September 20, 2020
उत्तराखंड समाज/संस्कृति हिमालयी राज्य

यमुना घाटी: बूंदो की संस्कृति का पर्याय

उत्तराखंड के प्रत्येक गांव की अपनी एक जल संस्कृति हैं. यहां किसी न किसी गांव में एक स्रोत का पानी आपको जरूर मिलेगा,जिसकी अपनी एक परम्परा होती है, संस्कृति होती है। उसका वर्णन वहां किसी न किसी देवात्मा से जुड़ा मिलता है। यमुना घाटी के ऐसे ही कुछ जल स्रोतों के बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ प​त्रकार प्रेम पंचोली

जल संस्कृति भाग—1

उत्तराखंड हिमालय में जल सहजने की परम्परा अपने आप में एक मिशाल है। आप जहां कही भी जल सस्कृति के प्रति लोगों का जुड़ाव देखेंगें वहां पानी को सिर्फ देवतुल्य ही मानते है, अर्थात पानी के संरक्षण को यहां आध्यात्म का एक मूल आधार मान गया है. उत्तराखंड की जल संस्कृति को लोग वेद पुराणों में लिखित कथा के अनुरूप मानते हैं। यह सच है कि अधिकांश स्थानों के नाम इन पुराणों में मिलते-जुलते भी है.
यमुना घाटी में जल संरक्षण की संस्कृति के अब अवशेष भर रह गये है तथा अधिकतर स्थानों पर लोंगो ने सीमेन्ट पोतकर सौन्दर्यकरण के नाम से इन्हें नए तरह से बनाने की कोशिश की है. जहां जहां लोगों ने सीमेन्ट पोत दिया वहां पर पानी की मात्रा भी कम हुई है और जहां दो धारे हुआ करते थे वहां एक धार सूख ही गया है.

सीमेन्ट पोतने के पश्चात इन धारों तथा कुण्डों की आध्यात्म से जुड़ी परम्परा भी समाप्त हुई है. यदि कुण्ड के बाहर सीमन्ट लगा दिया तो लोग सीमेन्ट तक जूतो सहित चले जाते हैं. जबकि जलधारा के पास लोग नंगे पावं ही जाते थ. यही नहीं पानी के पास बनी पत्थर की आकृतियां भी मटियामेट की गई है. जिससे जल संरक्षण की लोक परम्परा लुप्त प्रायः हो गई हैं. अब यह नक्कासीदार आकृतियां दिखाई नही देती और लोग जल संस्कृति को भूलते जा रहे हैं. यहां तक कि कुण्ड के अन्दर भी पत्थरों पर सीमेन्ट लगा दिया गया और तब से कुण्ड में एकत्रित पानी तो सूख ही गया है.

 

सम्पूर्ण यमुना घाटी में मात्र एक स्थान पर केदार कुण्ड है यमुना घाटी में केदार कुण्ड का होना बहुत आश्चार्य भी है परन्तु इससे जुड़ी कहानी दिल को संतुष्ट कर देती है। यमुना घाटी में जहां भी छोटी-छोटी नदियों का संगम बना है वहां लोग चुटकी में कह देते है कि यह त्रेवेणी है। भला यह इलाहबाद वाला संगम न हो परन्तु तीन धाराओं का संगम तो है ही। यमुना घाटी में गंगा से जुड़ी कई कहानियां है यदि दो धाराऐं गंगा यमुना से प्रचलित है तो तीसरी बहने वाली धारा को लोग सरस्वती भी कह देते है। गंगनाणी कुण्ड से निकलने वाली धारा यमुना से संगम बनाती है तथा तीसरी धारा भी यही पर संगम बनाती है जिसे लोग सरस्वती कहते है यद्यपि यह धारा सरताल से निकलकर बढियार गांव होते हुए गंगनाणी के पास यमुना मे संगम बनाती। देहरादून से लगभग 100 किमी0 की दूरी पर स्थिति गंगनाणी धारा यह कहानी बयां करती है कि यह पानी गंगा का है लोग इस पानी को गंगा जल के रूप में प्रयोग करते है।

स्थानीय लोगों में कहानी प्रचलित है पाण्डव जब लाखामण्डल में अंज्ञात वास में थे तो उस दौरान उन्हे गंगा जल की आवश्यकता दुर्गा पूजा के लिए पड़ी वे यमुना घाटी से गंगा घाटी की तरफ नही जा सकते थे अलबत्ता अर्जुन ने अपने धनुष से पहाड़ पर तीर मारा जहां से जल धारा फूट पड़ी और यह गंगा धारा हो गई यानी गंगनाणी.

