April 13, 2021
शख्सियत

उत्तराखण्ड की वीरांगना मुन्नी पाण्डे की प्रेरणास्पद संघर्षगाथा

  • भुवन चन्द्र पन्त

1971 के because भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए कुमाऊं रेजीमेन्ट के नायक लीलाम्बर पाण्डे की वीरांगना को आज भारत-पाक युद्ध की स्वर्णजयन्ती (50 वर्ष पूर्ण होने पर) के मौके पर उनके कानियां, रामनगर स्थित आवास पर सम्मानित किया गया. दर्जनों सैन्य वाहनांे के साथ, जब सैन्य अधिकारियों की टोलियां आज कानियां (रामनगर) की गंगोत्री विहार कालोनी में पहुंची तो एक बार कालोनी वासी इस सकते में आ गये कि आज फिर कालोनी का कोई सैनिक शहीद हो गया. because पुष्पमालाओं से सुसज्जित सेना के वाहन और उनके आगे-पीछे सेना के उच्चधिकारियों की गाड़ियों का हुजुम, कालोनी के लोगों को किसी अनहोनी की आशंका जताने को काफी था. लेकिन जल्दी ही इस शंका से पर्दा तब उठा, जब सैनिकों का काफिला गंगोत्री विहार निवासी श्रीमती मुन्नी पाण्डे के आवास पर जाकर ठहरा.

मुन्नी पाण्डे

शहीद लीलाम्बर पांडे

ये उसी वीरांगना मुन्नी पाण्डे becauseका निवास था, जिनके पति नायक स्व. लीलाम्बर पाण्डे, भारत-पाक युद्ध में 16 दिसम्बर 1971 को कच्छ क्षेत्र में देश की रक्षा में शहीद हो गये थे. इसके पुख्ता प्रमाण तो नहीं हैं लेकिन उनके साथ के सैनिक तब बताते थे कि दुश्मन की गोली लगने के बाद भी उन्होंने 4-5 दुश्मनों के मौत के घाट उतारकर दम तोड़ा. आज उसी शहीद के सम्मान में कृतज्ञ राष्ट्र की सेना ने उनके आवास पर जाकर शहीद को because श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए वीरांगना को उच्च सैन्य अधिकारियों द्वारा सलामी देकर गौरवान्वित किया गया. इस सम्मान से गदगद् होकर श्रीमती मुन्नी पाण्डे बताती है कि वे शहीद होकर भी अमर हो गये. इस अवसर पर मशाल प्रज्ज्वलित कर देश के सारे शहीद परिवारों से एकत्र कर इस मशाल को सेना हेडक्वार्टर दिल्ली तक ले जाया जायेगा. सेना की कृतज्ञता को कोटि-कोटि नमन्.

मुन्नी पाण्डे

आइये! अब परिचय कराते हैं, because श्रीमती मुन्नी पाण्डे की संघर्षपूर्ण गौरव गाथा का. एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली मुन्नी का विवाह जून 1968 में विजयपुर, पीपलखेत (बागेश्वर) निवासी लीलाम्बर पाण्डे से तय हुआ . विधि का संयोग देखिये, शादी की तिथि तय होकर शादी की जरूरी तैयारियां चल ही रही थी, कि लीलाम्बर पाण्डे के पिता यानि होने वाले ससुर का आकस्मिक निधन हो गया. इसलिए शादी में अनावश्यक व्यवधान हो गया because और कुछ दिन विलम्ब के बाद वहीं शादी हुई. तब आज की तरह के आवागमन के साधन नहीं थे. उनकी मायके से ससुराल की यात्रा एक दिन में तय नहीं होती थी. रात्रि विश्राम बागेश्वर करने के बाद ही अगले दिन वहां पहुंचा जा सकता था.

मुन्नी पाण्डे

माल देश अथवा मल्ला देश के नाम से यह क्षेत्र का शारीरिक श्रम इतना दुसाध्य माना जाता था, कि हर एक के बस की बात नहीं. जिसने धान रोपाई becauseजैसा दुष्कर कार्य कभी किया ही न हो, जिसमें रोपाई के वक्त पैर सड़ जाते है, उसके लिए तो यह एक चुनौती थी. लेकिन ससुराल यहां है, तो खुद को परिस्थितियों के माकूल करना ही पड़ता है.because मुन्नी पाण्डे ने अपनी किसी परेशानी की शिकवा-शिकायत मायके में नहीं की. पति फौज से साल-दो साल में एक महीने की छुट्टी आते बाकी समय बौल (शारीरिक श्रम) ही जिन्दगी का पर्याय बन चुका था. जिसे वे बखूबी निभा भी रही थी. जाड़ों में जब खेती-बाड़ी के काम से थोड़ा राहत मिलती तो एकाध माह के लिए मायके आना जरूर होता.

