मंजू दिल से… भाग-15

  • मंजू काला

सदियों से समंद हिंदुस्तान की जन-आस्थाओं के साथ पूरे परिवेश के साथ जुड़े रहे हैं. समंदर का भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म और अर्थ के क्षेत्र में विशेष स्थान रहा है. because रत्नाकर के रूप में सागर भारत भूमि को अनादिकाल से धन-धान्य से समृद्ध करते रहे हैं. सभ्यता के प्रारम्भ से लेकर आज तक भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग अपने जीवन निर्वाह के लिये पूरी तरह से समुद्रों पर ही आश्रित रहा है. आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हमने हर प्रकार से समुद्र का आशीर्वाद लिया है.

मनुष्य

मेरा मानना है कि समुद्र मंथन से प्राप्त रत्नों के कारण ही हमें विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता होने का गौरव प्राप्त हुआ. सदियों से हमारे पर्यावरण की रक्षा भी इन्हीं से होती रही है. because लेकिन, खेद के साथ लिखना चाहती हूँ कि हम सब समुद्र तट पर बैठ कर धरती की रेती को अपनी आभा से निहाल करते, सूर्य देव को निहारते हुए चिप्स कोला गटकते रहते हैं!  सच तो यह है कि हम अपने देश की सामुद्रिक विरासत से परिचित ही नहीं है, तो आज इस आलेख के माध्यम से आइए न!, परिचित होते हैं हिंदुस्तान की सामुद्रिक विरासत से!

मनुष्य

हमारे देश का अपना एक सामुद्रिक इतिहास रहा है और समुद्री क्रियाकलापों संबंधी बातों का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है. हमारे पुराणों से हमें महासागर, समंदर और नदियों because से जुड़ी हुई ऐसी कई घटनाओं की जानकारी मिलती है, जिससे इस बात का पता चलता है कि मानव को समंदर और महासागर रूपी संपदा से काफ़ी लाभ हासिल हुआ है! भारतीय साहित्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला और पुरातत्व-विज्ञान से प्राप्त कई साक्ष्य भी हमारे  देश की सामुद्रिक परंपराओं के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं.

मनुष्य

यदि हम हमारे देश के समुद्री इतिहास का because अध्ययन करें, तो इस बात का पता चलता है कि प्राचीन काल से लेकर 13वीं शताब्दी तक हिंद महासागर पर भारतीय उप महाद्वीप का वर्चस्व कायम रहा है!

मनुष्य

यूनान के मानव विज्ञानी because और चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में मकदूनिया के दूत रहे मेगस्थनिज ने उस दौरान पाटलिपुत्र में सशस्त्र सेनाओं के प्रशासन का वर्णन किया है. और एक विशेष समूह के होने की बात कही है, जो समुद्री-युद्ध के विभिन्न पहलुओं को देखा करता था, यही कारण है कि मगध साम्राज्य की जलसेना को साक्ष्य के आधार पर विश्व की प्रथम जलसेना होने की संज्ञा दी जाती है.

मनुष्य

राजनीतिक कारणों से अधिक व्यापार के लिए हिंदुस्तानी समुद्री रास्तों का प्रयोग करते थे. इस प्रकार 16वीं शताब्दी तक का काल देशों के मध्य समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार, because संस्कृति और परंपरागत लेन-देन का गवाह रहा है. हिंद महासागर को हमेशा एक विशेष महत्व का क्षेत्र माना जाता रहा है और भारत के इतिहास में हिंद महासागर का अपना एक मुकाम है.

मनुष्य

हमारे सामुद्रिक इतिहास का आरंभ because 3000 ई. पू. से होता है. इस दौरान, सिंधु घाटी की सभ्यता के निवासियों का समुद्री व्यापार मेसोपोटामिया के साथ होता था.! मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त साक्ष्यों से यह बात सामने आई है कि इस काल में समुद्री गतिविधियों में अच्छी प्रगति हुई है.

मनुष्य

पढ़ें—पैठणी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है औरंगाबाद का पैठण

लोथल (अहमदाबाद से लगभग 400 किमी दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित) में शुष्क गोदी (ड्राई-डॉक) की खोज से यह because पता चला है कि ज्वार-भाटा, पवनों और अन्य समुद्री कारक उस काल में भी विद्यमान थे. लोथल से प्राप्त ड्राई-डॉक 2400 ई. पू. का है और इसे विश्व की प्रथम ऐसी सुविधा माना जाता है जिस पर पोतों के आश्रय और उनकी मरम्मत की सुविधा थी.

