March 5, 2021
अभिनव पहल उत्तराखंड हिमालयी राज्य

उत्तराखंड में बेहतर रोजगार का जरिया हो सकती है केसर की खेती!

  • जे. पी. मैठाणी

आजकल आप नकली केसर यानी कुसुम के कंटीले फूलों के बारे में भी ये सुनते हैं की ये केसर है लेकिन सावधान रहिये. ये नकली है इसके झाड़ीनुमा पौधो पर गुच्छों में उगने वाले फूलों को सुखकर केसर जैसा रंग निकलता है. इसलिए कृपया सावधान रहिये!

जैसे ही हम केसर का नाम सुनते हैं हमें कश्मीर का ध्यान आता है. पूजा पाठ, भोजन , प्रसाद, आयुर्वेदिक ओषधियां और इसके अलावा केसर के कई उपयोग हैं. केसर के तंतु जो धागे जैसे होते हैं वो फूल के मध्य भाग के बारीक रेशे वाले पुंकेसर होते हैं. केसर के फूल की पंखुड़ियों से केसर नहीं बनता बल्कि फूल के मध्य भाग में जो धागे सदृश तंतु यानी पुंकेसर होते हैं उनको सुखाकर असली केसर बनती है! इसकी खेती सबसे अधिक खेती कश्मीर के पम्पौर और किश्तवाड़ में होती है.

आजकल आप नकली केसर यानी कुसुम के कंटीले फूलों के बारे में भी ये सुनते हैं की ये केसर है लेकिन सावधान रहिये. ये नकली है इसके झाड़ीनुमा पौधो पर गुच्छों में उगने वाले फूलों को सुखकर केसर जैसा रंग निकलता है. इसलिए कृपया सावधान रहिये!

केसर का वानस्पतिक नाम क्रोकस सैटाइवस (Crocus sativus) है. अंग्रेज़ी में इसे सैफरन (saffron) नाम से जाना जाता है. यह इरिडेसी (Iridaceae) कुल का क्षुद्र वनस्पति है जिसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है. ‘आइरिस’ परिवार का यह सदस्य लगभग 80 प्रजातियों में विश्व के विभिन्न भू-भागों में पाया जाता है.

असली केसर की खेती– हिमालय के बुग्याल से लगे क्षेत्रों या गांवों में ही 1800 मीटर से ऊपर यानी लगभग समुद्रतल से 4800-से 5000 फीट तक ही हो सकती है असली केसर के बीज नहीं होते बल्कि रेशेदार खोल के भीतर छुपे बल्बों या कंद से ही असली केसर के फूल खिलते हैं. मैंने वर्ष 2018 में असली केसर की खेती पर कुछ अनुप्रयोग किये इस कार्य में मेरी मदद मेरे मित्र मुबारक नर्सरी वाले मोहम्मद खालिद और देहरादून के गार्डनिंग सोसाइटी के अध्यक्ष श्री सतीश कुमार भंडारी जी ने की!

आइये जानते है असली केसर की खेती के बारे में…
एक किलो में 200 के करीब बल्ब आते हैं- एक नाली जमीन के लिए डेढ़ किलो केसर के बल्ब चाहिए. वर्तमान में एक किलो केसर के बल्ब का मूल्य लगभग 1000 रुपये किलो है. आपको सुविधानुसार 100 ग्राम का पैकेट भी मिल सकता है!

दूध में केसर डालकर पीना काफी अच्छा होता है, खासतौर से गर्भवती महिलाओं के लिए। क्योंकि केसर सौंदर्य निखारने में सहयोगी है, इसलिए सुंदर एवं गोरे बच्चे को पाने के लिए गर्भवती महिलाएं अपने आहार में केसर को शामिल करने की कोशिश करती हैं.

कैसा होता है केसर का असली फूल
केसर के फूल के मध्य भाग में पिस्टिल्स और स्टिग्मा यानी फूल का वह अंग जिससे परागण पैदा होते हैं, वो ही सुखाकर केसर के रूप में प्रयोग होता है. (The stigma receives pollen and it is on the stigma that the pollen grain germinates. Often sticky, the stigma is adapted in various ways to catch and trap pollen with various hairs, flaps, or sculpturings.)

