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आंदोलन, लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता और इतिहास: स्वतंत्रता के बाद भारत

आंदोलन, लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता और इतिहास: स्वतंत्रता के बाद भारत

समसामयिक
 डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र राजनीति एवं मीडिया विशेषज्ञ भारत की स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण की घटना नहीं थी; यह एक ऐसे राष्ट्र के पुनर्निर्माण की शुरुआत थी, जिसने सदियों की राजनीतिक अस्थिरता, औपनिवेशिक शासन, विभाजन और सामाजिक चुनौतियों के बाद स्वयं को लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। 1947 के बाद भारत का इतिहास केवल सरकारों और राजनीतिक दलों का इतिहास नहीं है। यह आंदोलनों, जनभावनाओं, असहमतियों, संघर्षों, बलिदानों और उन निर्णयों का इतिहास भी है, जिन्होंने देश की दिशा को बार-बार प्रभावित किया। यदि हम स्वतंत्र भारत के इतिहास को ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन आंदोलनों और जनदबाव के परिणामस्वरूप हुए। कभी आंदोलन ने सरकार को अपनी नीति बदलने के लिए विवश किया, कभी उसने लोकतंत्र को मजबूत किया और कभी किसी आंदोलन ने देश की एकता तथा संवैधानिक व्यवस्था ...
पर्यावरण आंदोलन और पहाड़ी महिलाएं

पर्यावरण आंदोलन और पहाड़ी महिलाएं

आधी आबादी
भावना मसीवालपहाड़ का जीवन देखने में हमें जितना शांत और खूबसूरत लगता है, अपने भीतर वह बहुत सी हलचलों और दबावों को समेटे है. यह दबाव एक ओर प्रकृति का प्रकोप है जो भूकंप और बाढ़ के रूप में देखा जाता है तो दूसरी ओर पहाड़ पर बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप है जो केदारनाथ, बद्रीनाथ और रूद्रप्रयाग के विध्वंस का जीवंत उदाहरण है. पहाड़ के जीवन को जिसने न केवल प्रभावित किया बल्कि पहाड़ को मैदानों और शहरो की तरफ पलायन को मजबूर किया. यह पलायन केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे पहाड़ी समाज का रहा. पहाड़ी समाज पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित है मगर भूमंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव ने प्रकृति प्रदत्त उनकी यह जीविका छीन ली है. आज पलायन बढ़ रहा है. कारण आर्थिक बेरोजगारी है जिसका परिणाम सबसे अधिक महिलाओं के जीवन पर रहा. उत्तराखंड में आज भी महिलाएं अकेली पहाड़ पर रहने को मजबूर हैं और पुरुष शहर जाकर कमाने को. पहाड़ के बारे में कहा जाता ह...