
विजयादशमी (20 अक्टूबर, 2026) पर विशेष

प्रो. गिरीश्वर मिश्र
शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा
कठिन और लंबे वनवास के बाद श्रीराम द्वारा रावण के साथ लंका में युद्ध के बाद विजय प्राप्त करने की स्मृति को सजीव करता विजयादशमी का पर्व भारत के जन-जीवन में विशेष महत्व रखता है। यह याद दिलाता है कि आसुरी वृत्तियाँ जीवन-द्रोही होती हैं और उनका प्रतिकार करने के लिए तत्पर रहना आवश्यक है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में जीवन मूल्यों को स्थापित करने की सतत कामना और उसके लिए संघर्ष की अनिवार्यता को भी व्यंजित करता है।
श्रीराम की मंगलदायी छवि पौरुष और चरित्र के उत्कर्ष के रूप में लोक मन में अंकित है। पर उत्कर्ष से वह दूर नहीं, बल्कि पास आ जाते हैं। उनकी विशिष्टता यही है कि उनका जैसा आत्मीय कोई और नहीं मिलता। लोक से श्रीराम का तादात्म्य इतना गहरा है कि राम को याद किए बिना आज भी आम आदमी जीवन के बारे में सोच ही नहीं पाता। हम सबको आदत पड़ गई है और राम का नाम अच्छी-बुरी हर घड़ी याद किया ही जाता है। इसलिए उनकी विजय का उत्सव हर जाति-वर्ग के बच्चे, बूढ़े, जवान सबके लिए हर्ष और उल्लास का विषय होता है।
इस अवसर पर अब रावण-दहन का आयोजन मुख्य हो गया है। साथ में शारदीय नवरात्र में जगन्माता दुर्गा का पूजन देश के अन्यान्य क्षेत्रों में अत्यंत लोकप्रिय है। यह अवसर प्रतीक रूप में असत्य पर सत्य की और दुष्प्रवृत्ति पर सद्वृत्ति की जीत के संकल्प की ओर ध्यान आकृष्ट करता है।
अनेक रूपों और प्रसंगों में दैवी संपद और आसुरी संपद का द्वंद्व चलता ही रहता है। यह द्वंद्व संदेश देता है कि यह उतार-चढ़ाव अस्तित्व का सहज स्वभाव है। भारतीय काल गणना के हिसाब से भीषण महाभारत वाले द्वापर युग के ठीक पहले परिगणित त्रेता युग में मूल्यों के द्वंद्व के बीच विष्णु के मानवीय अवतार श्रीराम की महागाथा में मानव जीवन की विभिन्न समस्याओं और विसंगतियों से आजीवन लगातार जूझते रहने की पीड़ा प्रकट होती है।
इस पीड़ा के दायरे में देव, दानव, पशु, पक्षी, वनस्पति यानी पूरा चराचर जगत सम्मिलित है। यह विस्तृत वितान स्वाभाविक भी है, क्योंकि कर्म-बंधन अनिवार्य है, जो बिना रुके निरंतर चलता रहता है। कर्म करना जीवन की अनिवार्यता है और उसका परिणाम भी अकाट्य होता है। इस क्रम में आसक्ति और मोह पैदा होने की संभावना हमेशा बनी रहती है। ऐसा होने पर ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार के भावों के साथ आक्रोश, क्षोभ और कलह जन्म लेते हैं। तब जीवन और प्रकृति के बीच असंतुलन पैदा होता है। इस स्थिति को ही धर्म की ग्लानि कहते हैं। दूसरी ओर धर्म की रक्षा करने से जीवन की रक्षा और उन्नति होती है।
विजयादशमी धर्म की जय का उद्घोष करने वाला उत्सव है। राम कथा का एक मार्मिक प्रसंग इस दृष्टि से गौर करने लायक है। राम और रावण के बीच लंका की भूमि पर हो रहे युद्ध के बीच प्रबल पराक्रमी रावण से लड़ने को पैदल चल रहे श्रीराम को देख भक्त विभीषण के मन में संशय उठा। इस दृश्य में प्रतापी रावण रथ पर सवार था और रघुवीर विरथ यानी रथहीन थे। इस बेमेल स्थिति से विभीषण अधीर हो रहे थे। बिना रथ, बिना कवच, बिना पदत्राण के वीर बलवान रावण को कोई कैसे जीत सकेगा : नाथ न रथ नाहिन पदत्राना केहि बिधि जितब बीर बलवाना।
इस संदेह की मनःस्थिति को भाँपकर श्रीराम समझाते हैं कि जीत दिलाने वाला रथ कोई दूसरा है, जिसे कोई शत्रु पराजित नहीं कर सकता। उस रथ के साथ संसार रूपी अजेय शत्रु को जीता जा सकता है— महा अजय संसार रिपु जीत सकहिं सो बीर।
तब श्रीराम धर्ममय रथ की बात सामने रखते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने उस रथ का बड़ा सुंदर चित्र खींचा है। विजय की ओर ले जाने वाला रथ शौर्य—अर्थात् वीरता और धैर्य—के दो पहियों पर टिका होता है। उस रथ पर सत्य और शील, यानी सदाचार, नाम वाले ध्वज और पताका फहराते हैं। इस रथ में चार घोड़े जुते हुए हैं : बल, विवेक-बुद्धि, शम (अर्थात् इन्द्रियों पर नियंत्रण) और परोपकार।
इन घोड़ों की लगाम एक मजबूत डोरी है, जो क्षमा, दया और समता की तीन लड़ियों से मिलकर तैयार हुई है। ईश्वर-भजन या स्मरण सारथी है। वैराग्य ढाल है। संतोष की तलवार है। दान फरसा है। बुद्धि प्रचंड शक्ति है। श्रेष्ठ विज्ञान धनुष है। निर्मल अर्थात् निष्पाप और अविचल मन तरकस है। इस तरकस में शम यानी मन पर नियंत्रण, यम (सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य) और नियम (संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान) बाण हैं।
