Tag: हिमालयी संस्कृति

हिमालयी संस्कृति के संरक्षण हेतु लेखक गाँव और IGNCA ने किया समझौता

हिमालयी संस्कृति के संरक्षण हेतु लेखक गाँव और IGNCA ने किया समझौता

दिल्ली-एनसीआर
  देश के पहले लेखक गाँव और आईजीएनसीए, नई दिल्ली के बीच सांस्कृतिक एवं शोध सहयोग हेतु एमओयू पर हस्ताक्षरहिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीइंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में हिमालय की सांस्कृतिक चेतना, साहित्य, कला और लोकविरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कार्यरत देश के पहले लेखक गाँव, देहरादून तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के मध्य सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं शोध संबंधी सहयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस पहल को भारतीय संस्कृति, साहित्य, कला और विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) प्रो. रमेश गौड़ ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का वास्तविक स्वरूप उसकी लोक परंपराओं, साह...
उत्तराखंड हिमालय की धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं का प्रतीक  है: छोटी दीवाली और इगास

उत्तराखंड हिमालय की धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं का प्रतीक है: छोटी दीवाली और इगास

लोक पर्व-त्योहार
जे पी मैठाणी  ऐ- ध्यान धोरया - यी राखुडी- कांणसी बग्वाल मतलब छ्वोटी दीवाली का दिन ख्वोली कणी ग्वोरू का पुछडा पर बाँधण च ( हे ध्यान रखना सब लोग - ये जो तुम्हारे हाथों पर राखियाँ बांधी जा रही है , ये छोटी दिवाली के दिन काटकर गाय के पूछ पर बाँध देनी हैं.  - ध्यान रखना- ये कोई और नहीं मेरी माँ ( श्रीमती विशेश्वरी देवी )  रक्षाबंधन के दिन हमको - बार बार बोल देती थी , और आज भी मैंने अपनी मां को फ़ोन करने की कोशिश की लेकिन अभी रात बेहद हो गयी तो बात नहीं हो पायी ! उस दौर में समस्या यह थी की उस जमाने में स्पंज से बनी राखियाँ जल्दी ही पानी सोखकर टूट जाती थी,  और सिर्फ सामान्य धागे वाली राखी पसनद नहीं आती थी ! आस पास के गांवों से जो पंडित जी भी आते थे उनकी हल्दी  और लाल पिठाईं में रंगी गयी राखियों से सारी हथेलियाँ रंग जाती थी और स्कूल में लिखते वक्त नोट बुक पर राखियों का वो कच्चा रंग लग जाता था ! घर...