Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
टैगोर का शिक्षादर्शन- ‘असत्य से संघर्ष और सत्य से सहयोग’

टैगोर का शिक्षादर्शन- ‘असत्य से संघर्ष और सत्य से सहयोग’

शिक्षा
रवीन्द्र नाथ टैगोर की पुण्यतिथि (7 अगस्त,1941) पर विशेषडॉ. अरुण कुकसाल‘किसी समय कहीं एक चिड़िया रहती थी. वह अज्ञानी थी. वह गाती बहुत अच्छा थी, लेकिन शास्त्रों का पाठ नहीं कर पाती थी. वह फुदकती बहुत सुन्दर थी, लेकिन उसे तमीज नहीं थी. राजा ने सोचा ‘इसके भविष्य के लिए अज्ञानी रहना अच्छा नहीं है’....उसने हुक्म दिया चिड़िया को गंभीर शिक्षा दी जाए. पंडित बुलाए गए और वे इस निर्णय पर पंहुचे कि चिड़िया की शिक्षा के लिए सबसे जरूरी हैः एक पिंजरा. और फिर पिंजरे में रखकर चिड़िया ज्ञान पाने लगी. लोगों ने कहा ‘चिड़िया के तो भाग्य जगे!’.... ‘महाराज, चिड़िया की शिक्षा पूरी हो गई’. राजा ने पूछा, ‘वह फुदकती है? भतीजे-भानजों ने कहा, ‘नहीं !’ ‘उड़ती है?’ ‘एकदम नहीं!’ ‘चिड़िया लाओ,’ राजा ने आदेश दिया. चिड़िया लाई गई. उसकी सुरक्षा में कोतवाल, सिपाही और घुड़सवार साथ चल रहे थे. राजा ने चिड़िया को उंगली से ...
संकट में सीमांत

संकट में सीमांत

उत्तराखंड हलचल
सुमन जोशीबरसात का मौसम है. खिड़कियों के शीशों पर पड़ी बूंदों को देखते हुए अदरक-इलायची वाली चाय की चुस्कियों के बीच अपनी पसंदीदा किताब पढ़ने के दिन. और उसी के साथ म्यूजिक स्टोर से, "रिम-झिम गिरे सावन,  सुलग-सुलग जाए मन,  भीगे आज इस मौसम में,  लगी कैसी ये अगन". गीत सुनते-सुनते कहीं पहाड़ों व बचपन की यादों में खो जाने के दिन. तेल की कढ़ाई में प्याज़ और आलू का बेसन में लिपटकर गोते खाने के दिन.हम इस बरसात में जहाँ जाने का मन बनाते हैं. जिस जगह की छवि हम मन में उकेरते हैं असल में वहां के लोग पल-पल डरों के अंधेरों में जीते हैं. जो लोग इस मंजर का आँखों देखा हाल देख रहे है और त्रादसी से जूझ रहे हैं उनके लिए बरसात एक डरावने सपने की तरह हैं.और इसी बीच शहर में बैठे अपने 12×14 फ़ीट के कमरे में बैठे फेसबुक,इंस्टाग्राम पर बरसात की चुनिंदा तस्वीरों पर लाइक करते हुए हम सोचते हैं कि काश हम वहा...
राजनीति में अदला बदली

राजनीति में अदला बदली

समसामयिक
भाग—2डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र राजनीति में परिवर्तन आंतरिक अंतर्विरोध के कारण भी होता है. यह अंतर्विरोध पार्टी विशेष कम होकर व्यक्तिगत रूप में ज्यादा दिखता है, जब एक प्रभावशाली नेता अपनी ही पार्टी से संबंध विच्छेद कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है. उस वक्त नेता के समर्थक जितने भी सांसद/विधायक होते हैं, वह भी विरोधी हो जाते हैं. ऐसे में राजनीति की परिवर्तनशील प्रक्रिया चरित्रहीन हो जाता है. जिससे स्थिति अस्थिर हो जाती है और यह अस्थिरता राजनीति के उन सवालों को खड़ा करता है, जिसे देखने की कोशिश कभी संवैधानिक रूप में हुई ही नहीं. इसके कई उदाहरण अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक उतार-चढ़ाव में मिल जाता है. इसलिए जिस राजनीति में आत्ममंथन की जरूरत है, कारणों की समीक्षा की जरूरत है, वहां सिर्फ राजनीतिक आलोचनाओं के अलावा कुछ नहीं है.आरोप-प्रत्यारोप के बीच राजनीतिक नैतिकता खत्म होती नजर ...
अब कौन ‘नटार’ से डरता है…