मनुष्य

वैदिक साहित्य में नौकाओं पोतों और समुद्री यात्राओं का उल्लेख कई बार आया है. अभिलेख की बात करें तो ऋग्वेद वह सबसे पुराना साक्ष्य है जिसके अनुसार वरुण समुद्र के because देवता हैं और पोतों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले महासागरीय मार्गों का उन्हें ज्ञान था. ऋग्वेद में इस बात का उल्लेख है कि व्यापार और धन की खोज में व्यापारी महासागर के रास्ते दूसरे देश में जाया करते थे. महाकाव्य रामायण और महाभारत में भी पोतों और समुद्री यात्राओं का वर्णन है. यहाँ तक कि पुराणों में भी समुद्री यात्राओं की कथाएँ वर्णित हैं.

मनुष्य

नंद और मौर्य काल में बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार गतिविधियाँ हुईं जिनसे अनेक राष्ट्र और भारत के बीच नज़दीकियाँ बढ़ीं. इससे भारत की संस्कृति और धार्मिक विश्वासों का because प्रचार-प्रसार अन्य देशों में हुआ. मौर्य वंश की समुद्री गतिविधियों के चलते भारतीय इंडोनेशिया और आस-पास के द्वीपों पर जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ. इस काल में, भारत पर सिकंदर ने आक्रमण किया. यूनान और रोम के साहित्यिक अभिलेखों से नंद और मौर्य साम्राज्यों के दौरान समुद्री व्यापार होने के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं.

मनुष्य

यूनान के मानव विज्ञानी और चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में मकदूनिया के दूत रहे मेगस्थनिज ने उस दौरान पाटलिपुत्र में सशस्त्र सेनाओं के प्रशासन का वर्णन किया है. और एक विशेष समूह के होने की बात कही है, जो समुद्री-युद्ध के विभिन्न पहलुओं को देखा करता था, यही कारण है कि मगध साम्राज्य की जलसेना को because साक्ष्य के आधार पर विश्व की प्रथम जलसेना होने की संज्ञा दी जाती है. चंद्रगुप्त के मंत्री चाणक्य ने अर्थशास्त्र की रचना इसी कल में की, जिसमें एक नवध्यक्ष (पोतों के अधीक्षक के अधीन जलमार्ग विभाग के कार्य करने संबंधी ब्यौरे उपलब्ध हैं. अर्थशास्त्र में ‘युद्ध कार्यालय’ के रूप में स्थापित एडमिरल्टी डिवीजन का भी उल्लेख है जिसे महासागरों, झीलों और समुद्रों में नौचालन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. मौर्य शासन के दौरान रखी जाने वाले विभिन्न प्रकार की नौकाओं और उनके प्रयोजन की विस्तृत जानकारी भी इस पुस्तक में उपलब्ध है.

मनुष्य

इस बात के प्रमाण हैं कि because अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए पश्चिम बंगाल के ताम्रलिटित से समुद्र के रास्ते सिलोन जाते समय उपहार के तौर पर अपने साथ पवित्र बरगद वृक्ष का एक पौधा ले गए थे. अशोक ने दक्षिण-पूर्व एशिया में समुद्र के रास्ते कई साम्राज्यों में अपने दूत भी भेजे थे.

मनुष्य

अशोक महान के शासन काल में मौर्य साम्राज्य लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप तक फैला था और उसके व्यापारिक संबंध श्रीलंका, मिस्र, सीरिया और मकदूनिया के साथ थे. अशोक because के प्रिय कार्यों में से एक था- बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार. इस बात के प्रमाण हैं कि अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए पश्चिम बंगाल के ताम्रलिटित से समुद्र के रास्ते सिलोन जाते समय उपहार के तौर पर अपने साथ पवित्र बरगद वृक्ष का एक पौधा ले गए थे. अशोक ने दक्षिण-पूर्व एशिया में समुद्र के रास्ते कई साम्राज्यों में अपने दूत भी भेजे थे.

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सातवाहन वंश ने भी (200 ई.पू.-200 ई.)  दक्कन क्षेत्र में शासन किया था और उनका साम्राज्य आज के कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात के सौरास्ट्र के हिस्सों तक फैला हुआ था. बंगाल की खाड़ी से लगे भारत के पूर्वी तट पर उनका नियंत्रण था और रोम साम्राज्य के साथ उनके व्यापारिक संबंध काफ़ी अच्छे थे. because सातवाहन भारतीय मूल के प्रथम शासक हुए जिन्होनें अपने सिक्कों पर पोत अंकित किए व उनके दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न भागों में समुद्र के रास्ते संस्कृति, भाषा और हिंदू धर्म के प्रचार किए जाने के भी साक्ष्य मिलते हैं.

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चीन के सन्यासी फ़ाहियान

हम जानते हैं कि 320-500 ई. के बीच गुप्त साम्राज्य उत्तर, मध्य और दक्षिण भारत के भागों तक फैल चुका था व इस काल को ‘भारत का स्वर्ण युग’ कहा जाता है! चंद्रगुप्त प्रथम, because समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक थे. बोध गया, सारनाथ और वाराणसी में बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के उद्देश्य से 399 ई. में भारत आए चीन के सन्यासी फ़ाहियान ने गुप्त साम्राज्य के बारे में आँखों देखा वर्णन किया है. विदेशी व्यापार में विस्तार होने के साथ ही गुप्त काल में सामान्य समृद्धि, आर्थिक-प्रगति, सांस्कृतिक अभिवृद्धि कलात्मक विकास और स्थापत्य कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिली.