केसर के फायदे

  1. स्वास्थ्य को मिलने वाले केसर के फायदे तो आप ज़रूर जानते होंगे. दूध में केसर डालकर पीना काफी अच्छा होता है, खासतौर से गर्भवती महिलाओं के लिए। क्योंकि केसर सौंदर्य निखारने में सहयोगी है, इसलिए सुंदर एवं गोरे बच्चे को पाने के लिए गर्भवती महिलाएं अपने आहार में केसर को शामिल करने की कोशिश करती हैं.
  2.  हमने यहां केसर को सीधा इस्तेमाल करने की बजाय, कोशिश शब्द का प्रयोग किया है. करें भी क्यों ना… सोने-चांदी के भाव पर मिलने वाला केसर इस्तेमाल करना हर किसी के बस की बात भी नहीं है. दरअसल अधिकांश लोग जो केसर इस्तेमाल करते हैं वह असली एवं शुद्ध भी नहीं होता, क्योंकि शुद्ध केसर की कीमत तो आसमान को छूती है.

केसर की बातें
केसर को अन्य कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि कुंकुम, जाफरान अथवा सैफ्रन. शायद आप ना जानते हों कि केसर भारतीय पदार्थ नहीं है, यानी कि यह विदेश से आई हुई फसल है. इसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है, यद्यपि इसकी खेती स्पेन, इटली, ग्रीस, तुर्किस्तान, ईरान, चीन तथा भारत में होती है. भारत में यह केवल जम्मू (किस्तवार) तथा कश्मीर (पामपुर) के सीमित क्षेत्रों में पैदा होती हैं. क्योंकि वहां की जलवायु केसर के लिए उपजाऊ है, इसके अलावा इसे किसी भी अन्य भारतीय राज्य में उगाना नामुमकिन ही है.

विश्व में केसर उगाने वाले प्रमुख देश हैं- फ्रांस, स्पेन, भारत, ईरान, इटली, ग्रीस, जर्मनी, जापान, रूस, आस्ट्रिया, तुर्किस्तान, चीन, पाकिस्तान के क्वेटा एवं स्विटज़रलैंड. आज सबसे अधिक केसर उगाने का श्रेय स्पेन को जाता है, इसके बाद ईरान को. कुल उत्पादन का 80% इन दोनों देशों में उगाया जा रहा है, जो लगभग 300 टन प्रतिवर्ष है.

केसर में क्रोसिन
केसर में ‘क्रोसिन’ नाम का तत्व पाया जाता है, जो वैज्ञानिक रूप से बुखार को दूर करने में उपयोगी माना जाता है. इसके साथ ही यह एकाग्रता, स्म रण शक्ति और रिकॉल क्षमता को भी बढ़ाने का काम करता है। इतना ही नहीं, आंखों की परेशानी दूर करने में भी मददगार है केसर.
(स्रोत- www.hindi.speakingtree.in).

केसर (saffron) एक सुगंध देने वाला पौधा है. इसके पुष्प की वर्तिकाग्र (stigma) को केसर, कुंकुम, जाफरान अथवा सैफ्रन (saffron) कहते हैं. यह इरिडेसी (Iridaceae) कुल की क्रोकस सैटाइवस (Crocus sativus) नामक क्षुद्र वनस्पति है जिसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है, यद्यपि इसकी खेती स्पेन, इटली, ग्रीस, तुर्किस्तान, ईरान, चीन तथा भारत में होती है. भारत में यह केवल जम्मू (किस्तवार) तथा कश्मीर (पामपुर) के सीमित क्षेत्रों में पैदा होती हैं. प्याज तुल्य इसकी गुटिकाएं (bulb) प्रति वर्ष अगस्त-सितंबर में रोपी जाती हैं और अक्टूबर-दिसंबर तक इसके पत्र तथा पुष्प साथ निकलते हैं.

