Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
हिटो फल खाला…

हिटो फल खाला…

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—14रेखा उप्रेती“कल ‘अखोड़ झड़ाई’ है मास्साब, छुट्टी चाहिए.” हमारा मौखिक प्रार्थना-पत्र तत्काल स्वीकृत हो जाता. आखिर पढ़ाई जितनी ही महत्वपूर्ण होती अखोड़ झड़ाई… गुडेरी गद्ध्यर के पास हमारे दो अखरोट के पेड़ थे, बहुत पुराने और विशालकाय. ‘दांति अखोड़’ यानी जिन्हें दांत से तोड़ा जा सके. दांत से तो नहीं, पर एक चोट पड़ते ही चार फाँक हो जाते और स्वाद अनुपम. गाँव में ‘काठि अखोड’ के बहुत पेड़ थे. काठि माने काठ जैसे, जिन्हें तोड़कर उनकी गिरी निकालना मशक्कत माँगता. अक्सर उन्हें आलपिन से कुरेद कर खाना पड़ता… पर हमारे पेड़ के अखोड़ दांति थे और दूधिया भी.हम कंटीली झाड़ियों के आस-पास और गधेरे के बहते पानी के नीचे दुबक गए अखरोट खोजकर ऐसे प्रसन्न होते जैसे समंदर से नायब मोती ढूँढ निकाले हों. दोपहर तक यह प्रक्रिया चलती रहती, फिर भारी-भारी डलिया उठाए सब घर की ओर जाती चढ़ाई पर हाँफते...
फिर शुरू हुआ जीवन

फिर शुरू हुआ जीवन

संस्मरण
बुदापैश्त डायरी : 6डॉ. विजया सतीनए देश में हम अपने देश को भी नई दृष्टि से देखते हैं. ऐसा ही होता रहा हमारे साथ बुदापैश्त में  ..अपने जाने-पहचाने जीवन की नई-नई छवियाँ खुलती रही हमारे सामने. विभाग में हिन्दी पढ़ने वाले युवा विद्यार्थियों की पहली पसंद होती – भारत जाने पर बनारस की यात्रा! उन्हें राजस्थान के रंगों का भी मोह था. हम भी बनारस को नए सिरे से देखने को ललक उठते, ऐसा क्या है हमारे बनारस में जो अब तक हम न देख पाए? क्षमा कीजिएगा... बनारस नहीं, उनकी वाराणसी ! बहुत जागरुक और चौकन्ना होना होता है हमें अपने देश के लिए परदेश में. ... भारतीय भोजन को लेकर तरह-तरह के भ्रम थे - उन्हें मिटाना था. रोजमर्रा का वह जीवन जब दिल्ली जैसे शहर में सड़कों पर हमारे साथ-साथ गाय भी चले, इस पर उनसे क्या कहना हुआ, यह सोचना था.सबसे बढ़कर भारत में स्त्री. कितने-कितने सवाल - असुरक्षित है उनका जीवन...
वेदों के ‘इंद्र-वृत्र युद्ध’ मिथक का जल वैज्ञानिक तात्पर्य    

वेदों के ‘इंद्र-वृत्र युद्ध’ मिथक का जल वैज्ञानिक तात्पर्य    

साहित्‍य-संस्कृति
भारत की जल संस्कृति-7डॉ. मोहन चन्द तिवारीभारतवर्ष प्राचीनकाल से ही एक कृषि प्रधान देश रहा है. कृषि की आवश्यकताओं को देखते हुए ही यहां समानांतर रूप से वृष्टिविज्ञान, मेघविज्ञान और मौसम विज्ञान की मान्यताओं का भी उत्तरोत्तर विकास हुआ. वैदिक काल में इन्हीं मानसूनी वर्षा के सन्दर्भ में अनेक देवताओं को सम्बोधित करते हुए मंत्रों की रचना की गईं. वैदिक देवतंत्र में इंद्र को सर्वाधिक पराक्रमी देव इसलिए माना गया है क्योंकि वह आर्य किसानों की कृषि व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए मेघों से जल बरसाता है और इस जल को रोकने वाले वृत्र नामक दैत्य का वज्र से संहार भी करता है- "इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री. अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्॥"                 -ऋग्वेद,1.32.1 ऋग्वेद में बार-बार इन्द्र द्वारा वृत्र का संहार करके जल को मुक्त कराने का ...
चौमासेक गाड़ जैसी…

चौमासेक गाड़ जैसी…

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—29प्रकाश उप्रेतीआज बात- 'सडुक' (सड़क) और 'गाड़' (नदी) की. हमारा गाँव न सड़क और न ही नदी के किनारे है. सड़क और नदी से मिलने के मौके तब ही मिलते थे जब हम दुकान, 'ताहे होअ बहाने'(नदी के करीब के खेतों में हल चलाने) और 'मकोट (नानी के घर) जाते थे. हमारे कुछ खेत जरूर सड़क और नदी के पास थे लेकिन ईजा ने शुरू से ही इन दोनों के प्रति मन में भय बैठा रखा था. बाकी रहा-सहा भय उन कहानियों ने पैदा कर दिया जो हमने गांवों वालों के साथ-साथ ईजा व 'अम्मा' से सुनी थीं. कुछ नदी में डूबने और डुबाने के किस्से तो कुछ नदी के ऊपर बने पुल में बच्चों की बलि देने के थे.सड़क हमको आकर्षित जरूर करती थी लेकिन गाडियाँ डराती भी थीं. खासकर भयंकर आकार वाले 'ठेल्य' (ट्रक). उनका आगे का हिस्सा बहुत ही डरावना होता था. साथ ही तेज निकलती कार और झूलती हुई जीप से भी डर लगता था. सड़क पर सिर्फ ...
ऑनलाइन शिक्षा में रचनात्मकता की मिसाल: जश्न-ए-बचपन ग्रुप