अब कौन ‘नटार’ से डरता है…

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—40प्रकाश उप्रेतीपहाड़ में खेती हो न हो लेकिन "नटार" हर खेत में होता था. "नटार" मतलब खेत से चिड़ियों को भगाने के लिए बनाया जाने वाला ढाँचा सा. तब खेतों में जानवरों से ज्यादा चिड़ियाँ because आती थीं. एक -दो नहीं बल्कि पूरा दल ही आता था. झुंगर, मंडुवा, तिल, गेहूं, जौ, सरसों और धान सबको सफाचट कर जाते थे. कई बार तो उनके दल को देखकर ईजा हा...हा ऊपर से बोल देती थीं लेकिन तब चिड़ियाँ निडर हुआ करती थीं. दूर भागने की जगह वो निर्भीक होकर दाने चुगती रहती थीं. ज्योतिष खेत में बीज बोने के बाद ईजा की दो प्रमुख चिंताएं होती थीं: एक 'बाड़' करना और दूसरा "नटार" लगाना. बाड़, पशुओं के लिए और नटार, चिड़ियों के लिए. बाड़ के लिए ईजा '"रम्भास" (एक पेड़) और अन्य लकड़ियां लेकर आती थीं. सम्बल से उन्हें 'घेंटने' के बाद लम्बी लकड़ियों को सीधा और छोटी लकड़ियों को आड़ा- because तिरछा ल...
महिलायें, पीरियड्स और क्वारंटीन

महिलायें, पीरियड्स और क्वारंटीन

आधी आबादी
डॉ. दीपशिखा जोशीवैसे तो लगभग हमारे देश के हर हिस्से में महिलाओं को माहवारी के दिनों में अछूत माना जाता है, मगर पहाड़ी इलाक़ों में ख़ासकर बात करूँगी उत्तराखण्ड के बहुत जगहों पर इस प्रथा का बहुत सख़्ती से पालन होता है. बहुत से लोग जो अब शहरों में रहते हैं या जिनका कभी पहाड़ों से वास्ता ना रहा हो शायद विश्वास ना करें कि अभी भी या कभी इतना कठिन जीवन जीती हैं या जीती थी महिलायें! क्वारंटीन, आइसोलेशन शब्द हम में से बहुत से लोगों ने अब इस कोरोना काल में सुने होगें, मगर वो पहाड़ी महिला आज भी माहवारी के उन कठिन दिनों में रहती है पूरे 4 से 7 दिन बिलकुल अलग-थलग, उसे कोई छू नहीं सकता, अगर कोई छू लें तो गौ-मूत्र से उसकी शुद्धि की जाती है. उस महिला को इन दिनों केवल रसोई या पूजा-घर ही नहीं घर के बाक़ी हिस्सों में जाने की भी मनाही होती है. उसे मिलता है एक अलग स्थान, घर का कोई कोना, अधिकांशतया गाय को...
मालपा की ओर

