पुस्तक-समीक्षा

रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं!- रवांई के लोक की अनमोल सांस्कृतिक विरासत से साक्षात्कार…

  • ग्राउंड जीरो से संजय चौहान!

शिक्षक, लेखक, कवि, लोकसंस्कृतिकर्मी और लोक से because जुड़े दिनेश रावत नई-नई पुस्तक रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं को पढने का सौभाग्य मिला. पांच अध्याय में लिखी गयी इस पुस्तक में आपको रवाई घाटी की अनमोल सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का मौका मिलेगा साथ ही यहाँ की अनूठी परम्पराओं की जानकारी भी मिलेगी जिन्हें आपने आज तक नहीं सुना होगा.

तु आया देवा, शांख क सबद, तु आया देवा ढोलू की नाद
तु आया देवा, अंग मोड़ी-मोड़ी, तु आया देवा बांगुडी बांदुऊ…

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लेखक दिनेश रावत ने देवताओं की स्तुति से ही इस because किताब की शुरुआत की है. लोक के प्रति गहरी समझ और लोक संस्कृति के सच्चे साधक की यही एक निशानी होती है. जिसके बाद किताब के अगले पन्नो में साहित्यकार डॉ प्रयाग जोशी और साहित्यकार व रवांई की पहचान महाबीर रवाल्टा जी द्वारा पुस्तक की उपयोगिता और महत्ता के बारे में अपनी अपनी लेखकीय विचार व्यक्त किये है.

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किताब के प्रथम अध्याय में लेखक द्वारा उत्तरकाशी जनपद के भौगौलिक और सांस्कृतिक परिचय देते हुये लिखा है कि यही वह क्षेत्र है जहाँ प्रकृति निरंतर हंसती, थिरकती व नृत्यमयी दिखाई देती है. गंगा यमुना की उद्गम स्थली, because पांडवों की क्रीडा स्थली, राजा भागीरथी की तपस्थली की अपनी अलग ही पहचान है. पंच कोसी यात्रा भी यही होती है. बाड़ाहाट की ये पावन भूमि है.  प्रथम अध्याय के अंत में लेखक द्वारा जनपद के पश्चिमोत्तर क्षेत्र यानी की रवांई के बारे में विस्तार से बताया है की रवांई में तीन तहसील मोरी,  पुरोला और बडकोट है, जबकि तीन ब्लाक मोरी, पुरोला और नौगावं है. यमुना, टोंस, रुपिन, सुपिन यहाँ की प्रमुख नदिया है.  इस क्षेत्र को सोनगढ़ के नाम से भी जाना जाता है. रवांई ऋषि मुनियों की तपोस्थली है, वेद मंत्रो की उत्पति एवं पांड्वो की क्रीडा स्थली है. हिमालय की गोद में बसे इस क्षेत्र की विशिष्टता है जंहा दिन का आगाज ही ढोली के ढोल से प्रभात और निशा का प्रारम्भ नौबत यानी नमती के रूप में निकलने वाले लोकबाद्यो के तालों के साथ होता है. लोक प्रचलित महाभारतकालीन संस्कृति के पदचिन्ह आज भी यहाँ सुगमता से देखे जा सकते हैं.

पढ़ें— पुस्तक ‘रवाँई क्षेत्र के देवालय एवं देवगाथाएं’ लोकार्पित

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किताब के द्वितीय अध्याय में रवांई के लोकजीवन और लोकदेवता, और लोकास्था के विविध आयामों की जानकारी देते हुए लेखक ने कहा है की यहाँ जन्म ही ज्योतिर्मय नहीं बल्कि मृत्य भी महोत्सव है. क्षेत्रीय मेले थौले, तीज त्योहर, पर्व उत्सव, कला साहित्य, नृत्य गीत संगीत, एव देवी देवता किसी न किसी रूप में धर्म आस्था से जुड़ें हैं. रवांई में पूजित लोक देवताओं में पांडव, रघुनाथ, महासू देवता, because सोमेश्वर महाराज, नागराज सहित विभिन देवी देवताओं का पूजन किया जाता है. लोक में आस्था है की इनकी पूजा से ही लोक में सुख शान्ति और समृद्धि आती है. लेखक ने किताब को लिखने में कितने पुराने इतिहास को भी लोगों के सामने लाने का प्रयास किया है इसको इन पंक्तियों से समझा जा सकता है की..दोणी गाँव के पास पुजेली ग्रामवासी चमोली के नन्दप्रयाग से आये और अपने साथ अपने कुलदेवता भी साथ लेकर आये और यहाँ स्थापित कर दिया जिन्हें नंदेश्वर महारज कहतें हैं. उक्त पंक्तिया लेखक की लोक के प्रति गहरी जानकारी, समझ और विश्वसनीयता को चरितार्थ करती है.