इस तरह का कोई दूसरा उपाय नहीं है— एहि सम विजय उपाय नहि दूजा। रथ का यह रूपक सामाजिक-राजनीतिक जीवन के परिचालन, शासन-प्रशासन और विधि-विधान की रक्षा में जुटे लोगों के लिए कर्तव्य-पालन और आचरण के तथा उसके सहायक उपादानों को बताता है। यह मूल्य-व्यवस्था आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आज राजनीतिक दल रथ-यात्रा पर हैं या उसकी तैयारी कर रहे हैं। पर यह रथ कैसा है और यात्रा किस काम के लिए है, यह विचारणीय है।
आज विश्व में संहार की लीला ऐसी हो रही है कि हार-जीत का कोई स्पष्ट अर्थ ही नहीं रह रहा। शायद जीतना स्वयं को है, अर्थात् स्वराज ही जरूरी है। जब तक अपने पर जीत नहीं होती, तब तक आदमी हारा हुआ है। जीत आसुरी उपाय से नहीं हो सकती। लोभवश स्वार्थ, अहंकार, दंभ, आडंबर का बोलबाला हो रहा है। उसी की छत्रछाया में व्यवस्था चल रही है, ऐसा लगता है। नेता, पुलिस, अधिकारी, कर्मचारी सभी मिथ्याचार के शिकार हो रहे हैं। किसी को संतोष नहीं है और तृष्णा की आग में नियम-कानून, धन-जन, श्रम और उत्पादन सबकी हानि हो रही है।
कर्मकांड तो हो रहा है, पर कार्य नहीं हो पा रहा है। कार्य की गुणवत्ता में गिरावट दर्ज हो रही है। धर्म के साथ जुड़ाव के लिए निस्पृह कर्तव्यपालन कठोर नैतिक मानदंडों की माँग करता है। कपट, छल, छद्म के आडंबर जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उनसे निःस्वार्थ जनसेवा का भाव जाता रहा। मानवीय संवेदना के ह्रास की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। सत्ता-सुख ही केंद्रीय हो रहा है।
जो सत्ता में हैं, उन्हें सत्ता की रक्षा करनी है और जो सत्ता में नहीं हैं, उन्हें सत्ता तक पहुँचने के लिए आंदोलन, प्रदर्शन, रैली, अनर्गल बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप में ही सारा श्रम और ऊर्जा खपानी पड़ रही है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अवसर वैध है, पर धरना और प्रदर्शन प्रायः दिशाहीन होते जा रहे हैं और उनकी उपलब्धि संदिग्ध है। इस उठापटक में लोक-कल्याण ओझल होता जा रहा है।
इसलिए आत्मलोचन की विशेष आवश्यकता है। यह जरूरी है कि हम विवेक के अनुसार आचरण करें, न कि सीमित राजनीतिक लाभ के लिए देशहित को भूलते जाएँ। प्रजातंत्र के लिए संस्थाओं की स्वायत्तता सुनिश्चित करना जरूरी है और नियम-कानून का पालन भी। यदि उसमें कमी हो तो सुधार की कोशिश होनी चाहिए। निरंकुश उपद्रव आगे बढ़ने का रास्ता नहीं है। आज देश को जगाने की जरूरत है और यह पहचानने की जरूरत है कि देश को क्या चाहिए। झूठे प्रपंच और अनावश्यक आडंबर की जगह विशाल देश की व्यापक समझ जरूरी है। स्वतंत्रता में एक-दूसरे का आदर भी शामिल है।
राम और देवी माँ सबकी हैं। राम ने देवी की उपासना की और अपनी सहज शक्ति पहचानी। उनकी विजय रावण को हराकर अपना राज्य स्थापित करना न था। वह लंका में विवेक और देवत्व को स्थापित करना चाहते थे। राम राज्य की स्थिति ऐसी थी, जिसमें सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती। बिना भेद-भाव के सबको अवसर देने की संकल्पना राम-राज्य की कसौटी है।
विजयादशमी के अवसर पर राम से जुड़ने का अर्थ यह भी है कि हम अपने में प्रभुता और विश्वास स्थापित करें। राम अप्रत्याशित भाव से अविचल रहे। मनुष्य के विवेक के उदय के साथ दुख जुड़े ही होते हैं। राम सबमें रमना चाहते थे, सबको रमाना चाहते थे। वे यहीं कहीं हैं, हमारे पास ही। वे वहीं हैं, जहाँ मानुष और सारे जीव लोक के साथ हमारी आत्मीयता बसती है।
इस अवसर को भारतीय समाज ने जिजीविषा और नवाचार के उत्सव के रूप में अपना लिया है। शारदीय नवरात्र अपने में शक्ति के संचय का अवसर देता है। भगवती का जागरण और शेरां वाली की स्तुति तथा रामलीला का आयोजन इसके सांस्कृतिक रूप को मोहक और लोकप्रिय बना रहे हैं।
पुरुषोत्तम श्रीराम ‘धर्म के विग्रह’ के रूप में विख्यात हैं। राम के लिए ‘धर्म’ का अर्थ होता है सत्य, अहिंसा, परोपकार और सब जनों की चिंता। इस तरह धर्म सबको साथ रहने, साझेदारी तथा परस्पर सौहार्द को जन्म देता है। इस धर्म की रक्षा हमें करनी होगी और यह धर्म ही हमारी रक्षा करेगा।
