कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व समूचे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है.आज के ही दिन भगवान् कृष्ण ने द्वापर युग में दुराचारी कंस के अत्याचार और आतंक से मुक्ति दिलाने तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए जन्म लिया था. गीता में भगवान् कृष्ण स्वयं कहते हैं कि “जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तो मैं धर्म की स्थापना के लिए हर युग में अवतार लेता हूं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत.
अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय
साधूनां विनाशाय दुष्कृताम् .
धर्मसंस्थापनार्थाय
संभवामि युगे युगे ॥”
गीता‚ 4.7-8

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गीता में धर्म की अवधारणा सज्जन के संरक्षण और दुर्जन के विनाश से जुड़ी है तो वहीं आधुनिक संदर्भ में ‘धर्म’ से तात्पर्य है समाज व्यवस्था को युगानुसारी मानवीय मूल्यों की दृष्टि से पुनर्स्थापित करना. भारत में ‘धर्म’ शब्द मजहब या ‘रिलीजन’का पर्यायवाची नहीं अपितु समूची समाज व्यवस्था का वाचक शब्द है. मगर आज के हिन्दुत्व वादियों ने धर्म को because मजहब से जोड़ दिया है. इसलिए आज राजनैतिक दलों में सत्ता प्राप्ति के लिए छोटे मोटे चुनावी युद्ध भी होते हैं तो मीडिया द्वारा उन्हें ‘महाभारत’ बताकर लोगों को भरमाने की कोशिश की जाती है,जबकि महाभारत के राजधर्म के सिद्धांत आज देश में पूरी तरह भुला दिए गए हैं.

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द्वापर युग की महाभारत तो अठारह दिनों में समाप्त हो गई थी. पर आज की मीडिया में सारा साल महाभारत का युद्ध लड़ा जाता है. पुराकाल में महाभारत का धर्मयुद्ध दुर्योधनी तंत्र के अत्याचार के विरुद्ध because लड़ा गया था और इसका नेतृत्व धर्मराज युधिष्ठर के पक्ष में खड़े होकर तब साक्षात् ईश्वर के अवतार भगवान् कृष्ण स्वयं कर रहे थे.

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भारत में ही नहीं अपितु समस्त विश्व साहित्य में गीता इस दृष्टि से एक अद्भुत ग्रन्थ है कि जिज्ञासापूर्ण प्रश्नोत्तरी की शैली में लिखा गया यह ग्रन्थ हर युग में दुर्योधनी तंत्र के अत्याचार के विरुद्ध लड़ा गया धर्मयुद्ध है. because यह धर्म के नाम पर पैदा हुई विकृतियों और भ्रांतियों के निराकरण का भी ग्रन्थ है. इस कालजयी रचना में प्रश्न पूछने वाला पूर्वपक्षी भी कोई सामान्य जन नहीं बल्कि स्वधर्म से भटका हुआ किन्तु सामाजिक मूल्यों के प्रति जागरूक एक अर्जुन जैसा विचारशील  शिष्य है.

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सभ्यताओं के इतिहास में कृष्ण जैसे ईश्वर तुल्य धर्मप्रवर्तक बहुत बार मिल जाते हैं,किंतु अर्जुन जैसा जिज्ञासु प्रश्नकर्ता गीता के because अलावा अन्यत्र मिलना कठिन है. कुरान, बाइबिल, तथा अन्य धार्मिक ग्रंथ निष्ठा और आस्था के ग्रंथ हैं किंतु गीता लोगों की जिज्ञासा और जीवन के संघर्षों का हल तलाशने वाला ग्रन्थ है. मनुष्य के जीवन में जितनी समस्याएं आ सकती हैं,उन तमाम समस्याओं और युगमुल्यों से गीता हर युग में संवाद करती आई है.