मनुष्य

413 ई. में फ़ाहियान अपनी मात्रभूमि लौटते समय बंगाल मे ताम्रलिटित से जलमार्ग के रास्ते रवाना हुआ और 14 दिनों के बाद सिलोन पहुँचकर जावा के लिए पोत द्वारा निकोबार और मलक्का के जलडमरूमध्य को पार करते हुए प्रशांत महासागर पहुँचा. फ़ाहियान की रचनाओं से यह प्रमाणित होता है कि ईसा काल के आरंभिक वर्षों में because महासागरीय नौचालन भलीभाँति विकसित था. 633-645 ई. के बीच भारत का भ्रमण करने वाले एक अन्य चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस बात का आँखों देखा वर्णन किया है कि गुप्त काल के दौरान अन्य देशों के साथ हमारा व्यापार बड़े पैमाने पर हो रहा था. इस काल के दौरान खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई.

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इतिहास में महान खगोलविद के रूप में प्रसिद्ध आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे विद्वानों का संबंध भी इसी काल से था. खगोलीय पिंडों की माप इस काल में सही ढंग से होने लगी because और ज्ञात तारों की मदद से स्थिति के अनुमानित आकलन के आधार पर महासागरीय नौचालन कला की शुरुआत हो गई. इस काल के दौरान, पूर्व और पश्चिम में कई पत्तनो का निर्माण किया गया जिनसे यूरोप और अफ्रीका के देशों के साथ हमारे समुद्री व्यापार बड़े पैमाने पर पुनः शुरू हुए.

चोल, चेर और पांड्य वंश

इस समय भारतीय प्रायद्वीप बड़ा शक्तिशाली था.  चोल, चेर व पांडय शासकों ने सुमात्रा, जावा, मलय प्रायद्वीप, थाईलैंड और चीन के स्थानीय शासकों के साथ सामुद्रिक  (व्यापारिक) रिश्ते मजबूत कर लिए थे. समुद्री यात्राओं के दौरान मौसमी पावनों का ज्ञान भी विकसित हुआ. चोल राजवंशों के (3 ई. – 13 वीं शताब्दी) because शासन कल में समुद्री व्यापार विस्तृत पैमाने पर होता था और इस काल में आवास भंडार ग्रहों और वर्कशॉप वाले नए पत्तनो की स्थापना हुई. अपने व्यापारिक पोतों की सुरक्षा में लगी शक्तिशाली नौसेना की सहायता के लिए भारतीय तटों के किनारे पोतों की मरम्मत के लिए यार्ड, गोदी और लाइट हाउस बनाए गए थे. भारत के पूर्वी समुद्र तटीय भाग और सुदूर पूर्व के बीच फैले श्री विजय साम्राज्य के दौरान 5वीं से 12वीं शताब्दी के बीच हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार हुआ.

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श्री विजय साम्राज्य, सांस्कृतिक और व्यापारिक अभियान का परिणाम यह हुआ कि वे सुमात्रा, बर्मा, मलय प्रायद्वीप, जावा, थाईलैंड, और इंडोनेशिया जैसे सुदूरवर्ती देशों के संपर्क because में आए. भारत, अरब और चीन के व्यापारी वर्ग उत्कृष्ट सुविधाओं वाले पत्तनो की ओर आकर्षित हुए. चोलों, तमिल राजाओं और श्री विजय साम्राज्य के बीच आपसी मतभेदों के कारण 10 वीं शताब्दी के अंत में उनकी जलसेनाओं के मध्य कई समुद्री लड़ाइयाँ लड़ी गई और ये साम्राज्य कमजोर हो गए तथा इस क्षेत्र में अरबों को अपना प्रभुत्व स्थापित करने का मौका मिला.

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विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न भागों के साथ समंदर के जरिये मजबूत रिश्ते बना लिए थे और इस प्रकार भारत की संस्कृति और परंपरा की पताका भी because दक्षिण पूर्व एशिया में लहरा रहे थे. आज भी दक्षिण पूर्व एशिया में इसका प्रभाव देखने को मिलता है! वहाँ अभी भी अनेक स्थानों और लोगों के नाम भारतीय मूल के हैं. 

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1007 ई. में चोलों ने श्री विजय को हराकर मलय प्रायद्वीप, जावा, सुमात्रा और कुछ पड़ोसी द्वीपों पर शासन किया. पांड्य राजवंश (6 ठीं -16 वीं शताब्दी) प्रसिद्ध नाविक और समुद्री व्यापारी थे जिनके संबंध रोम साम्राज्य और पश्चिम में मिश्र से लेकर पूर्व में चीन तक फैले थे! भारत की दक्षिणी तटरेखा पर किए जाने वाले मोती के उत्पादन, उनके नियंत्रण में थी जिसमें उस समय के सबसे उत्कृष्ट मोती का उत्पादन किया गया.