मुन्नी पाण्डे

दिसम्बर 1971 में भी वह फुर्सत के पलों में मायके आई हुई थी. उधर भारत-पाक युद्ध की खबरें अक्सर रेडियो पर सुनकर मन तरह-तरह के विचारों से because आशंकित था. संभवतः 3 दिसम्बर 1971 से लड़ाई शुरू हुई थी और 16 दिसम्बर 1971 को युद्ध विराम की घोषणा हो चुकी थी. युद्ध विराम की घोषणा से सभी ने राहत की सांस ली. 18 दिसम्बर 1971 को सेना की ओर से एक तार प्राप्त हुआ, जो घर विजयपुर के पते रहा होगा, वहां से प्रत्यावर्तित (रिडाइरेक्ट) होकर प्राप्तकर्ता को because भवाली के पते पर भेजा गया था. संभवतः इसी वजह से तार की डिलीवरी में इतना समय भी लगा. मन जिस आशंका से ग्रसित था, वही हुआ.

मुन्नी पाण्डे

तार 16 दिसम्बर 1971 को नायक लीलाम्बर पाण्डे की सीमा पर शहीद होने की खबर का था. बदहवास मुन्नी पाण्डे पछाड़ खाकर रोती, विलखती और कभी because खुद तालाब में डूब मरने को उद्धत होती. परिजनों तथा पास-पड़ोस के लोग ढांढस बधाते रहे. परिजनों को यकीन ही नहीं हो रहा था, कि यह घटना सच है भी या नहीं? उस समय आज की तरह दूरभाष की सुविधा तो थी नहीं कि झट से फोन से मालूम कर लें. फोन करें भी तो किसे? ट्रंककाल होता था, जिसमें सुबह का मिलाया, so शाम तक बात हो जाय तो बड़ी बात थी, लेकिन फोन नंबर के अभाव में यह भी संभव नहीं था. बड़े भाई मनोहर पन्त, जो एक तरह से परिवार के मुखिया थे, अपने दामाद डी.एन. जोशी जी को साथ लेकर उसी तारधर पहुंचे जहां से तार तकसीम हुआ था.

मुन्नी पाण्डे

शीघ्र जवाब आने की प्रत्याशा में because जवाबी तार रेजीमेंट को किया गया, जिसका कोई उत्तर नहीं मिला. अगले दिन ककिया ससुर, जो नैनीताल में नौकरी करते थे, पहुंच गये और समाचार की सत्यता because की पुष्टि हो गयी. खैर- दूसरे दिन अपने ककिया ससुर के साथ वे अन्तिम क्रियाकर्म की रस्म करने ससुराल चली गयी. दुर्भाग्य से उनके कोई बच्चे भी नहीं थे, जिनके भविष्य के लिए वह आगे की हिम्मत जुटाये.

मुन्नी पाण्डे

अन्धे को क्याbecause चाहिये, एक लाठी का सहारा, जो इस विद्यालय ने दिया. जून 1972 में जब कक्षा 5 की परीक्षा उत्तीर्ण की तो संयोगवश उसी समय एक शासनादेश जारी हुआ कि कक्षा-5 उत्तीर्ण because सीधे हाईस्कूल परीक्षा में सम्मिलित हो सकता है. प्रधानाचार्य श्रीमती कला बिष्ट की दूरदर्शिता थी, कि उन्होंने इनका प्रवेश कक्षा-5 उत्तीर्ण करने के बाद सीधे कक्षा- 9 में कर दिया.

मुन्नी पाण्डे

यों ही दो-तीन because महिनों का समय गुजर गया. तब वह कक्षा-5 उत्तीर्ण भी नहीं थी. स्वयं श्रीमती मुन्नी पाण्डे ने आगे पढ़ाई कर अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत जुटायी और इस कार्य में सहयोग दिया उनके पिता तुल्य बड़े भाई मनोहर पन्त ने. पास के शहर नैनीताल में भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय का नाम किसी ने सुझाया, क्‍योंकि because सैनिक विद्यालय नाम होने से एक आश जगी कि सैंनिकों के परिवारों को विशेष राहत मिलेगी. विद्यालय की संस्थापक प्रधानाचार्य श्रीमती कला बिष्ट से मिले. उन्होंने निःशुल्क छात्रावासी सुविधा के साथ कक्षा-5 में दाखिला कर दिया. सारी सुविधाएं, स्कूल फीस, छात्रावास की सारी सुविधाएं, यूनिफार्म तथा स्टेशनरी निःशुल्क.