केसर का क्षुप 15-25 सेंटीमीटर ऊंचा, परंतु कांडहीन होता है. पत्तियां मूलोभ्दव (radical), संकरी, लंबी और नालीदार होती हैं. इनके बीच से पुष्पदंड (scapre) निकलता है, जिसपर नीललोहित वर्ण के एकाकी अथवा एकाधिक पुष्प होते हैं. पंखुडि़यां तीन तीन के दो चक्रों में और तीन पीले रंग के पुंकेशर होते हैं. कुक्षिवृंत (style) नारंग रक्तवर्ण के, अखंड अथवा खंडित और गदाकार होते हैं. इनकी ऊपर तीन कुक्षियां, लगभग एक इंच लंबी, गहरे, लाल अथवा लालिमायुक्त हल्के भूरे रंग की होती हैं, जिनके किनारे दंतुर या लोमश होते हैं. केसर की गंध तीक्ष्ण, परंतु लाक्षणिक और स्वाद किंचित् कटु, परंतु रुचिकर, होता है.

दुनिया में सबसे उत्तम केसर इरान में होती है और भारत में कश्मीर में. केसर विश्व का सबसे कीमती पौधा है. केसर की खेती भारत में जम्मू के किश्तवाड़ तथा जन्नत-ए-कश्मीर के पामपुर (पंपोर) के सीमित क्षेत्रों में अधिक की जाती है. केसर यहां के लोगों के लिए वरदान है.

इसका उपयोग मक्खन आदि खाद्य द्रव्यों में वर्ण एवं स्वाद लाने के लिये किया जाता हैं. चिकित्सा में यह उष्णवीर्य, उत्तेजक, आर्तवजनक, दीपक, पाचक, वात-कफ-नाशक और वेदनास्थापक माना गया है. अत: पीड़ितार्तव, सर्दी जुकाम तथा शिर:शूलादि में प्रयुक्त होता है.

केसर का वानस्पतिक नाम क्रोकस सैटाइवस (Crocus sativus) है. अंग्रेज़ी में इसे सैफरन (saffron) नाम से जाना जाता है. यह इरिडेसी (Iridaceae) कुल का क्षुद्र वनस्पति है जिसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है. ‘आइरिस’ परिवार का यह सदस्य लगभग 80 प्रजातियों में विश्व के विभिन्न भू-भागों में पाया जाता है. विश्व में केसर उगाने वाले प्रमुख देश हैं- फ्रांस, स्पेन, भारत, ईरान, इटली, ग्रीस, जर्मनी, जापान, रूस, आस्ट्रिया, तुर्किस्तान, चीन, पाकिस्तान के क्वेटा एवं स्विटज़रलैंड. आज सबसे अधिक केसर उगाने का श्रेय स्पेन को जाता है, इसके बाद ईरान को. कुल उत्पादन का 80% इन दोनों देशों में उगाया जा रहा है, जो लगभग 300 टन प्रतिवर्ष है.

भारत में केसर
दुनिया में सबसे उत्तम केसर इरान में होती है और भारत में कश्मीर में. केसर विश्व का सबसे कीमती पौधा है. केसर की खेती भारत में जम्मू के किश्तवाड़ तथा जन्नत-ए-कश्मीर के पामपुर (पंपोर) के सीमित क्षेत्रों में अधिक की जाती है. केसर यहां के लोगों के लिए वरदान है. क्योंकि केसर के फूलों से निकाला जाता सोने जैसा कीमती केसर जिसकी कीमत बाज़ार में तीन से साढ़े तीन लाख रुपये किलो है. परंतु कुछ राजनीतिक कारणों से आज उसकी खेती बुरी तरह प्रभावित है. यहां की केसर हल्की, पतली, लाल रंग वाली, कमल की तरह सुन्दर गंधयुक्त होती है. असली केसर बहुत महंगी होती है. कश्मीरी मोंगरा सर्वोतम मानी गई है. एक समय था जब कश्मीर का केसर विश्व बाज़ार में श्रेष्ठतम माना जाता था. उत्तराखंड के चौबटिया के राजकीय बागान में सबसे पहले केसर के कंद बोए गए थे. लेकिन यह प्रयोजना प्रवान नहीं चढ़ सकी. विदेशों में भी इसकी पैदावार बहुत होती है और भी केसर का आयात करता है. उत्तराखंड के चारधाम में से एक श्रीबद्रीनाथ में केसर की काफी मांग रहती है. क्योंकि श्रीबद्रीनाथ का एक प्रमुख प्रसाद केसरिया भात है. इसे डिमरी लोग बनाते हैं.