यूनान और रोम के साथ चेर साम्राज्य (12वीं शताब्दी) के व्यापारिक संबंध बहुत फले फूले. वे अपना नौचालन अरब सागर से मिलने वाली नदियों के ज़रिए करते थे. वे टिडीज (कोच्चि केbecause नज़दीक आज के पेटीयापत्तनम) और मुजरिस (कोच्चि के ही नज़दीक आज के पत्तनम) से अरब के पतनों तक सीधा अपने पोतों को ले जाने के लिए मानसूनी पवनों का प्रयोग करते थे.

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विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न भागों के साथ समंदर के जरिये मजबूत रिश्ते बना लिए थे और इस प्रकार भारत की संस्कृति और परंपरा की पताका भी दक्षिण पूर्व एशिया because में लहरा रहे थे. आज भी दक्षिण पूर्व एशिया में इसका प्रभाव देखने को मिलता है! वहाँ अभी भी अनेक स्थानों और लोगों के नाम भारतीय मूल के हैं.  इस क्षेत्र में हिंदू और बौद्ध, दोनों धर्मों, संस्कृतियों और वास्तुकला को फैलाने में भी विजय नगर साम्राज्यों के जलपोतों का रहा है.

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13वीं और 15वीं शताब्दी 

इस दौरान उत्तर भारत के अधिकांश भागों पर जहाँ दिल्ली सल्तनत का प्रभुत्व कायम था, वहीं दक्षिण भारत के अधिकांश हिस्सों पर विजय नगर साम्राज्य का नियंत्रण था.

कहा जाता है कि 8वीं शताब्दी तक अरब के रहबासी, व्यापारी वर्ग के रूप में समुद्र के रास्ते बड़ी संख्या में हिंदोस्ता because आने लगे थे. कुछ समय के बाद, आज के पश्चिम एशिया के कई भाग यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया और भारत के बीच व्यापार के केन्द्र बिन्दु बन शीघ्र ही, अरबों ने व्यापार मार्गों पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया और पश्चिम तथा पूर्व के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने लगे. 900 ई. से 1300 ई. तक के काल को दक्षिण पूर्व एशिया में समुद्री व्यापार का आरंभिक युग माना जाता है.

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जैसा कि हम जानते हैं कि मुगलों ने 1526 ई. से 1707 ई. तक उत्तर भारत के अधिकांश भागों पर शासन किया. भू-संसाधनों से पर्याप्त राजस्व प्राप्त होने के कारण उन्होंने because समुद्री मामलों पर विशेष ध्यान नहीं दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि अरबों का हिंद महासागर में व्यापार पर एकाधिकार स्थापित हो गया. पूरब में हिन्दुस्तान के नाम से प्रसिद्ध समृद्ध भूमि के बारे में सुनकर यूरोप के कई देशों को यह लगा कि व्यापार के लिए उन्हें किसी सीधे समुद्री मार्ग की तलाश करनी चाहिए. इसमें सबसे पहले पुर्तगाल को सफलता मिली और भारतीय तटों पर पहुँचने वाला वह प्रथम यूरोपियन देश बन गया.

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इतिहासकारों के अनुसार, १६वीं शताब्दी से पहले, हिंद महासागर के शान्त जल में सक्रिय और समृद्ध वाणिज्यिक व्यापार होता था, जिसमें पूर्व अफ्रीका के अधिकतर तटीय और समुद्री समुदायों से लेकर मलेशिया और इंडोनेशिया द्वीप तक के लोग सक्रिय रूप से भाग लेते थे. वास्को डी गामा! (1400-1524) पुर्तगाल का because अन्वेषक था. जिसने पुर्तगाल से भारत तक के महासागरीय मार्ग की खोज की. पुर्तगाल से जलयात्रा शुरू कर उसने अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ का चक्कर लगाया और तब जाकर मई 1498 में वह केरल के कालिक पहुँचा. उसके आगमन से भारत के समुद्री इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई. पूरे हिंद महासागर पर नियंत्रण रखने की रणनीति बनाने वाले पुर्तगाली व्यापारियों के आगमन से शांतिपूर्ण ढंग से हो रहे समुद्री व्यापार में बाधा उत्पन्न हुई.

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पुर्तगालियों ने कालिकट, कोचीन, गोवा, सूरत और पश्चिमी तट पर स्थित अन्य पत्तनों के समीप कारखानें स्थापित किए. उन्होंने हर्मुज, सोकोट्रा अदन और मलक्का जैसे महत्वपूर्ण पत्तनों का because नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया. ऐसा उन्होंने हिन्द महासागर से हो रहे व्यापार पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया. इससे हिन्द महासागर क्षेत्र में होने वाले व्यापार पर अरबों के एकाधिकार समाप्त हो गया.