मुन्नी पाण्डे

अन्ततः एक वीरांगना ने पैंशन पर आजीविका चलाने के बजाय शिक्षित होकर आत्मनिर्भर होने का जो रास्ता दिखाया, वह दूसरे लोगों को रोशनी जरूर देता है, वरना केवल आजीविका के लिए तो पारिवारिक पेंशन से भी गुजारा हो ही जाता. यह एक मिशाल है, उन लोगों के लिए जो किस्मत का रोना रोकर हाथ-पांव छोड़ देते हैं. इस संघर्षपूर्ण वीरांगना के व्यक्तित्व को नमन् करते हुए शहीद की आत्मा को श्रद्धांजलि के पुष्प अर्पित करते हैं.

मुन्नी पाण्डे

अन्धे को क्या चाहिये, एक because लाठी का सहारा, जो इस विद्यालय ने दिया. जून 1972 में जब कक्षा 5 की परीक्षा उत्तीर्ण की तो संयोगवश उसी समय एक शासनादेश जारी हुआ कि कक्षा-5 उत्तीर्ण सीधे हाईस्कूल परीक्षा में because सम्मिलित हो सकता है. प्रधानाचार्य श्रीमती कला बिष्ट की दूरदर्शिता थी, कि उन्होंने इनका प्रवेश कक्षा-5 उत्तीर्ण करने के बाद सीधे कक्षा- 9 में कर दिया. इस तरह अगले वर्ष हाईस्कूल की परीक्षा दी और उसमें अच्छे नंबरों से परीक्षा पास की.

मुन्नी पाण्डे

प्रधानाचार्य कला बिष्ट ने because एक संरक्षक की हैसियत से इनको सलाह दी कि हाईस्कूल के बाद बीटीसी की ट्रेनिंग कर लें. तब बीटीसी हाईस्कूल के बाद हो जाती थी और पाठ्यक्रम एक वर्षीय था. ट्रेनिंग पूरी हुई, हाईस्कूल व बीटीसी का सार्टिफिकेट तो हाथ में था, लेकिन सरकारी विद्यालयों में नियुक्ति की बारी आने में अभी विलम्ब था. इस समय का सदुपयोग करने के लिए इन्टरमीडिएट की परीक्षा का फार्म व्यक्तिगत् रूप से भरा और दो साल बाद इधर इन्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की, because उधर नौकरी की तलाश. अल्पकाल के लिए भीमताल के किसी प्राइवेट स्कूल में नौकरी की, माह पूरा भी नहीं हुआ था कि सरकारी नौकरी का आदेश आया और रामगढ़ विकास क्षेत्र के किसी विद्यालय में पहली नियुक्ति मिली. कुछ साल पहाड़ों पर नौकरी के बाद रामनगर ब्लाक के विद्यालय में स्थानान्तरित हो गयी.

मुन्नी पाण्डे

एक दिन यों ही विद्यालय जाने के लिए वाहन का इन्तजार कर रही थी, कि साथ कि किसी अध्यापिका की स्कूटी से बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गयी. because कूल्हे व कोहनी की हड्डी टूट चुकी थी. कुछ समय स्थानीय अस्पतालों में उपचार के बाद परेशानियां बढ़ती गयी, अन्ततः दिल्ली के आर्मी हास्पिटल में एक माह भर्ती रही. आज भी उस परेशानी से चलने-फिरने में काफी दिक्क्त महसूस करती हैं. दुर्भाग्य से जिन परिजनों को साथ के लिए संरक्षण दिया, उनके साथ भी कुछ ऐसी अनहोनियां हुई, जो उन्हें आज भी कचोटती रहती हैं.

मुन्नी पाण्डे

अन्ततः एक वीरांगना ने पैंशन because पर आजीविका चलाने के बजाय शिक्षित होकर आत्मनिर्भर होने का जो रास्ता दिखाया, वह दूसरे लोगों को रोशनी जरूर देता है, वरना केवल आजीविका के लिए तो पारिवारिक पेंशन से भी गुजारा हो ही जाता. यह एक मिशाल है, उन लोगों के लिए जो किस्मत का रोना रोकर हाथ-पांव छोड़ देते हैं. इस संघर्षपूर्ण वीरांगना के व्यक्तित्व को नमन् करते हुए शहीद की आत्मा को श्रद्धांजलि के पुष्प अर्पित करते हैं.

मुन्नी पाण्डे

(लेखक भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल से सेवानिवृत्त हैं तथा प्रेरणास्पद व्यक्तित्वोंलोकसंस्कृतिलोकपरम्परालोकभाषा तथा अन्य सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा कविता लेखन में भी रूचि. 24 वर्ष की उम्र में 1978 से आकाशवाणी नजीबाबादलखनऊरामपुर तथा अल्मोड़ा केन्द्रों से वार्ताओं तथा कविताओं का प्रसारण.)

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