खेती-बाड़ी

कीवी मेन! विक्रम बिष्ट के स्वरोजगार मॉ​डल नें पलायन को दिखाया आईना, पहाड़ में रोजगार सृजन की जगा रहे हैं अलख

कीवी मेन! विक्रम बिष्ट के स्वरोजगार मॉ​डल नें पलायन को दिखाया आईना, पहाड़ में रोजगार सृजन की जगा रहे हैं अलख

खेती-बाड़ी
ग्राउंड जीरो से संजय चौहान कुछ लोगों को पहाड़ आज भी पहाड़ नजर आता है. वहीं दूसरी ओर हमारे बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने बिना किसी शोर शराबे के चुपचाप अपनी मेहनत और हौंसलों से पहाड़ की परिभाषा because ही बदल कर रख दी है. ऐसे लोग आज पलायन की पीडा से कराह रहे पहाड़ के लिए उम्मीद की किरण नजर आ रहे हैं. आज ऐसे ही पहाडी के बारें में आपको रूबरू करवाते हैं जिन्होंने पहाड़ में स्वरोजगार का मॉ​डल तैयार करके एक उदाहरण प्रस्तुत किया है. लोग उन्हें कीवी मेन के नाम से भी जानते हैं.ज्योतिष सीमांत जनपद चमोली के कर्णप्रयाग ब्लाक की सिदोली पट्टी में गौचर से 20 किमी की दूरी पर स्थित मुल्या गांव (ग्वाड) निवासी 48 वर्षीय विक्रम सिंह बिष्ट आज लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बनें हुये हैं. उनका स्वरोजगार मॉ​डल लोगों को बेहद पसंद आ रहा है, जिस कारण लोग स्वरोजगार के लिए अपने गांव वापस लौट रहें हैं. बहुमुखी प्रत...
हिसालू की जात बड़ी रिसालू

हिसालू की जात बड़ी रिसालू

खेती-बाड़ी
उत्तराखंड के अमृतफल हिसालू का वनौषधि के रूप में परिचय डॉ. मोहन चंद तिवारीजिस भी उत्तराखंडी भाई का बचपन पहाड़ों में बीता है तो उसने हिसालू का खट्टा-मीठा स्वाद जरूर चखा होगा और इस फल को तोड़ते समय इसकी टहनियों में लगे टेढ़े और नुकीले काटों की खरोंच भी जरूर खाई होगी. वे दिन अब भी याद हैं गर्मियों में स्कूल की दो महीनों की छुट्टियों में जब भी गांव जाना होता था तो उसका एक because अनोखा परम सुख हिसालू टीपने का भी था. गर्मियों के महीने में सुबह सुबह और फिर दोपहर के बाद गांव के बच्चे हिसालू के फल तोड़ने जंगलों की तरफ निकल पड़ते और घर के सब लोग ताजे ताजे फलों का स्वाद लेते.हरताली हिसालू का दाना कई छोटे-छोटे नारंगी रंग के कणों का समूह जैसा होता है, जिसे कुमाऊंनी भाषा में 'हिसाउ गुन' कहते हैं. नारंगी रंग के हिसालू के अलावा लाल हिसालू की भी एक because प्रजाति पाई जाती है. दूनागिरि क्षेत्र मे...
भारत में पहली बार ‘मॉन्क फल’ की खेती

भारत में पहली बार ‘मॉन्क फल’ की खेती

हिमाचल-प्रदेश, खेती-बाड़ी
सीएसआईआर-आईएचबीटी, पालमपुर द्वारा की पहलजे.पी. मैठाणी/हिमाचल ब्यूरोविश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) (World Health Organization (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 422 मिलियन लोग मधुमेह से पीड़ित हैं. अतिरिक्त गन्ना शर्करा के सेवन से इंसुलिन प्रतिरोध, टाइप 2 मधुमेह, यकृत की समस्याएं, चयापचय सिंड्रोम, हृदय रोग आदि जैसी अनेक जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं. इस संबंध में, कम कैलोरी मान के कई सिंथेटिक because मिठास वाले पदार्थ हाल ही में फार्मास्युटिकल और खाद्य उद्योगों ने बाज़ार में उतारे हैं. हालांकि, आम तौर पर उनके संभावित स्वास्थ्य संबंधी कारणों के चलते उनकी व्यापक स्वीकार्यता को सीमित करती है. इसलिए, दुनिया भर के वैज्ञानिक सुरक्षित और गैर-पोषक प्राकृतिक मिठास के विकास पर लगातार काम कर रहे हैं.ज्योतिषयह पौधा लगभग 16-20 डिग्री सेल्सियस के वार्षिक औसत तापमान और आर्द्र प...
उत्तराखंड में स्‍वरोजगार का जरिया बन सकती है कैमोमाइल की खेती