यहां पर भी लोगों ने बताया कि सन् 1992 में उत्तरकाशी में महाशिव पुराण का आयोजन हुआ तत्काल उत्तरकाशी में हुए हवन की सामग्री गंगा में विसर्जित हुई। यह सामग्री यमुना घाटी मे गंगानाणी धारा नामक स्थान पर उक्त पानी के साथ बह कर आई जिसे लोग देखकर आश्चर्य में पड़ गए परंतु लोगों को मालूम था कि यह हवन में लाई जाने वाली सामग्री है और उतरकाशी में आजकल महाशिव पुराण चल रहा है. यह धारा यहां कैसे निकली? स्थानीय लोगों में कहानी प्रचलित है पाण्डव जब लाखामण्डल में अंज्ञात वास में थे तो उस दौरान उन्हे गंगा जल की आवश्यकता दुर्गा पूजा के लिए पड़ी वे यमुना घाटी से गंगा घाटी की तरफ नही जा सकते थे अलबत्ता अर्जुन ने अपने धनुष से पहाड़ पर तीर मारा जहां से जल धारा फूट पड़ी और यह गंगा धारा हो गई यानी गंगनाणी. उक्त स्थान पर यमुना नदी में बड़े-बड़े पत्थर पड़े है उन पत्थरों को लोग कहते है कि यह पत्थर अर्जुन के तीर से पहाड़ से टूटकर टुकड़े-टुकड़े हुए है जो अवशेष आज भी हैं. महाभारत काल के शिलालेख भी यमुना घाटी में बताए जाते हैं. गंगनाणी धारा से 6 किमी दूर लाखामण्डल में बने म्यूजिम में एक शिलालेख है जिसकी भाषा आज तक किसी के समझ नही आई है इसको भी पाण्डव काल का लेख बताते हैं. लाखामण्डल के सामने पर कुंआ नामक स्थान है, कुंआ का तत्पर्य हम लोग पानी के कुण्ड से समझते है हालांकि उक्त स्थान पर कोई विशाल कुंआ नहीं है. उस जगह पर लाखी-पाखी का जंगल कहते हैं. लोग कहते है कि यहां पर जो पानी का कुण्ड व धारा है वह भाग्यशाली लोंगो को मिलता है.

जगदम्बाऋषी महाराज ने जब कमण्डल गंगा की ओर डुबोया तो आकाशवाणी हुई और कहा कि तुम तुरंत वापस जाओ. ऋषी महाराज वापस आकर अपने तपस्थली पर बैठ गए. प्रातः काल भयंकर गरजना हुई आसमान पर कोहरा छाने लगा कुछ क्षणों में जगदम्बाऋषी की तपस्थली पर एक जल धारा फूट पड़ी, इस धारा के आगे एक गोलनुमा पत्थर बहते हुए आया जो आज भी गंगनाणी नामक स्थान पर विद्यमान है.

बताया गया कि कुंआ गांव का एक व्यक्ति पशुओं के लिए चारा—पति लाने के लिए उक्त जंगल में पंहुचा, जब उसने पेड़ पर चढ़कर नीचे देखा तो पेड़ की जड़ पर उसे एक सुन्दर कुण्ड दिखाई दिया वह डर गया और उसकी हाथ की दरांती कुण्ड में गिर गई वह डरा-सहमा जब नीचे उतरा तो कोई कुण्ड नही था परन्तु उसे उक्त स्थान पर अपनी दरान्ती सोने जैसे चमकती हुई दिखाई दी. दरअसल वह दरांती लोहे से सोने में बदल गईं. इस कहानी से उस अदृश्य कुण्ड की जानकारी प्राप्त होती है. बताया जाता कि यह कुण्ड ऐसे लोगों ने देखा जिनके भाग्य बदल गए. आज भी लाखी-पाखी के जंगल में जाना प्रतिबन्धित है जो जाएगा वह स्वच्छ एंव नंगे पांव ही जायेगा.