केसर की खेती। फोटो गूगल के साभार

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से सिर्फ 20 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटे शहर पंपोर के खेतों में शरद ऋतु के आते ही खुशबूदार और कीमती जड़ी-बूटी ‘केसर’ की बहार आ जाती है. वर्ष के अधिकतर समय ये खेत बंजर रहते हैं क्योंकि ‘केसर’ के कंद सूखी ज़मीन के भीतर पनप रहे होते हैं, लेकिन बर्फ़ से ढकी चोटियों से घिरे भूरी मिट्टी के मैदानों में शरद ऋतु के अलसाये सूर्य की रोशनी में शरद ऋतु के अंत तक ये खेत बैंगनी रंग के फूलों से सज जाते हैं. और इस रंग की खुशबू सारे वातावरण में बसी रहती है. इन केसर के बैंगनी रंग के फूलों को हौले-हौले चुनते हुए कश्मीरी लोग इन्हें सावधानी से तोड़ कर अपने थैलों में इक्ट्ठा करते हैं. केसर की सिर्फ 450 ग्राम मात्रा बनाने के लिए क़रीब 75 हज़ार फूल लगते हैं. केसर का पौधा

प्याज तुल्य केसर के कंद/गुटिकाएं (bulb) प्रति वर्ष अगस्त-सितंबर माह में बोए जाते हैं, जो दो-तीन महीने बाद अर्थात नवंबर-दिसंबर तक इसके पत्र तथा पुष्प साथ निकलते हैं. इसके पुष्प की शुष्क कुक्षियों (stigma) को केसर, कुंकुम, जाफरान अथवा सैफ्रन (saffron) कहते हैं. इसमें अकेले या 2 से 3 की संख्या में फूल निकलते हैं.

‘केसर’ को उगाने के लिए समुद्रतल से लगभग 2000 मीटर ऊंचा पहाड़ी क्षेत्र एवं शीतोष्ण सूखी जलवायु की आवश्यकता होती है. पौधे के लिए दोमट मिट्टी उपयुक्त रहता है. यह पौधा कली निकलने से पहले वर्षा एवं हिमपात दोनों बर्दाश्त कर लेता है, लेकिन कलियों के निकलने के बाद ऐसा होने पर पूरी फसल चौपट हो जाती है। मध्य एवं पश्चिमी एशिया के स्थानीय पौधे केसर को कंद (बल्ब) द्वारा उगाया जाता है.

केसर का पौधा सुगंध देनेवाला बहुवर्षीय होता है और क्षुप 15 से 25 सेमी (आधा गज) ऊंचा, परंतु कांडहीन होता है। इसमें घास की तरह लंबे, पतले व नोकदार पत्ते निकलते हैं। जो मूलोभ्दव (radical), संकरी, लंबी और नालीदार होती हैं. इनके बीच से पुष्पदंड (scapre) निकलता है, जिस पर नीललोहित वर्ण के एकाकी अथवा एकाधिक पुष्प होते हैं. अप्रजायी होने की वजह से इसमें बीज नहीं पाए जाते हैं. प्याज तुल्य केसर के कंद/गुटिकाएं (bulb) प्रति वर्ष अगस्त-सितंबर माह में बोए जाते हैं, जो दो-तीन महीने बाद अर्थात नवंबर-दिसंबर तक इसके पत्र तथा पुष्प साथ निकलते हैं. इसके पुष्प की शुष्क कुक्षियों (stigma) को केसर, कुंकुम, जाफरान अथवा सैफ्रन (saffron) कहते हैं. इसमें अकेले या 2 से 3 की संख्या में फूल निकलते हैं. इसके फूलों का रंग बैंगनी, नीला एवं सफेद होता है. ये फूल कीपनुमा आकार के होते हैं. इनके भीतर लाल या नारंगी रंग के तीन मादा भाग पाए जाते हैं. इस मादा भाग को वर्तिका (तन्तु) एवं वर्तिकाग्र कहते हैं. यही केसर कहलाता है. प्रत्येक फूल में केवल तीन केसर ही पाए जाते हैं. लाल-नारंगी रंग के आग की तरह दमकते हुए केसर को संस्कृत में ‘अग्निशाखा’ नाम से भी जाना जाता है.