ऑनलाइन शिक्षा में रचनात्मकता की मिसाल: जश्न-ए-बचपन ग्रुप

अभिनव पहल
कोरोना महामारी के इस वैश्विक दौर में बुरी तरह प्रभावित होने वाले तमाम क्षेत्रों में से एक है शिक्षा का क्षेत्र. पूरे देश में स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के लगभग 33 करोड़ विद्यार्थी इस महामारी के कारण अपनी पढ़ाई-लिखाई से समझौता करने को विवश हैं. ऑनलाइन माध्यम से विद्यार्थियों को पढ़ाने की कोशिश तमाम स्कूलों व विश्वविद्यालयों द्वारा की जा रही है लेकिन रचनात्मकता व इंटरनेट की अनुपलब्धता के कारण कई विद्यार्थी इस तरह की कक्षाओं में अपनी रूचि खोते जा रहे हैं. एक ढर्रे में चलाई जा रही ऑनलाइन कक्षाएँ कई बार पढ़ाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति जैसी ही लगती हैं. इस खानापूर्ति रूपी ऑनलाइन पढ़ाई से परे उत्तराखंड के सरकारी शिक्षकों से जुड़े “रचनात्मक शिक्षक मंडल” ने “जश्न ए बचपन” नाम से एक व्हाट्सऐप ग्रुप का निर्माण किया है जिसकी चर्चा आजकल राज्य के लगभग हर स्थानीय अखबार व सोशल मीडिया ग्रुप में जोर...
शिलाखर्क बुग्याल ट्रैक: रहस्य और रोमांच से भरा ट्रैकिंग स्‍पॉट

शिलाखर्क बुग्याल ट्रैक: रहस्य और रोमांच से भरा ट्रैकिंग स्‍पॉट

पर्यटन
कम और ना जाने, जाने वाले ट्रैंकिंग रूट - पार्ट-2 पांडव यहॉं बना रहे थे विशाल मंदिर, लेकिन...जे. पी. मैठाणीउत्तराखण्ड के सीमान्त जनपद चमोली की एक बेहद रोमांचक घाटी है पाताल गंगा घाटी. बायोटूरिज़्म पार्क पीपलकोटी से लगभग 11 किमी. की दूरी पर पाखी गरूड़गंगा, पनाईगाड, टंगणी और बेलाकूची के बाद एक छोटा सा 10-12 दुकानों का बाजार है जिसका नाम पातालगंगा है. संभवतः यह नाम देश की आजादी के बाद जब भारत-चीन बॉर्डर पर सड़कों का विकास हो रहा था, तब पड़ा होगा. उस दौरान 70 के दशक में अलकनन्दा घाटी की सबसे बड़ी बेलाकूची बाढ़ आई थी. उसके बाद पीपलकोटी से भंडीरपाणी के बाद सड़क का अलाइनमेन्ट बदल दिया गया और अब सड़क पाखी गरूड़ गंगा, पनाईगाड़ टंगणी से अपर बेलाकूची होते हुए एक ऐसे स्थान पर पहुँचती है जहाँ पर लॉर्ड कर्जन पास के जलागम से विभाजित होकर एक बड़ी जलधारा आती है. इस स्थान पर राष्ट्रीय राजमार्ग के बनने में ए...
गढ़वाली रंगमंच व सिनेमा के बेजोड़ नायक :  बलराज नेगी

गढ़वाली रंगमंच व सिनेमा के बेजोड़ नायक :  बलराज नेगी

साहित्यिक-हलचल
जन्मदिन (30 जून)  पर विशेषमहाबीर रवांल्टागढ़वाली फिल्मों के जाने माने अभिनेता और रंगकर्मी बलराज नेगी का जन्म 30 जून 1960 को चमोली जिले के भगवती (नारायणबगड़) गांव के इन्द्र सिंह नेगी व धर्मा देवी के घर में हुआ था.सात भाई और दो बहिनों के परिवार में वे चौथे स्थान पर थे. आपके पिता गांव में परचून की दूकान चलाते थे. बलराज की आरंभिक शिक्षा नारायणबगड़ में हुई फिर डीएवी कालेज देहरादून से पढ़ने के बाद दिल्ली के करोड़ीमल कालेज से आपने स्तानक किया.दिल्ली में पढ़ाई के दौरान बलराज का रुझान नाटकों की ओर होने लगा और इन्होंने इसी क्षेत्र में कुछ करने का मन बना लिया. चंद्रा अकादमी ऑफ एक्टिंग मुंबई में प्रवेश लेने से पूर्व आपको किरण कुमार, राकेश पांडे, योगिता बाली जैसे कलाकारों की कसौटी से गुजरना पड़ा था. फिल्म एवं टेलीविजन  संस्थान पुणे के पूर्व प्रिंसिपल गजानन जागीरदार के मार्गदर्शन में आप...
‘दुदबोलि’ के रचना शिल्पी, साहित्यकार और समलोचक मथुरादत्त मठपाल

