Tag: मंजू काला

 भारत की कृषि कहावतें: कहे घाघ के सुन भडूरी!

 भारत की कृषि कहावतें: कहे घाघ के सुन भडूरी!

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मंजू दिल से… भाग-32 मंजू काला कुछ पखवाड़े पहले की बात है, सुबह की चाय सुड़कते हुए एक समाचार ने मेरा ध्यान आकर्षित किया था कि  कृषि विभाग किसानों को मौसम अनुमान करने के लिए  कहावतें पढा रहा है, पढकर मुझ जैसी आधुनिका का आश्चर्य चकित होना लाजमी था,   उत्सुकता वश मैंने पड़ताल की तो  पाया कि सदियों पहले हमारे देश में  कृषि के संबंध में कुछ मुहावरे  कहे गये हैं!   मैंने जब गहराई से इन कहावतों की बाबत जानकारी इकट्ठा की तो समझ गयी की  ये  मुहावरे,  कहावतें, लोकोक्तियाँ  हमारे देश की कृषक संस्कृति  को बयां करती है,  इनमें ज्ञान भरा होता है। वैसे अरबी भाषा में एक कहावत है-, "अल-मिस्लफ़िल कलाम कल-मिल्ह फ़िततआम"  यानी बातों में-कहावतों या मुहावरों और उक्तियों की उतनी ही ज़रूरत है जितनी की खाने में नमक की।"    ग्रामीण लोक अपनी बात में वजन पैदा करने के लिए अक्सर  इन  मुहावरों का इस्तेमाल करते है...
राग मल्हार : करे, बादरा, घटा घना घोर

राग मल्हार : करे, बादरा, घटा घना घोर

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मंजू दिल से… भाग-30 मंजू काला पावस ऋतु में मल्हार अंग के रागों का गायन-वादन अत्यन्त सुखदायी होता है. वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है. काफी थाट का यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है. गांधार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता. समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गांधार स्वर का प्रयोग करते हैं. भातखंडे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रंथ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गांधार का प्रयोग भी करते हैं. लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पंडित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गांधार का प्रयोग होता था. आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है.. ऋतुओं में से पावस एक महत्वपूर्ण व उपयोगी ऋतु है. यह जीवन दायिनी ऋतु है. अन्न-जल और धान्य का बरखा...
बारहमासा : विरह और मिलन की क्रियाओं का चित्रण!

बारहमासा : विरह और मिलन की क्रियाओं का चित्रण!

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मंजू दिल से… भाग-29 मंजू काला फ़ागुन महीना... फूली सरसों... आम झरे.. अमराई.... मै अंगना में चूप- चूप देखूँ ऋतु बसंत की आई.....!!!!!   ऋतु ...बसन्त की आई! फ़ागुन का महीना... सरकती ठंड की फुरफुरी,  गुन- गुन-गुनाता मौसम,  सप्तपदी के फेरों सीं "दें" लगाती ऋतुएँ औऱ वनों के बीच बुराँश कचनार-   आह  टेशू  भी फूल उठें होंगे शायद!  अरे भाई,  पत्तों से भरी डालियों पर फ़ाख्ता भी बोल रही होगी शायद.! मेरे प्यारे पहाड़ों के गदेरों में चातकी भी बोल रही होगी मालूम!? पीले पड़ते गेहूँ, जौ के खेतों में, कफू  भी उड़ रही होगी शायद, औऱ... और,  सरसों की  वल्लरियों पर...मधुकरियाँ भी गुनती होंगी.....शायद! किसी रमणी का पति परदेश से अभी आया नहीं होगा शायद, युद्धरत होगा शायद, भूल गया होगा अपनी प्रिया को, शायद, वह पंछियों से शिकायत करती होगी शायद औऱ ऐसी ही विरहणी नायिका के लिये “बारह मासा”   लिखा होगा ...
राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

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मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से ‘मंजू दिल से…’ नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की 26वीं किस्त… म...
हिमालयन अरोमा: चुलु की चटनी और चांदनी चौक

हिमालयन अरोमा: चुलु की चटनी और चांदनी चौक

हिमालयन अरोमा
हिमालयन अरोमा भाग-2 मंजू काला हैदराबाद की गलियों में घूमते हुए मैंने कई बार ‘डोने’ बिरयानी का स्वाद चखा है, ‘बिरडोने’ बिरयानी दक्षिण भारत की एक प्रसिद्ध बिरयानी रेसिपी है। यहां डोने बिरयानी में डोने शब्द का इस्तेमाल किया गया है। डोने एक कटोरी के आकार का पात्र होता है जिसे पत्तों से तैयार किया जाता है। यह रेसिपी थोड़ी सिंपल होती है, हैदराबादी बिरयानी की तरह इसमें ज्यादा मसाले का उपयोग नहीं किया जाता है, इस रेसिपी को दक्षिण भारत में खास तरह के चावल से तैयार किया जाता है जिसे सीरागा सांबा चावल कहा जाता है। यह सांबा चावल एक तरह का चावल ही है लेकिन यह आकार में छोटा होता है और इसमें एक खास तरह का फ्लेवर होता है। इसके साथ ही इस रेसिपी में पुदीना के पत्ते के साथ मैरीनेट किए हुआ बकरी का मीट इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह से तैयार की गई इस खास बिरयानी को पत्तों से तैयार किए गए दोनों में परो...
हिमालयन अरोमा: हिमालयी  ग्वैरिल उर्फ कचनार 