इस घाटी में गांव व स्थानों के नाम पानी से संबन्धित है जैसे कफनौल, रूपनौल, सरगांव, कुड़, कुण्ड, बडियाड़ आदि अर्थात कफनौल-नौले से तात्पर्य, कुड़ एंव कुण्ड का तात्पर्य कुंआ अथवा कुण्ड से, बडियाड़ का तात्पर्य बावड़ी से सर का तात्पर्य पानी से, ऐसे कई नाम इस घाटी में प्रचलित है. जल संस्कृति में एक खास बात इस क्षेत्र में भी है कि नई बहू का एवं गांव में आए मेहमान का पहला परिचय पानी के इन धाराओं से ही कराते हैं.

बड़कोट के पास गंगनाणी कुण्ड
इस कुण्ड का महत्व बड़ा पवित्र माना जाता है. स्थानीय लोग प्रत्येक सक्रांती में यहां नहाने आते हैं. कुण्ड के पानी के आचमन से ही लोग अपने को पुण्य मानते हैं. कुण्ड का सम्बन्ध गंगा जल से है. बताया जाता कि प्राचीन समय में परशुराम के पिता जगदम्बाऋषी ने इस स्थान पर घोर तपस्या की थी. वे गंगा जल लेने उत्तरकाशी जाते थे, अपितु शिव उनकी तपस्या से अभिभूत हुए और सपने मे आकर कहा कि गंगा की एक धारा तपस्या स्थल पर आएगी. फिर भी जगदम्बाऋषी महाराज ने जब कमण्डल गंगा की ओर डुबोया तो आकाशवाणी हुई और कहा कि तुम तुरंत वापस जाओ. ऋषी महाराज वापस आकर अपने तपस्थली पर बैठ गए. प्रातः काल भयंकर गरजना हुई आसमान पर कोहरा छाने लगा कुछ क्षणों में जगदम्बाऋषी की तपस्थली पर एक जल धारा फूट पड़ी, इस धारा के आगे एक गोलनुमा पत्थर बहते हुए आया जो आज भी गंगनाणी नामक स्थान पर विद्यमान है. तत्काल यहां पर एक कुण्ड की स्थापना हुई. यह कुण्ड पत्थरों पर नकासी करके बनवाया गया जिसका पुरातत्विक महत्व है. वर्तमान में इस कुण्ड के बाहर स्थानीय विकासीय योजनाओं के मार्फत सीमेन्ट लगा दिया गया है. परन्तु कुण्ड के भीतर की आकृति व बनावट पुरातत्वीक है. यहां पर जगदम्बाऋषी का भी मन्दिर है. लोग उक्त स्थान पर मन्नत पूरी करने आते है और यह स्थान एक तीर्थ के रूप में माना जाता है.

गंगनाणी में जगदम्बाऋषी के मन्दिर में एक साध्वी के रूप में रहती थी जो अपना नाम त्रिवेणी पुरी बताती ​थी. उसने बताया कि गंगनाणी का महत्व यह भी है कि यहां पर तीन धाराएं संगम बनाती है. कहती थी कि इलहबाद में तो दो ही जिन्दी नदियां संगम बनाती हैं तीसरी नदी मृत अथवा अदृश्य है यद्यपि गंगनाणी में एक धारा जो जगदम्बाऋषि की तपस्या से गंगा के रूप में प्रकट हुई. सामने वाली धारा को सरगाड़ अथवा सरस्वती कहती है तथा बगल में यमुना बहती है. इन तीनों का संगम गंगनाणी में होता है. वे बड़े विश्वास के साथ कहती थी कि यही है असली त्रिवेणी. ज्ञात हो कि गंगनाणी कुण्ड के बारे में ‘केदारखण्ड’ में लिखित वर्णन है. उक्त स्थान में वसंत के आगमन पर एक भव्य मेले का आयोजन होता है. लोग उक्त दिन भी कुण्ड के पानी को बर्तन में भरकर घरों को ले जाते हे. यह पानी वर्ष भर पूजा के काम आता है. बताया जाता कि इस दिन ही गंगा यहां प्रकट हुइ थी.

(नोट—आलेख को प्रकाशन से पूर्व लेखक/प्रकाशक की अनुमति लेनी आवश्यक होगी, यह कॉपीराइट के अन्तर्गत है। )
(लेखक सी.सुब्रमण्यम राष्ट्रीय मीडिया अवॉर्ड—2016 द्वारा सम्मानित हैं)

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