September 23, 2020
Home Posts tagged कुमाऊंनी
संस्मरण

बाजार ने कौतिक की रौनक भी छीन ली

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—45 प्रकाश उप्रेती आज बात “कौतिक” की. साल भर जिसका इंतजार बच्चे, बूढ़े, बड़े सबको रहता था, वह कौतिक था. कौतिक मतलब “मेला” हुआ. कौतिक की तब इतनी हाम थी कि परदेश गए लोग भी कौतिक पर घर पहुंच जाते थे. मासाब कौतिक के दिन हाज़िरि लगाकर छोड़ देते
संस्मरण

सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों की पुरोधा-आमा 

आमा के हिस्से का पुरुषार्थ डॉ गिरिजा किशोर पाठक  कुमाऊँनी में एक मुहावरा बड़ा ही प्रचलित है “बुढ मर, भाग सर” (old dies after a certain age at the same times he transmits rituals, and traditions) यानी कि जो बुज़ुर्ग होते हैं वे सभ्यता, सांस्कृतिक परंपराओं के स्थंभ होते हैं. इन्हीं से अगली पीढ़ी को […]
संस्मरण

सौण कम न भादौ

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—24 प्रकाश उप्रेती आज बात- बरसात, रात, सूखा, ‘गोल्देराणी’ पूजना और पहाड़ की. पहाड़ में बरसात के दिन किसी आफ़त से और रातें आपदा से कम नहीं होती थीं. चौमास में ‘झड़’ (कई दिनों तक लगातार बारिश का होना) पड़ जाते थे तो वहीं बे-मौसम बारिश सबकुछ बहा ले […]
उत्तराखंड

लोक संस्कृति में रंग भरने वाला पहाड़ का चितेरा  

ललित फुलारा भास्कर भौर्याल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. उम्र सिर्फ 22 साल है. पर दृष्टिकोण और विचार इतना परिपक्व कि आप उनकी चित्रकारी में समाहित लोक संस्कृति और आंचलिक परिवेश को भावविभोर होकर निहारते रह जाएंगे. उनके चटक रंग बरबस ही अपनी दुनिया में खोई हुई आपकी एकाग्रता, को अपनी तरफ खींच लेंगे. वो […]
समसामयिक

लोक के चितेरे जनकवि हीरा सिंह राणा

डॉ. अरुण कुकसाल लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा, फिर भोला उज्याला होली, कां रोली राता 12 नवम्बर, 2019 की रात वैकुंठ चतुर्दशी मेला, श्रीनगर (गढ़वाल) में गढ़-कुमाऊंनी कवि सम्मेलन के मंच पर नरेन्द्र सिंह नेगीजी एवं अन्य कवियों के मध्य जनकवि हीरा सिंह राणाजी भी शोभायमान थे. प्रिय मित्र चारू तिवारीजी एवं विभोर बहुगुणाजी […]
इतिहास

गढ़वाल की सैन्य परंपरा का प्रारम्भिक महानायक

लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी (सन् 1829 – 1896) डॉ. अरुण कुकसाल ‘जिस अंचल में बलभद्र सिंह जैसे वीरों का जन्म होता है, उसकी अपनी अलग रेजीमेंट होनी ही चाहिए.’ कमान्डर इन चीफ, पी. रोबर्टस ने सन् 1884 में तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड डफरिन को गढ़वालियों की एक स्वतंत्र बटालियन के गठन के प्रस्ताव की […]
समसामयिक

अपनी संस्कृति से अनजान महानगरीय युवा पीढ़ी

अशोक जोशी पिछले कुछ सालों से मैं उत्तराखंड के बारे में अध्ययन कर रहा हूं और जब भी अपने पहाड़ों के तीज-त्योहारों, मेलों, मंदिरों, जनजातियों, घाटियों, बुग्यालो, वेशभूषाओं, मातृभाषाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों, धार्मिक यात्राओं, चोटियों, पहाड़ी फलों, खाद्यान्नों, रीति-रिवाजों के बारे में पढ़ता हूं तो खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूं कि मैंने देवभूमि उत्तराखंड के […]