September 19, 2020
आधी आबादी

पर्यावरण आंदोलन और पहाड़ी महिलाएं

  • भावना मसीवाल

पहाड़ का जीवन देखने में हमें जितना शांत और खूबसूरत लगता है, अपने भीतर वह बहुत सी हलचलों और दबावों को समेटे है. यह दबाव एक ओर प्रकृति का प्रकोप है जो भूकंप और बाढ़ के रूप में देखा जाता है तो दूसरी ओर पहाड़ पर बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप है जो केदारनाथ, बद्रीनाथ और रूद्रप्रयाग के विध्वंस का जीवंत उदाहरण है. पहाड़ के जीवन को जिसने न केवल प्रभावित किया बल्कि पहाड़ को मैदानों और शहरो की तरफ पलायन को मजबूर किया. यह पलायन केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे पहाड़ी समाज का रहा. पहाड़ी समाज पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित है मगर भूमंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव ने प्रकृति प्रदत्त उनकी यह जीविका छीन ली है. आज पलायन बढ़ रहा है. कारण आर्थिक बेरोजगारी है जिसका परिणाम सबसे अधिक महिलाओं के जीवन पर रहा. उत्तराखंड में आज भी महिलाएं अकेली पहाड़ पर रहने को मजबूर हैं और पुरुष शहर जाकर कमाने को. पहाड़ के बारे में कहा जाता है कि ‘पहाड़ का पानी और जवानी कभी भी पहाड़ के काम नहीं आई है’. पानी जो बरसात और बाढ़ में उसे बहा ले गया और जवानी जो युवा होने के साथ ही रोजगार की तलाश में शहरों में बीत गई. आज भी कितने गाँव ऐसे हैं जहाँ केवल बुजुर्ग और महिलाएं हैं जो अपनी जीने की जद्दोजहद के प्रति प्रतिबद्ध है. सुबह होने से पहले जंगल जाना, सुबह होने तक लौट आना, जानवरों का चारा-पानी, घर का काम, खेत का काम, फिर घर आकर खाना बनाने की नित्य प्रक्रिया, शाम होने से पहले जानवरों के पुनः चारे की व्यवस्था और भी तमाम तरह के काम वह अपनी दैनिक दिनचर्या में करती हैं साथ ही घर की देखभाल, मेहमान, पति, बच्चे भी उसकी दिनचर्या का ही हिस्सा हैं. उत्तराखंड की लोकगायिका कबूतरी देवी कहती हैं कि ‘अविरल अंतहीन श्रम का सिलसिला है पहाड़ी औरत का जीवन’. पहाड़ की महिलाओं के जीवन में पर्यावरण का विशेष योगदान रहा है यह योगदान उनके जीवन की नित्य क्रियाओं में देखने को मिलता हैं क्योंकि ‘औरतें भोजन की प्राथमिक संग्राहक होने के नाते आर्थिक जीवन में कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं’. ऐसे में पर्यावरण को लेकर जब भी उत्तराखंड में आंदोलन हुए, महिलाओं की उसमें सक्रिय भागीदारी रही है|

उत्तराखंड में पर्यावरण आंदोलन किसी बड़े उद्देश्य या वैश्विक परिदृश्य को पाने के लिए नहीं हुए थे बल्कि पहाड़ी महिलाओं का अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा कर पाने के संघर्ष से हुआ था. उस समय तक पर्यावरण और पर्यावरण आंदोलन से कोई परिचित नहीं था. पर्यावरण आंदोलन के उदय का मुख्य कारण पर्यावरणीय विनाश रहा.  