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जमोटिन, जिनकी राजधानी कालिकट थी, एक बहुत बड़ा व्यापार पत्तन था जहाँ से ज़मीन और समुद्र के रास्ते बड़े पैमाने पर व्यापार होता था. जब वास्को डी गामा कालिकट पहुँचा तो जमोटिन के शासक ने पुर्तगालियों को व्यापार करने की अनुमति दे दी. यह बात अरब के उन व्यापारियों को पसंद नहीं आई जो जमोटिन के साथ पहले से because व्यापार कर रहे थे. जब जमोटिन के राजा ने उनसे सामान्य सीमाशुल्क की माँग की तब वास्को डी गामा ने शुल्क चुकाने से मना कर दिया और यूरोप वापस जाने हेतु कालिकट से निकला. इसके बाद कोच्चि और कन्नानूर के राजाओं के साथ पुर्तगालियों के मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गए और इन सब ने मिलकर जमोटिन पत्तनों पर कई आक्रमण किए. जमोटिन ने एक शताब्दी से अधिक समय तक पुर्तगालियों का मुकाबला किया.

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इस संघर्ष के दौरान, उस समय के नेवल कमांडर कुंजाली मरक्कारों ने कई अवसरों पर अपनी सामरिक कुशलता और पराक्रम को साबित किया..!कुंजाली मरक्कार की उपाधि जमोटिन के राजा के नेवल प्रमुख को दी गई थी. 1502 और 1600 के बीच पुर्तगालियों और जमोटिन की नौसेनाओं के बीच हुए जल युद्ध में चार प्रमुख कुंजालियों ने भाग लिया. चार मरक्कारों में, कुंजाली मरक्कार द्वितीय सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ. भारतीय तटों की नेवल सुरक्षा का संगठन प्रथम बार करने का श्रेय कुंजाली मरक्कार को ही दिया जाता है. कुंजाली शब्द “कुंज और अली” से मिलकर बना है जिसका अर्थ मलयालम में ‘प्रिय अली’ होता है. कुंजाली मरक्कारों के पास भले ही गोला-बारूद और विशाल पुर्तगाली जलयान जैसे संसाधनों का अभाव रहा हो, उन्होंने 90 वर्ष से अधिक समय तक पुर्तगालियों को मलाबार तट पर पाँव जमाने नहीं दिया.!

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1509 की बात है, जब अल्फ़ासों-डी-अल्बुकर्क कोच्चि में पुर्तगाली गवर्नर बनकर आया था, तब जमोटिन को हटाने में नाकाम रहने के उपरांत उसने 1510 ई. में बीजापुर (आज के कर्नाटक) के because सुल्तान को हटाकर गोवा और इसके आस-पास के इलाक़ों को अपने अधिकार में ले लिया था, इसके बाद से गोवा पुर्तगाली भारत का मुख्यालय और पुर्तगाली वायसराय का निवास स्थान बन गया.

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जानकर कहते हैं कि नीदरलैंड्स के एमसटर्डम में, 1592ई. में स्थापित डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पहले व्यापारिक बेड़े को रवाना किया था, जो 1595ई. में भारत पहुँचा था. because हिन्द महासागरीय क्षेत्र में प्रथम डच बेस की स्थापना बटाविया (वर्तमान में जकार्ता, इंडोनेशिया के रूप में प्रसिद्ध) में की गयी थी. बताते हैं कि उन्होनें पुर्तगालियों को चुनौती नहीं दी और उन्हें 1608 ई. में पुलिकट में व्यापार केन्द्र स्थापित करने की अनुमति दे दी गई, जिससे डच कोरोमंडल का निर्माण हुआ. बाद में, डच सूरत और डच बंगाल की स्थापना क्रमशः 1616 और 1627ई. में हुई थी. डचों ने 1661 के आस-पास मालाबर तट के किलों आर विजय प्राप्त की और सिलोन को पुर्तगाली आक्रमण से बचाने के लिए डच मालाबार की नींव रखी. वस्त्रों के अतिरिक्त, डच जिन चीज़ों का व्यापार करते थे. उनमें कीमती रत्न, नील, रेशम, अफी, दालचीनी और कालीमिर्च शामिल थे.

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जब ईस्ट इंडिया  कंपनी की स्थापना 31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड में हुई, तभी कैप्टन विलियम हॉकिन्स के नेतृत्व में कंपनी का एक पोत ‘हेक्टर’ सूरत पहुँचा. कैप्टन विलियम हॉकिन्स अपने साथ सम्राट जहाँगीर के लिए एक पत्र लाए थे, जिसमें मुगल के अधिकार वाले क्षेत्रों के साथ व्यापार करने का अनुरोध किया गया था. because सम्राट जहाँगीर ने व्यापार करने की अनुमति दे दी और अन्य व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान करने का वादा भी किया. उस समय भारत में यूरोपियन शक्ति के रूप में पुर्तगालियों का वर्चस्व कायम था और यह सोचकर कि अंग्रेज़ों के आगमन से उनका व्यापार प्रभावित हो सकता है, पुर्तगालियों को भारत में अंग्रेज़ों का आगमन अच्छा नहीं लगा.

