लाटी का उद्धार

नीमा पाठक

केशव दत्त जी आज लोगों के व्यवहार से बहुत दुखी और खिन्न थे मन ही मन सोच रहे थे ऐसा क्या अपराध किया मैंने जो लोग इस तरह मेरा मजाक उड़ा रहे हैं. जो लोग रोज झुक झुक कर because प्रणाम करते थे वे ही लोग आज मुंह पर हँस रहे थे. हर जगह धारे में, नोले में, चाय की दुकान में, खेतों में, बाजार में उन्हीं की चर्चा थी. और तो और उनके खुद के स्कूल में चार लोगों को इकठ्ठा देख कर उनको लग रहा था यहाँ भी सब उन्हीं की चर्चा कर रहे हैं. लोगों का अपने प्रति ऐसा व्यवहार उनको गहरा आघात पहुंचा गया. उन्होंने दुखी होकर घर से बाहर निकलना बंद कर दिया, स्कूल नहीं जाने के भी बहाने ढूंढने लगे.

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उनकी पत्नी उनके इस तरह के व्यवहार को जानने की कोशिश कर रही थी, तो पांडेय जी बोले, “लछुली तूने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, मेरा लोगों में मुंह दिखाना मुश्किल हो गया है अब तो मेरा मन नौकरी पर जाने का भी नहीं है.”  उसी समय दो लोग उनके घर के बाहर खड़े होकर उनको आवाज देकर बोले, ‘पांडेय ज्यू, बधाई हो! सुनने में because आया ब्याह कर लिया आपने”, दोनों ही फिर ठहाके लगा कर हंसने लगे. उनकी व्यंगात्मक बधाई को पाण्डेजी से पहले उनकी पत्नी ने स्वीकार किया और बोली, “ बधाई हम दोनों को ही मिलनी चाहिए क्योंकि हम दोनों का ही परिवार आज दो से तीन हुआ है. बाहर से खड़े खड़े बधाई क्या देनी अन्दर आकर दुल्हन को मुंह दिखाई दो और मिठाई भी खाते जाओ.”

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जिन बच्चों का कभी पांडे जी ने because नामकरण किया था, जनेऊ की थी अब उनकी शादी भी होने लगी थी पर पांडेय जी निःसंतान ही रह गए. जैसे जैसे उम्र बढती गई उनके अन्दर खालीपन आने लगा, घर आकर पति की उदासी पत्नी से देखी नहीं जाती थी. उसने अपने पति को दूसरी शादी के लिए खूब मनाया था पर वे कभी भी इसके लिए राजी नहीं हुए.

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पांडेजी की पत्नी के ऐसे तेवर की लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी. एक ही वार में पत्नी ने सबका मुंह बंद कर दिया फिर किसी की हिम्मत नहीं हुई उनका मजाक उड़ाने की. पांडे जी because की पत्नी लक्ष्मी ने तय किया कि वह  अपने पति की ढाल बनकर उनका साथ देगी, उन्हें लोगों के हंसी मजाक का पात्र नहीं बनने देगी. लक्ष्मी बहुत तेज तर्रार व बुद्धिमती महिला थी उसकी व्यवहारिक बुद्धि भी बहुत तेज थी, वह हर परिस्थिति में हमेशा सही निर्णय लेती थी.

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केशव दत्त पांडेय जी एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापन के साथ साथ  आस पास के गांवों में जजमानी का काम भी करते थे. उनकी पत्नी लक्ष्मी एक कुशल गृहणी तो थी ही और एक सच्ची जीवनसंगिनी भी थी. पांडेय जी जब भी अपने जजमानों के घर जाते लक्ष्मी भी अकसर उनके साथ जाती थी. पांडेय जी पूजा पाठ करते तो वह कर्म कांड के गीत गाती, जजमानों का मार्ग दर्शन करती. वे लोग अपना काम छोड़ दूसरों का काम पहले करते थे, गाँव के लोग भी इस जोड़ी को बहुत सम्मान देते थे, because कोई भी काम उनके बिना पूरा नहीं होता था. जिन बच्चों का कभी पांडे जी ने नामकरण किया था, जनेऊ की थी अब उनकी शादी भी होने लगी थी पर पांडेय जी निःसंतान ही रह गए. जैसे जैसे उम्र बढती गई उनके अन्दर खालीपन आने लगा, घर आकर पति की उदासी पत्नी से देखी नहीं जाती थी. उसने अपने पति को दूसरी शादी के लिए खूब मनाया था पर वे कभी भी इसके लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने इसे भगवान की मर्जी मान कर संतोष कर लिया पर मन हमेशा बच्चे के लिए तरसता रहा.

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लड़की की माँ की थी वह हाथ जोड़कर बोली, “ उद्धार कर दो मेरी बेटी का, इसकी ख़ुशी से बढ़कर मुझे और कुछ नहीं चाहिए. कैसे होगा, क्या होगा? ये सब आपको ही because संभालना पड़ेगा.” लक्ष्मी बिना पति की राय के ही बात पक्की करके आ गई. घर आकर पति को सारी बात बताई और थोड़ी ना नुकर के बाद वह भी राजी हो गए, कुछ ही दिनों में वह पति का ब्याह कर लाई.