इन फूलों में पंखुडि़यां तीन-तीन के दो चक्रों में और तीन पीले रंग के पुंकेशर होते हैं. कुक्षिवृंत (style) नारंग रक्तवर्ण के, अखंड अथवा खंडित और गदाकार होते हैं. इनके ऊपर तीन कुक्षियाँ, लगभग एक इंच लंबी, गहरे, लाल अथवा लालिमायुक्त हल्के भूरे रंग की होती हैं, जिनके किनारे दंतुर या लोमश होते हैं.

इन फूलों की इतनी तेज़ खुशबू होती है कि आसपास का क्षेत्र महक उठता है. केसर की गंध तीक्ष्ण, परंतु लाक्षणिक और स्वाद किंचित् कटु, परंतु रुचिकर, होता है. इसके बीज आयताकार, तीन कोणों वाले होते हैं जिनमें से गोलकार मींगी निकलती है. ‘केसर को निकालने के लिए पहले फूलों को चुनकर किसी छायादार स्थान में बिछा देते हैं. सूख जाने पर फूलों से मादा अंग यानि केसर को अलग कर लेते हैं. रंग एवं आकार के अनुसार इन्हें- मागरा, लच्छी, गुच्छी आदि श्रेणियों में वर्गीकत करते हैं. 150000 फूलों से लगभग 1 किलो सूखा केसर प्राप्त होता है.

आयुर्वेद में केसर
केसर का उपयोग आयुर्वेदिक नुस्खों में, खाद्य व्यंजनों में और देव पूजा आदि में तो केसर का उपयोग होता ही था पर अब पान मसालों और गुटकों में भी इसका उपयोग होने लगा है. केसर बहुत ही उपयोगी गुणों से युक्त होती है. यह कफ नाशक, मन को प्रसन्न करने वाली, मस्तिष्क को बल देने वाली, हृदय और रक्त के लिए हितकारी, तथा खाद्य पदार्थ और पेय (जैसे दूध) को रंगीन और सुगन्धित करने वाली होती है.

आयुर्वेदों के अनुसार केसर उत्तेजक होती है और कामशक्ति को बढ़ाती है. यह मूत्राशय, तिल्ली, यकृत (लीवर), मस्तिष्क व नेत्रों की तकलीफों में भी लाभकारी होती है. प्रदाह को दूर करने का गुण भी इसमें पाया जाता है.

चिकित्सा में यह उष्णवीर्य, आर्तवजनक, वात-कफ-नाशक और वेदनास्थापक माना गया है. अत: पीड़ितार्तव, सर्दी जुकाम तथा शिर:शूलादि में प्रयुक्त होता है. यह उत्तेजक, वाजीकारक, यौनशक्ति बनाए रखने वाली, कामोत्तेजक, त्रिदोष नाशक, आक्षेपहर, वातशूल शामक, दीपक, पाचक, रुचिकर, मासिक धर्म साफ़ लाने वाली, गर्भाशय व योनि संकोचन, त्वचा का रंग उज्ज्वल करने वाली, रक्तशोधक, धातु पौष्टिक, प्रदर और निम्न रक्तचाप को ठीक करने वाली, कफ नाशक, मन को प्रसन्न करने वाली, वातनाड़ियों के लिए शामक, बल्य, वृष्य, मूत्रल, स्तन (दूध) वर्द्धक, मस्तिष्क को बल देने वाली, हृदय और रक्त के लिए हितकारी, तथा खाद्य पदार्थ और पेय (जैसे दूध) को रंगीन और सुगन्धित करने वाली होती है. आयुर्वेदों के अनुसार केसर उत्तेजक होती है और कामशक्ति को बढ़ाती है. यह मूत्राशय, तिल्ली, यकृत (लीवर), मस्तिष्क व नेत्रों की तकलीफों में भी लाभकारी होती है. प्रदाह को दूर करने का गुण भी इसमें पाया जाता है.

