Tag: महाभारत

आज महाभारत में शकुनि हैं दुर्योधन हैं पर न कृष्ण हैं, न अर्जुन

आज महाभारत में शकुनि हैं दुर्योधन हैं पर न कृष्ण हैं, न अर्जुन

लोक पर्व-त्योहार
कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व समूचे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है.आज के ही दिन भगवान् कृष्ण ने द्वापर युग में दुराचारी कंस के अत्याचार और आतंक से मुक्ति दिलाने तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए जन्म लिया था. गीता में भगवान् कृष्ण स्वयं कहते हैं कि "जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तो मैं धर्म की स्थापना के लिए हर युग में अवतार लेता हूं- “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत. अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् . धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥" -गीता‚ 4.7-8 ज्योतिष गीता में धर्म की अवधारणा सज्जन के संरक्षण और दुर्जन के विनाश से जुड़ी है तो वहीं आधुनिक संदर्भ में ‘धर्म’ से तात्पर्य है समाज व्यवस्था को युगानुसारी मानवीय मूल्यों की दृष्टि से पुन...
हिंदोस्ता की सामुद्रिक विरासत (मैसोपोटामिया टू मुजरिस ) 

हिंदोस्ता की सामुद्रिक विरासत (मैसोपोटामिया टू मुजरिस ) 

इतिहास, ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-15 मंजू काला सदियों से समंद हिंदुस्तान की जन-आस्थाओं के साथ पूरे परिवेश के साथ जुड़े रहे हैं. समंदर का भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म और अर्थ के क्षेत्र में विशेष स्थान रहा है. because रत्नाकर के रूप में सागर भारत भूमि को अनादिकाल से धन-धान्य से समृद्ध करते रहे हैं. सभ्यता के प्रारम्भ से लेकर आज तक भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग अपने जीवन निर्वाह के लिये पूरी तरह से समुद्रों पर ही आश्रित रहा है. आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हमने हर प्रकार से समुद्र का आशीर्वाद लिया है. मनुष्य मेरा मानना है कि समुद्र मंथन से प्राप्त रत्नों के कारण ही हमें विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता होने का गौरव प्राप्त हुआ. सदियों से हमारे पर्यावरण की रक्षा भी इन्हीं से होती रही है. because लेकिन, खेद के साथ लिखना चाहती हूँ कि हम सब समुद्र तट पर बैठ कर धरती की रेती को अपनी आभा से निहाल ...
‘पृथु वैन्य’ जिनके नाम पर ‘पृथिवी’ का नामकरण और लोकतंत्र की स्थापना हुई

‘पृथु वैन्य’ जिनके नाम पर ‘पृथिवी’ का नामकरण और लोकतंत्र की स्थापना हुई

पर्यावरण
 ‘पृथ्वी दिवस’ पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी आज 22 अप्रैल का दिन अंतरराष्ट्रीय जगत में ‘पृथ्वी दिवस’ (Earth Day) के रूप में मनाया जाता है. पृथिवी के पर्यावरण को बचाने के लिए ‘पृथ्वी दिवस’ की स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में की गई थी. ‘पृथ्वी दिवस’ की अवधारणा सभी पहाड़, नदियों, वनस्पतियों, महासागर, ग्राम-नगरों because के पर्यावरण संतुलन की चिंता को अपने आप में समाहित किए हुए.भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो पूरे ब्रह्माण्ड में पर्यावरण की शांति 'पृथ्वी दिवस’ का मूल विचार है. अंतरराष्ट्रीय जगत मैंने अपने शोधग्रंथ "अष्टाचक्रा अयोध्या : इतिहास और परंपरा" (उत्तरायण प्रकाशन, दिल्ली, 2006) में 'भारतराष्ट्र' की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए 'पृथु वैन्य' के because इतिहास पर भी विस्तार से चर्चा की है.और यह बताने का प्रयास किया है कि हमारे भारत में पृथिवी की रक्...
विद्यादत्त शर्मा: कलम और खुरपी के महामना!

विद्यादत्त शर्मा: कलम और खुरपी के महामना!

साहित्‍य-संस्कृति
नरेन्द्र कठैत पहाड़ में चीड़ की भीड़ ही भीड़ है. इसलिए चीड़ आत्ममुग्ध है कि वही पहाड़ की रीढ़ है. लेकिन थोड़ी सी भी, तेज हवा के झौंक में चीड़ की समूल उखड़ जाने because की प्रवृत्ति भी हमनें करीब से देखी है. हालांकि अंत, देर-सबेर सबका निश्चित है. वो इमारती हो अथवा करामाती, जलना सबको लकड़ी होकर ही है. किंतु चीड़ इतना बुद्धिहीन, बेखबर भी नहीं है - या - यूं कहें कि उसको यह भान नहीं है कि because उसके रग-रग में प्रज्वलन क्षमता भले ही है किंतु उसमें बांज के समान घनी छाया, मजबूत पकड़, प्रचण्ड ताप और शीतलता का वास नहीं है. इसीलिए चीड़ की आत्मा कदम-कदम पर बांज से खौफ खाती है. और-बांज से जितनी दूर हो सके पांव पसारती है. चीड़ पहाड़ की पगडंडियों, because धार-खाल-वनपथों पर ही नहीं अपितु साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में भी ऐसी ही अति उत्साही चीड़ की सी भीड़ है. लेकिन.....इंही चीड़ और चीड़ के कुनबों की भीड़...