समसामयिक

शिक्षा और परीक्षा : साख बहाल करने का सवाल!

शिक्षा और परीक्षा : साख बहाल करने का सवाल!

शिक्षा, समसामयिक
प्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा   मेडिकल प्रवेश परीक्षा यानी ‘नीट’ में पेपर लीक की ताजी घटना ने एक बार फिर पूरे देश को खास तौर पर युवा और किशोर वर्ग को झकझोर दिया है। देश भर के लाखों परीक्षार्थियों के वर्षों के परिश्रम और उनकी ख़ुद की और परिवार वालों की आशाओं और आकांक्षाओं सब पर पानी फिर गया। बड़े परिश्रम और अच्छे खासे पैसे लगा कर कोचिंग आदि से तैयारी कर परीक्षा की दहलीज पर पहुंचने के बाद कुछ थोड़े से धनलोलुप आपराधिक तत्वों की करतूत ने युवा वर्ग को बड़ा निराश किया। वे अब कुंठा और अनिश्चय के दौर में पहुँच रहे हैं। पर यह घटना किसी भी तरह आकस्मिक तो नहीं ही कही जा सकती क्योंकि पिछली परीक्षा में हुई नीट पेपर लीक की सीबीआई जांच अभी ख़त्म नहीं हुई है। वह कब पूरी होगी और उसका क्या हस्र होगा किसी को नहीं मालूम । अर्थात् यह त...
“वंदे मातरम्” है भारत की साकार अंतश्चेतना

“वंदे मातरम्” है भारत की साकार अंतश्चेतना

समसामयिक, साहित्‍य-संस्कृति
 प्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा  वैश्विक स्तर पर भारत सदियों से अनेक देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा है. यह तथ्य अनेक साक्ष्यों से बहुश: प्रमाणित है कि प्राचीन भारत की भौतिक समृद्धि से प्रभावित हो खिंचे आए विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत का अनेक प्रकार से शोषण और दोहन किया और अनैतिक ढंग से विभिन्न क्षेत्रों में और विभिन्न अवधि के लिए अपना अनधिकृत आधिपत्य जमाया. इस प्रक्रिया में भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य और जीवन पद्धति में अनेक परिवर्तन आए. इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी के रूप में बर्तानवी (अंग्रेजी )उपनिवेश की लगभग दो सौ वर्षों की त्रासदी थी. यह इस अर्थ में विशेष अर्थ रखती है कि इस दौर में देश को न केवल भौतिक और आर्थिक क्षति पहुँची अपितु दुर्भाव के साथ उसमें मानसिक रूप से भी बदलाव भी लाया गया. शिक्षा के क्षे...
‘विकसित भारत 2047’ हकीकत या दिवास्वप्न

‘विकसित भारत 2047’ हकीकत या दिवास्वप्न

साहित्‍य-संस्कृति, समसामयिक
नेत्रपाल सिंह यादव निदेशक पॉलिसी & रिसोर्स मैनेजमेंट सेंटर भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी के जैसे-जैस करीब पहुंच रहा है, ऐसे में यह देश एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. 2047 तक भारत को एक विकसित देश में बदलने का महत्वाकांक्षी एजेंडा, जिसे “नए भारत” के रूप में जाना जाता है. एक व्यापक खाका है जिसमें आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता शामिल है. यह आलेख एंथ्रोपोलॉजिकल लेंस से इस विज़न के महत्वपूर्ण पहलुओं पर गहराई से चर्चा करता है. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विकास तथा सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता एवं मानव विकास के समग्रता का संपूर्णता में विश्लेषण करता है. आधुनिक विकास के मानकों में आर्थिक विकास स्थिति की भूमिका का महत्वपूर्ण योगदान रहता हैं जिसके तहत किसी भी राष्ट्र या आधुनिक राज्य (Nation & State) की वहां के नागरिक की ‘प्रति व्यक्ति आय’ (Per capita income) से ज...
पर्वतीय राज्य का  स्वप्न 24 वर्षों के बाद भी रहा अधूरा

