विश्व पर्यावरण दिवस 2026: प्रकृति की ओर लौटना ही जीवन की संजीवनी  

World Environment Day 2026

 

विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून, 2026)  पर विशेष

प्रो. गिरीश्वर मिश्र
शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा  

आज हमारे अस्तित्व के हर आयाम- जल, थल और नभ में गहरे परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। इनमें से अनेक परिवर्तन अयाचित, अवांछित और चिंताजनक हैं। उनका स्वरूप इतना व्यापक और जटिल है कि सामान्य व्यक्ति उन्हें प्रकृति के कोप के रूप में देखता है, जबकि वैज्ञानिक उन्हें प्राकृतिक और मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप उत्पन्न भौतिक प्रक्रियाओं के रूप में समझने का प्रयास करते हैं। जो भी हो, यह निर्विवाद है कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। भीषण गर्मी और लू के दिनों की संख्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है। समुद्र का जलस्तर ऊपर उठ रहा है, जंगलों में आग की घटनाएँ बढ़ रही हैं और अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि के कारण बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएँ जीवन और आजीविका को संकट में डाल रही हैं। असमय वर्षा, ओलावृष्टि और बर्फबारी से किसानों की फसलें नष्ट हो रही हैं, पहाड़ दरक रहे हैं और जीवन के सामने नए-नए जोखिम खड़े हो रहे हैं। इन सबके बीच मानो किसी प्रलय की छाया दिखाई देने लगी है।

मनुष्य अक्सर अपनी जिम्मेदारी को अनदेखा कर देता है और उन विसंगतियों से आँख मूँद लेता है जिन्हें उसने स्वयं जन्म दिया है। पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाले हमारे आचरण का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में मनुष्य और प्रकृति के संबंधों की गंभीर समीक्षा आवश्यक हो जाती है, ताकि हम अपनी भूलों को समझ सकें और फिर से प्रकृतिस्थ होने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

आज वायुमंडल विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों से घिर चुका है। स्वच्छ वायु और शुद्ध पेयजल दोनों ही दुर्लभ होते जा रहे हैं। खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों, कीटनाशकों और मिलावट के कारण स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह सब केवल प्रकृति का कोप है? वस्तुतः इसमें मनुष्य की भूमिका भी कम नहीं है। मनुष्य अक्सर अपनी जिम्मेदारी को अनदेखा कर देता है और उन विसंगतियों से आँख मूँद लेता है जिन्हें उसने स्वयं जन्म दिया है। पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाले हमारे आचरण का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में मनुष्य और प्रकृति के संबंधों की गंभीर समीक्षा आवश्यक हो जाती है, ताकि हम अपनी भूलों को समझ सकें और फिर से प्रकृतिस्थ होने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

प्राचीन काल में मनुष्य स्वयं को प्रकृति का अभिन्न अंग मानता था। प्रकृति उसके जीवन के चारों ओर उपस्थित थी और उसका सीधा अनुभव जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था। हमारी सांस्कृतिक परंपरा में प्रकृति को दिव्यता का प्रत्यक्ष रूप माना गया। महाकवि कालिदास ने प्रकृति के विविध रूपों में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव किया। मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं समझता था, क्योंकि वह जानता था कि उसका शरीर और समस्त सृष्टि एक ही पंचमहाभूतों से निर्मित है। प्रकृति का संरक्षण अपने ही अस्तित्व की रक्षा माना जाता था। जल पवित्रता का प्रतीक था, अग्नि शोधन का, वायु प्राणों का आधार और पृथ्वी सबकी धात्री माता। इसलिए प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध सह-अस्तित्व और सम्मान का था, संघर्ष का नहीं।

ईशावास्य उपनिषद् का उद्घोष- “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” – हमें संयमित उपभोग और लोभ से बचने की शिक्षा देता है। योग, बौद्ध और जैन चिंतन ने भी आवश्यकताओं को सीमित रखने, अपरिग्रह और संतुलित जीवन पर बल दिया। किफायत, आत्मसंयम और संतुलन को नैतिक मूल्य माना गया। आज जब जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और संसाधन सीमित हैं, तब इन मूल्यों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।

समय के साथ जब मानव बुद्धि ने प्रकृति के रहस्यों को समझना शुरू किया, तब उसने प्रकृति की शक्तियों को अपने उपयोग में लाने की क्षमता प्राप्त की। यह उपलब्धि अपने आप में महत्त्वपूर्ण थी, किंतु धीरे-धीरे मनुष्य ने स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझना शुरू कर दिया। प्रकृति को उपभोग की वस्तु और स्वयं को उसका उपभोक्ता मान लेने से सोच का पूरा ढाँचा बदल गया। विकास और आर्थिक वृद्धि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बन गए। उपभोक्तावाद ने बाजार को जीवन का केंद्र बना दिया और अधिकाधिक उपभोग को समृद्धि का पर्याय मान लिया गया। जीवन की गुणवत्ता का मूल्यांकन आवश्यकताओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि उपभोग और प्रदर्शन से होने लगा। प्रतिस्पर्धा, संग्रह और भोग की प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती गई।