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हिन्द महासागरीय क्षेत्र में फ्रांसीसियों का आगमन 1740ई. में हुआ और उन्होंने मॉरीशस में एक सुदृढ़ बेस की स्थापना की. आख़िरकार, वे सूरत और पांडिचेरी पहुँचे जहाँ उन्होंने व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना की. बाद के वर्षों में फ्रांसीसी प्रतिष्ठानों की स्थापना कराईकल, यानाओन, माहे और चंद्रनागोर आज बंगाल में चंदननगर के because रूप में प्रसिद्ध में हुई. 18वीं शताब्दी के दौरान, हिन्द महासागर में अंग्रेज़ों के आधिपत्य को मुख्य चुनौती फ्रांसीसियों से मिल रही थी. 1744 और 1760 के बीच दक्षिण भारत और बंगाल के पूर्वी तट के किनारे किलों और शहरों पर विजय प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों ने लगातार एक दूसरे पर आक्रमण किए. फ्रांसीसियों को आरंभ में कुछ सफलता मिली परंतु 1760 में तमिलनाडु के वॉडीवाश के युद्ध में अंग्रेज़ों ने फ्रांसीसियों पर निर्णायक विजय प्राप्त की.

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अंग्रेज समुद्र के महत्व को जानते थे. because प्रांतों की भूमि को अधिकार में लेने के अतिरिक्त उन्होंने एक नौसेना की स्थापना की जो उनके समुद्री व्यापार की सुरक्षा करने के साथ शत्रुओं को दूर रखने का कार्य करती थी. इस प्रकार एक बलशाली नौसेना ने भारत पर शासन करने में भी अंग्रेज़ों की सहायता की.

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भारतीय तटों पर नियंत्रण करने के अंग्रेज़ों के प्रयासों का मराठो ने डटकर सामना किया. मुगलों के लगातार आक्रमण का सामना कर रहे मराठो के पास आरंभ में कोई नौसेना नहीं थी. because शिवाजी वे प्रथम योद्धा थे जिन्हें एक मजबूत नौसेना की आवश्यकता महसूस हुई. सिद्दियों (जिनके बेस मुरुद जंजीरा में थे) से लड़ने के क्रम में और कोंकण तट पर पुर्तगालियों की नौसैन्य शक्ति को देखकर शिवाजी को कुशल पत्तन प्रणाली और मजबूत नौसेना के महत्व का पता चला. शिवाजी का दुर्गों में विश्वास था और उन्होंने विजयदुर्ग, सिन्धुदुर्ग (Sindhudurg) और अन्य स्थानों की तरह कोंकण तट पर कई तटीय दुर्गों का निर्माण करवाया. उन्होंने तटों की अपेक्षा छोटी पहाड़ियों पर किलों का निर्माण करवाया ताकि किलों की ठोस सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

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मराठो की नौसेना शीघ्र ही because बलशाली हो गई और उसने कोलाबा, सिन्धुदुर्ग, विजयदुर्ग और रत्नागिरी स्थित दुर्गों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया. मराठो ने 40 वर्ष से अधिक तक अपने दम पर पुर्तगालियों और अंग्रेज़ों को रोक कर रखा. शिवाजी के समय में मराठो की नौसेना एक प्रबल सेना के रूप में विकसित हो गई थी. जिसमें 500 से अधिक पोत थे लेकिन 1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु के उपरांत मराठो की नौसेना कमजोर हो गई थी.

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कान्होजी

कन्होजी आंग्रे 1699 ई. में मराठा बेड़े सारकेल (एडमिरल) के रूप में शामिल हुए. पहले तो कान्होजी का पूरा ध्यान अपने बेड़े में पोतों की संख्या 10 से बढ़ाकर लगभग 50 because गलबट और 10 जुटाव करने पर केंद्रित रहा. ऐसा करने से उसकी सेना एक विशाल नौसेन्य बल में तब्दील हो गई. उन्होंने उन किलों को पुनः अधिकार में लिया जिन्हे मराठो की नौसेना सिद्दियों के हाथों गँवा चुकी थी. सिद्दियों पर निर्णायक विजय प्राप्त करने के उपरांत उनका ध्यान पुर्तगालियों की ओर गया.

