October 22, 2020
समसामयिक

संकट में है आज विश्वमैत्री का प्रतीक हिमालय पुष्प ‘ब्रह्मकमल’

2 अगस्त विश्वमैत्री दिवस पर विशेष

  • डॉ. मोहन चन्द तिवारी

आज 2अगस्त प्रथम रविवार के दिन को अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर मैं विश्वमैत्री का संदेश देने वाले संजीवनी तुल्य हिमालय के दुर्लभ पुष्प ‘ब्रह्मकमल’ के सम्बंध में सभी पर्यावरण प्रेमी मित्रों को बताना चाहता हूं कि खलजनों की मित्रता के समान भारतराष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक यह उत्तराखंड का राज्यपुष्प ‘ब्रह्मकमल’ आज संकट के दौर में है.

‘ब्रह्मकमल’ ऊँचाई वाले क्षेत्रों का एक दुर्लभ पुष्प है जो कि सिर्फ हिमालय,उत्तरी बर्मा और दक्षिण-पश्चिम चीन में पाया जाता है.

वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से ‘ब्रह्मकमल’ एस्टेरेसी कुल का पौधा है. इसका वैज्ञानिक वानस्पतिक नाम ‘सोसेरिया ओबोवेलाटा’ Saussurea obvallata है.सामान्य तौर पर ‘ब्रह्मकमल’ हिमालय की पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है. वर्तमान में भारत में इसकी लगभग 61प्रजातियों की पहचान की गई है जिनमें से 58 प्रजातियाँ हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं. उत्तराखंड में यह विशेष तौर पर पिण्डारी से लेकर चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदार नाथ तक पाया जाता है.

वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से ‘ब्रह्मकमल’ एस्टेरेसी कुल का पौधा है. इसका वैज्ञानिक वानस्पतिक नाम ‘सोसेरिया ओबोवेलाटा’ Saussurea obvallata है.सामान्य तौर पर ‘ब्रह्मकमल’ हिमालय की पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है. वर्तमान में भारत में इसकी लगभग 61प्रजातियों की पहचान की गई है जिनमें से 58 प्रजातियाँ हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं. उत्तराखंड में यह विशेष तौर पर पिण्डारी से लेकर चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदार नाथ तक पाया जाता है.भारत के अन्य भागों में इसे और भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसै – हिमाचल में ‘दूधाफूल’, कश्मीर में ‘गलगल’ और उत्तर-पश्चिमी भारत में ‘बरगनडटोगेस.

उत्तराखंड का राज्यपुष्प है ब्रह्मकमल
‘ब्रह्मकमल’ की विशेषता यह है कि यह पुष्प कमल की प्रजातियों के समान पानी में नहीं बल्कि धरती पर खिलता है. माना जाता है कि ‘ब्रह्मकमल’ के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है और वह भी सिर्फ रात्रि में ही खिलता है.दुर्लभता दिव्यता और दैवीय गुणों से युक्त होने के कारण ‘ब्रह्मकमल’ को धार्मिक दृष्टि से अतिशुभ माना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार ‘ब्रह्मकमल’ को इसका नाम सृष्टि के देवता ब्रह्मा के नाम पर मिला है. केदारनाथ धाम, बद्रीधाम, हेमकुण्ड साहिब यात्रा करने वाले तीर्थयात्री ‘ब्रह्मकमल’ पुष्प से पूजा अर्चना करना अपना सौभाग्य मानते हैं.इन्हीं विलक्षण गुणों के कारण ‘ब्रह्मकमल’ को उत्तराखंड का राज्य पुष्प भी घोषित किया गया है.

असल में उत्तराखंड हिमालय के इस अति प्राचीन सांस्कृतिक पुष्प ‘ब्रह्मकमल’ के साथ वैदिक संस्कृति का इतिहास और सुनहरी यादें भी जुड़ी हुईं हैं,जिनका संबंध विश्वमैत्री का साम्राज्य स्थापित करने वाले वैदिक मंत्रद्रष्टा ऋषि ‘विश्वामित्र’ से है. वैदिक आर्यों का आदि निवास स्थान उत्तराखंड हिमालय रहा है. इस नाते भी भारत के सांस्कृतिक इतिहास का यदि अवलोकन किया जाए तो ‘ब्रह्मकमल’ भारतराष्ट्र की भौगोलिक पहचान से जुड़ा एक ऐतिहासिक पुष्प भी है. ‘ब्रह्मकमल’ के दिव्य सौंदर्य और उसकी मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था. लोग शायद कम ही जानते हैं कि वैदिक काल में इस भारत देश को ‘ब्रह्मदेश’ के नाम से जाना जाता था. ऋग्वेद,(3.53.12) में इसका स्पष्ट उल्लेख आया है-
“विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रहमेदं भारतं जनम्” 