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यह गीता अपने कर्त्तव्य पथ से भटके हुए मोहग्रस्त अर्जुन के लिए लिखी गई है. एक आदर्श गुरु की भूमिका का निर्वाह करते हुए भगवान् कृष्ण ने अपने परम शिष्य अर्जुन की मोहग्रस्त भ्रांतियों के निराकरण हेतु सात सौ श्लोकों की गीता सुना डाली. समूची मनुष्य जाति के अस्तित्व से जुड़े जितने भी खास सवाल हो सकते हैं, अर्जुन उन तमाम  सवालों को ओढे हुए because जनता के ‘रिप्रेजेंटेटिव’की तरह धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने वाले सृष्टि के सर्जक, नियामक और संहारक भगवान कृष्ण के सामने खड़ा हुआ है और कृष्ण को भी जगतरूपी सत्ता का मुखिया होने के कारण अर्जुन के उन तमाम उल्टे सीधे सवालों के उत्तर देने पड़े हैं, जो हर युग में प्रासंगिक हैं.ऐसा ही एक मनुष्य जाति की सनातन व्यवस्था से जुड़ा ‘वर्णसंकर’की समस्या का एक महत्त्वपूर्ण सवाल अर्जुन ने प्रथम अध्याय के पांच श्लोकों (40-44) में उठाया है.

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गौरतलब है कि महाभारत के काल में जन्मना जाति तथा विवाहों की समस्या ने सामाजिक विकृति का भयंकर रूप धारण कर लिया था और महाभारत के युद्ध की विभीषिका से वर्णव्यवस्था जैसी स्वधर्म एवं कर्तव्यनिष्ठा के सिद्धान्तों पर आधारित समाज व्यवस्था के नष्ट होने की संभावना बलवती हो गई थी. इसलिए अर्जुन का युद्ध से मोहभंग होने का एक कारण यह भी because था कि युद्ध में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने से स्त्रियां विधवा हो जाती हैं,सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं. परंपरागत विवाह संस्था के भंग हो जाने से वर्णसंकर विवाहों के कारण देश या राष्ट्र में भयंकर अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इसी सामाजिक समस्या की ओर भगवान्  कृष्ण का ध्यान आकृष्ट करते हुए अर्जुन कहता है-

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“हे कृष्ण ! युद्ध के द्वारा कुल नाश होने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं,धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप because बहुत फैल जाता है. अधर्म वृद्धि होने पर कुल की स्त्रियां अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होती हैं. ऐसे वर्णसंकर कुलघातियों को नरक की प्राप्ति होंगी और उनके पितर जन भी श्राद्ध और तर्पण से वंचित होकर अधोगति को प्राप्त होंगे.”-

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:.
धर्मे
नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण
प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:.
स्त्रीषु
दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकर:..
संकरो
नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य .
पतन्ति
पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया:..
दोषैरेतै:
कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकै:.
उत्साद्यन्ते
जातिधर्मा:कुलधर्माश्च शाश्वता:..
उत्सन्नकुलधर्माणां
मनुष्याणां जनार्दन .
नरकेऽनियतं
वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥”
गीता,1.40-44

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यहां अर्जुन की समस्या बहुत तर्कसंगत और औचित्यपूर्ण लगती है कि जब किसी नस्ल ,धर्म और जाति का अंत समीप होता है, तब उसके कुल परंपरा से आए हुए पुरातन सिद्धांत सबसे पहले नष्ट होने because लगते हैं. परिणामतः पूरा परिवार अज्ञानता एवं कुरीतियों और निजी स्वार्थों के अधीन होकर अपने अंत की ओर अग्रसर होने लगता है. यही कुरीतियां आगे चलकर समाज को पतन की ओर ले जाती हैं और व्यक्ति और राष्ट्र स्वधर्म तथा परधर्म के विवेक को खो देते हैं.

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दरअसल, हम जब गीता को भगवान कृष्ण द्वारा उपदिष्ट कालजयी चिंतन कहते हैं तो हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि अर्जुन पांच हजार वर्ष पुराने महाभारत के काल में रहता हुआ भी वर्त्तमान समय के युगमूल्यों से ताजा संवाद कर रहा है. आधुनिक भारतीय समाज जिन राजनैतिक और सामाजिक उथल पुथल के तहत अपनी हजारों वर्ष पुरानी वर्ण व्यवस्था because और जाति प्रथा को आज संवैधानिक दृष्टि से तिलांजलि दे चुका है तथा वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं की कठपुतली बना हुआ है. गीता का समाज दर्शन उन आधुनिक राजनैतिक मूल्यों के साथ भी सीधा संवाद कर रहा है जो गुलामी की मानसिकता के कारण उपजी हैं.

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चुनावी युद्ध में सत्ताकामी ये सबके सब नेता चाहे वे किसी भी जाति के हों शक्तिशाली,धनबली,बाहुबली बन कर लोकतंत्र रूपी द्रौपदी का चीरहरण करने में लगे हैं. आज  कुरुक्षेत्र में जो वर्त्तमान because महाभारत चल रही है उसमें न भीष्म हैं, न विदुर, जो इन नेताओं को ‘शांतिपर्व’या  ‘अनुशासन’पर्व के ‘राजधर्म’का पाठ पढा सकें.