जबकि हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा का संदेश इससे भिन्न था। ईशावास्य उपनिषद् का उद्घोष- “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” – हमें संयमित उपभोग और लोभ से बचने की शिक्षा देता है। योग, बौद्ध और जैन चिंतन ने भी आवश्यकताओं को सीमित रखने, अपरिग्रह और संतुलित जीवन पर बल दिया। किफायत, आत्मसंयम और संतुलन को नैतिक मूल्य माना गया। आज जब जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और संसाधन सीमित हैं, तब इन मूल्यों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।

प्रकृति को नष्ट करना अंततः स्वयं को नष्ट करना है। धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश जैसी मूल शक्तियाँ सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। इन्हीं के सहारे जीवन का समूचा तंत्र संचालित होता है।

जीवन के संचालन के लिए ऊर्जा आवश्यक है। जैसे-जैसे मानव समाज का विस्तार हुआ, ऊर्जा की खपत भी बढ़ती गई। ऊर्जा की खोज में मनुष्य ने अनेक नए स्रोत विकसित किए, जिनमें परमाणु ऊर्जा भी शामिल है। यह प्रभावी तो है, पर इसके साथ गंभीर जोखिम भी जुड़े हैं। इसके अपशिष्ट पदार्थों का सुरक्षित निस्तारण आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी प्रकार उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति ने कचरे के विशाल पहाड़ खड़े कर दिए हैं। उत्पादन और उपभोग जितना बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से अपशिष्ट भी बढ़ रहा है। आज लगभग हर शहर कचरा प्रबंधन की समस्या से जूझ रहा है।

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इतिहास बताता है कि प्रकृति की उदारता का लाभ उठाते-उठाते मनुष्य उसके दोहन और शोषण की राह पर चल पड़ा। वह भूल गया कि प्रकृति को नष्ट करना अंततः स्वयं को नष्ट करना है। धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश जैसी मूल शक्तियाँ सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। इन्हीं के सहारे जीवन का समूचा तंत्र संचालित होता है। प्रकृति के ये तत्व परस्पर जुड़े हुए हैं और संतुलन की अवस्था में एक-दूसरे के पूरक बनकर कार्य करते हैं। किंतु जब इस संतुलन में हस्तक्षेप होता है, तब अव्यवस्था और संकट उत्पन्न होते हैं।

प्रकृति का अनुशासन अद्भुत है। ऋतुओं का चक्र, फूलों का खिलना, फलों का पकना, पक्षियों का कलरव और नदियों का प्रवाह- सब एक निश्चित व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होते हैं। धरती अपनी उर्वरता से जीवन का पोषण करती है। नदियाँ, पहाड़ और वन जीवन को सहारा देते हैं। प्रकृति का यह विराट संसार उदारता और संतुलन का अनुपम उदाहरण है। किंतु आधुनिक मनुष्य ने स्वयं को प्रकृति से अलग मान लिया है। उसने प्रकृति को बाँट-छाँटकर अपने अधिकार की वस्तु बना लिया। भूमि, जल, वन, खनिज और जीव-जंतु सब पर स्वामित्व का दावा किया गया। इतना ही नहीं, जिस पर अधिकार नहीं था, उसे भी प्राप्त करने की होड़ शुरू हो गई।

“विश्व पर्यावरण दिवस हमें स्मरण कराता है कि प्रकृति पर विजय नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही जीवन का आधार है।”
— गिरीश्वर मिश्र

यही अनियंत्रित लोभ आज युद्धों, हिंसा और वैश्विक संघर्षों का एक बड़ा कारण बन गया है। युद्ध केवल मनुष्यों का विनाश नहीं करते, वे पर्यावरण को भी गहरे घाव देते हैं। बारूद, रसायन और विनाशकारी तकनीकें धरती, जल और वायु को प्रदूषित करती हैं। समुद्रों तक में विषैले पदार्थ पहुँच रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रकृति परिवार के सदस्य के रूप में हमारा यह आचरण उचित कहा जा सकता है?

धरती का आकार लगभग वही है जो सदियों पहले था, पर उस पर रहने वाली आबादी कई गुना बढ़ चुकी है। उपलब्ध स्थान और संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। इसके साथ ही मनुष्य ने अपने जीवन को प्रकृति के अनुकूल ढालने के बजाय प्रकृति को अपनी इच्छाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास शुरू कर दिया। विकास की अनेक योजनाएँ तत्काल लाभ तो देती हैं, किंतु उनके दूरगामी दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। इसलिए विकास का प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय और नैतिक भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन-मूल्यों पर पुनर्विचार करें। प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता के रूप में देखें। संयमित उपभोग, सीमित आवश्यकताएँ, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव ही हमें वर्तमान संकट से बाहर निकाल सकता है। विश्व पर्यावरण दिवस हमें यही स्मरण कराता है कि प्रकृति से हमारा संबंध उपभोक्ता और वस्तु का नहीं, बल्कि सहजीवी और संरक्षक का होना चाहिए।

अंततः, प्रकृति की ओर लौटना कोई अतीतगमन नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित बनाने की आवश्यकता है। यही जीवन की संजीवनी है और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।

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