पर्वतीय राज्य का  स्वप्न 24 वर्षों के बाद भी रहा अधूरा

समसामयिक, उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस, उत्तराखंड हलचल
प्रकाश उप्रेती सहायक प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली उत्तराखंड 25वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। 9 नवंबर की तारीख़ पर्वतीय राज्य का सपना देखने वालों के लिए ऐतिहासिक महत्व की है। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक- 2000 को 1 अगस्त की देर शाम जब लोक सभा ने ध्वनिमत से पारित किया तो देश के नक्शे पर 27वें राज्य के रूप में उत्तराखंड (पर्वतीय राज्य की माँग के साथ) बनने का रास्ता साफ हुआ। 10 अगस्त को इस बिल को मंजूरी देने के पश्चात राष्ट्रपति ने 28 अगस्त , 2000 को राज्य के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी। अटल बिहारी बाजपेयी जी की सरकार ने 1 नवंबर, 2000 को उत्तराखंड की पहली सरकार गठन करने का फैसला किया, लेकिन पता चला कि उक्त दिन "ग्रह नक्षत्रों" के हिसाब से "शुभ" नहीं है। "शुभ" की आशा में 9 नवंबर, 2000 को नए राज्य ने आकार ग्रहण किया।मानवजनित आपदाओं के प्रकोप से काँपते हुए जवानी की दहलीज तक पहुं...
कैसी हो उत्तराखंड में पत्रकारिता?

कैसी हो उत्तराखंड में पत्रकारिता?

साहित्‍य-संस्कृति, समसामयिक
सुरेश नौटियाल, वरिष्ठ पत्रकार कई साल पहले, ब्रिटिश उच्चायोग के प्रेस एवं संपर्क विभाग ने नई दिल्ली में “भाषाई पत्रकारिता: वर्तमान स्वरूप और संभावनाएं” विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया था। जनसत्ता के तत्कालीन सलाहकार संपादक प्रभाष जोशी ने इस गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा था: “मैंने अपनी जिंदगी के नौ साल अंग्रेजी पत्रकारिता में व्यर्थ किए, क्योंकि इस देश में जनमत बनाने में अंग्रेजी अखबारों की भूमिका नहीं हो सकती है।” इसी आख्यान में प्रभाष जोशी ने कहा कि अंग्रेजी इस देश में सोचने-समझने की भाषा तो हो सकती है लेकिन महसूस करने की नहीं। और जिस भाषा के जरिए आप महसूस नहीं करते, उस भाषा के जरिए आप लोगों को इतना प्रभावित नहीं कर सकते कि वे अपनी राय, अपने तौर-तरीके आदि बदल सकें। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी और अंग्रेजी में लिखने पर पाठक वर्ग में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया होती है। केवल भाषाई अखबार ही लो...
पृथ्वी पर ही जीवन है, बचा लें!

पृथ्वी पर ही जीवन है, बचा लें!

समसामयिक
पृथ्वी दिवस पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  अपने दौड़ भाग भरे व्यस्त दैनिक जीवन में हम सब कुछ अपने को ही ध्यान में रख कर सोचते-विचारते हैं और करते हैं. हम यह भूल जाते हैं कि यह पृथ्वी जिस पर हमारा आशियाना है मंगल, बुध की ही तरह का एक ग्रह है जो विशाल सौर मण्डल का एक सदस्य है . पृथ्वी के भौतिक घटक जैसे स्थल, वायु, जल, मृदा आदि जीव मंडल में जीवों को आश्रय देते हैं और उनके विकास और सवर्धन के लिए ज़रूरी स्रोत उपलब्ध कराते हैं. यह भी गौर तलब है कि अब तक के ज्ञान के हिसाब से धरती ही एक ऐसा ग्रह है जहां जीवन है. इस धरती पर हमारा पर्यावरण एक  परिवृत्त  की तरह है जिसमें वायु मंडल, जल मंडल, तथा स्थल मंडल के अनेक भौतिक और रासायनिक तत्व मौजूद रहते हैं. जैविक और अजैविक दोनों तरह के तत्वों से मिल कर धरती पर संचालित होने वाला पूरा जीवन-चक्र निर्मित होता है . इस जीवन-चक्र का आधार सिद्धांत विभिन्न तत्व...
सार्वजनिक जीवन में मर्यादा की जरूरत है   

सार्वजनिक जीवन में मर्यादा की जरूरत है   

समसामयिक
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  देश को स्वतंत्रता मिली और उसी के साथ अपने ऊपर अपना राज स्थापित करने का अवसर मिला. स्वराज अपने आप में आकर्षक तो है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके साथ जिम्मेदारी भी मिलती है. स्वतंत्रता मिलने के बाद स्वतंत्रता का स्वाद तो हमने चखा पर उसके साथ की जिम्मेदारी और कर्तव्य की भूमिका निभाने में ढीले पड़ कर कुछ पिछड़ते गए. देश को देने की जगह शीघ्रता और आसानी से क्या पा लें because इस चक्कर में भ्रष्टाचार, भेद-भाव तथा अवसरवादिता आदि का असर बढ़ने लगा. इसीलिए देश के आम चुनावों में कई बार भ्रष्टाचार एक मुख्य मुद्दा बनता रहा है और देश की जनता उससे मुक्ति पाने के लिए वोट देती रही है. परन्तु परिस्थितियों में जिस तरह का बदलाव आता गया है उसमें देश की राजनैतिक संस्कृति नैतिक मानकों के साथ समझौते की संस्कृति होती गई. ज्योतिष आज की स्थिति में धन–बल, बाहु-बल, परिवारवाद के साथ राजनीति के किर...
अनुराग ठाकुर की सांसद मोबाइल स्वास्थ्य सेवा देश भर के तमाम सांसदों के लिए प्रेरणा