कैसे संभालें केसर के बल्बों को अगले साल के लिए
उत्तराखंड में केसर के जो बल्ब आपने पिछले साल बोये थे उन पर जाड़ा ख़तम होते ही मार्च के अंतिम सप्ताह में पहले फूल खिलेंगे, जबकि कश्मीर में उच्च हिमालयी क्षेत्र में जून के आखिरी सप्ताह से सितंबर प्रथम सप्ताह में फूल खिलते हैं. यानी कि शरद ऋतु के आगम से पहले कश्मीर में केसर के फूल खिलते हैं. उत्तराखंड में इस पर और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है. कश्मीर से लाए गए बल्व असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करते हुए अप्रैल—मई में ही फूल गए. फूलों के झड़ने के बाद फिर पत्तियों का गुच्छे में उभर कर आना एक नया अनुभव था. ये फूल 3—4 दिन ही रहते हैं फूलों के बीच से केसर चुनकर अब अगले 3-4 महीने इन बल्बों से बारीक पतली-पतली लम्बी पत्तियां निकलती हैं जो जून में सूख जाती हैं लेकिन कश्मीर में अक्टूबर से दिसंबर मध्य पत्तियां सूख जाती हैं और जमीन बर्फ से ढ़क जाती है. केसर के बल्ब जमीन के नीचे शीत सुप्तावस्था में चले जाते हैं. ध्यान रहे बल्बों को बरसात से पहले ही खोदकर लकड़ी–प्लास्टिक की ट्रे में रेत, बालू या सूखी पत्तियों से ढककर ठन्डे अधेरे स्थान पर रखना होता है इस अवधी को डोर्मंसी यानी बल्ब की सुप्तावस्था कहते हैं. उत्तराखंड में इन बल्बों को दिपावली के बाद और बर्फ गिरने से पहले लाइन से जमीन में 8-10 इंच की दूरी पर बो दिया जाना चाहिए! बारिश और अधिक पानी से फसल और बल्बों को बचाना जरूरी है!

उत्तराखंड में कहां —कहां हो सकती है केसर की खेती
उत्तराखंड में माणा, मलारी, नीति, द्रोणागिरी, तोलमा, औली परसारी, जोशीमठ के ऊपर सुनील, डूमक, कलगोठ, घाट में- सुतोल, कनोल देवाल में– वाण, घेस. दशोली में– पीपलकोटी- किरुली के ऊपर पांचुला बुग्याल, मंडल, रुद्रप्रयाग जिले में चोपता वाला क्षेत्र, पौड़ी में बिनसर और दूधातोली वाला क्षेत्र, पिथौरागढ़ में– मालपा, मुनस्यारी, उत्तरकाशी में– डोडिताल के आस—पास का क्षेत्र, मोरी, सांकरी, दयरा बुग्याल के नीचे वाला क्षेत्र, टिहरी में गंगी– सहस्त्रताल वाला क्षेत्र, देहरादून में धनौल्टी वाला क्षेत्र उपयोगी है!

(सभी फोटो जेपी मैठाणी )
यह लेख लेखक द्वारा पिछले तीन वर्षों के शोध के बाद लिखा गया है।

(लेखक पहाड़ के सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार एवं पीपलकोटी में ‘आगाज’ संस्था से संबंद्ध हैं)

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