कान्होजी ने उन पुर्तगाली व्यापारिक पोतों आर आक्रमण करना तथा उन्हें कब्ज़े में लेना शुरू किया. जिन्होंने कान्होजी का पासपोर्ट खरीदने से इनकार कर दिया. पुर्तगालियों ने इन आक्रमणों का प्रतिकार तो किया परंतु मराठो की संख्या के आगे टिक न सके और पराजित हुए. अंततः पुर्तगालियों और मराठो के बीच शांति समझौता हुआ. because पुर्तगाल के मामले को निपटने और अपने पक्ष में करने के बाद कान्होजी ने अपना ध्यान अंग्रेज़ों पर केंद्रित किया. मुंबई में अंग्रेज़ों का पत्तन कान्होजी के कोलाबा के किले से काफ़ी नज़दीक अंग्रेज़ों ने कान्होजी को अपने लिए ख़तरा मानते हुए सभी शत्रुओं को अपने पक्ष में करना शुरू किया. ब्रिटिश गवर्नर चार्ल्स बून और विख्यात सारकेल कान्होजी के बीच 10 वर्षों से भी अधिक समय तक कई लड़ाइयाँ लड़ी गई. जिनमें दोनों को भारी नुकसान हुआ.

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आख़िरकार, 1724 में सारकेल कान्होजी ने ब्रिटिश गवर्नर विलियम फिपस के पास शांति का प्रस्ताव भेजा. किसी प्रकार का औपचारिक समझौता न होने और दोनों के किन्हीं because गतिविधियों में भाग न लेने से युद्ध विराम के भंग होने का ख़तरा बना रहा. कान्होजी इस प्रकार समुद्र में किसी से नहीं हारे. कुछ वर्षों बाद, कान्होजी आंग्रे की मृत्यु हो गई और अंग्रेज़ों ने आख़िरकार 1756 में मराठा के गढ़ माने जाने वाले घेरिया के किले (विजयदुर्ग) को अपने अधिकार में ले लिया और इस प्रकार मराठो के पतन की शुरुआत हो गई.

अँग्रेज़ी हुकूमत में समुद्री भारत

ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) 01 मई 1830 को ब्रिटिश क्राउन के अधीन आई और इसे योधी का दर्जा मिल गया. तब इस सर्विस को इंडियन नेवी नाम दिया गया. 1858 में पुनः नामकरण करते हुए इसे ‘हर मेजेस्टीज़ इंडियन नेवी’ अभिहित किया गया. 1863 में इसका पुनर्गठन करते हुए इसे दो शाखाओं में बाँटा गया. बॉम्बे स्थित शाखा को बॉम्बे मरीन और कलकत्ता स्थित शाखा को बंगाल मरीन कहा गया. भारतीय जलराशि की सुरक्षा करने का कार्य रॉयल नेवी के सुपुर्द किया गया.

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द रॉयल इंडियन मरीन (आरआईएम) because का गठन 1892 में हुआ. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रॉयल इंडियन मरीन को समुद्री सर्वेक्षण, लाइट हाउसों के रख-रखाव और सैनिकों को लाने ले जाने जैसे कार्य सौंपे गए थे. 1918 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के उपरांत शीघ्र ही ब्रिटिश सरकार ने भारत में रॉयल इंडियन मरीन की नफरी को कम कर दिया. 02 अक्तूबर 1934 को इस सर्विस का नाम पुनः बदलकर रॉयल इंडियन नेवी (आर आई एन) किया गया. जिसका मुख्यालय बम्बई में था.

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जब 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई तब रॉयल इंडियन नेवी (Royal Indian Navy) में अफसरों की संख्या 114 और नाविकों की संख्या 1732 थी. उस समय बम्बई के नेवल डॉकयार्ड के भीतर स्थित नेवल हेडक्वार्टर्स में केवल 16 अफ़सर तैनात थे. चूकि, युद्ध के दौरान कमान और नियंत्रण का केंद्र बिंदु नई दिल्ली हुआ करता था, एक नेवल संपर्क अफ़सर के अक्तूबर 1939 में नई दिल्ली में तैनात किया गया. ऐसा करने का उद्देश्य महत्वपूर्ण कागज़ातों पर होने वाली कार्रवाई में लगने वाले समय को कम करना था लेकिन जब यह भी असंतोषजनक प्रतीत हुआ तो मार्च 1941 में नौसेना मुख्यालय को बम्बई से नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया.

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द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभिक चरण में रॉयल नेवी की सहायता के लिए रॉयल इंडियन नेवी के पास छ: मार्ग रक्षी जलयानों वाला एक स्क्वाड्रन था. जो समुद्र में गश्त लगाया करता था because और स्थानीय नेवल परीक्षा का दायित्व निभाता था. व्यापारिक पोतों को हथियार उपलब्ध कराए गए और भारतीय पत्तनो और उन तक जाने वाले समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए बेड़े में नए प्रकार के जलयान शामिल किए गए. रॉयल नेवी का पूर्वी बेड़ा पृष्टभूमि में अवश्य था लेकिन स्थानीय नेवल प्रतिरक्षा की ज़िम्मेदारी रॉयल इंडियन नेवी (आर आई एन) की थी.

