Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
नर से नारायण की यात्रा

नर से नारायण की यात्रा

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव (swatantrata ka amrit mahotsav) भारत की देश-यात्रा का पड़ाव है जो आगे की राह चुनने का अवसर देता है. इस दृष्टि से पंडित दीन दयाल उपाध्याय की चिंतनपरक सांस्कृतिक दृष्टि में जो भारत का खांचा था बड़ा प्रासंगिक है. वह समाजवाद और साम्यवाद से अलग सबके उन्नति की खोज पर केन्द्रित था. वह सर्वोदय के विचार को सामने रखते है और सोच की यह प्रतिबद्धता भारतीय राजनैतिक सोच को औपनिवेशक सोच से अलग करती है. उनका स्पष्ट मत था कि समाजवाद और साम्यवाद सिर्फ शरीर और मन तक सीमित हैं और इच्छा (काम) because और धन (अर्थ) तक ही चुक जाते हैं. वे मनुष्य के समग्र अस्तित्व की उपेक्षा करते हैं. एक व्यापक आधार चुनते हुए वह मानव अस्तित्व के सभी पक्षों अर्थात शरीर, और मन के साथ बुद्धि तथा आत्म का भी समावेश करते हैं. इन्हीं के समानांतर धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष के पुरुषार्थों को भी...
द्वाराहाट क्षेत्र का ‘बागेश्वर’ : सदियों से उपेक्षित पांडवकालीन तीर्थ

द्वाराहाट क्षेत्र का ‘बागेश्वर’ : सदियों से उपेक्षित पांडवकालीन तीर्थ

धर्मस्थल
कुमाऊं क्षेत्र के उपेक्षित मन्दिर-1डॉ. मोहन चंद तिवारीउत्तराखंड देव संस्कृति का उद्गम स्थल है और वहां के मन्दिरों के स्थापत्य और अद्भुत मूर्तिकला ने भारत के ही नहीं विश्व के कला प्रेमियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है. किंतु पुरातत्त्वविदों और स्थापत्यकला के विशेषज्ञों द्वारा द्वाराहाट,जागेश्वर, because बैजनाथ के मन्दिरों के स्थापत्य और मूर्तिकला का सतही तौर से ही आधा अधूरा मूल्यांकन किया गया है. स्थानीय लोक संस्कृति के धरातल पर तो मूल्यांकन बिल्कुल ही नहीं हुआ है. इनके अलावा दूर दराज के गांवों और नौलों के मन्दिरों का स्थापत्य और मूर्तियों का कलात्मक मूल्यांकन आज भी उपेक्षित और अनलोचित ही पड़ा है.  उत्तराखंड की अधिकांश मूर्तियां धर्म द्वेषियों द्वारा खंडित कर दी गई हैं. किंतु इन खंडित मूर्तियों में भी उत्तराखंड का आदिकालीन इतिहास और देव संस्कृति की झलक आज भी इतनी शक्तिशाली है कि व...
सयाना होता भारतीय गणतंत्र

सयाना होता भारतीय गणतंत्र

समसामयिक
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  मनुष्य द्वारा रची कुछ बेहद ताकतवर परिभाषाओं में देश, राज्य, राष्ट्र और गणतंत्र जैसी कोटियाँ भी आती हैं जो धरती पर सामुदायिक-सांस्कृतिक यात्रा में पथ प्रदर्शक की  भूमिकाएं अदा करती हैं.  इन परिभाषाओं  की  व्यावहारिक परिणति परस्परसहमति के  सापेक्ष्य होती है. इतिहास गवाह है कि असहमति  हिंसा को जन्म देती है और आक्रमण, युद्ध और संधियों ने  इन संरचनाओं को  लगातार प्रभावित किया है. because अनेक देशों में सैन्य शासन ने चुनी सरकार को सत्ता से बेदखल किया है. लोभ में अनेक बार युद्ध , नर संहार और लूट मचती रही  है. सभ्यता के बढ़ते कदम के साथ क्रूरता, बर्बरता, छल-छद्म और कुटिलता के नए नए रूप आते रहे हैं. न्यूक्लियर तकनालाजी ने इस परिदृश्य को और भी जोखिम भरा बना दिया है. ऐसे में विकसित, विकासशील और अविकसित देशों के बीच की खाई पटती नजर नहीं आती. मुसीबत यह भी है कि ‘विकसित’ कहे जाने व...
उत्तराखंड में फिर खिलेगा कमल, BJP के विकास कार्यों पर जनता को पूरा भरोसा: धन सिंह रावत  