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एक दिन गाँव में ही एक लड़के की शादी थी,पांडे जी भी बारात में बाराती बन कर दूसरे गाँव गए थे. रात में पड़ोस के घर में ही उनकी रुकने की व्यवस्था थी. खाना तो लड़की वालों के घर खा लिया था, जिस घर में वे रुके थे उन्होंने चाय का आग्रह किया और एक सुन्दर लड़की चाय बनाकर रख गई उसकी माँ बीमार थी फिर भी वह बात करने बैठ गई और अपनी राम कहानी बताने लगी. उसने बताया कि, “ये जो चाय दे गई है पैंतीस साल की हो गई है अभी तक शादी नहीं हुई, because लाटी(गूंगी) जो ठहरी.” बुढ़िया को अपनी बेटी के भविष्य की बहुत चिंता थी, उसे लगता था मेरे जीवन के बाद इस लाटी  का क्या होगा? यही दुखड़ा उसने पंडित जी को सुनाया और उनसे आग्रह किया कि कोई भी विधुर या गरीब उसकी लड़की के लिए ढूंढ़ दें तो उस पर बहुत बड़ा एहसान होगा, वह निश्चिन्त होकर अपना बुढ़ापा जैसे तैसे काट लेगी. उसकी जिंदगी के बाद लड़की का ध्यान रखने वाला कोई नहीं है, कोई जमा पूंजी भी नहीं थी, रात दिन वह लाटी की चिंता में घुल रही थी। पंडित जी ने उसकी सारी बातें ध्यान से सुनी, उसको मदद का आश्वासन देकर व्यथित मन से घर आ गए.

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सभी सांकेतिक फोटो पिक्साबे.कॉम से साभार

पंडित जी कहीं से भी घर आते तो अपनी पत्नी को सारी बातें विस्तार से बताते थे. इस बार भी शादी की सारी बातों के साथ साथ लाटी वाली बात भी बताई, उस लाटी की माँ का के दुःख से पांडे because जी बहुत द्रवित थे वे मन से चाह रहे थे कि कहीं कोई उसके योग्य पात्र मिल जाए तो एक पुण्य का कार्य हो जाएगा. उन्होंने अपनी पत्नी को कहा, “तू भी ध्यान में रखना, मैं उसकी माँ को आश्वासन दे कर आया हूँ.” लड़की के बारे में पूरी बात तो, बताओ दिखने में कैसी है, कितने साल की है, काम धाम कर लेती है कि नहीं तभी तो कहीं बात करुँगी. पांडेजी बोले, “ सब अच्छी है, काम में, देखने में, बस लाटी है इसीलिए ब्याह नहीं हुआ.”

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जैसे-जैसे दोनों पति पत्नी की because उम्र बढ़ती जा रही थी, उन्होंने लाटी के नाम पर पूरी जमीन कर दी अपनी जमापूंजी का वारिस भी उसे बना दिया. उन तीनों की खुशहाल जिंदगी को देख कर लोग उनकी सराहना करने लगे। लाटी का उद्धार हो गया और लाटी ही उनके बुढ़ापे की लाठी भी बन गई थी.

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दूसरे दिन ही मायके जाने का बहाना बना कर लछुली पहुँच गई लड़की के घर. उसकी माँ को अपना परिचय दिया तथा उनकी लड़की की शादी की बात की. अपनी तरफ से अपने पति का प्रस्ताव बड़ी चालाकी से रखा, लाटी की माँ से बोली, “ मुझे भी एक सहेली की तलाश है, हम दोनों चाहते है कि कोई तीसरा घर में आए तो हमारा because भी मन लग जाएगा, वैसे भी ये तो अपने काम पर चले जाते हैं और मैं कैसे दिन काटूं अकेले घर में? इसीलिए आई थी. माँ बोली ऐसे कैसे भेज दूँ मैं अनब्याही लड़की को आपके साथ? आपने कल इनको देखा था ना रात में आपके घर पर रुके थे उन्हीं के लिए मैं आपकी बेटी का हाथ मांग रही हूँ, आपकी बेटी को सहेली बना कर रखूंगी, माँ जैसी ममता दूंगी, सब कुछ है हमारे पास किसी भी चीज की कमी नहीं है, हमारे घर आएगी तो राज करेगी. हमेशा इसकी ख़ुशी का ध्यान रखूंगी और क्या कहूँ? एक ही कमी है हमारे भाग्य में कोई संतान नहीं है इसीलिए”.

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अब उत्तर देने की बारी लड़की की माँ की थी वह हाथ जोड़कर बोली, “ उद्धार कर दो मेरी बेटी का, इसकी ख़ुशी से बढ़कर मुझे और कुछ नहीं चाहिए. कैसे होगा, क्या होगा? ये सब because आपको ही संभालना पड़ेगा.” लक्ष्मी बिना पति की राय के ही बात पक्की करके आ गई. घर आकर पति को सारी बात बताई और थोड़ी ना नुकर के बाद वह भी राजी हो गए, कुछ ही दिनों में वह पति का ब्याह कर लाई.

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लाटी के घर में आते ही रौनक आ गई लछुली ने खूब प्रेम दिया,उसकी हर पसंद नापसंद का ध्यान रखा. एक छोटे बच्चे की तरह लाड़ली बन गई थी वह दोनों की. उसकी मां को दिया because वचन निभाया. अपने गहने कपड़े पहना कर उसे अपने साथ ले जाती, घर के कामों में तो वह पहले से निपुण थी, खेती बाड़ी का काम भी सिखा दिया. जैसे-जैसे दोनों पति पत्नी की उम्र बढ़ती जा रही थी, उन्होंने लाटी के नाम पर पूरी जमीन कर दी अपनी जमापूंजी का वारिस भी उसे बना दिया. उन तीनों की खुशहाल जिंदगी को देख कर लोग उनकी सराहना करने लगे। लाटी का उद्धार हो गया और लाटी ही उनके बुढ़ापे की लाठी भी बन गई थी.

(सेवानिवृत विभागाध्यक्षा हिंदी, मेयो कॉलेज गर्ल्स स्कूल अजमेर)

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