उत्तराखंड में पर्यावरण आंदोलन किसी बड़े उद्देश्य या वैश्विक परिदृश्य को पाने के लिए नहीं हुए थे बल्कि पहाड़ी महिलाओं का अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा कर पाने के संघर्ष से हुआ था. उस समय तक पर्यावरण और पर्यावरण आंदोलन से कोई परिचित नहीं था. पर्यावरण आंदोलन के उदय का मुख्य कारण पर्यावरणीय विनाश रहा. आलोचकों का कहना था कि ‘स्वाधीनता पाने के बाद से पश्चिमी अनुभव पर आधारित आर्थिक विकास के प्रतिमानों की नकल उतारने की वजह से ही भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष तीव्र हुए. दूसरा विकास योजनाओं का संसाधनों के सामाजिक पहलुओं से अनजान होना भी संसाधनों के शोषण और उस पर निर्भर लाखों ग्रामवासियों की बदहाली का जिम्मेदार है’. विकास का सीधा आशय पुरुष प्रधान समाज का विकास है क्योंकि विकास की रूपरेखा महिलाओं की मूलभूत आवश्यकताओं से अपरिचित रहती है जबकि यह आवश्यकताएं उनकी अपनी नहीं पूरे परिवार की होती हैं. इसी कारण महिलाएं  सबसे ज्यादा प्रभावित भी रही हैं. रामचंद्र गुहा लिखते हैं-‘पर्यावरण का विनाश साफ तौर पर हाशिए पर रह रही संस्कृतियों और पेशों, जैसे आदिवासी, बंजारे, मछुआरे और कारीगरों पर सबसे बड़ा खतरा है, जो हमेशा से ही अपने अस्तित्व के लिए अपने आस-पास की प्रकृति पर निर्भर रहे हैं. लेकिन जैव ईंधन के स्रोतों के विनाश का सबसे बड़ा असर औरतों पर पड़ा है. सभी ग्रामीण संस्कृतियों में औरतें, खास कर भूमिहीन गरीब, हाशियाई और छोटे खेतिहर परिवारों की औरतें प्रभावित हुई हैं. इन औरतों के नजरिए से देखें तो यह कहा जा सकता है कि सारा विकास औरतों की जरूरतों से अपरिचित होता है और अक्सर स्त्री विरोधी होता है, जो ठीक-ठीक उनके काम का बोझ बढ़ाने के लिए ही निर्मित किया गया होता है’. उत्तराखंड में पर्यावरण को लेकर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी का यही सबसे बड़ा कारण रहा है.

उतराखंड में पहला आंदोलन औपनिवेशिक काल के दौरान 1921 में हुआ. ब्रिटिश हुकूमत के चलते 67% खेती रहित सार्वजानिक जमीन को वन संरक्षण के नाम पर ले लिया गया’. कृषि और पशुपालन की अर्थवयवस्था को बनाए रखने के लिए जो अनुमति बेहद जरूरी थी जैसा कि चराना, ईधन और चारा संग्रहण में भारी कटौती की गई. घास की पैदावार को बढ़ाने के लिए वार्षिक वन की झाड़ियों को जलाने की जो प्रथा थी उसे संरक्षित वनों के एक मील की दूरी के अंदर तक मना कर दिया गया. साथ ही वन सुरक्षा कर्मचारी नियुक्त कर दिए गए. जिसका प्रभाव स्थानीय लोगों विशेष रूप से महिलाओं पर पड़ा. क्योंकि उनका जीवन पूर्णतः जंगलों पर आश्रित था. इसके विरोध में ‘जंगलों को जलाया गया. यह जलाना विरोध का प्रदर्शन था. इसमें चीड़ के जंगल व्यापक रूप से जलाए गए. जलाए जाने की 395 घटनाएं दर्ज हुई जिन्होंने अंदाजन 246,000 एकड़ जंगल को प्रभावित किया’. प्रभाव स्वरूप प्रशासन द्वारा ‘कुमाऊँ ग्रीवान्सिस कमिटी’ स्थापित की गई और रिपोर्ट में पाया गया कि ‘नियमों को लागू करवाने के लिए जिन वन सुरक्षा कर्मचारियों को नियुक्त किया गया था वह महिलाओं और बच्चों के कामों में दखल देते थे’.

महिलाओं के जंगल पर दावे व उनकी दैनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ग्रीवान्सिस कमिटी ने सिफारिश की. जिसका नतीजा रहा कि ‘नए आरक्षित वनों के 7,500 वर्ग कि.मी. से 4,460 वर्ग कि.मी. वनों को वन विभाग से हटाकर लोगों के हक को वापिस स्थापित कर राजस्व विभाग को सौप दिया गया’. साथ ही 1930 में वन पंचायतों (ग्राम वनों) के निर्माण की इजाज़त दी गई. उतराखंड में पर्यावरण को लेकर यह पुरूषों और महिलाओं का छोटे स्तर पर पहला आंदोलन रहा.