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शायद स्वयं को सनातन धर्मी हिन्दू भी यह भूल चुके हैं कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने न केवल हमारी कर्मों  पर आधारित और सामाजिक समरसता के ताने बाने में ढाली गई वर्णव्यवस्था को जातियों,प्रजातियों,अगड़ों, पिछड़ों,एससी, एसटी,ओबीसी की कैटेगरियों में बांट कर पूरी तरह ध्वस्त ही नहीं कर दिया है,बल्कि गीता में भगवान् कृष्ण के कर्मणा because वर्णव्यवस्था के सिद्धांत को भी अप्रासंगिक और संविधान विरोधी सिद्ध कर दिया है. पर विडम्बना यह है कि आजादी के 73 वर्षों के बाद भी वोटों की राजनीति करने वाले राजैतिक दलों को अंग्रेजों द्वारा थोपी गई यह सनातन हिंदू धर्म विरोधी  जातिप्रथा इस लिए रामबाण ओषधि सिद्ध हो रही है क्योंकि इसके नाम से सत्ता की कुर्सी देश की मूलभूत समस्याओं का हल निकाले बिना आसानी से मिल जाती है.

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देश को काला धन, भ्रष्टाचार, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति दिलाने का दावा करके सत्ता में काबिज राजनेता चाहे वे because किसी भी राजनैतिक दल से हों,कभी पिछले दरवाजे से और कभी संवैधानिक अधि घोषणाओं के माध्यम से जातिवादी आरक्षण का लालच देकर समाज को जातियों,प्रजातियों में विभाजित करते आए हैं.

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गीता की धर्म परिभाषा के संदर्भ में इस आधुनिक जातिवादी मानसिकता को धर्म माना जाए या अधर्म इस का विवेकपूर्ण निर्णय मैं फिर कभी विस्तार से करुंगा. पर इतना जरूर कहना चाहता हूं कि because आज राजैतिक दलों के बीच जो महाभारत चल रही है उसे धर्मयुद्ध कहना तो बेईमानी ही होगी. कृष्ण, बुद्ध, महावीर और गांधी ने इस महान देश को ‘धर्मराष्ट्र’ बनाया किंतु अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’की साम्राज्यवादी मानसिकता से राज करने वाले हमारे नेताओं ने इसे ‘धृतराष्ट्र’बना दिया है.

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यही विडंबना है आज जो धर्मयुद्ध की राजनैतिक दलों में महाभारत चल रही है, उसके दोनों ओर पक्ष-विपक्ष में कौरव ही कौरव नज़र आते हैं. दोनों ओर कहीं शकुनि हैं,तो कहीं दुर्योधन,कहीं दुःशासन हैं because तो कहीं अश्वत्थामा. एक से एक मौकापरस्त दलबदलू जो अपने प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटाने में अत्यंत व्यवहार कुशल हैं. चुनावी युद्ध में सत्ताकामी ये सबके सब नेता चाहे वे किसी भी जाति के हों शक्तिशाली,धनबली,बाहुबली बन कर लोकतंत्र रूपी द्रौपदी का चीरहरण करने में लगे हैं. आज  कुरुक्षेत्र में जो वर्त्तमान महाभारत चल रही है उसमें न भीष्म हैं, न विदुर, जो इन नेताओं को ‘शांतिपर्व’या  ‘अनुशासन’पर्व के ‘राजधर्म’का पाठ पढा सकें.

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दूर-दूर तक देखने पर भी कोई कृष्ण तो क्या विषादग्रस्त अर्जुन तक नज़र नहीं आता और न ही देखने में आता है इस धर्मयुद्ध का आंखों देखा हाल बताने वाला संजय जैसा निष्पक्ष पत्रकार,जो इस because समय देश की व्यथापूर्ण दुर्दशा को देखते हए कह सके कि-‘यह कैसा धर्मयुद्ध है ! जहां क्षणिक सत्ता के लोभ से समस्त लोग स्वधर्म का त्याग करते हुए स्वजनों को ही मारने के लिए उद्यत हैं’-

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्.
यद्राज्यसुखलोभेन
हन्तुं स्वजनमुद्यताः.. ”
गीता,1.45

समस्त देशवासियों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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