‘ब्रह्मदेश’ के नाम से विख्यात उत्तराखंड का यह पर्वतीय भूभाग बौद्धकाल से पहले आर्य संस्कृति का मुख्य केन्द्र रहा था.यही भूभाग आर्यों का मूल निवास स्थान भी था. किसी जमाने में सरस्वती नदी इसे अन्न-धन से उपजाऊ बनाए रखती थी. गृत्समद ऋषि ने एक वैदिक मंत्र में सरस्वती नदी से ‘ब्रह्म’ नामक इस देश को अन्न धन और बल से भरपूर रखने की शुभकामना व्यक्त की है –
“इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व
वाजिनीवती” -ऋग्वेद‚ 2.41.18

उत्तराखंड के बागेश्वर में बहने वाली सरयू नदी भी कैलाश मानसरोवर में ‘ब्रह्मसर’ से उत्पन्न होती है. चीनी यात्री इत्सिंग” (672ई.) ने इस पर्वतीय प्रदेश का तत्कालीन नाम ‘ब्रह्मराष्ट्र’ बताया है. ‘ब्रह्म’ नाम से प्रसिद्ध ‘ब्रह्मपर्वत’ ‘ब्रह्मपुर’ नामक नगर कुमाऊं और गढ़वाल में आज भी मौजूद हैं. ‘मानसखंड’ में रामायण कालीन ‘संजीवनी बूटी’ के उद्भव  स्थान द्रोणगिरि पर्वत की जिस भौगोलिक स्थिति का वर्णन आया है, वह अल्मोड़े जिले के द्वाराहाट में ‘ब्रह्म’ पर्वत पर ही विराजमान है, जिसे आज ‘द्रोणगिरि’ या ‘दुनागिरि’ वैष्णवी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है.

हिमालय क्षेत्र की हिमाचल और उत्तराखंड सरकारों को अब इन ‘ब्रह्मकमलों’ की सुरक्षा के लिए तत्काल कोई कदम उठाना चाहिए. शायद अपनी राष्ट्रीय संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहर से बेखबर लोगों को यह मालूम नहीं है कि वर्त्तमान काल में ‘संजीवन बूटी’ को लेकर जिन विभिन्न जड़ी बूटियों की खोज और उन पर अनुसंधान हो रहा है उन वानस्पतिक पौधों की सूची में ‘ब्रह्मकमल’ (‘सोसेरिया ओबोवेलाटा’) की भी प्रमुख रूप से दावेदारी है.

चिंता का विषय है कि आज अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस पर विश्वमैत्री का संदेश देने वाले संजीवनी तुल्य इस दुर्लभ ‘ब्रह्मकमल’ के अस्तित्व पर संकट के बादल गहरा रहे हैं. केदारनाथ में ब्रह्मकमल का अंधाधुँध दोहन भी इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है. इसी तरह हेमकुण्ट साहिब यात्रा में भी ‘ब्रह्मकमल’ को नोचने का रिवाज सा बन गया है.प्रकृति विरोधी इन अन्धभक्तों की दुष्ट हरकतों से तथा इस क्षेत्र में इस पुष्प का अंधाधुँध व्यापारिक दोहन होने के कारण खलजनों की मित्रता के समान ‘ब्रह्मकमलों’ की विभिन्न प्रजातियाँ आज विलुप्ति के कगार पर हैं.

यह कैसी विडम्बना है कि एक ओर जहां उत्तराखंड सरकार ‘संजीवनी बूटी’ को खोजने का अभियान समय समय पर चलाती आई है तो दूसरी ओर इस प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर स्वरूप संजीवनी पुष्प ‘ब्रह्मकमल’ की विभिन्न प्रजातियों का अस्तित्व संकट में है. बद्रीधाम मंदिर समिति ने उत्तराखंड सरकार से इनके संरक्षण के लिए कई बार गुहार भी लगाई है. हिमालय क्षेत्र की हिमाचल और उत्तराखंड सरकारों को अब इन ‘ब्रह्मकमलों’ की सुरक्षा के लिए तत्काल कोई कदम उठाना चाहिए. शायद अपनी राष्ट्रीय संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहर से बेखबर लोगों को यह मालूम नहीं है कि वर्त्तमान काल में ‘संजीवन बूटी’ को लेकर जिन विभिन्न जड़ी बूटियों की खोज और उन पर अनुसंधान हो रहा है उन वानस्पतिक पौधों की सूची में ‘ब्रह्मकमल’ (‘सोसेरिया ओबोवेलाटा’) की भी प्रमुख रूप से दावेदारी है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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