Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
गोधूलि का दृश्य

गोधूलि का दृश्य

किस्से-कहानियां
लघुकथाअनुरूपा “अनु”गोधूलि का समय था. गाय बैल भी जंगल की ओर से लौट ही रहे थे.मैं भी घर के पास वाले खेत में नींबू के पेड़ की छांव में कलम और कागज लेकर बैठ गई.सोच रही थी कुछ लिखती हूं.क्योंकि उस पल का जो दृश्य था वह बड़ा ही लुभावना लग रहा था. सूरज डूब रहा था. उसकी लालिमा चीड़ से छपाछप लदे हुए पहाड़ो पर फैल रही थी. पंछियों का कलरव भी चली रहा था. हवा भी मंद-मंद गति से दस्तक दे रही थी.आस पास के घरों से बच्चों की आवाजें भी गूंज रही थी क्योंकि बच्चे खेल- खेल में किलकारियां मार रहे थे. कुत्ते भी आपस में रपटा झपटी कर रहे थे. मां के गाय दुहने का समय भी आ ही गया था. तभी मां तड़पडा़ती हुई बाल्टी लेकर गोशाला की ओर दूध दुहने निकलती है. और बाबा भी टेलीविजन बंद करके जैसे ही बाहर की ओर आते हैं.अपना ऊन का कोट और साफा पहन कर लकड़ियों के ढांग से दो-चार लकड़ियां उठाते है और आग जलाने रसोई की ओर चल ...
गढ़वाल उत्तराखंड की लक्ष्मी बाई तीलू रौतेली

गढ़वाल उत्तराखंड की लक्ष्मी बाई तीलू रौतेली

इतिहास
वीरांगना तीलू रौतेली की जन्मजयंती पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज 8 अगस्त को गढ़वाल उत्तराखंड की लक्ष्मी बाई के नाम से प्रसिद्ध तीलू रौतेली की जन्मजयंती है. इतिहास के पन्नों में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई दिल्ली की रजिया सुल्ताना, बीजापुर की चांदबीबी,मराठा महारानी ताराबाई,चंदेल की रानी दुर्गावती आदि वीरांगनाओं के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है किंतु गढ़वाल उत्तराखंड की वीरांगना तीलू रौतेली के बारे में बहुत कम लोगों को ही यह जानकारी है कि केवल 15 वर्ष की अल्पायु में ही वह वीरबाला रणभूमि में कूद पड़ी थी और सात साल तक उसने अपनी बहादुरी से लड़ते हुए अपने दुश्मनों को छठी का दूध याद दिला दिया था.तीलू रौतेली का जन्म कब हुआ? निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. किन्तु गढ़वाल में आठ अगस्त को ही उनकी जन्म जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है कि उनका जन्म आठ अगस्त, 1661 को हुआ था. उस समय ग...
आखन देखी

आखन देखी

समसामयिक
ललित फुलाराजब मैं यह लिख रहा हूं.. जुलाई बीत चुका है. फुटपाथ, सड़कें, गली-मोहल्ले कोरोना से निर्भय हैं! जीवन की गतिशीलता निर्बाध चल रही है. लोगों के चेहरों पर मास्क ज़रूर हैं, पर भीतर का डर धीरे-धीरे कम होने लगा है. रोज़मर्रा के कामकाज़ पर लौटे व्यक्तियों ने आशावादी रवैये से विषाणु के भय को भीतर से परास्त कर दिया है. घर के अंदर बैठे व्यक्तियों की चिंता ज्यादा है, बाहर निकलने वाले जनों ने सारी चीजें नियति पर छोड़ दी हैं. वैसे ही जैसे असहाय, अगले पल की चिंता, दु:ख, भय और परेशानी ईश्वर पर छोड़ देता है.दरअसल, पेट की भूख दुनिया की हर महामारी से बड़ी होती है. पेट की भूख के चलते ही तीन महीने पहले तक जो सड़कें भयग्रसित हो गईं थी, अब वहां हलचल है एवं स्थितियां सामान्य होने लगी हैं. मास्क व सैनिटाइज़र को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाते हुए लोग अपने कर्म पर लौट चले हैं. गली-मोहल्लों में कुल्फि...
पृष्ठभूमि को नया विस्तार और आयाम

पृष्ठभूमि को नया विस्तार और आयाम

शिक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भाग-1डॉ. अरुण कुकसाल‘‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक गुण शामिल होते हैं: एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छांटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्मांधता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ एवं बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए....वह न तो पुराने को इसलिए नकारे क्योंकि वह पुराना है, न ही नए को इसलिए स्वीकार करे क्योंकि वह नया है-बल्कि उसे निष्पक्ष रूप से दोनों को परखना चाहिए और साहस से उसको नकार देना चाहिए जो न्याय एवं प्रगति को अवरुद्ध करता हो....’’ (माध्यमिक शिक्षा आयोग-1952)कोठारी कमीशन (1964-66) के आलोक में सन् 1968 में देश की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अमल में लाया गया था. इसके अन्तर्गत शिक्षा के अवसरों की समानता, प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा शिक्षण, हिन्दी का सम्पर्क भाषा के रूप में व...
पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद है बड़ी इलायची का उत्पादन

पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद है बड़ी इलायची का उत्पादन

खेती-बाड़ी
डॉ. राजेंद्र कुकसालबड़ी इलायची या लार्ज कार्डेमम को मसाले की रानी कहा जाता है. इसका उपयोग भोजन का स्वाद बढाने के लिए किया जाता है साथ ही इसमें औषधीयय गुण भी होते है. बड़ी इलायची से बनने वाली दवाईयों का उपयोग पेट दर्द, वात, कफ, पित्त, अपच, अजीर्ण, रक्त और मूत्र आदि रोगों को ठीक करने के लिए  किया जाता है. इसकी खेती सिक्किम, पश्चिमी बंगाल, दार्जलिंग और भारत के उत्तर– पूर्वी भाग में अधिक की जाती है. बड़ी इलायची  भारत के उत्तर– पूर्वी भाग में प्राकृतिक रूप में पाई जाती है. इसके आलावा नेपाल, भूटान और चीन जैसे देश में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है.समुद्र तट से 600 - 1500 मीटर तक की ऊंचाई वाले नम व छायादार स्थान जहां पर सिंचाई की सुविधा हो, बड़ी इलायची खेती की अपार संभावनाएं है. किन्तु समय पर उन्नत किस्मों की पौधों का न मिलना, तकनीकी जानकारी का अभाव, फसल (फलों) को सुखाने हेतु आधुनिक...
टैगोर का शिक्षादर्शन- ‘असत्य से संघर्ष और सत्य से सहयोग’

टैगोर का शिक्षादर्शन- ‘असत्य से संघर्ष और सत्य से सहयोग’

शिक्षा
रवीन्द्र नाथ टैगोर की पुण्यतिथि (7 अगस्त,1941) पर विशेषडॉ. अरुण कुकसाल‘किसी समय कहीं एक चिड़िया रहती थी. वह अज्ञानी थी. वह गाती बहुत अच्छा थी, लेकिन शास्त्रों का पाठ नहीं कर पाती थी. वह फुदकती बहुत सुन्दर थी, लेकिन उसे तमीज नहीं थी. राजा ने सोचा ‘इसके भविष्य के लिए अज्ञानी रहना अच्छा नहीं है’....उसने हुक्म दिया चिड़िया को गंभीर शिक्षा दी जाए. पंडित बुलाए गए और वे इस निर्णय पर पंहुचे कि चिड़िया की शिक्षा के लिए सबसे जरूरी हैः एक पिंजरा. और फिर पिंजरे में रखकर चिड़िया ज्ञान पाने लगी. लोगों ने कहा ‘चिड़िया के तो भाग्य जगे!’.... ‘महाराज, चिड़िया की शिक्षा पूरी हो गई’. राजा ने पूछा, ‘वह फुदकती है? भतीजे-भानजों ने कहा, ‘नहीं !’ ‘उड़ती है?’ ‘एकदम नहीं!’ ‘चिड़िया लाओ,’ राजा ने आदेश दिया. चिड़िया लाई गई. उसकी सुरक्षा में कोतवाल, सिपाही और घुड़सवार साथ चल रहे थे. राजा ने चिड़िया को उंगली से ...
संकट में सीमांत

संकट में सीमांत

उत्तराखंड हलचल
सुमन जोशीबरसात का मौसम है. खिड़कियों के शीशों पर पड़ी बूंदों को देखते हुए अदरक-इलायची वाली चाय की चुस्कियों के बीच अपनी पसंदीदा किताब पढ़ने के दिन. और उसी के साथ म्यूजिक स्टोर से, "रिम-झिम गिरे सावन,  सुलग-सुलग जाए मन,  भीगे आज इस मौसम में,  लगी कैसी ये अगन". गीत सुनते-सुनते कहीं पहाड़ों व बचपन की यादों में खो जाने के दिन. तेल की कढ़ाई में प्याज़ और आलू का बेसन में लिपटकर गोते खाने के दिन.हम इस बरसात में जहाँ जाने का मन बनाते हैं. जिस जगह की छवि हम मन में उकेरते हैं असल में वहां के लोग पल-पल डरों के अंधेरों में जीते हैं. जो लोग इस मंजर का आँखों देखा हाल देख रहे है और त्रादसी से जूझ रहे हैं उनके लिए बरसात एक डरावने सपने की तरह हैं.और इसी बीच शहर में बैठे अपने 12×14 फ़ीट के कमरे में बैठे फेसबुक,इंस्टाग्राम पर बरसात की चुनिंदा तस्वीरों पर लाइक करते हुए हम सोचते हैं कि काश हम वहा...