मालपा की ओर

किस्से-कहानियां
कहानीएम. जोशी हिमानीमालपा मेरा गरीब मालपा रातों-रात पूरे देश में, शायद विदेशों में भी प्रसिद्व हो गया है. मैं बूढ़ा, बीमार बेबस हूँ. बाईपास सर्जरी कराकर लौटा हूँ. बिस्तर पर पड़े-पड़े सिवाय आहत होने और क्रंदन करने के मैं मालपा के लिए कर भी क्या सकता हूँ? अन्दर कमरे से पत्नी गंगा और दोनों बेटों को आपसी बातचीत के स्वर कानों में पड़ रहे हैं. मैं भलीभांति जानता हूँ कि इलकी मालपा जाने की तैयारी अपनी सगे-सम्बन्धियों को कोई राहत पहुंचाने के लिए नहीं है वरन् यह तैयारी है वहां जाकर अपने को मृतक आश्रित दिखाकर सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि पर दावा करना. गंगा उदास और दुखी होने का अभिनय बखूबी कर लेती है. इस बार भी ऐसा ही हो रहा है. सुबह अल्ल-सबेरे मेरे बिस्तर के पास आकर नेक सलाह दे गई है- ‘‘सुनों जी, जीवन को घर भेज देते हैं. अभी हम लोग सूतक भी तो नहीं मना सकते है, जब तक जेठ और जेठानी जी ...
स्मृति मात्र में शेष रह गए हैं ‘सी रौता’ और थौलधार जातर

स्मृति मात्र में शेष रह गए हैं ‘सी रौता’ और थौलधार जातर

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावतसी रौता बाई! सी रौता!! कितना उल्लास, उत्सुकता और कौतुहल होता था. गाँव, क्षेत्र के सभी लोग ख़ासकर युवाजन जब हाथों में टिमरू की लाठियाँ लिए ढोल—दमाऊ की थाप पर नाचते, गाते, थिरकते, हो—हल्ला करते हुए अपार जोश—खरोश के साथ गाँव से थौलधार के लिए निकलते थे. कोटी से निकला यह जोशीला जत्था बखरेटी से होकर थौलधार पहुँचता था. रास्ते भर में उनका उन्मुक्त नृत्य देखते ही बनता था. थौलधार पहुँचने पर तो इनके जोश को मानो चिंगारी मिल जाती थी. लोक वादक तन—मन को उत्साहित करने वाले ताल बजाते और जोशीले युवाओं के जत्थे उनके पीछे—पीछे हो नाचते, गाते रहते. नृत्याभिन शैली एकदम आक्रामक होती थी. ठीक वैसे ही जैसे किसी पर विजय प्राप्ति के लिए चल रहे हों. इस दौरान कुछ खास पंक्तियों को गीत या नारों के रूप में पूरे जोशीले अंदाज़ में जोर—जोर से गाया, दोहराया जाता था, जिसके बोल होते थे— 'सी रौता बाई! सी रौता!!' थ...
उत्तराखंड की संस्कृति पर गुमान था कवि गुमानी को

उत्तराखंड की संस्कृति पर गुमान था कवि गुमानी को

स्मृति-शेष
डॉ. मोहन चंद तिवारी अगस्त का महीना आजादी,देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावनाओं से जुड़ा एक खास महीना है. इसी महीने का 4 अगस्त का दिन मेरे लिए इसलिए भी खास दिन है क्योंकि इस दिन 24 वर्ष पूर्व 4 अगस्त,1996 को गुमानी पंत के योगदान पर राष्ट्रीय समाचार पत्र 'हिदुस्तान' के रविवासरीय परिशिष्ट में 'अपनी संस्कृति पर गुमान था कवि गुमानी को' इस शीर्षक से मेरा एक लेख छपा था. मैंने दूसरे समाचार पत्रों में भी इसे कई बार प्रकाशनार्थ भेजा था लेकिन उन्होंने छापा नहीं, क्योंकि ज्यादातर राष्ट्रीय स्तर के सम्पादकों की मानसिकता होती है कि वे कुमाऊंनी कवि या कुमाऊंनी साहित्य से सम्बंधित लेखों को आंचलिक श्रेणी का मानते हुए राष्ट्रीय समाचार पत्रों में ज्यादा महत्त्व नहीं देते हैं.हालांकि नवरात्र और शक्तिपूजा और पर्व-उत्सवों पर 'नवभारत टाइम्स' और 'हिंदुस्तान' आदि समाचार पत्रों में मेरे लेख सन् 1980 से छपते रहे हैं. क...