उत्तराखंड में स्‍वरोजगार का जरिया बन सकती है कैमोमाइल की खेती

खेती-बाड़ी, ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-17मंजू कालाजहाँ... कैमोमाइल का फूल सुंदरता, सादगी because और शांति का प्रतीक माना जाता है, वहीं निकोटिन रहित होने के कारण  यह औषधीय गुणों से भरपूर होता है. पेट के रोगों के लिए यह रामबाण औषधि है, वहीं त्वचा रोगों में भी कैमोमाइल काफी लाभकारी है. यह जलन, अनिद्रा, घबराहट और चिड़चिड़ापन में... भी लाभकारी है. कोलकाता उत्तराखंड के... परिपेक्ष में इस जादू के फूल की...बात करें... तो भौगोलिक परिस्थितियों वाले उत्तराखंड के गांवों से हो रहे पलायन ने खेती... और… किसानी को गहरे तक प्रभावित किया है. because अविभाजित उत्तर प्रदेश में यहां आठ लाख हेक्टेयर में खेती होती थी, जबकि 2.66 लाख हेक्टेयर जमीन बंजर थी. राज्य गठन के बाद अब खेती का रकबा घटकर सात लाख हेक्टेयर पर आ गया है, जबकि बंजर भूमि का क्षेत्रफल बढ़कर 3.66 लाख हेक्टेयर हो गया है. सगंध खेती की मुहिम अब राज्य के 109 एरोम...
पहाड़ की कृषि आर्थिकी को संवार सकता है मंडुआ

पहाड़ की कृषि आर्थिकी को संवार सकता है मंडुआ

खेती-बाड़ी
चन्द्रशेखर तिवारीउत्तराखण्ड में पृथक राज्य की मांग के लिए जब व्यापक जन-आंदोलन चल रहा था तब उस समय यह नारा सर्वाधिक चर्चित रहा था - ’मंडुआ बाड़ी खायंगे उत्तराखण्ड राज्य बनायेंगे'. because स्थानीय लोगों के अथक संघर्ष व शहादत से अलग पर्वतीय राज्य तो हासिल हुआ परन्तु विडम्बना यह रही कि राज्य बनने के बाद यहां के गांवों में न तो पहले की तरह मंडुआ-बाड़ी खाने वाले युवाओं की तादात बची रही और नहीं मंडुआ की बालियों से लहलहाते सीढ़ीदार खेतों के आम दृश्य.ज्योतिष राज्य बन जाने के बाद खेती-बाड़ी और पशुपालन से जुड़े ग्रामीण युवाओं के रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों के शहरों व महानगरों की ओर रुख करने से यहां मडुआ जैसी कई because परम्परागत फसलें हाशिये की ओर चली गयीं. मंडुआ की घटती खेती को कृषि विभाग के आंकडे़ भी तस्दीक करते हैं. उत्तराखण्ड में वर्ष 2004-2005 के दौरान 131003 हेक्टेयर में मडुआ की खेती ह...
उत्तराखंड में जैविक खेती को 6100 क्लस्टर बनाये जाएंगे!

उत्तराखंड में जैविक खेती को 6100 क्लस्टर बनाये जाएंगे!

खेती-बाड़ी
डॉ. राजेंद्र कुकसालमुख्यमंत्री की कृषकों के हित में सराहनीय एवं स्वागत योग्य पहल, राज्य में गतिमान 3900 जैविक कलस्टरों की हकीकतउत्तराखंड कृषि प्रदान राज्य है जहां पर अधिकांश लोगों की आजीविका कृषि पर ही निर्भर है. राज्य का अधिकांश भाग पर्वतीय है जहां पर 65 प्रतिशत वन आच्छ्यादित हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में बर्षाbecause आधारित कृषि होती है साथ ही इस क्षेत्र में रसायनिक खाद का उपयोग बहुत कम यानी 5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर ही होता है. पहाड़ी क्षेत्रों में जैविक खेती की संभावनाओं को देखते हुए 2003 में शासन द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में शत् प्रतिशत एवं मैदानी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत स्वैच्छा से  जैविक खेती करने का निर्णय लिया गया.नेता जी चर्ष 2003 में कृषि विभाग एवं उत्तरांचल because जैविक उत्पादन परिषद द्वारा गहन विचार विमर्श के बाद जैविक कृषि मार्ग निर्देशिका (रोड़ मैप) प्रकाशित ...
पहाड़ में स्‍वरोजगार का बेहतर जरिया हो सकती है लहसुन की जैविक  

पहाड़ में स्‍वरोजगार का बेहतर जरिया हो सकती है लहसुन की जैविक  

खेती-बाड़ी
डॉ. राजेंद्र कुकसाललहसुन  पहाड़ी क्षेत्रों  की एक प्रमुख नगदी/व्यवसायिक फसल है. पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली लहसुन जैविक होने के साथ ही अधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट व औषधीय गुणों से because भरपूर भी होती है जिस कारण बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है. उद्यान विभाग के बर्ष 2015 - 16 में दर्शाये गये आंकड़ों के अनुसार राज्य में 1530.45 हैक्टर क्षेत्र फल में लहसुन की खेती की जाती है जिससे 9768.25 मैट्रिक टन उत्पादन होता है.पहाड़ीपहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिकbut रूप से उगाई जाने वाली लहसुन जैविक होने के साथ ही अधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट व औषधीय गुणों से भरपूर होती है, जिस कारण बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है.पहाड़ी जलवायु ऐसी जगह जहां न तो बहुत गर्मी हो so और न ही बहुत ठण्डा लहसुन की खेती के लिए उपयुक्त है. लहसुन की खेती 1000 से 1500 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र जहां तापमान 25 - 35...
उत्‍तराखंड में कीवी की बागवानी…