अपने ही जंगलों से दैनिक जीवन की कुछ मूलभूत सामग्री लेने पर वन संरक्षण कानून के तहत महिलाओं को अपराधी व चोर बना दिया गया. ‘न्यायालय में उनके ख़िलाफ दर्ज अपराधों में 75 प्रतिशत वन छटाई पर लगाए गए प्रतिबंधो से जुड़े मामले थे’ . महिलाओं के जंगल पर दावे व उनकी दैनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ग्रीवान्सिस कमिटी ने सिफारिश की. जिसका नतीजा रहा कि ‘नए आरक्षित वनों के 7,500 वर्ग कि.मी. से 4,460 वर्ग कि.मी. वनों को वन विभाग से हटाकर लोगों के हक को वापिस स्थापित कर राजस्व विभाग को सौप दिया गया’. साथ ही 1930 में वन पंचायतों (ग्राम वनों) के निर्माण की इजाज़त दी गई. उतराखंड में पर्यावरण को लेकर यह पुरूषों और महिलाओं का छोटे स्तर पर पहला आंदोलन रहा.

वनों के संरक्षण और अपने आस-पास के जीवन और रोजी-रोटी को बचाने में उत्तराखण्ड की महिलाओं का विशेष योगदान रहा है. यह महिलाएं भले ही अशिक्षित थी परंतु प्रकृति से कैसे तादात्मय बनाए रखना है और कैसे पहाड़ से जीवन की उत्पति करनी है, इन रहस्यों को जानती थीं. पर्यावरण को लेकर दूसरा आंदोलन 26 मार्च 1974 को होता है जो आज़ादी के बाद का पहला पर्यवारण आंदोलन था. जो दसौली ग्राम सेवा संघ (डी.जी.एस.एस) के मंडल गाँव से शुरू होकर अलकनंदा घाटी के कई गांवों में फैलता है. यह विरोध जो बाद में आंदोलन का रूप अख्तियार करता है वन अधिग्रहण अधिनियम के प्रावधानों का ही परिणाम था. जहाँ गाँव के लोगों को अपने ही जगलों से अपनी कृषि की जरूरतों के लिए लकड़ी काटने की इजाजत नहीं दी जाती और वहीं इलाहाबाद की साइमन कंपनी को टैनिस, बैटमिन्टन जैसे खेलों का सामान बनाने के लिए 2451 पेड़ काटने का ठेका दे दिया जाता है. गाँव के लोग इसके विरुद्ध नहीं थे बल्कि उनका कहना था पहले ‘उनकी खेती की जरूरते पूरी की जाए फिर खेल की’. मगर ऐसा नहीं होता और आंदोलन को दबाने के लिए सरकार पुराने भूमि अधिग्रहण के मुआवजे की घोषणा का सहारा लेती है जिसके लिए सभी पुरुष चमौली चले जाते हैं. दूसरी ओर ठेकेदार और अधिकारी रेनी जंगलों की कटाई आरंभ कर देते हैं. ऐसे समय में गौरा देवी के नेतृत्व में महिला मंडल दल की 27 औरतें पेड़ों की रक्षा के लिए पेड़ों से चिपक जाती हैं और ठेकेदारों और वन अधिकारियों का विरोध करती हैं और कहती हैं ‘यह जंगल हमारा मायका है/ हम अपनी पूरी ताकत से इसे बचाएंगी. रेनी गाँव की घटना से पहले आंदोलन पूरी तरह मर्दों का मामला था. परंतु इस घटना के बाद चिपको आंदोलन के संघर्ष में महिलाओं की भूमिका बढ़ने लगी. इसी क्रम में 1 फरवरी को अडवाणी गाँव में पेड़ों की रक्षा में वहाँ की महिलाएं यह कहते हुए, पेड़ों पर चिपक गई ‘पेड़ नहीं, हम कटेंगी’, 9 फरवरी 1978 को नरेन्द्र नगर, 25 दिसंबर 1978 को मालागाड्डी क्षेत्र से होता हुआ पूरे उत्तराखंड में फैला यह आंदोलन महिलाओं का आंदोलन बना.