हिमालयन अरोमा: हिमालयी  ग्वैरिल उर्फ कचनार 

हिमालयन अरोमा
हिमालयन अरोमा भाग-1 मंजू काला बासंती  दोपहरियों में हिमालय के because आंगन में विचरण करते  हुए  मैं  अक्सर दुपहरी  हवाओं के साथ अठखेलियाँ  करते कचनार के  पुष्पों को निहारती हूँ! जब मधुऋतु का यह मनहर पुष्प पतझड़ में  हिमवंत को सारे पत्ते न्योछावर कर नूतन किसलयों की परवाह किए बगैर वसंतागमन के पूर्व ही खिलखिल हँसने लगता है-  तब मै भी सकुन से अपनी  चेहरे पर घिर आयी शरारती अलकों को संवार कर चाय की चुस्कियां लेने लगती हूँ! ज्योतिष हिमवन में एकबारगी इसका खिलखिलाना किसी को नागवार भले लगे, किंतु यह मनभावन पुष्प अपने कर्तव्य को निभाकर मन को प्रफुल्लित कर ही देता है. दूसरी ओर, अन्य पुष्पों को भी खिलने को प्रेरित करता है. इस प्रकार, सबको प्रमुदित कर अपना अनुसरण करने को मानो बाध्य कर देता है. वसंत के इस संदेशवाहक को सबसे पहले हुलसित देखकर किस   मानुष का  because ह्रदय-कमल नहीं खिल उठता! अपन...
हिमालय के सावनी गीत…

हिमालय के सावनी गीत…

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मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से ‘मंजू दिल से…’ नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की 25वीं किस्त… म...
क्या हैं चावल से जुड़ी मान्यताएं व रस्में…

क्या हैं चावल से जुड़ी मान्यताएं व रस्में…

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देहरादून के बासमती चावल की दुनियाभर में रही है धाक! मंजू दिल से… भाग-20 मंजू काला आज धानेर खेते रोद्र छाया लुको चोरी खेला  रे भयी लुको चोरी खेला रे! (ठाकुर जी का रविंद्र संगीत) प्राचीन समय से ही भारतीय थाली में दाल और चावल परोसने की परंपरा रही है. चावल की दुनियाभर में तकरीबन चालीस हजार से ज्यादा किस्में हैं. चावल के उत्पादन में भारत दूसरे स्थान पर है. बहुत पहले विश्वभर में धान जंगली रूप में उगता था, लेकिन खुशबू तथा स्वाद के चलते चावल के किस्से मशहूर होने लगे. ढेरों किस्सों-कहानियों because से रूबरू करवाने वाले चावल की नस्लों को सहेजने के लिए फिलीपींस में एक जीन बैंक भी है. फिलीपींस का ही बनाऊ चावल खेती के लिए आठवें आश्चर्य की तरह देखा जाता है. रोचक बात यह भी है कि यहां टेरेस फॉर्मिंग जैसी जगह है, जहां समुद्र तल से 3,000 फीट की ऊंचाई पर हजारों साल पुराने खेत हैं, जहां पहाड़िय...
हिंदुस्तान की कर्नाटकी…

हिंदुस्तान की कर्नाटकी…

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मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. so आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से 'मंजू दिल से...' नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से... की 12वीं किस्त... ...
छत्तीसगढ़ : पौराणिक काल का कौशल प्रदेश…

छत्तीसगढ़ : पौराणिक काल का कौशल प्रदेश…

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बिहाय के पकवान मंजू दिल से… भाग-11 मंजू काला भांवर परत हे, भांवर परत हे हो नोनी दुलर के, so हो नोनी दुलर के होवत हे दाई, मोर but रामे सीता के बिहाव होवत हे दाई, मोर because रामे सीता के बिहाव एक भांवर परगे, because एक भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because हो नोनी दुलर के अगनी देवता दाई, because हाबय मोर साखी अगनी देवता दाई, because हाबय मोर साखी दुई भांवर परगे, because दुई भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because हो नोनी दुलर के गौरी गनेस दाई, because हाबय मोर साखी गौरी गनेस दाई, because हाबय मोर साखी तीन भांवर परगे, तीन भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because हो नोनी दुलर के देवे लोके दाई, because हाबय मोर साखी देवे लोके दाई, because हाबय मोर साखी चार भांवर परगे, चार भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because दाई नोनी दुलर के दुलरू के नोनी, because तोर अंग झन डोलय दुलरू के नोनी...