालयी राज्य में स्थानीय संसाधन आधारित स्वरोजगार जो प्रदूषण ना करते हों विकसित किए जाने की आवश्यकता है पर्यटन (इकोटूरिज़्म), प्राकृतिक रेशा और हस्तशिल्प ये तीन प्रमुख रोजगार के उद्योग हैं जो धुंआरहित हैं।

यहां यह भी स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि इस लेख का प्रमुख उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ भांग के रेशा, दवा, काॅस्मेटिक, कागज़, इन्सुलेशन, ऊर्जा के उपयोग वाले क्षेत्रों को प्रोत्साहित करना है।

बाॅम्बे हैम्प कम्पनी के अध्ययन के अनुसार – आबकारी अधिनियम की धारा 8/9/10 में भांग में पाए जाने वाले नशीले नारकोटिक की वजह से प्रतिबंधित और खेती करने का भी प्रावधान है। वहीं दूसरी ओर धारा 14 में आबकारी अधिकारियों के निरीक्षण और मार्गदर्शन में भांग की खेती किए जाने का प्रावधान है। लेकिन अगर व्यावसायिक भांग में टीएचसी स्तर 0.3 से 1.5 के बीच है तो ऐसी भांग नशे की श्रेणी में नहीं आती है लेकिन जहां टीएचसी का स्तर 1.5 से अधिक हो जाए उसे नशीला माना जा सकता है और ऐसे भांग की खेती प्रतिबन्धीत हो जाएगी। अब इस दिशा में राज्य सरकार के आग्रह पर पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय, भरसार कृषि विश्वविद्यालय, विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान भांग की उन्नत किस्म जो रेशे और बीजों के लिए उपयोगी हो और जिसमें टीएचसी का स्तर 0.3 से कम होगा ऐसे बीजों को पहाड़ों की बेकार पड़ी भूमि पर कृषिकरण के लिए प्रचारित प्रसारित किया जायेगा।

वन पंचायतों पर कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता श्री ईश्वर जोशी बताते हैं कि 1992-93 में भी स्थानीय लोगों द्वारा परम्परागत रूप से भांग की खेती को नारकोटिक एक्ट से मुक्ति दिलाने के लिए एक समिति बनाई गई थी लेकिन उस वक्त भी उस पर कोई खास कार्य नहीं हो पाया। उनका कहना है कि भांग की खेती नशे के लिए करना सर्वथा अनुचित है लेकिन अगर भांग के रेशे और बीज का उपयोग स्थानीय स्वरोजगार को बढाने के लिए किया जाए तो अनुचित नहीं है। कुमाऊं में पुरातन काल से ही भांग के बीजों का उपयोग गडेरी, गोभी की सब्जी में मसाले के रूप में सर्वाधिक किया जाता रहा है। ग्रामीणों क्षेत्रों के गरीब काश्तकार भांग के बीज, नमक और नींबू की चटनी बनाकर ही सब्जी का जुगाड़ कर लेते हैं। मट्ठे को स्वादिष्ट बनाने के लिए भांग के थोड़े से बीज, टिमरू के बीज पीस कर स्वादिष्ट पेय बनाया जाता रहा है।

नारकोटिक्स एक्ट 1985 के सेक्शन 14 में वर्णित है कि सरकार विशेष प्रावधानों के तहत् सिर्फ और सिर्फ भांग के औद्योगिक उपयोग जैसे रेशा, बीज और उद्यानिक प्रयोग हेतु भांग की खेती कर सकते हैं। एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग एंड साइकोट्राॅपिक सब्सटेन्सेस) एक्ट 1985 पर राष्ट्रीय नीति के सेक्शन 14 में पुनः इसका उद्धरण है कि भांग के बीजों से उच्च मूल्यों के तेल बनाए जा सकते हैं।

उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद के वरिष्ठ कार्यक्रम समन्वयक श्री दिनेश जोशी ने जानकारी दी कि हिमालय में तिब्बत और भूटान्तिक व्यापार के दौरान से ही भांग के रेशे से बने छपेल (बर्फ पर चलने के लिए जूते), रस्सियां, छोटे थैले, बैलों के मुंह पर बांधे जाने वाले मोथड़े भांग से ही बनाये जाते रहे हैं। ऐसे में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा बिना सोचे-समझे भांग की खेती के प्रोत्साहन का विरोध करना सर्वथा अनुचित है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद द्वारा राज्य बनने के बाद सबसे पहले 2004 में पीपलकोटी में आगाज़ फैडरेशन के साथ भांग रेशा आधारित प्रशिक्षण एवं प्रसंस्करण कार्यक्रम चलाए गए जिसकी सफलता को देखते हुए कालांतर में सर रतन टाटा ट्रस्ट ने कार्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। आज भी यह कार्य भांग रेशे के साथ-साथ कंडाली एवं भीमल रेशा आधारित उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए आगाज़ फैडरेशन पीपलकोटी द्वारा बिना किसी सहायता के चलाया जा रहा है। यहां भांग के रेशे के सदुपयोग पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है ना कि उसके नशीले गुणों को उजागर कर डांडी मार्च करने की।