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रॉयल इंडियन नेवी ने समाघात ड्यूटियों का निर्वाह करते हुए मध्य-पूर्व और बंगाल की खाड़ी में सराहनीय कार्य किया. उसके जलयानों ने भूमध्य और अटलांटिक दोनों यूरोपीय महासागरों में ऑपरेशन किए और शायद इसे इसका सर्वप्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण समाघात दायित्व लाल सागर में सौंपा गया. जहाँ भारतीय पोतों ने because इटली से मसावा को छीनकर उसपर अधिकार करने और सोमाली लैंड के अपतट पर इटली की नौसेना का मुकाबला करने में सक्रिय भूमिका निभाई. फ्रांस की खाड़ी में उनकी ड्यूटियाँ विशेषकर तटों की निगरानी करने और आपूर्ति करने वाले पोतों को सुरक्षा प्रदान करने की थी, वहाँ भी उन्होने सफलतापूर्वक आपरेट किया. जापान के युद्ध में शामिल होने के उपरांत, रॉयल इंडियन नेवी (आर आई एन) के लिए बर्मा के पास की जलराशि मुख्य कार्य क्षेत्र बन गया. बहादुरी और कौशल का शानदार परिचय देते हुए, उसने गश्ती कार्य और संयुक्त ओपरेशनों में कारगर ढंग से सहयोग किया.

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स्वतंत्रता के बाद का समुद्री भारत

स्वतंत्रता के उपरांत, भारत because का विभाजन होने पर रॉयल इंडियन नेवी रॉयल इंडियन नेवी और रॉयल पाकिस्तान नेवी में बँट गई.

22 अप्रैल 1958 को वाइस एडमिरल आर डी कटारी ने भारतीय नौसेना के नौसेनाध्यक्ष का पद भार संभाला और इस गौरव को प्राप्त करने वाले वे प्रथम नेवल अफ़सर बने. because रॉयल इंडियन नेवी की दो-तिहाई परिसंपत्ति भारत के पास रही और शेष पाकिस्तान की नेवी के पास चली गई. 15 अगस्त 1947 को रियर एडमिरल जे टी एस हॉल, आर आई एन को भारत के प्रथम फ्लैग अफ़सर कमांडिंग रॉयल इंडियन नेवी के रूप में नियुक्त किया गया.

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26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के बाद ‘रॉयल इंडियन नेवी’ से ‘रॉयल’ शब्द को हटा दिया गया और ‘इंडियन नेवी’ के रूप में इसका पुनः नामकरण किया गया. because 26 जनवरी 1950 को भारतीय नौसेना के प्रतीक चिह्न के रूप में रॉयल नेवी के क्रेस्ट के क्राउन का स्थान अशोक स्तंभ ने ले लिया. वेदों में वरुण देवता (समुद्र के देवता) की आराधना भारतीय नौसेना द्वारा चयनित आदर्श वाक्य “श नो वरुण:” से शुरू होती है जिसक अर्थ “वरुण देवता की कृपा हम पर हमेशा बनी रहे”. राज्य के प्रतीक के नीचे अंकित वाक्य “सत्यमेव जयते” को भारतीय नौसेना के क्रेस्ट में शामिल किया गया.

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ग्रेट ब्रिटेन में, सैन्य बलों के कमांडर-इन-चीफ़ और वहाँ की नेवी, आर्मी तथा एयर फोर्स को वहाँ के राजा, ध्वज प्रदान किया करते थे. हर विशेष समारोह के अवसर पर राजा के ध्वज तट पर होने वाली परेड में हिस्सा लेते थे. 1924 में, किंग जॉर्ज ने ब्रिटिश नेवी को अपना ध्वज प्रदान किया. 1935 में रॉयल इंडियन नेवी को because ‘राजा का ध्वज’ प्रदान किया गया. हमारा देश भारत 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र बना और इससे एक दिन पहले 25 जनवरी को रॉयल इंडियन नेवी, रॉयल इंडियन आर्मी और रॉयल इंडियन एयर फोर्स और उनकी संबंधित कमानों को भेंट किए गए सभी 33 राजा के ध्वजों की देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी में प्रदर्शनी लगाई गई.

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भारतीय नौसेना. सभी फोटो गूगल से साभार 

भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति, डा. राजेंद्र प्रसाद ने 27 मई 1951 को भारतीय नौसेना (Indian Navy) को ध्वज प्रदान किया. 21 अक्तूबर 1944 को पहली बार नौसेना दिवस मनाया गया. इस समारोह को उल्लेखनीय सफलता मिली because और इससे उत्साह का संचार हुआ. इस समारोह की सफलता के बाद इस प्रकार के कई कार्यक्रमों का और बड़े स्तर आयोजन प्रति वर्ष और सर्दी के मौसम में किया गया. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में नौसेना की सफल कार्रवाइयों, 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान कराची के बंदरगाह पर किए गए. मिसाइल आक्रमण तथा युद्ध में मारे गए सभी शहीदों की याद में 1972 से नौसेना दिवस प्रति वर्ष 04 दिसंबर को मनाया जाता रहा है..!

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(मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं. नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है.)

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Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

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