Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
कैद होते जंगलों के बीच पतरोल का आतंक

कैद होते जंगलों के बीच पतरोल का आतंक

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—33प्रकाश उप्रेतीआज बात- "पतरौ" और जंगलात की. 'पतरौ' का मतलब एक ऐसा व्यक्ति जिसे सरकार ने ग्राम -प्रधान के जरिए हमारे जंगलों की रक्षा के नाम पर तैनात किया हुआ था. रक्षा भी हमसे और वह भी हमारे जंगलों की. धीरे-धीरे हमें पता चला कि रक्षा की आड़ में हमारे जंगलों पर सरकारी कब्जा हो गया. अब सारे जंगलों को पत्थरों की दीवारों से कैद किया जा रहा था. कैद जंगल एकदम "चिड़ियाघर"(कितना विरोधाभाषी नाम है) की तरह लग रहे थे. हमारे घर के बाहर कदम रखते ही जंगल था. अब तक वो हमारा और हम उसके थे. एक दिन 15-20 लोग आए और उन्होंने हमारे 'छन' (गाय-भैंस-बैल बांधने की जगह) के पास से 'खोई' (दीवार) देना शुरू कर दिया. अब वह जंगल, उसी के पत्थरों से कैद हो रहा था. हम नीचे खड़े होकर बस देख रहे थे. तब तक ये बात गाँव में फैल चुकी थी कि सरकार का ऑर्डर आया है- "अब सब जंगों में खोई चीणि...
बहुत ही लोकप्रिय थी बेरीनाग की चाय!

बहुत ही लोकप्रिय थी बेरीनाग की चाय!

खेती-बाड़ी
‘मालदार’ दान सिंह बिष्टप्रकाश चन्द्र पुनेठाजिला पिथौरागढ़ के पूर्व दिशा में 36 किलोमीटर दूर काली नदी के किनारे झूलाघाट नाम का कस्बा है. काली नदी हमारे देश भारत और नेपाल के मध्य अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा का कार्य करती है. काली नदी के किनारे हमारे कस्बे को झूलाघाट कहते है. और काली नदी के पार नेपाल के कस्बे को जूलाघाट कहा जाता है. हमारे जिले पिथौरागढ़ के झूलाघाट कस्बे में हमारे देश की स्वतंत्रता से पूर्व, क्वीतड़ गाँव निवासी देव सिंह बिष्ट एक छोटी सी दुकान में घी का व्यवसाय करते थे. झूलाघाट में घी व्यवसाय करने से पूर्व, देव सिंह बिष्ट के पूर्वज नेपाल के जिला बैतड़ी के निवासी थे. बाद में नेपाल के जिला बैतड़ी से आकर पिथौरागढ़ के क्वीतड़ गाँव में बस गए थे. सन् 1906 में देव सिंह के घर क्वीतड़ में उनके पुत्र दान सिंह का जन्म हुआ था.म्यांमार से वापस पिथौरागढ़ आने के बाद दान सिंह अपने पिता के ...
जय हो ग्रुप की अनूठी पहल

जय हो ग्रुप की अनूठी पहल

समसामयिक
बेसहारा और बेजुबान जानवरों का सहारा बना जय हो ग्रुप, 111 दिनों तक खिलाई रोटियांहिमांतर ब्‍यूरो, उत्‍तरकाशीनगर पालिका परिषद, बड़कोट क्षेत्र में लॉक डाउन प्रथम से लेकर 111 दिनों तक सामाजिक चेतना की बुलन्द आवाज ‘‘जय हो” ग्रुप के कर्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवियों ने बेजुबान जानवरों को रोटी दान मांगकर खिलाने का काम किया. ग्रुप ने नगर के सभी रोटी दानदाताओं का आभार जताते हुए मौहल्लों में स्वंय आवारा बेजुबान जानवरों को रोटी या घर में बचा हुआ भोजन देने का आह्वान किया है.वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड 19) के चलते देश में हुए लॉक डाउन के दौरान बाजार सहित आम लोग अपने घरों में कैद हो गयें थे. सड़को और गलियों में घुमने वाले इन बेजुबान जानवरों की कोई सुध लेने वाला नहीं था, ऐसे में जय हो ग्रुप के युवा बेसहारा जानवरों के सहारा बन एक नई मिसाल पेश कीवैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड 19) के ...
जंगली कं​टीली झाड़ी से रोजगार का स्रोत बन रहा है टिमरू