जनपद चमोली में ही डांस कंडाली परियोजना पर आगाज़ फैडरेशन के साथ कार्य कर रहे श्री हरी कृष्ण ने बताया कि भांग के रेशे की खेती को प्रोत्साहित करने से गाड़-गधेरों और बुग्यालों से नीचे छानी क्षेत्र में जहां भेड़-बकरियों को गोठ में रखा जाता है उस खाली जमीन पर  जो भांग उगती है उसका नशे के लिए दुरूपयोग संभव है लेकिन अगर सही देख-रेख में कम टीएचसी लेवल की भांग की खेती कर उससे फाइबर निकाला जाए तो सैकड़ों बेरोजगारों को रोजगार मिल सकता है।

भारतीय ग्रामोद्योग संस्था के श्री अनिल चंदोला ने जानकारी दी कि उनके कार्डिंग प्लान्ट में भांग-कण्डाली, ऊन आदि सभी रेशों की कार्डिंग की जाती है और भांग से बने धागे की देश-विदेश में बहुत मांग है।

भाग एवं अन्य प्राकृतिक रेशों से तैयार परिधान

बाॅम्बे हैम्प कम्पनी से जुड़े युवा दिलज़ाद एवं सुमित ने जानकारी देते हुए बताया कि अकेले भारत में भांग के रेशे, भांग के बीजों का तेल, भांग के बीजों से बने साबुन और भांग का रेशा निकालने के बाद बचे बायोमास या डंठलों से- भवन निर्माण सामग्री, इंसुलेशन पैनल, मोटर कार के बम्पर बनाने के शोध कार्य आगाज़ फैडरेशन के साथ तीन साल से किए जा रहे हैं। इसलिए हमें इस बात की निराशा है कि उत्तराखंड के कुछ बुद्धिजीवी सिर्फ नशा और लाइसेंसिग की प्रक्रिया का हल्ला मचा कर इस विकास कार्य को प्रभावित करना चाहते हैं।

नारकोटिक्स एक्ट 1985 के सेक्शन 14 में वर्णित है कि सरकार विशेष प्रावधानों के तहत् सिर्फ और सिर्फ भांग के औद्योगिक उपयोग जैसे रेशा, बीज और उद्यानिक प्रयोग हेतु भांग की खेती कर सकते हैं। एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग एंड साइकोट्राॅपिक सब्सटेन्सेस) एक्ट 1985 पर राष्ट्रीय नीति के सेक्शन 14 में पुनः इसका उद्धरण है कि भांग के बीजों से उच्च मूल्यों के तेल बनाए जा सकते हैं। कुछ देशों में भांग की कम टीएचसी (टेट्रा हाइड्रा कैनाबिनोल) की प्रजाति उगाई जा सकती है। उत्तराखंड के संदर्भ में अल्मोड़ा, गढ़वाल और नैनीताल- तराई भाबर को छोड़कर ए एनडीपीएस एक्ट के सेक्शन 17 (1) (बी.) आबकारी एक्ट के तहत् भांग की कृषिकरण हेतु अनुमति प्रदान है यानि अल्मोड़ा, गढ़वाल और नैनीताल में भांग की खेती की जा सकती है। लेकिन भांग का किसी भी स्थिति में नशे के लिए कदापि उपयोग नहीं किया जा सकता।

भाग एवं अन्य प्राकृतिक रेशों से तैयार परिधान

दूसरी ओर पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा डाॅ. सलिल के. तिवारी के निर्देशन में डाॅ. अलका गोयल, डाॅ. आशुतोष दुबे, डाॅ. ए.के. वर्मा, डाॅ. शिशिर टंडन और डाॅ. सुमित चतुर्वेदी के नेतृत्व में 2011 से उत्तराखंड में लो टीएचसी यानी कम टीएचसी की भांग प्रजाति की कृषिकरण और रेशे के बेहतर उत्पादन के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। इससे पहाड़ के ऊंचाई वाले इलाकों में चरस गांजा के लिए उगाई जाने वाली भांग की अवैध खेती को रोका जा सकेगा।

उत्तराखंड सरकार द्वारा हाल ही में बीजापुर अतिथि गृह में सभी सम्बन्धित विभागों और सामाजिक संस्थाओं की बैठक उत्तराखण्ड बांस एवं रेशा विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं मुख्य वन संरक्षक श्री मनोज चंद्रन को निर्देशित किया कि उत्तराखंड के सभी प्राकृतिक रेशों के व्यापक कृषिकरण, संग्रहण, उपयोग कर स्वरोगजार बढाने के लिए प्रोसेसिंग और फिनिशिंग सेन्टर रेशे की खरीद की जाए। तीर्थ एवं पर्यटक स्थलों पर प्लास्टिक पाॅलिथीन प्रतिबंधित कर भांग, भीमल, डांस कंडाली, रामबांस, भाबड़ घास से बने हस्तशिल्प उत्पाद रखे जाएं। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि गांव में प्राकृतिक संसाधन होने से पलायन रुकेगा और उनका प्रयास रहेगा कि देश-विदेश के सभी संस्थानों को इस कार्य में जोड़ कर उत्तराखंड में विकास के नये आयाम स्थापित किए जाएं।

(लेखक पहाड़ के सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार एवं पीपलकोटी में ‘आगाज’ संस्था से संबंद्ध हैं)

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *