Tag: लोकजीवन

हिमालयी सरोकारों को समर्पित हिन्दी मासिक पत्रिका “हिमालय संवाद” का लोकार्पण सम्पन्न

हिमालयी सरोकारों को समर्पित हिन्दी मासिक पत्रिका “हिमालय संवाद” का लोकार्पण सम्पन्न

उत्तराखंड हलचल
 देहरादून ब्यूरो, देहरादून हिमालयी समाज, पर्यावरण, लोकजीवन, ग्रामीण पर्यटन, संस्कृति तथा विकास संबंधी विषयों पर केंद्रित हिन्दी मासिक पत्रिका "हिमालय संवाद" का लोकार्पण आज देहरादून स्थित ऑफिसर्स ट्रांजिट हॉस्टल के ऑडिटोरियम में आयोजित एक गरिमामय समारोह में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े शिक्षाविदों, साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों, शोधकर्ताओं तथा प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता की। समारोह के दौरान वक्ताओं ने हिमालय के बढ़ते महत्व और उसके समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हिमालय केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, संस्कृति, जल स्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति, अनियोजित विकास, पलायन, जैव विविधता के क्षरण और...
बूंदेली “सावनी” और चपेटे

बूंदेली “सावनी” और चपेटे

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-31मंजू कालालोकजीवन की सरिता सुख और दुःख के दो किनारों के बीच निरंतर बहती रहती है. यह सही है कि लोकोत्सव सुख के तट पर उगे हरे-भरे वृक्ष हैं, जो अपनी खुराक सुख-दुःख से बँधी जलराशि से ही लेते हैं, लेकिन यह भी असत्य नहीं है कि दुःख का किनारा टूट जाने पर सरिता की अस्मिता खत्म हो जाती है और फिर वृक्षों के उगने का सवाल ही नहीं उठता. मतलब यह है कि लोकोत्सवों का जन्म जीवन की उन घटनाओं से जुड़ा हुआ है, जो सुख-दुःख पर निर्भर न होकर उनकी उपयोगिता के महत्त्व से संबद्ध हैं. राम् नवमी और जन्माष्टमी राम और कृष्ण के महत्कार्यों और लोकादर्शों को सामने रखकर मनायी जाती हैं. महापुरुषों की जयंतियाँ मृतकों के प्रति श्रद्धा -सम्मान का नैवेद्य है. मृतकों या उनकी स्मृति से जुड़ी दुःख की अनुभूति धीरे-धीरे उनके कार्यों, आदर्शों और तज्जन्य यश पर केन्द्रित होकर सुखात्मक हो जाती है. फिर इस देश की ...
रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं!- रवांई के लोक की अनमोल सांस्कृतिक विरासत से साक्षात्कार…

रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं!- रवांई के लोक की अनमोल सांस्कृतिक विरासत से साक्षात्कार…

पुस्तक-समीक्षा
ग्राउंड जीरो से संजय चौहान!शिक्षक, लेखक, कवि, लोकसंस्कृतिकर्मी और लोक से because जुड़े दिनेश रावत नई-नई पुस्तक रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं को पढने का सौभाग्य मिला. पांच अध्याय में लिखी गयी इस पुस्तक में आपको रवाई घाटी की अनमोल सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का मौका मिलेगा साथ ही यहाँ की अनूठी परम्पराओं की जानकारी भी मिलेगी जिन्हें आपने आज तक नहीं सुना होगा. तु आया देवा, शांख क सबद, तु आया देवा ढोलू की नाद तु आया देवा, अंग मोड़ी-मोड़ी, तु आया देवा बांगुडी बांदुऊ…ज्योतिष लेखक दिनेश रावत ने देवताओं की स्तुति से ही इस because किताब की शुरुआत की है. लोक के प्रति गहरी समझ और लोक संस्कृति के सच्चे साधक की यही एक निशानी होती है. जिसके बाद किताब के अगले पन्नो में साहित्यकार डॉ प्रयाग जोशी और साहित्यकार व रवांई की पहचान महाबीर रवाल्टा जी द्वारा पुस्तक की उपयोगिता और महत्ता के बारे में ...