जंगली कं​टीली झाड़ी से रोजगार का स्रोत बन रहा है टिमरू

चमोली
कम उपजाऊ और बेकार भूमि में आसानी से उगता है उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में खेती को जंगली जानवरों से बचाव के लिए शानदार बाड़/बायोफेन्सिंग भी है टिमरू खेती-बाड़ी बचाएगा टिमरू तो रूकेगा जंगली जानवरों की वजह से होने वाला पलायनजे. पी. मैठाणीहिन्दू धर्म ग्रंथों में जिन भी पेड़-पौधों का रिश्ता पूजा-पाठ तंत्र-मंत्र से जोड़ा गया है. उन सभी पेड़-पौधों, वनस्पतियों में कुछ न कुछ दिव्य और आयुर्वेदिक गुण जरूर हैं. और उनका उपयोग हजारों वर्ष पूर्व से पारम्परिक चिकित्सा पद्धति, आयुर्वेद और इथ्नोबॉटनी में किया जाता रहा है. यानी पेड़—पौधों का महत्व उसके औषधीय गुणों के कारण है और उनके संरक्षण के लिए उनको धर्म ग्रंथों में विशेष स्थान दिया गया है. ऐसे ही एक बहुप्रचलित लेकिन उपेक्षित कंटीला झाड़ीनुमा औषधीय वृक्ष है टिमरू. टिमरू सिर्फ पूजा-पाठ और भूत पिशाच भगाने के लिए कंटीली डंडी नहीं है. व...
‘प्यारी दीदी, अपने गांव फिर आना’

‘प्यारी दीदी, अपने गांव फिर आना’

उत्तराखंड हलचल
गंगोत्री गर्ब्यालडॉ. अरुण कुकसाल‘‘प्रसिद्ध इतिहासविद् डॉ. शिव प्रसाद डबराल ने ‘उत्तराखंड के भोटांतिक’ पुस्तक में लिखा है कि यदि प्रत्येक शौका अपने संघर्षशील, व्यापारिक और घुमक्कड़ी जीवन की मात्र एक महत्वपूर्ण घटना भी अपने गमग्या (पशु) की पीठ पर लिख कर छोड़ देता तो इससे जो साहित्य विकसित होता वह साहस, संयम, संघर्ष और सफलता की दृष्टि से पूरे विश्व में अद्धितीय होता’’ (‘यादें’ किताब की भूमिका में- डॉ. आर.एस.टोलिया) ‘गाना’ (गंगोत्री गर्ब्याल) ने अपने गांव गर्ब्याग की स्कूल से कक्षा 4 पास किया है. गांव क्या पूरे इलाके भर में दर्जा 4 से ऊपर कोई स्कूल नहीं है. उसकी जिद् है कि वह आगे की पढ़ाई के लिए अपनी अध्यापिका दीदियों रन्दा और येगा के पास अल्मोड़ा जायेगी. गर्ब्याग से अल्मोड़ा खतरनाक उतराई-चढ़ाई, जंगल-जानवर, नदी-नालों को पार करते हुए 150 किमी. से भी ज्यादा पैदल दूरी पर है. मां-पिता समझाते...
एक दौर ऐसा भी था- गुजरे जमाने की चिट्ठी-पत्री का

एक दौर ऐसा भी था- गुजरे जमाने की चिट्ठी-पत्री का

संस्मरण
भुवन चन्द्र पन्तगुजरे जमाने के साथ ही कई रवायतें अतीत के गर्भ में दफन हो गयी,  इन्हीं में एक है- चिट्ठी-पत्री. एक समय ऐसा भी था कि गांव में पोस्टमैंन आते ही लोगों की निगाहें उस पर टिक जाती कि परदेश में रह रहे बच्चों अथवा रिश्तेदारों की कुशल क्षेम वाला पत्र पोस्टमैन ला रहा होगा. खाकी यूनिफार्म में सिर पर खाकी रंग की ही नुकीली टोपी, जिसमें आगे की ओर एक लाल पट्टी लगी होती, तथा कन्धे पर पोस्ट आफिस का ही एक विशेष बैग लटका होता. अपने इलाके में पोस्टमैन खूब इज्जत पाता था, हर कोई घर आने पर उसे बिना चाय पिलाये घर से नहीं लौटाता. अगर मनीआर्डर लाया हो तो आवभगत पक्की. लाने वाले पत्र के मजमून पर पोस्टमैन के साथ व्यवहार होता, अगर अच्छी खबर लाता तो ग्रामीणों से खूब इज्जत बटोरता, लेकिन यदि कोई बुरी खबर वाला समाचार लाता तो लोगों की नजरों से हमेशा के लिए खटक जाता. शायद यही बात प्रख्यात कथाकार शैलेश मटिय...
च्यला! हर्याव बुण कभें झन छोड़िए!

च्यला! हर्याव बुण कभें झन छोड़िए!

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीआज श्रावण संक्रांति के दिन हरेले का शुभ पर्व है. हमारे घर में नौ दिन पहले आषाढ़ के महीने में बोए गए हरेले को आज प्रातःकाल श्रावण संक्रांति के दिन काटा गया. कल रात हरेले की गुड़ाई की गई  उसे पतेशा भी गया.हरेला पतेशने के कुछ खास मंत्र होते हैं,जो हमें याद नहीं इसलिए 'सर्व मंगल मांगल्ये' इस देवी के मंत्र से हम हरेला पतेश देते हैं.   इस बार पिछले साल की तरह हरेले की पत्तियां ज्यादा बड़ी और चौड़ी नहीं हुई, मौसम की वजह से या अच्छी मिट्टी की वजह से कोई भी कारण हो सकता है. कोरोना काल भी इस हरेले के लिए संकटपूर्ण रहा,जितने उत्साह से इसे मनाया जाना था वह सब नहीं हो सका.प्रातःकाल हरेला काटे जाने के बाद मेरी पत्नी ने सबसे पहले हमारे इष्टदेव के मंदिर में मां दुर्गा और इष्टदेव ग्वेल सहित सभी कुल देवताओं और मुकोटी देवताओं को हरेला चढ़ाया. उसके बाद घर-परिवार की सबसे बड़ी और वरिष्ठ...
अपराध, खादी और खाकी

अपराध, खादी और खाकी

समसामयिक
मुद्दा मीडिया काडॉ. रुद्रेश नारायण मिश्रसमाज के विरोध में या असामाजिक तत्त्वों में संलिप्त रहना अपराध है, पर जब यही अपराध, खादी और खाकी से अगर मिल जाए तो कई सवाल सामाजिकता को लेकर उठने शुरू हो जाते हैं. जिसका समयानुसार चिंतन भी होता है परंतु कितना कारगर, इस पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है, क्योंकि भूमिका सिर्फ अपराधी की नहीं बल्कि खादी और खाकी की भी हो जाती है. जो आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की वजह से इस तरह की परिस्थितियों को जन्म देते हैं. भारत में अपराध, खादी और खाकी का संबंध आज का नहीं है. जाहिर है, इसकी छवि को बनाने के लिए कई बार राजनीतिक और सामाजिक सुधारों के नाम पर लोगों के बीच भ्रम की स्थिति फैलाई जाती है. जिससे राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा मिलता है. कई बार अपराधिक गतिविधियों में खादी और खाकी अपने लिए अवसर तलाशने लगते हैं. एक पक्ष में तो दूसरा विपक्ष में, परंतु सामाजिक संभ...
हरेला पर्व, अँधेरे समय में विचार जैसा है

हरेला पर्व, अँधेरे समय में विचार जैसा है

लोक पर्व-त्योहार
प्रकाश उप्रेतीपहाड़ों का जीवन अपने संसाधनों पर निर्भर होता है. यह जीवन अपने आस-पास के पेड़, पौधे, जंगल, मिट्टी, झाड़ियाँ और फल-फूल आदि से बनता है. इनकी उपस्थिति में ही जीवन का उत्सव मनाया जाता है. पहाड़ के जीवन में प्रकृति अंतर्निहित होती है. दोनों परस्पर एक- दूसरे में घुले- मिले होते हैं. एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यह रिश्ता अनादि काल से चला आ रहा है. 'पर्यावरण' जैसे शब्द की जब ध्वनि भी नहीं थी तब से प्रकृति पहाड़ की जीवनशैली का अनिवार्य अंग है. वहां जंगल या पेड़, पर्यावरण नहीं बल्कि जीवन का अटूट हिस्सा हैं. इसलिए जीवन के हर भाव, दुःख-सुख, शुभ-अशुभ, में प्रकृति मौजूद रहती है. जीवन के उत्सव में प्रकृति की इसी मौजूदगी का लोकपर्व है, हरेला. हरेला का अर्थ हरियाली से है. यह हरियाली जीवन के सभी रूपों में बनी रहे उसी का द्योतक यह लोक पर्व है. एक वर्ष में तीन बार मनाया जाने व...
आज भी प्रासंगिक हैं वैदिक जल विज्ञान के सिद्धात

आज भी प्रासंगिक हैं वैदिक जल विज्ञान के सिद्धात

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-8डॉ. मोहन चन्द तिवारीदेश में इस समय वर्षा ऋतु का काल चल रहा है.भारतीय प्रायद्वीप में आषाढ मास से इसकी शुरुआत  हो जाती है और सावन भादो तक इसका प्रभाव रहता है.आधुनिक मौसम विज्ञान की दृष्टि से इसे 'दक्षिण-पश्चिमी मानसूनों' के आगमन का काल कहते है,जिसे भारतीय ऋतुविज्ञान में 'चातुर्मास' या 'चौमास' कहा जाता है. इस मास में भारत का कृषक वर्ग इंद्रदेव से चार महीनों तक अच्छी वर्षा होने की शुभकामना करता है ताकि समूचे राष्ट्र को धन-धान्य की समृद्धि प्राप्त हो सके. यही वह उचित समय है जब जल भंडारण और पुराने जीर्ण शीर्ण नौलों और तालाबों की मरम्मत और साफ सफाई की जाती है ताकि वाटर हारवेस्टिंग की विधियों से वर्षा के जल का संग्रहण किया जा सके. लगभग पांच हजार वर्ष पहले सिंधुघाटी की सभ्यता में हड़प्पा काल के किसान दो प्रकार की मानसूनी वर्षा को ध्यान में रखते हुए वर्षभर में दो बार ख...