वनों के संरक्षण के साथ-साथ महिलाओं द्वारा 1990 में बीज बचाओं आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भागीदारी दी गई. भले ही आंदोलन के अगुआ पुरूष रहे बावजूद जमीनी स्तर पर इसे महिलाओं ने पोषित किया. इस अभियान के दौरान गाँव-गाँव जाकर परम्परागत बीज इक्कठे किए गए, उन्हें गाँव वालों को वितरित किया गया तथा उनको खेतों में जाकर बोया गया. इस अभियान से चावल की लगभग 200 किस्मों, राजमा की 150 किस्मों तथा बीजों की कई प्रजातियों को लुप्त होने से बचाया गया. मैत्री योजना 1995 में उत्तराखंड के नंगे पहाड़ों को फिर से हरा-भरा करने के लिए चलाया गया आंदोलन था. इसमें विवाह पूर्व लडकियाँ वृक्ष के पौधों को तैयार करती हैं तथा विवाह की तिथि को बतौर यादगार नव विवाहित दंपतियों द्वारा पौधों को निर्धारित वन क्षेत्र में रोपा जाता है. उत्तराखंड में महिलाएं परिवार की पोषक होती हैं क्योंकि पुरुष रोजगार के सिलसिले में अधिकतर बाहर रहते हैं. ऐसे में प्रकृति ही पहाड़ी महिलाओं के जीवन का सहारा या उनकी संगिनी होती है. जिससे इनका अटूट जुड़ाव पर्यावरण आंदोलन के समय देश को देखने को मिला.

नारीवादी आंदोलन की जब भी बात कही जाती है तो पहले पश्चिम को ही मानदंड के तौर पर आगे रखा जाता है. वास्तविकता जबकि यह है कि पहाड़ी महिलाओं का जंगल बचाओं आंदोलन भारत में नारीवादी आंदोलन का पहला कदम था. जिसमें वह केवल पर्यावरण अर्थात जंगलों के बचाव के मुद्दों को ही नहीं उठाती बल्कि अपने स्वयं के अस्तित्व के लिए भी संघर्ष करती हैं क्योंकि उनका पूरा जीवन ‘जल, जंगल, जमीन’ अर्थात प्रकृति प्रदत्त संसाधनों पर ही आश्रित रहा है. महिलाओं का पर्यावरण से संबंध पुराना रहा है भले उन्हें पहचान चिपकों आंदोलन के बाद मिली हो. रामचंद्र गुहा उपभोग की लक्ष्मण में लिखते हैं कि ‘आधुनिक भारत में पर्यावरणवादी आंदोलनों की एक असाधारण विशेषता इनमें महिलाओं द्वारा निभाई गई अहम् भूमिका है. वो काटे जा रहे जंगलों, अनियंत्रित खनन, विस्थापन और बड़े पैमाने पर मछली मारने के ख़िलाफ सड़कों पर उतरी हैं. वे नंगी पहाड़ियों पर पौधे लगा रही हैं, जलापूर्ति के स्थानीय स्रोतों का संरक्षण कर रही हैं और ऊर्जा-सक्षम तकनीक का प्रोत्साहन करने में जुटी हैं’. यहाँ लेखकों ने पर्यावरण आंदोलन के नारीवादीकरण अर्थात इको फेमिनिस्ट (Eco-Feminist) संदर्भ में व्याख्या की है. यहाँ महिलाओं का नजरिया मुख्य है ऐसे में उन्हें साथ लेकर चलना आवश्यक है. महिलाएं प्रकृति के करीब मानी जाती है क्योंकि वह जीवन देती है और उसका भरण-पोषण करती हैं या कहें कि प्रकृति अपने स्वभाव में फेमिन होती है. एक महिला के समान वह भी उत्पादन क्रम से जुड़ी होती है. प्रकृति और स्त्री के बीच का यही तादात्म्य उसे अधिक करीब लाता है. पारिस्थितिकी नारीवाद इसी तादात्म्य की बात करता है और महिलाओं को साथ लेकर चलने की बात कहता है. वह विकास में महिलाओं के नजरिए की महत्ता को स्वीकारता है.

 (उत्तराखण्ड के मासी गाँव में जन्म, जो इनके नाम से पहचाना जा सकता है. पहाड़ से दिल्ली फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा तक का विद्यार्थी एवं शोधार्थी जीवन. महिला मुद्दों को लेकर सक्रिय भागीदारी एवं पत्र-पत्रिकाओं व दैनिक राष्ट्रीय अख़बारों में स्वतंत्र लेखन. वर्तमान समय में दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेज के अंतर्गत अतिथि शिक्षक के रूप में कार्यरत.)

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