उत्‍तराखंड में कीवी की बागवानी…

खेती-बाड़ी
डॉ. राजेन्द्र कुकसालकीवी फल (चायनीज गूजबेरी) का उत्पति स्थान चीन है, पिछले कुछ दशकों से ये फल विश्वभर में अत्यन्त लोकप्रिय हो गया है. न्यूजीलैण्ड इस फल के लिए प्रसिद्ध है, क्योंकि इस देश ने कीवी फल को व्यवसायिक रूप दिया इसका उत्पादन व निर्यात न्यूजीलैंड में बहुत अधिक है. कीवी फल भारत में 1960 में सर्वप्रथम बंगलौर में लगाया गया था लेकिन बंगलौर की जलवायु में प्रर्याप्त शीतकाल (चिलिंग) न मिल पाने के कारण सफलता नहीं मिली. वर्ष 1963 में राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन ब्यूरो, क्षेत्रीय संस्थान के शिमला स्थित केन्द्र फागली में कीवी की सात प्रजातियों के पौधे आयातित कर लगाये गये जहां पर कीवी के इन पौधों से सफल उत्पादन प्राप्त किया गया. उत्तराखंड में वर्ष 1984-85 में भारत इटली फल विकास परियोजना के तहत राजकीय उद्यान मगरा टेहरी गढ़वाल में इटली के वैज्ञानिकों की देख.रेख में इटली से आयतित कीवी क...
पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद है बड़ी इलायची का उत्पादन

पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद है बड़ी इलायची का उत्पादन

खेती-बाड़ी
डॉ. राजेंद्र कुकसालबड़ी इलायची या लार्ज कार्डेमम को मसाले की रानी कहा जाता है. इसका उपयोग भोजन का स्वाद बढाने के लिए किया जाता है साथ ही इसमें औषधीयय गुण भी होते है. बड़ी इलायची से बनने वाली दवाईयों का उपयोग पेट दर्द, वात, कफ, पित्त, अपच, अजीर्ण, रक्त और मूत्र आदि रोगों को ठीक करने के लिए  किया जाता है. इसकी खेती सिक्किम, पश्चिमी बंगाल, दार्जलिंग और भारत के उत्तर– पूर्वी भाग में अधिक की जाती है. बड़ी इलायची  भारत के उत्तर– पूर्वी भाग में प्राकृतिक रूप में पाई जाती है. इसके आलावा नेपाल, भूटान और चीन जैसे देश में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है.समुद्र तट से 600 - 1500 मीटर तक की ऊंचाई वाले नम व छायादार स्थान जहां पर सिंचाई की सुविधा हो, बड़ी इलायची खेती की अपार संभावनाएं है. किन्तु समय पर उन्नत किस्मों की पौधों का न मिलना, तकनीकी जानकारी का अभाव, फसल (फलों) को सुखाने हेतु आधुनिक...
बहुत ही लोकप्रिय थी बेरीनाग की चाय!

बहुत ही लोकप्रिय थी बेरीनाग की चाय!

खेती-बाड़ी
‘मालदार’ दान सिंह बिष्टप्रकाश चन्द्र पुनेठाजिला पिथौरागढ़ के पूर्व दिशा में 36 किलोमीटर दूर काली नदी के किनारे झूलाघाट नाम का कस्बा है. काली नदी हमारे देश भारत और नेपाल के मध्य अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा का कार्य करती है. काली नदी के किनारे हमारे कस्बे को झूलाघाट कहते है. और काली नदी के पार नेपाल के कस्बे को जूलाघाट कहा जाता है. हमारे जिले पिथौरागढ़ के झूलाघाट कस्बे में हमारे देश की स्वतंत्रता से पूर्व, क्वीतड़ गाँव निवासी देव सिंह बिष्ट एक छोटी सी दुकान में घी का व्यवसाय करते थे. झूलाघाट में घी व्यवसाय करने से पूर्व, देव सिंह बिष्ट के पूर्वज नेपाल के जिला बैतड़ी के निवासी थे. बाद में नेपाल के जिला बैतड़ी से आकर पिथौरागढ़ के क्वीतड़ गाँव में बस गए थे. सन् 1906 में देव सिंह के घर क्वीतड़ में उनके पुत्र दान सिंह का जन्म हुआ था.म्यांमार से वापस पिथौरागढ़ आने के बाद दान सिंह अपने पिता के ...