‘दुदबोलि’ के रचना शिल्पी, साहित्यकार और समलोचक मथुरादत्त मठपाल

साहित्यिक-हलचल
80वें जन्मदिन पर विशेषडा. मोहन चंद तिवारी29 जून को जाने माने कुमाऊंनी साहित्यकार श्रद्धेय मथुरादत्त मठपाल जी का जन्मदिन है. उत्तराखंड के इस महान शब्दशिल्पी,रचनाकार और कुमाउनी दुदबोलि को भाषापरक साहित्य के रूप में पहचान दिलाने वाले ऋषिकल्प भाषाविद श्री मथुरादत्त मठपाल जी का व्यक्तित्व और कृतित्व उत्तराखंड के साहित्य सृजन के क्षेत्र में सदैव अविस्मरणीय ही रहेगा. मठपाल जी इतनी वृद्धावस्था  में भी निरन्तर रूप से साहित्य रचना का कार्य आज भी जारी रखे हुए हैं. वे सात-आठ घन्टे नियमित पठन, पाठन, लेखन का कार्य करते हुए देववाणी कुमाऊंनी और हिंदी साहित्य की आराधना में लगे रहते हैं. पिछले वर्ष जन्मदिवस पर उनके पुत्र नवेंदु मठपाल की पोस्ट से पता चला कि एक साल के दौरान ही मथुरादत्त मठपाल जी के द्वारा तीन नई किताबें प्रकाशित हुई ,जिनके नाम हैं-1.'रामनाम भौत ठूल', 2.'हर माटी है मुझको चंदन' (हिंदी...
रोपणी-“सामूहिक सहभागिता की मिशाल खेती का त्यौहार”

रोपणी-“सामूहिक सहभागिता की मिशाल खेती का त्यौहार”

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालपहाड़ों में खेती बाड़ी के कामों को सामूहिक रूप से त्यौहार जैसा मनाने की परम्परा वर्षों पुरानी है. हर मौसम में, हर फसल को बोने से लेकर, निराई—गुड़ाई और कटाई—छंटाई तक सारे कामों को त्यौहार के रूप मनाने की परम्परा सदियों पुरानी है, जिसमें रोपणी (धान की रोपाई) मुख्यत: एक ऐसी परम्परा थी. यह पूरे गांव की सहभागिता, सामूहिकता, आपसी भाईचारा को दर्शाती थी.पहाड़ों में रोपणी के लिए धान की नर्सरी (बीज्वाड़) चैत्र (मार्च-अप्रैल) माह में डाली जाती है, ताकि समय पर पौध तैयार हो जाए. सभी की यह कोशिश रहती थी कि सबकी नर्सरी एक साथ डाली जाय ताकि एक ही समय पर सबकी रोपणी लग सके. आषाढ़ (जून-जुलाई) का महिना एक ऐसा महिना होता है जब पूरे पहाड़ में हर गांव में रोपणी की धूम रहती थी, हर गांव घर परिवार को इंतजार रहता था कि कब उनके खेत में गुल का पानी पहुंचे और कब उनकी रोपणी लगे. बारी—बारी से सबके खे...
घुल्यास की दुनिया

घुल्यास की दुनिया

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—28प्रकाश उप्रेतीआज बात- 'घुल्यास' की. घुल्यास मतलब एक ऐसी लकड़ी जो पहाड़ की जिंदगी में किसी बड़े औजार से कम नहीं थी. लम्बी और आगे से मुड़ी हुई यह लकड़ी खेत से जंगल तक हर काम में आगे रहती थी. बगीचे से आम, माल्टा, और अमरूद की चोरी में इसका साथ हमेशा होता था. इज़्ज़त ऐसी की इसे नीचे नहीं बल्कि हमेशा पेड़ पर टांगकर ही रखा जाता था. ईजा इससे इतने काम लेती थीं कि हमारे पेड़ पर कम से कम चार-पांच अलग-अलग कद-काठी, लकड़ी व वजन के घुल्यास हमेशा टंगे रहते थे.हम भी सूखी लकड़ी लेने ईजा के साथ-साथ जाते थे. ईजा कहती थीं- "हिट म्यर दघे, मैं कच लकड़ काटूल तू उनों पन बे सूखी लकड़ चाहे ल्याले". हम भी ईजा के साथ चल देते थे.घुल्यास के लिए दाड़िम, भिमु, तिमूहुँ, गौंत, गीठी और मिहो की लकड़ी अच्छी मानी जाती थी. इसका कारण इन पेड़ों का मजबूत होना था. घुल्यास के लिए लकड़ी का मजबूत...