उत्तराखंड में फिर खिलेगा कमल, BJP के विकास कार्यों पर जनता को पूरा भरोसा: धन सिंह रावत  

उत्तराखंड हलचल
धन सिंह रावत श्रीनगर विधानसभा के वर्तमान विधायक हैं। उन्होंने कम उम्र में ही समाज सेवा का  कार्य शुरू कर दिया था। साल 1989 में धन सिंह रावत ने आरएसएस ज्वॉइन किया। बाल विवाह, छुआछूत और शराब के खिलाफ अभियान छेड़ा। वह राम जन्मभूमि मूवमेंट के दौरान भी सक्रिय रहे और जेल भी जाना पड़ा। उच्च शिक्षा मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय में मंत्री के रूप में सेवा दे चुके धन सिंह रावत का कहना है कि इस चुनाव में भी जनता का प्यार उन्हें प्राप्त होगा और सूबे में फिर से भाजपा की सरकार बनेगी। इसकी वजह यह है कि बीजेपी के शासन के दौरान सूबे में जितने कार्य हुए हैं, उतने कभी अन्य सरकारों के कार्यकाल में नहीं हुए।अंतिम गांव और व्यक्ति तक विकास पहुंचाना है हमारा लक्ष्य धन सिंह रावत ने कहा कि राज्य की जनता ने जिस तरह से पिछले चुनावों में अपना भारी समर्थन भारतीय जनता पार्टी को दिया ...
नेताजी ने ही दिया था गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ का सम्मान

नेताजी ने ही दिया था गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ का सम्मान

स्मृति-शेष
नेताजी की1 26वीं जन्मजयंती पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी क्रांतिवीर नेता सुभाष चन्द्र बोस की 126वीं जन्म जयंती है. समूचा देश नेता जी की इस जयंती को 'अगाध श्रद्धाभाव से मना रहा है. 'नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र बोस का नाम भारतीय स्वतंत्रता because आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है. उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान,भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये 21अक्टूबर,1943 को 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया.इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था. इस संगठन का राष्ट्रीय गीत था-हरताली “क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा” जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे. उनके द्वारा दिया गया 'जय हिन्द' का नारा आज भी भारत का राष्ट्...
उत्कट देशानुरागी और दुर्धर्ष स्वतंत्रता-सेनानी!

उत्कट देशानुरागी और दुर्धर्ष स्वतंत्रता-सेनानी!

स्मृति-शेष
पराक्रम दिवस (23 जनवरी) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  आज देश-सेवा के नाम पर राजनीति में दम-ख़म आजमाने वाले हर तरह की सौदेबाजी करने पर उतारू हैं. उन्हें सत्ता चाहिए क्योंकि सत्ता से इस लोक में सब सधता दिखता है. अनेक जन सेवक हमाए बीच हैं जो जीवन में कभी बड़े कष्ट और संघर्ष के बीच जिए और एक साधारण जन की तरह कष्ट सहा पर सत्ता का स्वाद पाते ही काया-पलट होता गया और अब वे करोड़ों और शायद घोषित-अघोषित अरबों रूपयों के स्वामी बन बैठे हैं . लोकैषणा कब वितैषणा में परिवर्तित हो गई पता ही नहीं चला. उसके बाद समाज और जन की भावना सिमटती गई और परिवार ही सीमा बनता गया. शर्म हया छोड़ बेटा-बेटी, नाती-पोते, भाई-भतीजे, बंधु-बांधव, और जाति-बिरादर तक पहुँच कर उनका देश और समाज का दायरा सिमटता गया. इस भारत-भूमि में उत्तरोत्तर बड़े प्रयोजन के लिए छोटे प्रयोजन या हित का त्याग करने की व्यवस्था थी. कुल के लिए निजी सुख, ...
गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार रहेगी ‘देवभूमि उत्तराखंड’ की धूम

गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार रहेगी ‘देवभूमि उत्तराखंड’ की धूम

