Tag: आस्था

चांदणी धार पूजन : जहां पक्षियों से संवाद करती है आस्था

चांदणी धार पूजन : जहां पक्षियों से संवाद करती है आस्था

पर्यावरण, लोक पर्व-त्योहार
  तुंगनाथ घाटी : लोकज्ञान, पर्यावरण और विज्ञान का अद्भुत संगमआशिता डोभाल उत्तराखंड का पहाड़ केवल भौगोलिक संरचना भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के सहअस्तित्व का जीवंत दर्शन है। यहां की जीवनशैली में जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन—इन ‘5 ज’ का गहरा रिश्ता है। यही कारण है कि पर्वतीय समाज ने प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि संबंध माना है। इस संबंध की एक अनूठी मिसाल रुद्रप्रयाग जिले की तुंगनाथ घाटी में आज भी जीवित है—चांदणी धार पूजन। विरासत में मिली पर्यावरण चेतना तुंगनाथ बाबा का शीतकालीन प्रवास स्थल मक्कूमठ केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। यह क्षेत्र वन आंदोलनों की भूमि रहा है। यहाँ की लोकमानस में गूंजने वाला नारा— “मौण द्यौला पर बौण ना” (गर्दन कटवा देंगे, पर जंगल नहीं कटने देंगे) यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति...
श्राद्ध की आस्था में पर्यावरण व जीवन

श्राद्ध की आस्था में पर्यावरण व जीवन

समाज
सुनीता भट्ट पैन्यूली पितृपक्ष या श्राद्ध हमारे अपने जो अब जीवित नहीं हैं या हमारे पास नहीं हैं. because उनको याद करने का अवसर हैं. हमारी हिंदू परंपरा में इन दिनों दिवंगत  पूर्वजों का श्राद्ध व पिंडदान किया जाता है.ऐसा माना जाता है कि पितरों की पूजा अर्चना करने से उनकी हम पर विशिष्ट कृपा बनी रहती है.ज्योतिष हमारा यह भी विश्वास है कि अपने पितरों को श्राद्ध देकर हम उनके निमित्त जो भी because ब्राह्मण को दे रहे हैं वह उन तक ज़रूर पहुंच जायेगा. यह तो हम नहीं जानते है कि पहुंचता है या नहीं किंतु यह निश्चित है कि  सच्चे हृदय से पितरों को याद करके जब उनको तर्पण दिया जाता है तो हमारी श्रद्धाऐं उन तक तो ज़रूर पहुंचती ही होंगी.ज्योतिष पितृ ऋण को चुकाने because और कृतज्ञता प्रकट करने का कर्म भी है श्राद्ध श्राद्ध में गाय, कुत्ता, कौऐ को खिलाने का विधान भी है यह प्रशंसनीय है कि  because इसम...