अनुराग ठाकुर की सांसद मोबाइल स्वास्थ्य सेवा देश भर के तमाम सांसदों के लिए प्रेरणा

समसामयिक, देश—विदेश
अरविन्द मालगुड़ी देव भूमि हिमाचल जहाँ के सुदूर पहाड़ी इलाकों में बसे तमाम गांवों के लोगों को अक्सर बीमार होने की स्थिति में मुश्किलों का सामना करना पड़ता था । अस्पताल तक पहुंचने में उन्हें कई तरह की परेशानियां पेश आती थी। इसी सार्थक सोच को मूर्त रूप मिला मई 2018 में जब वर्तमान केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर द्वारा हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में शुरू की गई सांसद मोबाइल स्वास्थ्य सेवा जो आज पूरे हिमाचल के लिए मील का पत्थर बन चुकी है जिसका असल मकसद ग्रामीण इलाकों के मरीजों को अस्पतालों की भीड़ और परेशानी से निजात दिलवा कर घर-द्वार पर स्वास्थ्य लाभ देना है।अनुराग ठाकुर जी के मन में ख्याल आया कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि अस्पताल को ही जरूरतमंदों के घरों तक लाया जाए और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य की स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करने के लिए और दूर-दराज के कोने में मेडिकल सेवा की पहुंच सुनिश्चित करने के ...
जनादेश का आशय : जनता क्या चाहे?

जनादेश का आशय : जनता क्या चाहे?

समसामयिक
प्रो. गिरीश्वर मिश्र इसमें कोई संदेह नहीं कि गोवा के सागर तट , उत्तराखंड के पहाड़ , उत्तर प्रदेश कि गंगा-जमुनी मैदान और पूर्वोत्तर भारत में पर्वत-घाटी वाले मणिपुर से आने वाले चुनाव परिणामों से भारतीय जनता पार्टी की छवि राष्ट्रीय स्तर पर एक सशक्त और ऊर्जावान राजनैतिक दल के रूप में निखरी है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक नायक के रूप स्वीकृति पर फिर मुहर लगी है. इस तरह के स्पष्ट राष्ट्रव्यापी जन-समर्थन को मात्र संयोग कह कर कमतर नहीं आंका जा सकता  और  न इसे जाति, धन because और धर्म के आधार पर ही समझा जा सकता है. इसे दिशाहीन विपक्ष की मुफ़्त की सौग़ात भी कहना उचित न होगा क्योंकि जहां पंजाब के परिणाम वहाँ की सरकार के विरुद्ध गए हैं और विपक्ष को पूरा अवसर मिला था उसके ठीक विपरीत भाजपाशासित प्रदेशों में मिले मुखर जनादेश शासन में आम जन का भरोसा और विश्वास को प्रकट करते हैं. साथ साथ ही वे यह...
हाईकमान और आलाकमान की राजनीति में ‘कमानविहीन’ हुआ उत्तराखंड

हाईकमान और आलाकमान की राजनीति में ‘कमानविहीन’ हुआ उत्तराखंड

समसामयिक
प्रकाश उप्रेती उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके पिछले कुछ दिनों से भयंकर ठंड से ठिठुर रहे हैं वहीं चुनावी तापमान ने देहरादून को गर्म कर रखा है. देहरादून की चुनावी तपिश से पहाड़ के इलाके बहुत प्रभावित तो नहीं होते लेकिन दुर्भाग्य because यह है कि उनके भविष्य का फैसला भी इसी तपिश से होता है. इसलिए ही जब उत्तराखंड के लोग गैरसैंण राजधानी की माँग करते हैं तो उसके पीछे पर्वतीय प्रदेश की संरचना और जरूरतें हैं क्योंकि देहरादून की नज़र तो दिल्ली की तरफ और पीठ पहाड़ की तरफ होती है. दिल्ली ही देहरादून को चलाती है. इसलिए उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके अलग उत्तराखंड राज्य के 21 वर्ष पूरे हो जाने के बाद भी स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, जमीन, रोजगार, कृषि, जलसंकट और पलायन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं.ज्योतिष उत्तराखंड को बने 21 वर्ष हो गए हैं. इन 21 वर्षों में 11 मुख्यमंत्रियों के साथ बीजेपी- कांग्रेस की सरकारे...