देश—विदेश
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीरक्षा मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय रंगशाला शिविर, नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने की तैयारियों के अवसर पर विभिन्न प्रदेशों एवं मंत्रालयों की झांकी के माध्यम से कलाकारों अपने-अपने राज्यों की सांस्कृतिक झलक पेश की. उत्तराखण्ड राज्य के कलाकारों द्वारा उत्तराखण्ड की पांरपरिक वेशभूषा में राष्ट्रीय रंगशाला में आकर्षक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, जिसे उपस्थित लोगों द्वारा बहुत पसंद किया गया, साथ ही इन 12 राज्यों के कलाकारों द्वारा भी अपने-अपने प्रदेश की झांकी के साथ पांरपरिक वेशभूषा में प्रस्तुति दी गई। गणतंत्र दिवस समोराह में इस वर्ष 12 राज्यों की झांकी सम्मिलित की गई है।उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस परेड के लिए उत्तराखंड की झांकी में सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक एवं नोडल अधिकारी के.एस.चौहान के नेतृत्व में उत्तराखंड राज्य से 16 कलाकार गणतंत...
कुमाऊं में आज भी संरक्षित है ‘उत्तरैंणी’ से ‘भारतराष्ट्र’ की पहचान

कुमाऊं में आज भी संरक्षित है ‘उत्तरैंणी’ से ‘भारतराष्ट्र’ की पहचान

लोक पर्व-त्योहार
उत्तरायणी पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीकुमाऊं उत्तराखण्ड में मकर संक्रान्ति का because पर्व 'उत्तरैंणी', ‘उत्तरायणी या ‘घुघुती त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड हिमालय का क्षेत्र अनादिकाल से धर्म इतिहास और संस्कृति का मूलस्रोत रहता आया है। ज्योतिष भारत मूलतः सूर्योपासकों का देश होने के because कारण यहां मकर संक्रान्ति या उत्तरायणी का पर्व विशेष उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखाई देती है। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रान्ति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं‚अतः इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। ज्योतिष महाभारतकाल में भीष्म पितामह ने because अपनी देह त्यागने के लिये उत्तरायण पक्ष में पड़ने वाले मकर संक्रान्...
बहुत-सी रंग-वालियों का देश है हिन्दुस्तान

बहुत-सी रंग-वालियों का देश है हिन्दुस्तान

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-24 कृष्ण-कटिकम: जब आप ‘गीत गोविंद’ का नृत्य करते हैं, तो कृष्ण को अपने आस-पास महसूस कर  सकते हैंमंजू कालानृत्य एक ऐसी विधा है जो मनुष्य के जन्म के बाद ही शुरू हो जाती है, या यूँ कह लीजिए की ये इन्सान के जन्म के साथ ही अभिव्यक्तियाँ देना आरम्भ कर देती है.  जब कोई बच्चा धरती पर जन्म लेता है तभी वह रोकर हाथ-पैर मारकर अपनी भावाव्यक्ति करता है. उसे भूख लगती है तो वह रुदन करता है, because और माँ समझ जाती है कि बच्चा भूखा है. इन्ही आंगिक-क्रियाओं से इस रसमय कला-नृत्य की उत्त्पत्ति हुई है. यह कला देवी-देवताओं, दैत्य-दानवों, मनुष्यों एवम पशु-पक्षियों तक को प्रिय है. हमारे हिन्दुस्तान में तो यह विधा ईश्वर प्राप्ति का साधन मानी गई है, यह बात हिन्दुस्तान का हर गृहस्थ जनता है कि जब समन्दर मंथन के पश्चात  दानवों को अमरत्व प्राप्त  होने का खतरा उत्त्पन हुआ, तब भगवान विष्णु...
हिंदी का विश्व और विश्व की हिंदी

हिंदी का विश्व और विश्व की हिंदी

साहित्‍य-संस्कृति
विश्व हिन्दी दिवस (10 जनवरी) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  वाक् या वाणी की शक्ति किसी से भी छिपी नहीं है. ऋग्वेद के दसवें मंडल के वाक सूक्त में वाक् को राष्ट्र को धारण करने और समस्त सम्पदा देने वाले देव तत्व के रूप में चित्रित करते हुए बड़े ही सुन्दर ढंग से कहा गया है : अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्. यह वाक की जीवन और सृष्टि में भूमिका को रेखांकित करने वाला प्राचीनतम भारतीय संकेत है. हम सब यह देखते हैं कि दैनंदिन जीवन के क्रम में हमारे अनुभव वाचिक कोड बन कर एक ओर स्मृति के हवाले होते रहते हैं तो दूसरी ओर स्मृतियाँ नए-नए सृजन के लिए खाद-पानी देती रहती हैं . अनुभव, भाषा, स्मृति और सृजन की यह अनोखी सह-यात्रा अनवरत चलती रहती है और उसके साथ ही हमारी दुनिया भी बदलती रहती है. यह हिंदी भाषा का सौभाग्य रहा है क़ि कई सदियों से वह कोटि-कोटि भारतवासियों की अभिव्यक्ति, संचार और सृजन के लिए एक प्रमुख...