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लेखक ने तीसरे अध्याय में देवालयों की विशेषता, धार्मिक प्रवृतियाँ, आराधना, देवालयों की आंचलिक विशेषताओं को विस्तार से बताया है जबकि चौथे अध्याय में लेखक ने नौगावं, पुरोला और मोरी के आंचलिक देवालयों और देवगाथाओं के बारे में विस्तार से वर्णन किया है. रघुनाथ, सोमेश्वर, नागराज, महासू देवता, पोखु, लवकुश, राजराजेश्वरी, सहित तीनों ब्लाको के हर देवालय और देवगाथाओं का उल्लेख करते हुए रवांई की वैभवशाली और समृद्धशाली सांस्कृतिक विरासत को देश दुनिया के सामने रखने काअभूतपूर्व कार्य किया है. साथ ही अपने लोक को नहीं पहचान दिलाई है. because रघुनाथ मंदिर में खिलने वाले नगरासू के फूल के बारे में भी पहली बार जानकारी इसी पुस्तक से मिली. बनाल के लोग कहते है की हमारे देवता कोठार नहीं बनाने देते है, कोठार बनाने वाले पर देवता दोष लग जाते हैं इसके पीछे की कहानी भी आपको इस पुस्तक में पढने को मिलेगी. .सोमेश्वर देवता की एतिहासिक लोक गाथा भी आपको इस पुस्तक में पढने को मिलेगी. पशु प्रेम के अनूठे अठूड मेला हो या फिर औतारिया नहीं स्वयं पालकी बोलती है की भूमि है नागदेवता मंदिर कुपडा… महर गांव में स्थापित राजराजेश्वरी का मंदिर 200 सालो से भी पुराना है जो इनकी आराध्य देवी है. वहीं सर बडियार क्षेत्र के देवी देवताओं की बारे में भी इस पुस्तक में जानकारी है. पोखु देवता को क्षेत्र का सर्वोच्च न्यायालय की जानकारी भी आपको इसी किताब में पढने को मिलेगी.

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लेखक ने पंचम आध्याय में प्रचलित महाभारतकालीन परम्परा और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी इसमें दी है..

पढ़ें— रवांई घाटी यानी अतिथि देवो भव: की समृद्ध परंपरा

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है की रवांई की अनमोल सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानना है तो तो दिनेश रावत की रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं में आपको सब कुछ मिल जाएगा. रुपिन-सुपिन से लेकर because यमुना टोंस नदी के लोक की हर लोकसंस्कृति… लेखक ने रवांई के देवालयों और देवगाथाओं की जो जानकारी दी है वो अनुपम व अद्वितीय है. पुस्तक को पढने पर ऐसा लगता है कि आप साक्षात रवांई घाटी में हो और इन देवालयों का दर्शन कर रहे हो. ये पुस्तक न केवल लोक को जानने वालों के लिए उपयोगी है अपितु प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे और उत्तराखंड की संस्कृति पर शोध करने वाले युवाओं के लिए बहुपयोगी साबित हो सकती है.. यही नहीं इस पुस्तक को उत्तराखंड के हर पुस्तकालय में होना चाहिये तभी लोगों को उत्तराखंड के हर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जानने का अवसर मिल सकेगा. आप सब भी इस बेहतरीन पुस्तक को एक बार जरूर पढें..

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रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं because पुस्तक के लेखक दिनेश रावत जी को इस ऐतिहासिक पुस्तक के लिए बहुत-बहुत  बधाई. रघुनाथ भगवान, नागराज, सोमेश्वर, पोखु, और महासू देवता की आप पर सदा कृपा बनी रहें और आने वाले समय में नई-नई पुस्तकों के जरिये लोक को समृद्ध बनायें..

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